16 अक्टूबर 2026 6:01 अपराह्न

बातचीत से संवारें व्यक्तित्व, शब्दों से बनती है इंसान की पहचान

पनगोत्रा की चिट्ठी-15 के लेखक केवल कृष्ण पनगोत्रा की तस्वीर और बातचीत से व्यक्तित्व विकास पर आधारित फीचर इमेज

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पनगोत्रा की चिट्ठी का 15वां और अंतिम अंक

संपादकीय इंट्रो : एक आत्मीय चिट्ठी का पड़ाव

साप्ताहिक स्तंभ केवल शब्दों का क्रम नहीं होता, बल्कि उसके साथ लेखक की सोच, अनुभव और पाठकों के साथ बना आत्मीय रिश्ता भी जुड़ा होता है। ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ की यात्रा भी इसी आत्मीय संवाद की यात्रा रही है। पंद्रह अंकों तक इस स्तंभ के माध्यम से जीवन, समाज, व्यवहार, रिश्तों और मानवीय सरोकारों से जुड़े अनेक विषयों पर सहज भाषा में विचार साझा किए गए। इस दौरान कोशिश यही रही कि हर चिट्ठी पाठक को केवल जानकारी न दे, बल्कि उसे अपने जीवन और आसपास की परिस्थितियों से जोड़ने का अवसर भी दे।

आज यह साप्ताहिक स्तंभ अपने 15वें और अंतिम अंक तक पहुंच गया है। किसी नियमित स्तंभ का अंतिम अंक अपने आप में भावुक क्षण होता है, लेकिन इसे पूर्ण विराम के रूप में देखना उचित नहीं होगा। विचारों की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती। एक पड़ाव के बाद दूसरी राह खुलती है और संवाद का कोई न कोई नया माध्यम सामने आता है। इसी भावना के साथ प्रस्तुत है ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ का अंतिम अंक—‘बातचीत से संवारें व्यक्तित्व’। अब आगे की बात उसी आत्मीय अंदाज में, जिसमें लेखक ने इन चिट्ठियों के जरिए पाठकों से लगातार संवाद किया।

बातचीत से संवारें व्यक्तित्व

अजीज पाठकों,

आज जब इस चिट्ठी के माध्यम से आपसे मुखातिब हो रहा हूं तो मन में कई तरह के भाव एक साथ उमड़ रहे हैं। यह हमारी बातचीत का 15वां और आखिरी पड़ाव है। पंद्रह चिट्ठियों का यह सफर कब शुरू हुआ और कब यहां तक आ पहुंचा, इसका पता ही नहीं चला। आपसे चिट्ठी के माध्यम से बातचीत करना मेरे लिए केवल लिखने का काम नहीं रहा, बल्कि यह ऐसा सिलसिला रहा जिसमें मैंने अपने मन की बात आप तक पहुंचाने की कोशिश की और यह भरोसा भी रखा कि आप इन शब्दों के पीछे छिपी भावना को महसूस करेंगे। आज की इस आखिरी चिट्ठी का विषय है—बातचीत से संवारें व्यक्तित्व। विषय सुनने में सामान्य जरूर लगता है, मगर यदि हम अपने दैनिक जीवन पर नजर डालें तो पाएंगे कि हमारी बातचीत ही कई बार हमारे व्यक्तित्व की सबसे स्पष्ट तस्वीर सामने रखती है।

मनुष्य का व्यक्तित्व केवल उसके पहनावे, रहन-सहन, चाल-ढाल या उठने-बैठने के तरीके से तय नहीं होता। कोई व्यक्ति कितना भी सलीकेदार दिखाई दे, कितने ही अच्छे वस्त्र पहनता हो और सामाजिक रूप से कितना ही प्रभावशाली क्यों न लगता हो, जब तक उसकी बातचीत में शिष्टता, संवेदनशीलता और संतुलन नहीं है, तब तक उसके व्यक्तित्व की तस्वीर अधूरी ही रहती है। इसके विपरीत साधारण पहनावे वाला कोई व्यक्ति भी यदि सम्मान, विनम्रता और आत्मविश्वास से बातचीत करता है तो वह कुछ ही समय में सामने वाले के मन में अपनी जगह बना लेता है। यही कारण है कि बातचीत को व्यक्तित्व का आईना कहा जा सकता है। शब्द केवल हमारे विचारों को व्यक्त नहीं करते, बल्कि हमारे संस्कार, सोच और सामने वाले के प्रति हमारे दृष्टिकोण को भी उजागर करते हैं।

