16 अक्टूबर 2026 6:01 अपराह्न

धार्मिक एवं सामाजिक विचारों का समूह है गांधीवाद : डॉ. अनिल दीक्षित

गांधी जयंती पर गांधी प्रतिमा के साथ डॉ. अनिल दीक्षित, सत्य अहिंसा सेवा और आत्मनिर्भरता पर गांधीवाद की प्रासंगिकता

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

देहरादून। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 157वीं जयंती के अवसर पर देहरादून में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में गांधीवाद, अहिंसा, सत्य, सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी पर विस्तार से चर्चा हुई। इतिहास संकलन समिति की ओर से आयोजित कार्यक्रम में महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए देवभूमि उत्तराखण्ड यूनिवर्सिटी, देहरादून के विधि-संकाय अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार दीक्षित ने कहा कि गांधीवाद किसी एक विचार या राजनीतिक सिद्धांत तक सीमित नहीं है। यह धार्मिक और सामाजिक विचारों का ऐसा व्यापक समूह है, जिसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है, जितनी गांधीजी के जीवनकाल में थी।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब दुनिया वैश्वीकरण, सामाजिक असहिष्णुता, तनाव और विभिन्न प्रकार के संघर्षों से गुजर रही है, ऐसे दौर में महात्मा गांधी के विचार समाज को शांति और सह-अस्तित्व का रास्ता दिखा सकते हैं। गांधीवाद व्यक्ति को केवल अपने हित तक सीमित रहने के बजाय समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझने की प्रेरणा देता है।

आज के दौर में पहले से अधिक प्रासंगिक गांधीवाद

डॉ. अनिल दीक्षित ने कहा कि महात्मा गांधी के विचारों को केवल इतिहास के एक अध्याय के रूप में देखने की जरूरत नहीं है। उनके विचार आज की सामाजिक परिस्थितियों में भी व्यवहारिक मार्गदर्शन दे सकते हैं। गांधीजी ने मानव जीवन में आवश्यकता और लालच के बीच अंतर को स्पष्ट किया था। उनका मानना था कि पृथ्वी पर मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन मनुष्य के लालच को पूरा करने के लिए नहीं।

डॉ. दीक्षित के अनुसार उपभोक्तावाद और बढ़ती व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा के वर्तमान दौर में गांधीजी का यह विचार और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। जरूरत और लालच के बीच संतुलन स्थापित किए बिना समाज में आर्थिक और सामाजिक असमानता को कम करना कठिन है। गांधीवाद इसी संतुलन, संयम और जिम्मेदारी की ओर संकेत करता है।

उन्होंने कहा कि गांधीजी का चिंतन केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने तक सीमित नहीं था। वे व्यक्ति के नैतिक विकास, सामाजिक समानता, आत्मनिर्भरता, सेवा और सत्य को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे। इसलिए गांधीवाद को व्यापक सामाजिक और मानवीय विचारधारा के रूप में समझने की आवश्यकता है।

अहिंसक प्रतिरोध गांधीवाद की मूल भावना

गांधीवाद क्या है, इस सवाल का जवाब देते हुए डॉ. दीक्षित ने कहा कि किसी भी प्रकार के शोषण और अन्याय का अहिंसक तरीके से विरोध करना गांधीवादी सोच का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने कहा कि दूसरों की सेवा को प्राथमिकता देना, आवश्यकता से अधिक संचय के स्थान पर त्याग को महत्व देना, झूठ के स्थान पर सत्य का साथ देना और व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर देश तथा समाज के हित को रखना गांधीवाद की मूल भावना है।

उन्होंने कहा कि गांधीवादी विचारों की जड़ें भारतीय दर्शन और उसकी मानवीय परंपराओं में दिखाई देती हैं। भारतीय चिंतन में सत्य, अहिंसा, त्याग, सेवा और आत्मसंयम को लंबे समय से जीवन मूल्यों के रूप में महत्व दिया जाता रहा है। महात्मा गांधी ने इन्हीं मूल्यों को अपने जीवन और सामाजिक संघर्षों का आधार बनाया तथा उन्हें जनआंदोलन का स्वरूप दिया।

डॉ. दीक्षित ने कहा कि अहिंसा का अर्थ केवल हिंसा से दूर रहना नहीं है। अहिंसा एक ऐसी जीवन पद्धति है, जिसमें विरोधी के प्रति भी मानवीय दृष्टिकोण बनाए रखते हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई जाती है। आज जब दुनिया के अनेक हिस्सों में तनाव और हिंसा का वातावरण दिखाई देता है, तब गांधीजी का अहिंसा का सिद्धांत विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

