व्यंग्य | अनिल अनूप
पिछली बार हमने देखा था कि कौआ उड़ गया तो केवल छत की मुंडेर खाली नहीं हुई, बल्कि जिम्मेदारी, वादा, भरोसा, खबर और कभी-कभी आदमी का होश भी उड़ गया। अब सवाल यह है कि जब हर तरफ कौआ ही उड़ रहा हो, तो आखिर बैठा कौन है? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि कौआ उड़ाने वाला कौन है?
क्योंकि कौआ अपने आप तो उड़ता है, लेकिन हमारे समाज में कई बार उसे उड़ाने के लिए बाकायदा व्यवस्था बनाई जाती है। कहीं फाइल आगे सरका दी जाती है, कहीं जिम्मेदारी पीछे धकेल दी जाती है, कहीं जांच बैठा दी जाती है और कहीं ऐसा बयान दे दिया जाता है कि सवाल पूछने वाला ही सोच में पड़ जाए—मैं पूछ क्या रहा था?
हमारे समय की सबसे दिलचस्प कला यही है। काम हो या न हो, काम होने का वातावरण जरूर तैयार कर दिया जाता है। समस्या बनी रहती है, लेकिन उस पर चर्चा करने वालों की कमी नहीं रहती। बैठक होती है, समीक्षा होती है, निर्देश जारी होते हैं, फोटो खिंचती है और अगले दिन अखबार में खबर छपती है—समस्या के समाधान के लिए अधिकारियों ने कमर कस ली।
अब कमर किसकी कसी और समस्या किसकी खुली रह गई, यह पूछने की जरूरत नहीं। कौआ उड़ गया!
पहले समस्या पैदा करो, फिर समाधान की बैठक बुलाओ
हमारे यहां कई समस्याएं इतनी पुरानी हो जाती हैं कि लोग उन्हें समस्या मानना ही छोड़ देते हैं। सड़क पर गड्ढा है तो लोग रास्ता बदल लेते हैं। नाली जाम है तो लोग बदबू के साथ जीना सीख लेते हैं। दफ्तर में काम अटका है तो आवेदक चक्कर काटने को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लेता है। फिर किसी दिन शिकायत बढ़ जाती है। लोगों की आवाज ऊपर तक पहुंचती है। अचानक व्यवस्था जागती है।
बैठक बुलाई जाती है। जिम्मेदार अधिकारी कहते हैं, “मामले को गंभीरता से लिया गया है। संबंधित विभाग को आवश्यक निर्देश दे दिए गए हैं। जल्द ही समस्या का समाधान कर दिया जाएगा।” जनता राहत की सांस लेती है। चलो, किसी ने गंभीरता से तो लिया! कुछ दिन गुजरते हैं। समस्या वहीं की वहीं। जनता दोबारा पूछती है। जवाब मिलता है, “कार्रवाई प्रगति पर है।” अब प्रगति कहां है, यह कोई नहीं बताता। समस्या आगे नहीं बढ़ी, लेकिन उसके समाधान की फाइल जरूर प्रगति कर रही है।
कई बार लगता है कि हमारे यहां समस्या का समाधान करने से ज्यादा जरूरी उसका समाधान किए जाने की प्रक्रिया को जीवित रखना है। समस्या खत्म हो गई तो बैठक किस बात पर होगी? समीक्षा किसकी होगी? निर्देश किसे दिए जाएंगे? इसलिए समस्या को इतना भी जल्दी खत्म नहीं करना चाहिए कि व्यवस्था की व्यस्तता ही समाप्त हो जाए!