मीठे बोल बड़े अनमोल

अजीज पाठकों, बचपन से एक कहावत सुनते आए हैं—मीठे बोल बड़े अनमोल। उस समय यह केवल एक कहावत लगती थी, लेकिन उम्र और अनुभव के साथ समझ में आता है कि इसमें जीवन व्यवहार का कितना गहरा सच छिपा हुआ है। मीठा बोलने का मतलब यह कतई नहीं है कि हम हर बात पर सहमत हो जाएं या अपनी राय व्यक्त करना छोड़ दें। अपनी बात स्पष्ट रूप से कहिए, असहमति भी जताइए, लेकिन भाषा ऐसी हो कि सामने वाला आपकी बात को समझ सके और आपके शब्द उसके आत्मसम्मान को चोट न पहुंचाएं। एक ही बात कठोर शब्दों में कही जाए तो विवाद पैदा कर सकती है और वही बात विनम्र शब्दों में रखी जाए तो विचार-विमर्श का रास्ता खोल सकती है। फर्क विचार में नहीं, उसे व्यक्त करने के तरीके में होता है। इसलिए बोलने से पहले शब्दों को थोड़ा तौल लेना चाहिए, क्योंकि मुंह से निकला शब्द वापस नहीं आता। कई रिश्ते वर्षों की समझ और अपनत्व से बनते हैं, लेकिन एक क्षण की कटुता उन्हें गहरी चोट पहुंचा सकती है।

व्यंग्य और विनोद की अपनी सीमा

बातचीत में हास्य और विनोद न हो तो जीवन कुछ अधिक गंभीर दिखाई देने लगेगा। हंसी वातावरण को सहज बनाती है और कई बार कठिन बातचीत के बीच भी अपनापन पैदा करती है। लिन यू-तांग जैसे विचारकों ने भी जीवन में हास्य के महत्व को रेखांकित किया है। लेकिन हास्य की अपनी सीमा और मर्यादा भी है। हमारा मजाक तभी तक अच्छा है जब तक उससे किसी दूसरे की गरिमा को चोट न पहुंचे। किसी व्यक्ति के रंग-रूप, आर्थिक स्थिति, पहनावे, परिवार, बीमारी, जाति, धर्म, भाषा या निजी कमजोरी को मजाक का विषय बनाकर हम आसपास बैठे लोगों को हंसा तो सकते हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि सामने वाला भीतर से भी हंस रहा हो। हो सकता है वह केवल परिस्थिति के कारण मुस्कुरा रहा हो और भीतर से आहत हो चुका हो। इसलिए व्यंग्य-विनोद का उद्देश्य बातचीत में रस और सहजता पैदा करना होना चाहिए, किसी व्यक्ति को छोटा साबित करना नहीं। हंसाइए, मगर किसी की गरिमा की कीमत पर नहीं।

बातचीत का विषय मत भूलिए

हमारे दैनिक जीवन की बातचीत में अक्सर एक विचित्र आदत दिखाई देती है। बात किसी एक विषय से शुरू होती है और थोड़ी ही देर में हम कई असंबंधित विषयों तक पहुंच जाते हैं। सामान्य सामाजिक बातचीत में यह स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन जब किसी गंभीर विषय पर चर्चा हो रही हो तो विषय की प्रधानता बनाए रखना जरूरी है। कार्यालय में किसी काम की योजना पर चर्चा हो रही हो तो उसे निजी शिकायतों की ओर मोड़ देना उचित नहीं होगा। परिवार में किसी समस्या का समाधान तलाशा जा रहा हो तो पुराने विवादों की पूरी गठरी खोल देने से समस्या हल होने के बजाय और उलझ सकती है। बातचीत का उद्देश्य केवल बोलते रहना नहीं होना चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि क्या कहना है, क्यों कहना है और कितना कहना है। विषय पर केंद्रित बातचीत कम शब्दों में भी अधिक प्रभाव पैदा कर सकती है, जबकि विषय से भटकी हुई लंबी बातचीत अक्सर समय तो लेती है, लेकिन कोई सार्थक परिणाम नहीं देती।

