खेतों में दफन हो चुकी नदी में फिर बहने लगी जलधारा, डीएम के नेतृत्व में भैंसी नदी पुनर्जीवन बना मिसाल
चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में पर्यावरण संरक्षण, जल संवर्धन और जनसहभागिता का एक ऐसा उदाहरण सामने आया है, जिसकी चर्चा अब प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर में होने लगी है। कभी खेतों और अवैध कब्जों के बीच पूरी तरह गायब हो चुकी ऐतिहासिक भैंसी नदी आज फिर से अपने अस्तित्व के साथ बहती दिखाई दे रही है। दशकों तक सूखी पड़ी इस नदी में दोबारा जलधारा का प्रवाह शुरू होना स्थानीय लोगों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है।
इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल प्रशासनिक प्रयास नहीं बल्कि जनता और प्रशासन की साझा भागीदारी का परिणाम है। शाहजहांपुर के जिलाधिकारी धर्मेंद्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में शुरू हुए इस अभियान ने एक मृतप्राय नदी को नया जीवन देकर जल संरक्षण के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक मॉडल प्रस्तुत किया है।
दशकों बाद फिर जीवित हुई भैंसी नदी
भैंसी नदी कभी शाहजहांपुर और आसपास के क्षेत्रों की जीवनरेखा मानी जाती थी। स्थानीय लोगों के अनुसार लगभग तीन दशक पहले तक नदी में वर्षभर पानी बहता था। यह नदी न केवल किसानों की सिंचाई का प्रमुख स्रोत थी बल्कि क्षेत्र के भूजल स्तर को बनाए रखने और वन्यजीवों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी।
समय के साथ बढ़ते अतिक्रमण, अवैध खेती और प्राकृतिक जल स्रोतों पर कब्जों ने नदी के अस्तित्व को संकट में डाल दिया। धीरे-धीरे नदी का प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध होता गया और एक समय ऐसा आया जब नदी पूरी तरह गायब होकर खेतों में बदल गई। नई पीढ़ी के कई लोगों ने तो नदी को केवल बुजुर्गों की कहानियों में ही सुना था। आज वही नदी फिर से पानी के साथ बह रही है और इसकी धारा को देखकर ग्रामीणों के चेहरे पर खुशी साफ दिखाई दे रही है।
भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है भैंसी नदी
भैंसी नदी का उद्गम पड़ोसी जनपद पीलीभीत के भैंसार तालाब से माना जाता है। यहां से निकलकर यह नदी प्राकृतिक ढलान के सहारे शाहजहांपुर जिले में प्रवेश करती है। बंडा क्षेत्र के गहलोइया गांव की एक अन्य प्राकृतिक जलधारा भी आगे चलकर इसमें मिल जाती है।
दोनों धाराएं दलेलापुर के पास एक होकर लगभग 56 किलोमीटर का सफर तय करती हैं और अंततः पन्नघाट के समीप गोमती नदी में समाहित हो जाती हैं। नदी का यह पूरा मार्ग क्षेत्रीय जल संतुलन और कृषि व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भैंसी नदी अपने पूरे स्वरूप में पुनर्जीवित हो जाती है तो इसका लाभ आने वाली कई पीढ़ियों को मिलेगा।
कैसे गायब हो गई थी नदी?
भैंसी नदी के लुप्त होने की कहानी मानवजनित हस्तक्षेप और पर्यावरणीय उपेक्षा का उदाहरण है। वर्षों तक नदी के बहाव क्षेत्र में खेती होती रही। नदी की जमीन पर धीरे-धीरे अतिक्रमण बढ़ता गया और उसके जल स्रोतों पर कब्जे होते चले गए। फीडर तालाबों और प्राकृतिक जलमार्गों के बाधित होने से नदी में पानी पहुंचना बंद हो गया। परिणामस्वरूप नदी पहले सूखी और बाद में पूरी तरह खेतों में तब्दील हो गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब किसी नदी का प्राकृतिक मार्ग बाधित होता है तो केवल नदी ही नहीं मरती, बल्कि उसके साथ पूरा स्थानीय जल चक्र प्रभावित हो जाता है। भूजल स्तर गिरने लगता है और क्षेत्र में जल संकट गहराने लगता है।
जन आंदोलन ने बदली तस्वीर
भैंसी नदी को बचाने की मुहिम कोविड काल के दौरान धीरे-धीरे शुरू हुई। शुरुआत में कुछ जागरूक नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों ने नदी के संरक्षण की आवश्यकता महसूस की। इसके बाद गांव-गांव बैठकों और चौपालों का आयोजन किया गया।