जांच बैठी है, सच अभी खड़ा है
किसी घटना के बाद सबसे पहले जो वाक्य सुनाई देता है, वह है—“जांच के आदेश दे दिए गए हैं।” यह वाक्य बड़ा भरोसेमंद है। इसमें न किसी को दोषी बताया जाता है, न किसी को निर्दोष। न तत्काल जवाब देना पड़ता है, न तत्काल परिणाम दिखाना पड़ता है। बस जांच शुरू होने की सूचना से जनता को यह विश्वास दिला दिया जाता है कि अब सब कुछ कानून और प्रक्रिया के अनुसार होगा।
जांच भी बेचारा क्या करे? उसे दस्तावेज चाहिए, बयान चाहिए, तथ्य चाहिए और समय चाहिए। समय इतना चाहिए कि कई बार घटना की याद लोगों के दिमाग से धुंधली होने लगती है।
फिर दूसरी घटना आ जाती है। पहली घटना की चर्चा कम हो जाती है। तीसरी घटना पहली दोनों को पीछे छोड़ देती है। कुछ समय बाद कोई पूछता है, “उस मामले का क्या हुआ?” जवाब आता है, “जांच चल रही है।”
पूछने वाला सोचता है, जांच चल रही है तो जरूर कहीं पहुंच भी रही होगी। लेकिन उसे क्या मालूम कि जांच कभी-कभी ऐसी सड़क पर चलती है, जिसका अंतिम छोर किसी को दिखाई ही नहीं देता।
यहां स्पष्ट कर दूं कि जांच जरूरी है। बिना जांच के किसी को दोषी ठहराना भी गलत है। लेकिन जांच का उद्देश्य सच तक पहुंचना और उचित कार्रवाई का आधार तैयार करना होना चाहिए, न कि सवालों को लंबे समय तक प्रतीक्षा कक्ष में बैठाए रखना।
जांच का कौआ उड़ जाए तो न्याय का पेड़ सूना हो जाता है। और उस पेड़ के नीचे बैठे लोगों को फिर किसी नई घोषणा का इंतजार करना पड़ता है।
आंकड़ों ने पहन ली सफलता की वर्दी
आजकल किसी भी काम की सफलता बताने के लिए आंकड़े बहुत काम आते हैं। कितनी बैठकें हुईं, कितने निरीक्षण किए गए, कितने नोटिस जारी हुए, कितने लोगों को चेतावनी दी गई, कितनी शिकायतों को निस्तारित बताया गया—इन सबका हिसाब तैयार हो जाता है।
आंकड़े जरूरी हैं। उनके बिना काम का मूल्यांकन मुश्किल है। लेकिन एक छोटा-सा सवाल है—क्या हर दर्ज शिकायत का निस्तारण वास्तव में शिकायतकर्ता की समस्या खत्म होने के बराबर है?
मान लीजिए, एक व्यक्ति ने पानी की समस्या की शिकायत की। शिकायत दर्ज हुई। संबंधित विभाग ने उसे आगे भेज दिया। दूसरे विभाग ने कार्रवाई की रिपोर्ट लगा दी। ऑनलाइन व्यवस्था में शिकायत निस्तारित दिखाई देने लगी। लेकिन घर में नल अब भी सूखा है।
कागज कहता है, काम पूरा। नागरिक कहता है, काम अधूरा। अब फैसला कौन करेगा? वह स्क्रीन, जिस पर हरे रंग में सफलता चमक रही है, या वह परिवार जो पानी खरीदकर अपनी जरूरत पूरी कर रहा है?
यह किसी एक विभाग पर आरोप नहीं, बल्कि काम की समीक्षा का बुनियादी सवाल है। आंकड़े बताते हैं कि व्यवस्था ने क्या किया; नागरिक का अनुभव बताता है कि उसका असर क्या हुआ।
दोनों को साथ रखकर देखा जाए, तभी वास्तविक तस्वीर सामने आएगी। वरना आंकड़ों का कौआ उड़ जाएगा और सफलता का प्रमाणपत्र मुंडेर पर बैठा रह जाएगा।
फोटो में विकास, जमीन पर प्रतीक्षा
किसी योजना का उद्घाटन हो तो तस्वीरें आती हैं। कोई अभियान शुरू हो तो तस्वीरें आती हैं। अधिकारी निरीक्षण करने निकलें तो तस्वीरें आती हैं। जनप्रतिनिधि जनता के बीच पहुंचें तो तस्वीरें आती हैं।
तस्वीरें जरूरी हैं। जनता को पता चलना चाहिए कि काम हो रहा है, कौन कर रहा है और किस उद्देश्य से किया जा रहा है। लेकिन तस्वीर काम का विकल्प नहीं है।
अगर सड़क बन रही है तो उसकी गुणवत्ता भी देखनी होगी। अगर स्कूल में सुविधा बढ़ाई जा रही है तो बच्चों को उसका लाभ भी मिलना चाहिए। अगर अस्पताल में सुधार का दावा है तो मरीज को इलाज की सुविधा भी मिलनी चाहिए। अगर किसी योजना के लाभार्थियों की तस्वीरें प्रकाशित हो रही हैं तो यह भी देखना होगा कि पात्र व्यक्ति वास्तव में लाभ पा रहे हैं या नहीं। फोटो में सब मुस्कुरा रहे होते हैं। कैमरा बंद होते ही असली कहानी शुरू होती है।
कहीं लाभार्थी पूछ रहा होता है कि अगली किस्त कब आएगी। कहीं किसान पूछता है कि पानी कब पहुंचेगा। कहीं विद्यार्थी पूछता है कि शिक्षक कब आएंगे। कहीं बुजुर्ग पूछता है कि उसकी पेंशन का मामला कब सुलझेगा। कैमरे के सामने विकास मुस्कुराता है और कैमरे के पीछे नागरिक इंतजार करता है।
फिर कोई पूछ ले कि काम कितना हुआ, तो जवाब मिलता है—“आपको दिखाई नहीं देता? पूरा कार्यक्रम हुआ, निरीक्षण हुआ, रिपोर्ट जारी हुई।” साहब, कार्यक्रम हुआ, यह दिखाई दे रहा है। अब काम भी दिखा दीजिए।
मीटिंग में सब जिम्मेदार, बाहर निकलते ही कोई जिम्मेदार नहीं
कार्यालय में बैठक चल रही है। मेज पर फाइलें हैं, सामने अधिकारी हैं और दीवार पर जिम्मेदारी का बड़ा-सा संदेश टंगा है। अध्यक्ष महोदय पूछते हैं, “यह काम समय पर पूरा क्यों नहीं हुआ?”
