16 अक्टूबर 2026 6:34 अपराह्न

राज्यसभा चुनाव में बीजेपी का बड़ा दांव! नए चेहरों के सहारे 2027 की सामाजिक बिसात साधने की कोशिश

राज्यसभा चुनाव 2026 के लिए बीजेपी के यूपी के नए उम्मीदवारों और रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला की फीचर इमेज

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव ने एक बार फिर बड़े सियासी संकेत दिए हैं। राज्यसभा की 12 सीटों के लिए 16 अक्तूबर को होने वाले चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की अपनी आठ सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। खास बात यह है कि बीजेपी ने इन आठों सीटों पर नए चेहरों को मौका दिया है। पार्टी के मौजूदा सात राज्यसभा सांसदों में से किसी को भी दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया गया है।

उम्मीदवारों की घोषणा से पहले कई नामों को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज थीं। स्मृति ईरानी, कुमार विश्वास, संजीव बालियान, हरीश द्विवेदी, कौशल किशोर और राजवीर सिंह जैसे नाम संभावित उम्मीदवारों की सूची में बताए जा रहे थे। पार्टी के स्तर पर करीब दो दर्जन नामों पर मंथन की चर्चाएं भी सामने आई थीं। लेकिन अंतिम सूची ने इन तमाम अटकलों को पीछे छोड़ दिया।

बीजेपी के इस फैसले को केवल राज्यसभा के लिए आठ नए उम्मीदवारों का चयन मानना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि, क्षेत्रीय संतुलन और संगठन से जुड़े नेताओं को दिया गया महत्व बताता है कि पार्टी की नजर सिर्फ राज्यसभा की सीटों पर नहीं, बल्कि वर्ष 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर भी है।

आठ सीटों पर आठ नए चेहरे

बीजेपी ने उत्तर प्रदेश से धर्मपाल सिंह, प्रकाश पाल, श्रुति गंगवार, विद्यासागर सोनकर, राधाकांत ओझा, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत और राम प्रताप सिंह चौहान को राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाया है।

इन नामों में कई ऐसे चेहरे हैं जिनका लंबा संगठनात्मक अनुभव रहा है। कुछ नेता विधानसभा और लोकसभा की राजनीति में सक्रिय रहे हैं, जबकि कुछ को पार्टी संगठन में लंबे समय तक काम करने के बाद अब संसद के उच्च सदन में पहुंचने का अवसर मिल रहा है।

उत्तर प्रदेश सरकार में पशुधन मंत्री और आंवला विधानसभा सीट से विधायक धर्मपाल सिंह लोध समुदाय से आते हैं। वह कई बार विधायक रह चुके हैं और प्रदेश सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।

प्रकाश पाल लंबे समय से बीजेपी संगठन में सक्रिय रहे हैं। वह उत्तर प्रदेश बीजेपी के ओबीसी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष हैं और इससे पहले कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा चुके हैं।

श्रुति गंगवार बीजेपी के वरिष्ठ नेता और झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की बेटी हैं। वह बरेली की अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक की चेयरपर्सन रह चुकी हैं और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय रही हैं। उनका संबंध भी ओबीसी समुदाय से है।

विद्यासागर सोनकर बीजेपी के प्रमुख दलित चेहरों में गिने जाते हैं। वह लोकसभा सांसद और विधान परिषद सदस्य रह चुके हैं। संगठन में भी उन्होंने प्रदेश महामंत्री जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं।

राधाकांत ओझा पेशे से वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। वह बार एसोसिएशन के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी दो बार संभाल चुके हैं।

गोपी कृष्ण पांडेय का राजनीतिक आधार मुख्य रूप से बीजेपी का संगठन है। वह लंबे समय से पार्टी से जुड़े हुए हैं और संगठन में काम करने वाले वरिष्ठ नेताओं में उनकी पहचान रही है।

