चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के परिषदीय उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत अंशकालिक अनुदेशकों के मानदेय का मामला एक बार फिर चर्चा में है। सोशल मीडिया और विभिन्न माध्यमों पर दावा किया जा रहा है कि नौ वर्षों के बकाया मानदेय के भुगतान के लिए 2,460.89 करोड़ रुपये का बजट जारी कर दिया गया है और प्रत्येक पात्र अनुदेशक के खाते में लगभग नौ लाख रुपये भेजे जाएंगे। इस दावे ने प्रदेश के हजारों अनुदेशक परिवारों की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार ने वास्तव में इतनी बड़ी धनराशि जारी कर दी है? क्या प्रत्येक अनुदेशक को नौ लाख रुपये मिलना तय हो गया है? और क्या बजट आवंटन का कोई आधिकारिक आदेश उपलब्ध है?
इन सवालों का जवाब देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले और बजट जारी होने के दावे को अलग-अलग समझना जरूरी है। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि अनुदेशकों के मानदेय को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हालांकि, 2,460.89 करोड़ रुपये का बजट जारी होने और प्रत्येक अनुदेशक को नौ लाख रुपये मिलने के दावे की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हो सकी है। इसलिए न्यायिक जीत को भुगतान की अंतिम घोषणा समझना उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
सुप्रीम कोर्ट ने 4 फरवरी 2026 को यू.पी. जूनियर हाई स्कूल काउंसिल इंस्ट्रक्टर वेलफेयर एसोसिएशन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने अंशकालिक संविदा अनुदेशकों के मानदेय में लंबे समय से वृद्धि नहीं किए जाने के मामले पर विचार किया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि योजना के अंतर्गत नियुक्त अनुदेशकों को शैक्षणिक सत्र 2017-18 से 17,000 रुपये प्रतिमाह की दर से मानदेय पाने का अधिकार है। राज्य सरकार को 1 अप्रैल 2026 से बढ़ी हुई दर पर मानदेय का भुगतान शुरू करने और बकाया राशि का भुगतान फैसले की तारीख से छह महीने के भीतर करने का निर्देश दिया गया। राज्य सरकार की अपीलें खारिज कर दी गईं, जबकि अनुदेशकों की ओर से दायर अपीलों को स्वीकार किया गया। यह आदेश अनुदेशकों के लिए कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
(स्रोत: सुप्रीम कोर्ट का मूल फैसला, 4 फरवरी 2026)
7,000 रुपये के मानदेय से शुरू हुआ था विवाद
अनुदेशकों की नियुक्ति वर्ष 2013-14 में समग्र शिक्षा अभियान की पूर्ववर्ती सर्व शिक्षा अभियान व्यवस्था के अंतर्गत हुई थी। शुरुआत में उन्हें 11 महीने की संविदा अवधि के लिए सात हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय निर्धारित किया गया था। बाद के वर्षों में उनकी सेवाएं लगातार नवीनीकृत होती रहीं, लेकिन मानदेय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई।
विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि संबंधित परियोजना अनुमोदन बोर्ड ने वर्ष 2017-18 के लिए 17,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय निर्धारित किया था। इसके बावजूद अनुदेशकों को इस दर से भुगतान नहीं किया गया। समय बीतता गया, महंगाई बढ़ती गई और अनुदेशकों की आर्थिक कठिनाइयां बनी रहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मानदेय को लंबे समय तक स्थिर रखने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने माना कि मानदेय की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए। फैसले में यह भी कहा गया कि उचित परिस्थितियों में मानदेय का पुनरीक्षण कम से कम प्रत्येक तीन वर्ष में किया जाना चाहिए।
अदालत की यह टिप्पणी केवल रकम बढ़ाने तक सीमित नहीं है। यह उन कर्मचारियों के श्रम, जिम्मेदारी और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा सवाल है, जिनसे वर्षों तक लगातार काम लिया गया, लेकिन उनके पारिश्रमिक में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
क्या नौ साल का एरियर मिलना तय है?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पात्र अनुदेशकों को वर्ष 2017-18 से 17,000 रुपये प्रतिमाह की निर्धारित दर के अनुसार बकाया मानदेय पाने का अधिकार मिला है। लेकिन किसी कर्मचारी के खाते में वास्तविक रूप से कितनी रकम आएगी, इसका निर्धारण उसकी पात्रता, संबंधित अवधि, सेवा विवरण और पहले किए गए भुगतान के आधार पर होना चाहिए।
इसलिए सभी अनुदेशकों को एक समान नौ लाख रुपये मिलने की घोषणा को बिना विभागीय गणना और आधिकारिक भुगतान आदेश के अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
यह अंतर समझना जरूरी है कि अदालत द्वारा किसी राशि का भुगतान करने का अधिकार निर्धारित करना और सरकार द्वारा प्रत्येक लाभार्थी की राशि की गणना करके भुगतान जारी करना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। पहली प्रक्रिया में अनुदेशकों को महत्वपूर्ण कानूनी सफलता मिली है। दूसरी प्रक्रिया के लिए प्रशासनिक कार्रवाई, वित्तीय स्वीकृति और पात्र लाभार्थियों का सत्यापित विवरण आवश्यक है।
2,460.89 करोड़ रुपये के बजट पर क्या है स्थिति?