पहला अधिकारी कहता है, “संसाधन उपलब्ध नहीं थे।” दूसरा कहता है, “हमें समय पर सूचना नहीं मिली।” तीसरा कहता है, “प्रस्ताव स्वीकृति के लिए भेजा गया था।” चौथा कहता है, “हमारी तरफ से कोई कमी नहीं थी।”
बैठक में सभी की बात सही मान ली जाए तो गलती जरूर हुई है, लेकिन गलती करने वाला कोई नहीं है। यह आधुनिक व्यवस्था का अनोखा गणित है। चार लोग काम में शामिल थे, पांच लोगों ने फाइल देखी, छह लोगों ने टिप्पणी लिखी और सातवीं बैठक में भी यह तय नहीं हो पाया कि काम रुका किस वजह से।
फिर अध्यक्ष कहते हैं, “अगली बैठक में पूरी रिपोर्ट लेकर आइए।” सब सिर हिलाते हैं। बैठक समाप्त होती है। लोग अपनी-अपनी गाड़ियों में बैठते हैं। फाइलें फिर अलमारी में चली जाती हैं। अगली बैठक की तारीख तय हो जाती है। काम की तारीख अभी तय नहीं हुई।
कौआ उड़ गया!
इसका समाधान बहुत कठिन नहीं है। हर काम के लिए जिम्मेदार व्यक्ति, समय-सीमा और प्रगति की स्पष्ट स्थिति तय होनी चाहिए। देरी हो तो उसका कारण दर्ज होना चाहिए। जहां गलती साबित हो, वहां नियमों के अनुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए। जिम्मेदारी किसी पद का बोझ नहीं, उस पद से जुड़ा कर्तव्य है।
जनता भी कम कलाकार नहीं है
अब जरा आईना अपनी तरफ भी घुमाते हैं। हर बार कौआ उड़ाने का दोष व्यवस्था पर डाल देना आसान है, लेकिन क्या नागरिकों की कोई जिम्मेदारी नहीं?