प्रियंका सिंह रावत बाराबंकी से लोकसभा की पूर्व सांसद हैं। वह बीजेपी की महिला नेताओं में प्रमुख चेहरा रही हैं। वहीं राम प्रताप सिंह चौहान आगरा की एत्मादपुर विधानसभा सीट से पूर्व विधायक हैं और फिलहाल प्रदेश बीजेपी के महामंत्री के रूप में संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

सामाजिक समीकरण पर भी नजर

बीजेपी की इस सूची को ध्यान से देखें तो इसमें सामाजिक प्रतिनिधित्व का स्पष्ट संतुलन दिखाई देता है। उम्मीदवारों में तीन ओबीसी, दो दलित और तीन सामान्य वर्ग से हैं। सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों में दो ब्राह्मण और एक राजपूत चेहरा बताया जा रहा है। इसके अलावा दो महिलाओं को भी प्रतिनिधित्व मिला है।

यानी बीजेपी ने राज्यसभा के लिए उम्मीदवार चुनते समय केवल राजनीतिक अनुभव को ही आधार नहीं बनाया। सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को भी साथ रखने की कोशिश की गई है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रुहेलखंड, कानपुर-बुंदेलखंड और पूर्वांचल जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े नेताओं को सूची में जगह मिलने से क्षेत्रीय संतुलन का संकेत भी मिलता है।

यही वह बिंदु है जहां राज्यसभा चुनाव का फैसला 2027 के विधानसभा चुनाव की रणनीति से जुड़ता दिखाई देता है।

उत्तर प्रदेश में बीजेपी की चुनावी सफलता का एक महत्वपूर्ण आधार गैर-यादव पिछड़ा वर्ग और दलित समुदायों के विभिन्न समूहों के साथ बना सामाजिक गठजोड़ रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव से लेकर 2017 के विधानसभा चुनाव तक इस रणनीति ने पार्टी को बड़ा राजनीतिक लाभ पहुंचाया था।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इन सामाजिक समूहों के भीतर बीजेपी को लेकर असंतोष और राजनीतिक दूरी की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं। ऐसे में नए चेहरों को राज्यसभा भेजना पार्टी के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संदेश देने का माध्यम भी हो सकता है।

2027 से पहले सामाजिक गठबंधन मजबूत करने की कोशिश?

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में बीजेपी की नई राज्यसभा सूची को 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों से अलग करके देखना मुश्किल है।

वरिष्ठ पत्रकार मुदित माथुर के मुताबिक, बीजेपी ने अलग-अलग पिछड़ी जातियों और सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देकर अपने पुराने सामाजिक समीकरण को मजबूत करने का प्रयास किया है।

उनका मानना है कि बीजेपी ने जिन गैर-यादव पिछड़ी जातियों को अपने राजनीतिक आधार का हिस्सा बनाया था, उनमें यदि किसी तरह की दूरी पैदा हुई है तो ऐसे समुदायों के नेताओं को महत्वपूर्ण राजनीतिक पद देना उस दूरी को कम करने की रणनीति हो सकती है।

यहां राज्यसभा की सीट महज संसद के उच्च सदन में पहुंचने का माध्यम नहीं रह जाती। यह पार्टी संगठन के भीतर संदेश देने का भी एक तरीका बन जाती है कि लंबे समय तक संगठन में काम करने वाले नेताओं को भी बड़े राजनीतिक अवसर मिल सकते हैं।

संगठन के कार्यकर्ताओं को बड़ा संदेश

बीजेपी की ओर से उम्मीदवारों के चयन को पार्टी के नियमित संगठनात्मक निर्णय के रूप में पेश किया जा रहा है।

पार्टी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी का कहना है कि बीजेपी में कार्यकर्ताओं की भूमिका समय और परिस्थिति के अनुसार तय की जाती है। उनके मुताबिक, इस सूची में लंबे समय से संगठन में काम करने वाले नेताओं के साथ अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों से आने वाले लोगों को भी जगह मिली है।