आवाज भी व्यक्तित्व का हिस्सा है

हम केवल शब्दों से बात नहीं करते, हमारी आवाज भी बहुत कुछ कहती है। बहुत धीमी आवाज सामने वाले को बार-बार पूछने के लिए मजबूर कर सकती है और अत्यधिक तेज या कर्कश आवाज बातचीत को आदेश या आक्रोश का रूप दे सकती है। हर परिस्थिति का अपना स्वर होता है। प्रसन्नता की बात हो तो आवाज में सहज खुशी आना स्वाभाविक है, जबकि किसी गंभीर विषय पर बातचीत करते समय स्वर में गंभीरता होनी चाहिए। समस्या तब पैदा होती है जब हम परिस्थिति की गंभीरता को समझे बिना एक ही अंदाज में बोलते रहते हैं। कई बार बात बिल्कुल सही होती है, लेकिन उसे कहने का तरीका इतना कठोर होता है कि सामने वाला सही बात को भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता। इसलिए बोलते समय शब्दों के साथ-साथ अपने स्वर पर भी ध्यान देना चाहिए। संतुलित आवाज आत्मविश्वास और परिपक्वता का संकेत देती है।

ज्ञान नहीं है तो सुनना सीखिए

अजीज पाठकों, दुनिया बहुत बड़ी है और हमारा ज्ञान सीमित। यह स्वीकार करने में किसी प्रकार की शर्म नहीं होनी चाहिए कि हमें हर विषय की जानकारी नहीं है। कई बार बातचीत ऐसे विषय पर पहुंच जाती है जिसके बारे में हमें बहुत कम जानकारी होती है। ऐसे समय में बिना जाने बोलते चले जाना समझदारी नहीं है। बेहतर है कि सामने वाले को ध्यान से सुना जाए और उसके अनुभव से कुछ सीखा जाए। सुनना भी बातचीत की एक महत्वपूर्ण कला है। जो व्यक्ति केवल बोलना जानता है, वह अपनी जानकारी की सीमा में ही घूमता रहता है, लेकिन जो व्यक्ति सुनने का धैर्य रखता है, उसका ज्ञान हर अच्छी बातचीत के साथ थोड़ा और विस्तृत होता जाता है। इसलिए किसी विषय पर कम जानकारी होने की स्थिति में चुप रहना कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है। यह भी व्यक्तित्व का एक गुण है कि व्यक्ति अपनी सीमाओं को पहचानता हो।

बोलने से पहले अपनी बात की पड़ताल करें

आज हम सूचना के ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां मोबाइल फोन पर कुछ ही क्षणों में हजारों सूचनाएं सामने आ जाती हैं। लेकिन हर सूचना सच हो, यह जरूरी नहीं। ऐसे समय में बिना पुष्टि के किसी बात को तथ्य की तरह प्रस्तुत करना हमारी विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकता है। बातचीत में बोलने से पहले हमें अपने कथन की सच्चाई पर विचार करना चाहिए। यदि किसी जानकारी को लेकर पूरा विश्वास नहीं है तो उसे अंतिम सत्य के रूप में पेश करने के बजाय यह कहना अधिक उचित है कि “मेरी जानकारी के अनुसार” या “ऐसा मैंने सुना है, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं की है।” यह छोटा-सा अंतर हमारी बातचीत को जिम्मेदार और विश्वसनीय बना सकता है। तथ्यपूर्ण टिप्पणी करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे लोगों के बीच भरोसे की जगह बनाता है और यही भरोसा व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पूंजी है।

चेहरे के भाव और दैहिक भाषा भी बोलती है

बातचीत केवल मुंह से निकलने वाले शब्दों तक सीमित नहीं होती। हमारा चेहरा, आंखों का भाव, बैठने का तरीका और हाथों की गतिविधियां भी सामने वाले तक संदेश पहुंचाती हैं। किसी की बात सुनते समय ध्यानपूर्वक देखना, स्वाभाविक रूप से सिर हिलाना और चेहरे पर सहज भाव रखना सामने वाले को यह अहसास कराता है कि उसकी बात सुनी जा रही है। दूसरी ओर अत्यधिक हाव-भाव, बार-बार हाथ-पैर चलाना या बनावटी शारीरिक मुद्रा बातचीत के प्रभाव को कम कर सकती है। दैहिक भाव स्वाभाविक हों तो संवाद में आत्मीयता आती है। बनावटीपन जितना कम होगा, बातचीत उतनी ही सहज और प्रभावशाली होगी।