सड़क पर गंदगी फैलाकर हम सफाई व्यवस्था को कोसते हैं। यातायात नियम तोड़कर पुलिस से अनुशासन की अपेक्षा करते हैं। बिना स्रोत की खबर आगे भेजते हैं और फिर कहते हैं कि सोशल मीडिया पर झूठ बहुत फैल रहा है।
बच्चों के सामने मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, फिर शिकायत करते हैं कि बच्चे हमारी बात नहीं सुनते। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं और फिर कहते हैं कि सरकार सुविधाएं नहीं देती।
हम चाहते हैं कि दूसरे ईमानदार हों, नियमों का पालन करें और अपना काम समय पर करें। लेकिन जब अपनी बारी आती है तो हमारे पास भी बहानों की पूरी दुकान खुल जाती है।
“सब करते हैं।” “एक बार से क्या होता है?” “हम अकेले क्या बदल देंगे?” “यह तो सरकार का काम है।” ये वाक्य भी कौए के पंख हैं। इनके सहारे हम अपनी छोटी-सी जिम्मेदारी से उड़कर दूर चले जाते हैं।
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि नागरिकों के सामने मौजूद वास्तविक समस्याओं के लिए उन्हें ही दोषी ठहरा दिया जाए। व्यवस्था की जिम्मेदारी अपनी जगह है और नागरिक की जिम्मेदारी अपनी जगह। एक की विफलता दूसरे के कर्तव्य को समाप्त नहीं करती। लेकिन बदलाव की शुरुआत तब होती है, जब हम दूसरों से सवाल करने के साथ अपने व्यवहार पर भी सवाल उठाते हैं।
सोशल मीडिया पर फैसला पहले, तथ्य बाद में
आज किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगा नहीं कि अदालत बैठ जाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस अदालत में न वकील होता है, न पूरी सुनवाई और न ही प्रमाणों की जांच का कोई तय तरीका।
एक वीडियो आया। किसी ने टिप्पणी लिखी। दूसरे ने उसे आगे बढ़ाया। तीसरे ने अपनी तरफ से कहानी जोड़ दी। चौथे ने फैसला सुना दिया।
कुछ ही घंटों में आरोपी की सामाजिक प्रतिष्ठा पर असर पड़ सकता है। बाद में पता चले कि वीडियो अधूरा था, संदर्भ अलग था या आरोप की पुष्टि नहीं हुई, तब तक मामला दूर निकल चुका होता है।
अब सुधार कौन करेगा? जिसने सबसे पहले पोस्ट लिखी थी, वह कहेगा कि उसे किसी और ने भेजी थी। जिसने आगे बढ़ाई, वह कहेगा कि वह तो सिर्फ जानकारी साझा कर रहा था। जिसने टिप्पणी की, वह कहेगा कि यह उसकी निजी राय थी।
और जिस व्यक्ति के बारे में गलत बात फैली, वह पूछता रह जाएगा कि मेरी बात कौन सुनेगा? यहां भी कौआ उड़ गया।
सूचना साझा करना नागरिक अधिकार है, लेकिन उसके साथ तथ्य जांचने की जिम्मेदारी भी आती है। आरोप और प्रमाण में फर्क करना जरूरी है। गलती हो जाए तो सुधार करना भी उतना ही जरूरी है। हर वायरल बात सच नहीं होती और हर लोकप्रिय राय प्रमाण नहीं बन जाती। कभी-कभी सबसे जिम्मेदार पोस्ट वही होती है, जिसे साझा करने से पहले हम दो मिनट रुककर जांच लेते हैं।
वादे की भी कोई समय-सीमा होनी चाहिए
वादे मनुष्य के सामाजिक जीवन का हिस्सा हैं। परिवार में वादा होता है, कारोबार में वादा होता है, सार्वजनिक जीवन में वादा होता है और शासन-प्रशासन में भी घोषणाएं की जाती हैं। समस्या वादा करने में नहीं, बल्कि वादे को जवाबदेही से अलग कर देने में है।
कोई काम करने की घोषणा हुई है तो उसका उद्देश्य क्या है? उसे पूरा करने की समय-सीमा क्या है? उसके लिए संसाधन कहां से आएंगे? काम पूरा होने की पुष्टि कौन करेगा? और यदि निर्धारित समय पर काम नहीं हुआ तो नागरिक जानकारी कहां से प्राप्त करेगा? ये सवाल किसी का अपमान नहीं हैं। ये सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता के सामान्य प्रश्न हैं।
जब कोई नागरिक अपने प्रतिनिधि से काम का हिसाब मांगता है तो उसे विरोधी, आलोचक या परेशान करने वाला समझने के बजाय उसकी बात सुननी चाहिए। सवाल पूछना लोकतांत्रिक जीवन का सामान्य हिस्सा है।
इसी तरह नागरिकों को भी यह समझना होगा कि हर घोषणा अगले दिन पूरी नहीं हो सकती। कुछ कामों में समय, संसाधन और कानूनी प्रक्रिया लगती है। लेकिन देरी का कारण बताना और प्रगति की जानकारी देना भी जिम्मेदारी का हिस्सा है।
वादा पूरा होने पर तालियां बजें, लेकिन वादा अधूरा रहने पर सवाल भी पूछे जाएं। तभी वादे का कौआ बार-बार उड़ने के बजाय किसी दिन जमीन पर उतरेगा।
आखिर कौआ लौटेगा कैसे?