“एक हजार हाथ भैंसी के साथ” का नारा लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हुआ। देखते ही देखते यह अभियान जन आंदोलन में बदल गया। ग्रामीणों ने स्वयं आगे बढ़कर नदी के पुराने मार्ग की पहचान की और उसे पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया। इस अभियान में किसान, सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरण प्रेमी, शिक्षक और युवा बड़ी संख्या में जुड़े। सामूहिक श्रमदान और जागरूकता अभियानों ने इस प्रयास को नई दिशा दी।
वैज्ञानिकों ने बताया नदी पुनर्जीवन का महत्व
कृषि और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार भैंसी नदी का पुनर्जीवन केवल एक नदी को बचाने का कार्य नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी को पुनर्स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम है। वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक दया श्रीवास्तव के अनुसार नदियां किसी भी क्षेत्र के जल चक्र की धुरी होती हैं। जब नदी जीवित रहती है तो आसपास के भूजल स्रोत भी सक्रिय बने रहते हैं।
भूगर्भ जल विभाग के इंजीनियर गणेश नेगी बताते हैं कि नदी तल के नीचे प्राकृतिक जल स्रोत मौजूद रहते हैं जिन्हें आर्टिशियन स्रोत कहा जाता है। ये स्रोत नदी को निरंतर जल उपलब्ध कराते हैं और नदी में जल प्रवाह बना रहने से स्वयं भी पुनर्भरित होते रहते हैं। नदी के पुनर्जीवित होने से नेवादा डाह, रसूलापुर, देवकली, मीरपुर और जेवां समेत कई गांवों में भूजल स्तर में सुधार के संकेत मिलने लगे हैं।
बिना सरकारी धन के सफल हुआ अभियान
इस पूरे अभियान की एक और उल्लेखनीय बात यह रही कि इसे जनसहयोग के आधार पर आगे बढ़ाया गया। स्थानीय लोगों ने स्वयं श्रमदान किया और नदी की निगरानी की जिम्मेदारी भी संभाली।
ग्रामीणों ने नदी के प्रत्येक हिस्से को बांटकर उसकी देखभाल सुनिश्चित की। नदी किनारे बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया और पौधों की सुरक्षा के लिए “पेड़ पालक” जैसी अभिनव व्यवस्था लागू की गई। शुरुआती दौर में मौसम और आवारा पशुओं के कारण कई पौधे नष्ट हुए, लेकिन लोगों ने हार नहीं मानी। लगातार प्रयासों के परिणामस्वरूप आज हजारों पौधे बड़े वृक्षों का रूप ले चुके हैं।
इस अभियान में राधेश्याम वर्मा, ज्ञानेंद्र वर्मा, हरिओम, विजय पाठक, नीरज सिंह, संजय त्रिपाठी, आलोक मिश्रा, देवेश गंगवार और नन्हे लाल सहित अनेक ग्रामीणों ने सक्रिय भूमिका निभाई।
डीएम धर्मेंद्र प्रताप सिंह के नेतृत्व को मिली सराहना
14 सितंबर 2024 को शाहजहांपुर के जिलाधिकारी के रूप में कार्यभार संभालने के बाद धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने इस अभियान को नई गति प्रदान की। उन्होंने इसे “एक जिला-एक नदी” पहल से जोड़ते हुए प्रशासनिक स्तर पर व्यापक सहयोग उपलब्ध कराया। उनके नेतृत्व में नदी मार्ग से जुड़े लगभग 80 तालाबों को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया। साथ ही नदी के किनारों पर 40 हजार से अधिक फलदार और छायादार पौधों का रोपण कराया गया।
प्रशासन और जनता के समन्वय से भैंसी नदी आज लगभग 45 किलोमीटर तक पुनः प्रवाहित हो चुकी है। अब इसे अंतिम गंतव्य गोमती नदी तक पूरी तरह जोड़ने के लिए अभियान तेज गति से जारी है।
देश के लिए बन रहा है प्रेरणादायक मॉडल
भैंसी नदी पुनर्जीवन अभियान यह साबित करता है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक सोच और जनसहभागिता एक साथ मिल जाएं तो असंभव लगने वाले कार्य भी संभव हो सकते हैं।
आज जब देश के अनेक हिस्सों में नदियां प्रदूषण, अतिक्रमण और जल संकट से जूझ रही हैं, तब शाहजहांपुर का यह मॉडल नई उम्मीद जगाता है। भैंसी नदी का पुनर्जीवन केवल एक नदी की वापसी नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और समाज के बीच फिर से स्थापित हुए संतुलन की कहानी है। यह अभियान आने वाले समय में देशभर के जल संरक्षण प्रयासों के लिए एक मार्गदर्शक उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा।