दूसरों को भी बोलने का अवसर दीजिए

यदि आप चाहते हैं कि लोग आपकी बात ध्यान से सुनें तो पहले दूसरों की बात सुनने की आदत डालिए। समूह में बातचीत करते समय हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए। किसी की बात के बीच में बार-बार टोकना या अपनी बात थोपने की कोशिश करना अच्छी बातचीत का संकेत नहीं है। कई बार सामने वाला बोल रहा होता है और हमारे दिमाग में अचानक कोई विचार आता है। उसे तुरंत कह देने की बेचैनी होती है, लेकिन थोड़ा धैर्य रखना चाहिए। यदि बात इतनी जरूरी है कि बीच में कहना आवश्यक हो तो “माफ कीजिए”, “एक बात जोड़ना चाहूंगा” या “यदि अनुमति हो तो” जैसे विनम्र शब्दों का इस्तेमाल किया जा सकता है। ये छोटे शब्द हमारी तहजीब और सामने वाले के प्रति सम्मान का परिचय देते हैं। आखिर बातचीत प्रतियोगिता तो है नहीं कि जो सबसे ज्यादा बोलेगा वही विजेता कहलाएगा।

चुगली और निंदा वाली बातचीत से दूरी रखें

अजीज पाठकों, हमारे आसपास ऐसी बातचीत की भी कमी नहीं जिसमें सामने कोई और हो और चर्चा किसी तीसरे व्यक्ति की चल रही हो। किसी की निंदा करना आसान है, लेकिन किसी की अच्छाई तलाशना कठिन। इसलिए ऐसी बातचीत से दूरी रखना बेहतर है जिसमें किसी अनुपस्थित व्यक्ति को लगातार निशाना बनाया जा रहा हो। आज हम किसी के बारे में जिस अंदाज में चर्चा कर रहे हैं, जरूरी नहीं कि कल कोई हमारे बारे में उसी तरह चर्चा न करे। सार्थक बातचीत वह है जिससे कोई विचार जन्म ले, किसी समस्या का समाधान निकले, किसी रिश्ते में मजबूती आए या किसी व्यक्ति को अपने बारे में सोचने का अवसर मिले। यदि बातचीत केवल चुगली, निंदा और कटु आलोचना तक सीमित है तो उससे दूरी बनाए रखना ही व्यक्तित्व के लिए बेहतर है।

जाति, धर्म और विश्वास पर संवेदनशीलता जरूरी

हमारा समाज विविधताओं से भरा हुआ है। अलग-अलग जातियां, धर्म, पंथ, भाषाएं, परंपराएं और विश्वास हमारे सामाजिक जीवन का हिस्सा हैं। विचारों में अंतर स्वाभाविक है और असहमति भी लोकतांत्रिक तथा सामाजिक जीवन का हिस्सा हो सकती है, लेकिन किसी की आस्था या पहचान को अपमानित करना स्वस्थ बातचीत का हिस्सा नहीं हो सकता। तर्क कीजिए, सवाल कीजिए, अपनी बात रखिए, लेकिन सामने वाले की गरिमा का सम्मान करते हुए। किसी व्यक्ति के विचार से असहमति होना अलग बात है और उसके सम्मान को ठेस पहुंचाना अलग। अच्छी बातचीत वही है जो असहमति के बावजूद संवाद का रास्ता बंद न होने दे।

