औकात….? इंसान की हैसियत का सच, समाज का छल और आत्मसम्मान की अंतिम लड़ाई
✍️अनिल अनूप
एक शब्द बहुत आसानी से लोगों के जंहा पर चढ़ जाता है – “औकात”। किसी को सपने में ताला लगाने वाली हो, किसी को सपने में ताला लगाने वाली हो, किसी को गरीबी का मजाक बनाने वाली हो या किसी को उसकी सामाजिक शुरुआत की याद दिलाने वाली हो – बस एक वाक्य है:
“अपनी औकात में रहो…”
यह वाक्य केवल शब्द नहीं है। यह चोरी से चली आ रही मानसिक दासी का प्रमाण है।
यह उस समाज की पहचान है, जो इंसानों को पढ़ने से देखने के बजाय उन्हें जाति, पैसा, पद, पोशाक, भाषा, धर्म और संपर्कों के पैमाने पर सिखाया जाता है।
लेकिन सवाल ये है कि आखिर “औकात” होती क्या है? किस बैंक का बीमा होता है? मानव जाति की कौन सी गाड़ी, बड़ा बंगला और ऊंचा पद तय होता है? क्या गरीब आदमी की कोई औकात नहीं होती?
कौन सा किसान, श्रमिक, मूर्तिकार, लेखक, कलाकार या किसान किसान इतना छोटा होता है क्योंकि उसकी सफलता समकक्ष नहीं होती?
एक सिद्धांत जब “औकात” शब्द को देखा जाता है तो उसे केवल सामाजिक व्यवहार नहीं दिखता, बल्कि वह मनुष्य की सबसे खतरनाक मानसिक बीमारी को पहचानता है – शब्दों को छोटी समझ का रोग है।
“औकात” शब्द की असली त्रासदी
दिलचस्प बात यह है कि “औकात” शब्द का मूल अर्थ क्षमता, स्थिति या स्थिरता से होता है। लेकिन समाज ने इसे अपमान का हथियार बना दिया। आज “औकात” का मतलब अक्सर ऐसा होता है कि:
तुम संयुक्त राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र बड़े नहीं हो, रेटिंग चित्र कम हो, नक्षत्र दर्शन का अधिकार नहीं, तुम शिष्य बड़े नहीं हो सकते। यानि यह शब्द केवल आर्थिक नहीं, मानसिक दासता का औज़ार बन गया है।
जब कोई अमीर आदमी गरीब को अपनी औकात बताता है, तब असल में वह अपने अंदर डर को छिपा हुआ होता है।
ऐसा होता है कि कहीं भी यह घटिया परिश्रम, प्रतिभा और संघर्ष से आगे नहीं निकलता।
जब किसी नेता-जनता को उसकी औकात याद आती है, तब वह लोकतंत्र नहीं, नेपोलियन बोल रहा होता है।
जब किसी वैज्ञानिक विद्वान ने कम पढ़ा-लिखे इंसान को उसकी औकात समझ आती है, तब उसकी डिग्री नहीं, उसका व्यवहार बोल होता है।
साहित्य ने हमेशा “औकात” के व्यवसाय का निर्माण किया
दुनिया का सबसे बड़ा साहित्य कभी अमीरों की चापलूसी से पैदा नहीं हुआ। वह भूख, दर्द, संघर्ष और अपमान की राख से निकला।
कबीर जुलाहा थे। रैदास चर्मकार थे। निराला ने देखी कमी। प्रेमचंद गरीबी में डूबे रहे। देवी कुमार व्यवस्था से प्लेस्टेशन कर रहे हैं।
अगर समाज की तय की हुई “औकात” ही अंतिम सत्य है, तो इतिहास इन लोगों को कभी याद नहीं रहता।
असल में कहावत है कि इंसान की सबसे बड़ी ताकतें उसके विचार हैं, न कि उसकी संपत्ति। एक विचार हजारों महलों पर भारी पड़ सकता है।
समाज को “औकात” क्यों चाहिए? क्योंकि सत्य से सबसे बड़ा सत्य प्रकट होता है।
हर इच्छा की व्यवस्था है कि लोग अपने आप को छोटा-सा स्ट्रक्चर बनाएं। ताकि वे प्रश्न न आरक्षण। ताकि वे विद्रोह न करें। ताकि वे सपने देखने की रहस्यमयी संरचना। इसी समाज की शुरुआत बचपन से ही होती है:
ये बड़े घर का बच्चा है, ये गरीब है, ये गांव का गंवार है, ये छोटी जाति का है, ये अंग्रेजी बोली है।
धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे होने वाला इंसान अपनी असली पहचान भूल जाता है और समाज द्वारा दी गई “औकात” को ही सच्चा सिद्धांत माना जाता है। यही सबसे बड़ा नुकसान है।
सबसे खतरनाक औकात: मानसिक औकात
गरीबी समान रूप से खतरनाक नहीं होती, युवा दासी। कई लोग आर्थिक रूप से गरीब होते हैं और दृष्टिकोण से भी समृद्ध होते हैं।
और कई लोग अरबों के मालिक भी अंदर से बेहद छोटे होते हैं। जिस आदमी की सोच छोटी है, उसकी औकात सबसे छोटी है।
जो कर्मचारी अपमान करके खुद को बड़ा साबित करना चाहता है, वह अंदर से बेहद कमजोर होता है।
एक ऐसा मजदूर जो ईमानदारी से मेहनत करता है, वह अमीर से कहीं बड़ा होता है जिसका हक हासिल करके महल खड़ा होता है।