सत्य और सेवा को जीवन का आधार बनाने की जरूरत

श्रद्धांजलि सभा में डॉ. दीक्षित ने गांधीवाद के सत्य और सेवा पक्ष पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गांधीजी के लिए सत्य केवल बोलने की बात नहीं थी, बल्कि यह जीवन जीने की प्रक्रिया थी। व्यक्ति के विचार, व्यवहार और कार्यों में सत्य का समावेश होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि गांधीवाद व्यक्ति को यह संदेश देता है कि समाज में परिवर्तन केवल दूसरों से अपेक्षा करने से नहीं आएगा। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्तर पर जिम्मेदारी निभानी होगी। जब व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज की चिंता करता है, तब सामाजिक परिवर्तन की वास्तविक शुरुआत होती है।

डॉ. दीक्षित ने कहा कि गांधीजी का जीवन इस बात का उदाहरण था कि बड़े सामाजिक परिवर्तन के लिए साधनों की पवित्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना लक्ष्य। किसी अच्छे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अपनाए जाने वाले रास्ते भी नैतिक और अहिंसक होने चाहिए।

शिक्षा का उद्देश्य केवल साक्षर बनाना नहीं

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर विचार रखते हुए डॉ. अनिल दीक्षित ने कहा कि गांधीजी शिक्षा को केवल पढ़ने-लिखने या साक्षर होने तक सीमित नहीं मानते थे। उनके विचारों में शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को आत्मनिर्भर, जिम्मेदार और व्यावहारिक रूप से सक्षम बनाना था।

उन्होंने कहा कि ऐसी शिक्षा की जरूरत है जो विद्यार्थियों को केवल परीक्षा और रोजगार तक सीमित न रखे, बल्कि उन्हें जीवन की वास्तविक परिस्थितियों का सामना करने योग्य बनाए। शिक्षा व्यक्ति में श्रम के प्रति सम्मान, आत्मनिर्भरता, सामाजिक जिम्मेदारी और नैतिक मूल्यों का विकास करे, तभी उसका वास्तविक उद्देश्य पूरा माना जा सकता है।

डॉ. दीक्षित ने कहा कि आज शिक्षा के क्षेत्र में तकनीकी और व्यावसायिक ज्ञान तेजी से महत्वपूर्ण हो रहा है, लेकिन इसके साथ मानवीय मूल्यों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। गांधीजी के विचारों से शिक्षा व्यवस्था को यह प्रेरणा मिलती है कि ज्ञान के साथ चरित्र निर्माण भी आवश्यक है।

गांधीजी के विचारों को जीवन में उतारने की आवश्यकता

कार्यक्रम में वक्ताओं ने महात्मा गांधी के जीवन और उनके विचारों को याद करते हुए कहा कि गांधीजी को केवल जयंती या पुण्यतिथि के अवसर पर याद करना पर्याप्त नहीं है। उनके विचारों की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब उन्हें व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के व्यवहार में उतारा जाए।

डॉ. दीक्षित ने कहा कि सत्य, अहिंसा, सेवा, त्याग और आत्मनिर्भरता जैसे गांधीवादी मूल्यों को अपनाकर समाज में आपसी विश्वास और सहयोग का वातावरण बनाया जा सकता है। आज की पीढ़ी को गांधीजी के जीवन से यह सीख लेने की आवश्यकता है कि सामाजिक परिवर्तन के लिए विचारों के साथ व्यक्तिगत आचरण भी महत्वपूर्ण है।

देहरादून के गांधी पार्क में आयोजित इस श्रद्धांजलि सभा में महात्मा गांधी के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए उपस्थित लोगों ने उनके विचारों को याद किया। कार्यक्रम में श्रीमती मीना तिवारी, डॉ. सुनील कुमार, क्रिश तिवारी, सुश्री साधना एडवोकेट, राजेंद्र प्रसाद एडवोकेट, संदीप राजभर सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

कार्यक्रम के दौरान गांधीजी के सत्य, अहिंसा और सेवा के संदेश को वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में प्रासंगिक बताते हुए उनके विचारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। श्रद्धांजलि सभा का संदेश यही रहा कि गांधीवाद केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा, सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी के माध्यम से वर्तमान को बेहतर बनाने की एक सतत विचारधारा है।

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