कभी-कभी चुप रहना भी बातचीत की कला है

हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता। हर बहस में शामिल होना भी आवश्यक नहीं और हर आरोप का जवाब आरोप से देना तो बिल्कुल जरूरी नहीं। कई बार सामने वाला केवल हमारी प्रतिक्रिया चाहता है। ऐसे समय में संयम ही सबसे अच्छा उत्तर हो सकता है। चुप रहना हमेशा कमजोरी नहीं होता। कई बार चुप्पी इस बात का प्रमाण होती है कि व्यक्ति अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना जानता है। बातचीत की कला में बोलना जितना जरूरी है, सही समय पर रुक जाना भी उतना ही जरूरी है। यदि कोई बातचीत लगातार कटुता की ओर जा रही है और उसमें समाधान की संभावना दिखाई नहीं देती तो कुछ समय के लिए मौन या विषय परिवर्तन भी समझदारी हो सकती है।

व्यक्तित्व कपड़ों से नहीं, व्यवहार से चमकता है

अजीज पाठकों, व्यक्तित्व के बारे में हम अक्सर बाहरी चीजों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। कपड़े कैसे हैं, बाल कैसे हैं, जूते कैसे हैं, चलने का अंदाज कैसा है—इन सबका अपना महत्व है, लेकिन इन सबके बाद जब व्यक्ति बातचीत करता है तो उसके व्यक्तित्व का वास्तविक पक्ष सामने आता है। उसकी भाषा में विनम्रता है या अहंकार, वह सामने वाले को सुनता है या केवल अपनी बात सुनाना चाहता है, असहमति में सम्मान बनाए रखता है या अपमान पर उतर आता है, गलती होने पर माफी मांग सकता है या नहीं—इन सवालों के उत्तर उसके व्यक्तित्व की असली तस्वीर पेश करते हैं। इसलिए व्यक्तित्व को संवारने के लिए केवल आईने के सामने खड़ा होना पर्याप्त नहीं है। कभी अपनी बातचीत के सामने भी खड़े होकर देखिए। संभव है वहां आपको अपने व्यक्तित्व की ऐसी तस्वीर दिखाई दे, जिस पर आपने पहले कभी गंभीरता से गौर न किया हो।

बातचीत से रिश्ते भी संवरते हैं

घर में पति-पत्नी के बीच बातचीत हो, माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद हो, भाई-बहन के बीच संबंध हों या मित्रों के बीच बातचीत—हर जगह भाषा और व्यवहार का महत्व है। कई बार घर की छोटी-सी समस्या इसलिए बड़ी हो जाती है क्योंकि कोई भी शांत होकर दूसरे की बात सुनने के लिए तैयार नहीं होता। बच्चे की गलती पर केवल डांटने के बजाय उससे बात की जा सकती है। बुजुर्ग की शिकायत को झुंझलाहट के बजाय धैर्य से सुना जा सकता है। जीवनसाथी की बात को तुरंत काटने के बजाय पहले समझने की कोशिश की जा सकती है। ये छोटे-छोटे व्यवहार रिश्तों को मजबूत करते हैं। संवाद बंद होता है तो दूरी बढ़ती है, जबकि संवाद बना रहता है तो समाधान की संभावना भी बनी रहती है।

नौकरी और सामाजिक जीवन में बातचीत का महत्व

आज के प्रतिस्पर्धी जीवन में बातचीत का महत्व पहले से कहीं अधिक दिखाई देता है। रोजगार के अनेक क्षेत्रों में साक्षात्कार महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वहां केवल योग्यता और प्रमाणपत्र ही नहीं देखे जाते, बल्कि व्यक्ति अपने विचारों को किस तरह प्रस्तुत करता है, प्रश्न को कितना समझता है और उत्तर देते समय कितना संयम रखता है, इसकी भी झलक मिलती है। कार्यालय में सहकर्मियों से संवाद, ग्राहकों से बातचीत, अधिकारियों के साथ व्यवहार और टीम में विचार साझा करना—हर जगह संवाद कौशल उपयोगी होता है। इसी तरह सामाजिक जीवन में भी व्यक्ति की सफलता केवल उसके ज्ञान पर निर्भर नहीं रहती। वह अपने ज्ञान और विचारों को दूसरों तक किस भाषा और किस व्यवहार के साथ पहुंचाता है, यह भी बहुत महत्वपूर्ण है।