सोशल मीडिया का नया “औकात युग”
आज सोशल मीडिया ने “औकात” को एक नया मंच दिया है। फॉलोअर्स के आधार पर इंसान की कीमत तय होती है।
ब्रांडेड मिश्रण से प्रमाणित किया जा रहा है। बिजनेस के सामान और विदेशी यात्रा को सफलता का प्रतीक बनाया गया है।
लोग अब जिंदगी भर कम और ज्यादा प्रदर्शन कर रहे हैं। जिसके पास के लिए अधिकतर है, वही “बड़ा” मान लिया गया है।
लेकिन सच्चाई तो यह है कि सोशल मीडिया की चमक के पीछे अकेले लोगपन, अवसाद और असुरक्षा की भावना हो रही है।
वे कॉन्स्टेंट्स के जीवन को देखकर अपनी “औकात” नापते रहते हैं। यानी तुलना अब केवल सामाजिक नहीं रही, डिजिटल भी हो गया है।
राजनीति और “औकात” का खेल
राजनीति में भी “औकात” सबसे बड़ा हथियार है। नेता जनता को वोट के समय मालिक कहते हैं और सत्ता में ज्ञान ही उसकी औकात याद दिलाते हैं।
गरीब आदमी लाइन में खड़ा रहता है, अमीर आदमी फोन कुकरकर काम करवाता है। यही वह जगह है जहां लोकतंत्र की चाहत होती है।
क्योंकि संविधान ने कभी किसी नागरिक की “औकात” तय नहीं की। उन्होंने कहा. दिया सम्मान। अधिकार दिया गया है. लेकिन व्यवहारिक समाज आज भी सामन्ती शक्ति से बाहर नहीं निकला।
प्रेम में भी “औकात” देखें, यह हमारे समाज की सबसे सच्ची सच्चाइयों में से एक है।
किसी भी लड़के या लड़की का प्रेम बार-बार उसकी नौकरी, नौकरी, जाति और परिवार की डिग्री से निर्धारित होता है।
जो भी भिन्न-भिन्न होते हैं केवल इसलिए टूट जाते हैं क्योंकि “औकात समान नहीं” होता है। यहां प्रेम हारता नहीं, समाज उसे मार देता है।
असली औकात क्या है?
एक विचार शायद इस प्रश्न का उत्तर कुछ इस तरह है: इंसान की औकात उसकी गुड़िया से नहीं, व्यवहार से तय होती है।
उसकी जेब से नहीं, उसकी नौकरी से तय होती है। उसकी कुर्सी से नहीं, उसकी कुर्सी से तय होती है।
जो भी वैज्ञानिक सम्मान दे सकता है, वही सच्चाई में बड़ा है। जो सत्य मिल भी रही है, वही उठ रही है। जो संघर्ष में भी इंसान बना हुआ है, वही असली अमीर है।
समय का सबसे बड़ा उदाहरण है
इतिहास गवाह है कि समय ने कई बादशाहों की औकात बताई है। जो लोग खुद को भगवान के गढ़ थे, वे आज के इतिहास की जड़ें हैं।
और जिन फ़कीरों को समाज ने ख़त्म कर दिया, उनके विचार आज भी ज़िंदा हैं। समय बहुत वैधानिक है। उन्होंने फालो स्टूडियो को गिरवी रख दिया।
इसलिए किसी इंसान को उसकी वर्तमान स्थिति देखकर छोटी समझ लेना मूर्खता है। कल अपना व्यक्तिगत इतिहास लिख सकते हैं।
“ औकात” और आत्मसम्मान का टोकरा होगा
हर इंसान को अपनी झिझक समझनी चाहिए, लेकिन इसका मतलब खुद को छोटा आदमी नहीं लेना चाहिए।
आत्मसम्मान और व्यवहार में बहुत अंतर है। जो व्यक्ति स्वयं का सम्मान करता है, वह कर्मचारियों का अपमान नहीं करता। परन्तु जो केवल अपने व्यवहार से जीता है, वह हर किसी को अपनी औकात बताता है।
सबसे बड़ी क्रांति क्या होगी?
जिस दिन समाज यह तय करेगा कि इंसान की कीमत उसके मानव से तय होगी, उस दिन “औकात” शब्द अपमान नहीं रहेगा। उस दिन एक किसान और वैज्ञानिक दोनों को समान सम्मान मिलेगा।
एक लेखक और व्यापारी दोनों की गरिमा होगी। एक गरीब बच्चा भी बड़े सपने देखने से नहीं डरेगा। लेकिन अभी हम उस समाज से बहुत दूर हैं। आज भी दुनिया इंसान को नहीं, उसकी खूबसूरती को सलामत रखती है।
सिद्धांत की अंतिम टिप्पणी
एक प्राचीन सिद्धांत अंत में यही कहेगा कि: “औकात” वह शब्द है, जिसे समाज ने छोटा बनाकर बनाया था, लेकिन जीवन बार-बार यह साबित करता है कि मनुष्य की मूल अवधारणा उसकी आत्मा में है।
जिस इंसान के अंदर करुणा होती है, जो अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है, जो फिर से खड़ा हो जाता है, अकेले जो भी सच बोल सकता है, उसकी औकात दुनिया की किसी कुर्सी से बड़ी होती है।
और सच तो यह है… जिस दिन इंसानियत की औकात नापना छोड़ दे, उसी दिन वह खुद इंसानियत की औकात हासिल कर ले।