प्रचलित खबर में दावा किया जा रहा है कि महानिदेशक स्कूल शिक्षा मोनिका रानी ने 2,460.89 करोड़ रुपये की धनराशि के पुनर्विनियोग का आदेश जारी कर दिया है। यह भी कहा जा रहा है कि सामान्य शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा और केंद्र प्रायोजित योजनाओं के विभिन्न लेखाशीर्षकों से धनराशि का समायोजन किया जा रहा है।
लेकिन इस दावे की पुष्टि के लिए संबंधित सरकारी पत्र की मूल प्रति, आदेश संख्या, जारी होने की तारीख, स्वीकृत बजट का विवरण और भुगतान के उद्देश्य का स्पष्ट उल्लेख जरूरी है।
उपलब्ध जानकारी के आधार पर इस विशिष्ट राशि के बजट आदेश की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है। इसलिए यह कहना कि 2,460.89 करोड़ रुपये अनुदेशकों के एरियर के भुगतान के लिए जारी हो चुके हैं, फिलहाल प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रकाशित नहीं किया जाना चाहिए।
यहां एक और महत्वपूर्ण अंतर है। बजट का पुनर्विनियोग, बजट की स्वीकृति, धनराशि का विभागीय आवंटन और लाभार्थियों के बैंक खातों में वास्तविक भुगतान अलग-अलग प्रशासनिक चरण हैं। इनमें से किसी एक चरण की कार्रवाई को सभी चरण पूरे हो जाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
छह महीने की समय-सीमा पर भी जरूरी है जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने 4 फरवरी 2026 को फैसला सुनाते हुए बकाया भुगतान के लिए छह महीने की समय-सीमा निर्धारित की थी। इस गणना के अनुसार समय-सीमा लगभग 4 अगस्त 2026 को पूरी हो गई। अब 9 अक्टूबर 2026 की स्थिति में यह जानना महत्वपूर्ण है कि सरकार ने निर्धारित समय के भीतर भुगतान पूरा किया या नहीं और यदि भुगतान लंबित है तो उसका कारण क्या है।
यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि समय-सीमा बीत जाने मात्र से किसी विशेष अधिकारी के विरुद्ध अवमानना का निष्कर्ष स्वतः नहीं निकलता। इसके लिए संबंधित न्यायिक आदेश, वास्तविक अनुपालन की स्थिति और अदालत के समक्ष रखे गए तथ्यों को देखना आवश्यक होगा।
प्रचलित खबर में 27 अक्टूबर 2026 को अगली सुनवाई होने की बात भी कही गई है। लेकिन इस तारीख की पुष्टि करने वाला संबंधित अदालती आदेश या आधिकारिक सुनवाई सूची उपलब्ध प्रमाणों से स्थापित नहीं हो सकी है। इसलिए इस तारीख को भी सत्यापित किए बिना निश्चित रूप से प्रकाशित करना उचित नहीं होगा।
अनुदेशकों को अब किस बात का इंतजार?
अनुदेशकों के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को जमीन पर उतारने की प्रक्रिया कहां तक पहुंची है। क्या पात्र अनुदेशकों की सूची तैयार हो गई है? क्या प्रत्येक अनुदेशक की सेवा अवधि और पहले किए गए भुगतान का मिलान किया गया है? क्या संबंधित विभाग ने बजट की वास्तविक स्वीकृति और आवंटन का आदेश जारी किया है? और क्या किसी जिले में एरियर का भुगतान शुरू हुआ है?
इन सवालों का जवाब संबंधित सरकारी आदेशों और विभागीय अभिलेखों से ही मिल सकता है। महानिदेशक स्कूल शिक्षा कार्यालय, बेसिक शिक्षा विभाग और जिला स्तर के संबंधित अधिकारियों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि अनुदेशकों को अफवाहों के बजाय प्रमाणित जानकारी मिल सके।
यदि बजट जारी हो चुका है, तो सरकार को आदेश सार्वजनिक करके भुगतान की प्रक्रिया और संभावित समय-सीमा बतानी चाहिए। यदि बजट की प्रक्रिया अभी अधूरी है, तो उसकी वास्तविक स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए। वर्षों से अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे कर्मचारियों को केवल उम्मीदों और चर्चाओं के सहारे नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
न्यायिक जीत के बाद अब जवाबदेही की परीक्षा
अनुदेशकों के मानदेय का मामला केवल कुछ हजार रुपये बढ़ाने या बकाया रकम देने का विषय नहीं है। यह उन कर्मचारियों के सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही से जुड़ा प्रश्न है, जिन्होंने वर्षों तक विद्यालयों में अपनी सेवाएं दी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मानदेय के मामले में अनुदेशकों के पक्ष में स्पष्ट निर्णय दिया है। अब प्रशासन की जिम्मेदारी है कि फैसले का समयबद्ध और पारदर्शी अनुपालन सुनिश्चित करे। साथ ही, समाचार माध्यमों की जिम्मेदारी है कि वे अदालत के फैसले, सरकारी बजट और वास्तविक भुगतान के बीच का अंतर पाठकों के सामने साफ रखें।
फिलहाल सबसे स्पष्ट निष्कर्ष यही है कि अनुदेशकों को 17,000 रुपये प्रतिमाह की दर से मानदेय और बकाया पाने का न्यायिक अधिकार मिला है, लेकिन 2,460.89 करोड़ रुपये जारी होने तथा प्रत्येक अनुदेशक के खाते में नौ लाख रुपये आने की खबर की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। जब तक संबंधित आदेश सार्वजनिक रूप से सत्यापित न हो जाए, तब तक इसे निश्चित भुगतान की घोषणा कहना जल्दबाजी होगी।
अनुदेशकों को न्यायिक फैसले के वास्तविक क्रियान्वयन का इंतजार है। अब सरकार को बताना चाहिए कि आदेश के अनुपालन, बजट आवंटन और बकाया भुगतान की प्रक्रिया किस चरण में है। अधिकार का फैसला अदालत ने दे दिया है; अब उस अधिकार को वास्तविक भुगतान में बदलना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
स्रोत: सुप्रीम कोर्ट का 4 फरवरी 2026 का फैसला।
रिपोर्ट: चुन्नीलाल प्रधान