संवेदनशीलता ही बातचीत का सबसे सुंदर गुण है

आखिर में एक बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। हम कभी नहीं जानते कि हमारे सामने बैठा व्यक्ति अपने जीवन में किन परिस्थितियों से गुजर रहा है। हो सकता है वह मुस्कुराते हुए हमारे सामने बैठा हो, लेकिन भीतर से किसी बड़ी परेशानी से जूझ रहा हो। ऐसी स्थिति में हमारी एक कठोर टिप्पणी उसके मन पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती है, जबकि एक संवेदनशील वाक्य उसे सहारा दे सकता है। इसलिए बोलते समय केवल यह न सोचें कि मैं क्या कहना चाहता हूं, बल्कि यह भी सोचें कि सामने वाला मेरी बात को किस तरह महसूस करेगा। यही सोच बातचीत को महज शब्दों से उठाकर मानवीय संवाद बना देती है।

तो फिर क्या करें?

बहुत मुश्किल नहीं है। अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखिए। बोलने से पहले सोचिए, सुनते समय धैर्य रखिए, विषय को समझिए, बिना पर्याप्त जानकारी के निर्णायक टिप्पणी करने से बचिए, हास्य-विनोद की सीमा पहचानिए और आवाज में परिस्थिति के अनुसार संतुलन रखिए। अपने हाव-भाव को स्वाभाविक रखिए, दूसरों की भावनाओं का सम्मान कीजिए और असहमति के समय भी भाषा की मर्यादा बनाए रखिए। जहां गलती हो वहां माफी मांगने में संकोच न कीजिए और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सामने वाले को उतना ही महत्व दीजिए जितना आप स्वयं अपने लिए चाहते हैं। यदि हम अपने दैनिक जीवन में इन सामान्य बातों को उतार पाएं तो हमारे व्यक्तित्व में सचमुच चार चांद लग सकते हैं। हम घर में बेहतर साथी, कार्यालय में बेहतर सहयोगी, समाज में बेहतर नागरिक और सबसे बढ़कर एक बेहतर इंसान बन सकते हैं।

अजीज पाठकों, यह आखिरी चिट्ठी है, संवाद नहीं

अजीज पाठकों, अब उस क्षण पर आ गया हूं जहां इस चिट्ठी को विराम देना है। यह कहते हुए मन स्वाभाविक रूप से थोड़ा भावुक है कि ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ का यह 15वां और आखिरी अंक है। इन चिट्ठियों में मैंने आपको केवल पाठक नहीं माना, बल्कि अपना संवाद-साथी समझा। इसलिए हर बार ऐसा लगा जैसे किसी परिचित चेहरे के सामने बैठकर मन की बात कह रहा हूं। आपने इन चिट्ठियों को पढ़ा, अपने समय का हिस्सा दिया और इस संवाद को आगे बढ़ाया, इसके लिए आभार शब्द शायद बहुत छोटा है। लेकिन यह अंत नहीं है। एक चिट्ठी समाप्त हो रही है, बातचीत नहीं। एक स्तंभ अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच रहा है, विचारों की यात्रा नहीं।

अगली कड़ी : ‘राज समाज’

अब इसी विचार-यात्रा को एक नए नाम और नए कलेवर में आगे बढ़ाने का समय है। अगली मुलाकात होगी ‘राज समाज’ के साथ। नाम बदलेगा, कलेवर बदलेगा और तेवर भी कुछ अलग होंगे, लेकिन कोशिश वही रहेगी—समाज को समझना, समय के सवालों को महसूस करना और उन विषयों पर आपसे संवाद करना जो हमारे आसपास घट रहे हैं। ‘राज समाज’ में फिर मुलाकात होगी—नई चिट्ठी नहीं, मगर वही आत्मीय बातचीत लेकर। ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ का यह अंतिम पड़ाव इसलिए किसी विदाई से अधिक एक नए सफर की तैयारी है।

तब तक के लिए अपनी बात यहीं रोकता हूं। आप स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें और अपने आसपास संवाद के दरवाजे खुले रखें। शब्दों की गरिमा बनाए रखें, रिश्तों की कद्र करें और जहां संभव हो वहां कटुता के बजाय बातचीत को रास्ता बनाएं।

राम-राम, अल्लाह हाफ़िज़, सत् श्री अकाल, नमस्ते!

आपका,
केवल कृष्ण पनगोत्रा

स्वतंत्र लेखक-पत्रकार
जम्मू-कश्मीर

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