उनके अनुसार धर्मपाल सिंह कई बार विधायक और मंत्री रह चुके हैं। प्रकाश पाल संगठन में लंबे समय से सक्रिय हैं और ओबीसी मोर्चे की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। विद्यासागर सोनकर सांसद और विधान परिषद सदस्य रहे हैं। प्रियंका सिंह रावत लोकसभा की पूर्व सदस्य हैं, जबकि राम प्रताप सिंह चौहान और गोपी कृष्ण पांडेय का लंबा संगठनात्मक अनुभव है।

इस लिहाज से बीजेपी की सूची में एक साथ दो संदेश दिखाई देते हैं। पहला, पार्टी के अनुभवी नेताओं को आगे बढ़ाने का संदेश और दूसरा, संगठन में लंबे समय तक काम करने वाले कार्यकर्ताओं को यह भरोसा दिलाना कि राजनीतिक अवसर केवल पहले से स्थापित चेहरों तक सीमित नहीं हैं।

मौजूदा सांसदों की छुट्टी क्यों?

बीजेपी की सूची का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश शायद यही है कि पार्टी ने उत्तर प्रदेश से अपने मौजूदा सात राज्यसभा सांसदों में से किसी को भी दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया।

इनमें केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा भी शामिल हैं। इनके अलावा अरुण सिंह, सीमा द्विवेदी, नीरज शेखर, बृजलाल और गीता शाक्य भी इस बार बीजेपी की उम्मीदवार सूची में नहीं हैं।

हरदीप सिंह पुरी वर्ष 2018 में राज्यसभा पहुंचे थे और बाद में दोबारा चुने गए। उनका कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त होना है। बीएल वर्मा भी केंद्र सरकार में मंत्री हैं और उनका कार्यकाल भी इसी अवधि में समाप्त हो रहा है।

केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी को राज्यसभा का टिकट नहीं मिलने के बाद स्वाभाविक रूप से उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। लेकिन इसे तत्काल पार्टी में उनकी भूमिका खत्म होने का संकेत मानना जल्दबाजी होगी।

बीजेपी की राजनीति में नेताओं को अलग-अलग समय पर अलग-अलग जिम्मेदारियां देने की परंपरा रही है। पार्टी किसी नेता को चुनावी राजनीति से संगठन, सरकार या संवैधानिक पद की ओर भी भेज सकती है।

दिनेश शर्मा की सीट पर भी नया चेहरा

बीजेपी की रणनीति को समझने के लिए पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा से खाली हुई राज्यसभा सीट को भी देखना जरूरी है।

दिनेश शर्मा को अंडमान-निकोबार का उपराज्यपाल बनाए जाने के बाद उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया था। उनकी खाली हुई सीट भी इस चुनाव में शामिल है।

इस सीट पर भी बीजेपी ने पुराने चेहरे को दोहराने के बजाय नया उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है। इससे पार्टी की मौजूदा रणनीति और स्पष्ट होती है कि राज्यसभा में प्रतिनिधित्व को नए सामाजिक और संगठनात्मक चेहरों के साथ पुनर्गठित किया जा रहा है।

‘एक सीट पर एकाधिकार’ का संदेश

क्राइस्ट कॉलेज, कानपुर के पूर्व प्रोफेसर डॉ. एके वर्मा के विश्लेषण में बीजेपी के इस फैसले की तीन प्रमुख वजहें दिखाई देती हैं।

पहली वजह यह कि पार्टी शायद यह संदेश देना चाहती है कि राज्यसभा की सीट किसी नेता का स्थायी अधिकार नहीं है। यानी एक बार सांसद बन जाने के बाद लगातार उसी व्यक्ति को मौका मिलना जरूरी नहीं है।

दूसरी वजह संगठनात्मक समावेश की राजनीति है। पार्टी के भीतर ऐसे कई नेता हैं जिन्होंने वर्षों तक संगठन के लिए काम किया, लेकिन उन्हें मुख्यधारा की चुनावी राजनीति में बड़ा अवसर नहीं मिला। राज्यसभा उनके लिए राजनीतिक मुख्यधारा में प्रवेश का रास्ता बन सकती है।