कौआ लौटाने के लिए न कोई विशेष पूजा चाहिए, न लंबा भाषण और न ही नई समिति। जरूरत है कुछ छोटी लेकिन ठोस आदतों की।
पहली बात, समस्या दर्ज होने के साथ उसकी स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए। शिकायत किसके पास है, कार्रवाई कहां तक पहुंची और समाधान कब तक संभव है—इसकी जानकारी नागरिक को मिलनी चाहिए।
दूसरी बात, समीक्षा में केवल कागजी प्रगति नहीं, वास्तविक परिणाम भी देखे जाने चाहिए। सड़क बनी है तो उसकी हालत देखी जाए। सुविधा शुरू हुई है तो उसका उपयोग देखा जाए। शिकायत निस्तारित हुई है तो यह भी जांचा जाए कि शिकायतकर्ता की समस्या हल हुई या नहीं।
तीसरी बात, जांच और कार्रवाई के मामलों में कानून के अनुसार निष्पक्षता बरती जाए। न किसी को बिना प्रमाण दोषी ठहराया जाए, न किसी मामले को केवल इसलिए भुला दिया जाए कि समय बीत गया।
चौथी बात, सार्वजनिक जीवन में किए गए वादों और घोषणाओं की प्रगति नागरिकों के सामने रखी जाए। इससे प्रशंसा भी तथ्य के आधार पर होगी और आलोचना भी।
और पांचवीं बात, नागरिकों को अपनी जिम्मेदारी से भागने के लिए हर बार किसी दूसरे कौए की जरूरत नहीं होनी चाहिए। बदलाव की शुरुआत किसी बड़े मंच से नहीं, रोजमर्रा के व्यवहार से भी हो सकती है।
इस बार मुंडेर खाली मत छोड़िए
कल्पना कीजिए, एक दिन फिर कोई बच्चा अपनी दादी से पूछता है, “दादी, कौआ उड़ गया?” दादी कहती हैं, “हां बेटा, उड़ गया।” बच्चा पूछता है, “अब क्या करें?”
दादी मुस्कुराकर कहती हैं, “इस बार उसके पीछे मत भागो। पहले देखो कि वह किस वजह से उड़ा। कहीं तुमने ही तो उसे डराकर नहीं भगाया? और अगर किसी ने जानबूझकर भगाया है, तो उससे पूछो कि क्यों भगाया।” बच्चा शायद इतना दर्शन न समझे, लेकिन उसकी बात में हमारे समय का बड़ा सबक छिपा है।
हर घटना के पीछे कारण होता है। हर समस्या का कोई न कोई संदर्भ होता है। और हर जिम्मेदारी का एक ठिकाना होना चाहिए।
किसी अधिकारी, नेता, कर्मचारी, पत्रकार या नागरिक से सवाल करना गलत नहीं। गलत यह है कि सवाल का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले को ही परेशान समझ लिया जाए।
व्यंग्य का काम किसी एक व्यक्ति को कठघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि उस आदत को पहचानना है जो पूरे समाज में धीरे-धीरे सामान्य बन जाती है।
आज हमें कौआ उड़ने पर हंसना भी चाहिए, लेकिन उसके बाद यह भी देखना चाहिए कि मुंडेर पर क्या बचा है। वहां कोई अधूरा काम है, कोई भूला हुआ वादा है, किसी की लंबित शिकायत है या हमारी अपनी जिम्मेदारी?
क्योंकि कौआ उड़ने से आसमान खाली नहीं होता। आसमान में और भी पक्षी होते हैं। लेकिन जमीन पर खड़ा आदमी अगर हर बार अपनी जिम्मेदारी भूल जाए, तो मुंडेरें खाली होती चली जाती हैं।
और एक दिन ऐसा आता है कि पूछने वाला भी नहीं बचता। फिर व्यवस्था बड़े आराम से कह सकती है—“देखिए, अब कोई शिकायत नहीं आ रही!” वाह! क्या सफलता है! शिकायत करने वाला थक गया, तो समस्या अपने आप समाप्त मान ली गई। इससे बड़ा व्यंग्य क्या होगा?
कौआ उड़ गया, यह खबर है। लेकिन कौआ क्यों उड़ा, यह सवाल है। और जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलेगा, हर सप्ताह कोई न कोई नई मुंडेर खाली होती रहेगी।
इसलिए अगली बार जब कोई कहे—“अरे भाई, कौआ उड़ गया!” तो मुस्कुराइए जरूर, मगर एक सवाल भी पूछिए— “कौआ उड़ गया तो उड़ गया, लेकिन उसकी जगह जवाबदेही कौन संभालेगा?”
— अनिल अनूप