तीसरी वजह सामाजिक संतुलन है। बीजेपी यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी के भीतर अलग-अलग सामाजिक वर्गों, क्षेत्रों और पीढ़ियों के लोगों के लिए राजनीतिक अवसर उपलब्ध हैं।

दो महिलाओं को जगह भी महत्वपूर्ण संकेत

बीजेपी की सूची में प्रियंका सिंह रावत और श्रुति गंगवार को जगह मिलना भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिला मतदाताओं की भूमिका लगातार बढ़ी है। ऐसे में पार्टी के स्तर पर महिला चेहरों को महत्वपूर्ण संवैधानिक और राजनीतिक जिम्मेदारियों में आगे बढ़ाना केवल प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं है, बल्कि चुनावी संदेश का हिस्सा भी हो सकता है।

प्रियंका सिंह रावत का लोकसभा का अनुभव है, जबकि श्रुति गंगवार का सामाजिक और सहकारी क्षेत्र से जुड़ा अनुभव है। दोनों को अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने वाली महिला नेताओं के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

क्या बीजेपी ने 2027 का चुनावी रोडमैप दिखा दिया?

राज्यसभा की आठ सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा को यदि केवल संसद के उच्च सदन के चुनाव तक सीमित करके देखा जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के सामने कई चुनौतियां हैं। उसे अपने पुराने सामाजिक गठबंधन को बनाए रखना है, गैर-यादव पिछड़ी जातियों में अपनी पकड़ मजबूत रखनी है, दलित समुदाय के बीच राजनीतिक आधार को विस्तार देना है और संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं को भी सक्रिय बनाए रखना है।

ऐसे में राज्यसभा के लिए नए चेहरों का चयन पार्टी की व्यापक रणनीति का हिस्सा दिखाई देता है।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बीजेपी ने उन नेताओं को भी मौका दिया है जिनका राजनीतिक अनुभव अलग-अलग क्षेत्रों से आता है। कुछ सीधे चुनावी राजनीति से आए हैं तो कुछ संगठन की लंबी पृष्ठभूमि से। कुछ सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं तो कुछ पेशेवर क्षेत्र से आते हैं।

यानी पार्टी ने राज्यसभा के मंच को केवल वरिष्ठ नेताओं के पुनर्वास के तौर पर इस्तेमाल करने के बजाय नए राजनीतिक चेहरों को आगे लाने का रास्ता चुना है।

असली परीक्षा 2027 में होगी

हालांकि राज्यसभा की उम्मीदवार सूची अपने आप में कोई चुनावी परिणाम तय नहीं करती। असली सवाल यह होगा कि बीजेपी के इस सामाजिक और संगठनात्मक संतुलन का असर जमीन पर कितना दिखाई देता है।

राज्यसभा के जरिए जिन समुदायों और क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व मिला है, क्या वे 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के पक्ष में मजबूती से खड़े होंगे? क्या नए चेहरे अपने-अपने सामाजिक समूहों में पार्टी का संदेश पहुंचा पाएंगे? क्या लंबे समय से संगठन में काम करने वाले नेताओं को संसद भेजने से कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ेगा?

इन सवालों का जवाब आने वाले महीनों में मिलेगा।

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की आठ सीटों पर नए उम्मीदवार उतारकर बीजेपी ने एक साथ कई संदेश देने की कोशिश की है। पार्टी ने जहां पुराने चेहरों को दोहराने से परहेज किया है, वहीं संगठन, सामाजिक प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय संतुलन और महिला भागीदारी को एक साथ साधने की कोशिश की है।

इसलिए यह फैसला केवल राज्यसभा चुनाव की गणित नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में 2027 की बड़ी राजनीतिक लड़ाई से पहले बीजेपी की सामाजिक और संगठनात्मक बिसात का हिस्सा भी माना जा रहा है।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि नए राज्यसभा उम्मीदवार पार्टी के लिए सिर्फ संसद में संख्या बढ़ाने वाले चेहरे साबित होते हैं या 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी के सामाजिक गठबंधन को फिर से मजबूत करने वाले राजनीतिक किरदार बनते हैं।

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