16 अक्टूबर 2026 7:07 अपराह्न

टकराव से ही निखरता है राज और समाज का रिश्ता

राज-समाज रविवारीय स्तंभ की फीचर इमेज, जिसमें स्तंभकार लेखक केवल कृष्ण पनगोत्रा की तस्वीर के साथ सामाजिक विकास, धार्मिक विविधता, संसद और राज-समाज के संबंधों को दर्शाया गया है।

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राज-समाज | साप्ताहिक स्तंभ

सामाजिक विकास में टकराव साधता भी है और सुधारता भी है

लेखक: केवल कृष्ण पनगोत्रा

हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी में घटने वाली अधिकांश घटनाएं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में कहीं न कहीं राज और समाज से जुड़ी रहती हैं। कहीं राज पर उंगली उठती है तो कहीं समाज पर!

अगर मानव इतिहास पर सरसरी निगाह डालें तो इंसान बस्ती से पहले जंगल में था। कंद-मूल और कच्चा मांस आदि खाया करता था। लेकिन जंगल में जिंदा रहने की चुनौती ने इंसान को अकेले रहने के बजाय समूह में रहने के लिए मजबूर किया। जंगल में अकेले रहते हुए भोजन जुटाना भी आसान नहीं था। इसलिए साथ मिलकर भोजन जुटाते हुए आपसी सहयोग, सहमति और भरोसे की परंपरा शुरू हुई। मोटी बात करें तो कृषि और परिवार जैसे बदलावों से गुजरता हुआ इंसान भाषा और नियमों तक पहुंच गया। इस तरह एक व्यवस्थित समाज को आकार मिला।

चूंकि समाज राज (राज्य) से पहले की व्यवस्था है, इसलिए समूहों को व्यवस्थित रखने के लिए राज की जरूरत पड़ी। राज और समाज में जहां सामंजस्य स्थापित हुआ, वहीं टकराव की स्थिति भी पैदा हुई। दुनिया में विभिन्न कालखंडों में विभिन्न सामाजिक समूहों ने विभिन्न नियमों और शर्तों के साथ जिन व्यवस्थाओं और जीवन पद्धतियों की आधारशिला रखी, उनको समय के साथ धर्म कहा जाने लगा। इन जीवन पद्धतियों और व्यवस्थाओं का विभिन्न कालखंडों में सहज पालन और अनुसरण करने के लिए उन्हें कलमबद्ध किया गया।

जिस कालखंड में वेदों को कलमबद्ध किया गया, उसे वैदिक काल कहा गया। वेद सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहे, बल्कि जीवनशैली भी बन गए। वेद ब्रह्मांडीय नियमों, कर्तव्यों और मानवीय मूल्यों (Universal Laws, Duties and Human Values) पर आधारित जीवन जीने का शाश्वत तरीका माने गए हैं।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण के हिसाब से वैदिक काल की जड़ें लगभग 1500 ईसा पूर्व या उससे भी पहले से जुड़ी हुई हैं। इसके मूल ग्रंथ यानी चारों वेद (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद) प्राचीन भारतीय संस्कृति और परंपराओं का आधार हैं। इस प्रकार संसार में एक विस्तृत सनातन समाज का वजूद सामने आया। मुझे नहीं लगता कि सनातन की स्थापना किसी राजा या व्यक्ति विशेष ने की। यह जरूर माना जा सकता है कि समय के साथ ऋषियों, मुनियों और संतों के अनुभवों तथा वेदों और उपनिषदों पर आधारित ज्ञान के संकलन से धीरे-धीरे सनातन विकसित हुआ होगा।

हिन्दू सामाजिक समूह

सनातन सामाजिक समूह विकसित होने के साथ ही सनातन राज का स्थापित होना इतिहास की एक व्यावहारिक घटना बनी। सनातन राज का उद्देश्य एक ऐसी शासन व्यवस्था से है, जहां राजा का सर्वोच्च कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना और धर्म यानी विधि-विधान तथा नैतिक मूल्यों का पालन करना और करवाना था।

यह कहना गलत होगा कि विश्व भर में सिर्फ सनातन सामाजिक समूह और सनातन राज का ही वर्चस्व कायम रहा।

समय-समय पर कई दूसरे सामाजिक समूहों का उदय हुआ। विभिन्न सामाजिक समूहों के राज (राज्य) और राजा-महाराजा (हुक्मरान) हुए। अलग-अलग इतिहास, विश्वास और दर्शन (History, Beliefs and Philosophy) पर आधारित सामाजिक समूहों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

इस्लामिक सामाजिक समूह

सातवीं सदी के दौरान अरब के रेगिस्तान में एकेश्वरवाद को मानने वाले इस्लामिक सामाजिक समूह का उदय हुआ। अल्लाहु अकबर (अरबी) का शाब्दिक अर्थ है अल्लाह सबसे महान है या “ईश्वर सर्वश्रेष्ठ है”। मुस्लिम धर्म के जानकारों का अभिमत है कि इस्लाम अल्लाह द्वारा पैगंबर मोहम्मद साहिब पर नाज़िल किया गया आखिरी पैगाम है। अविभाजित भारत में इस्लाम का प्रचार-प्रसार व्यापार, हुक्मरानी और सूफी विचारधारा से परवान चढ़ा।

सिख सामाजिक समूह

इसी प्रकार गुरु नानक देव जी ने सिख धर्म की स्थापना 15वीं शताब्दी में पंजाब क्षेत्र में की थी।

सिख धर्म पूरी तरह से एकेश्वरवादी (एक ओंकार) है और ईश्वर को निराकार मानता है। कुछ लोगों का मानना है कि सिख धर्म हिन्दू धर्म की शाखा (Offshoot) है, लेकिन यह बात गलत है। बेशक गुरु नानक देव जी हिन्दू खत्री थे, लेकिन गुरु साहिब जी ने एकेश्वरवाद की धारणा देकर सिख धर्म को हिन्दू धर्म की बहुदेववाद की धारणा से अलग कर दिया। सिख धर्म में मूर्ति पूजा, अवतारवाद, कर्मकांड और जनेऊ पहनने जैसी परंपराओं का स्पष्ट विरोध किया गया है।

इसके अलावा गुरु नानक देव जी और अन्य नौ सिख गुरु साहिबानों ने समाज में फैली जाति व्यवस्था और भेदभाव को पूरी तरह से अस्वीकार किया तथा सभी इंसानों को समान माना। हिन्दुओं में कई जातियां-उपजातियां हैं और जातिसूचक संबोधन भी हैं। सिख धर्म के संस्थापक श्री गुरु नानक देव जी ने इन शब्दों के साथ जाति व्यवस्था और ऊंच-नीच को अस्वीकार किया है:

नीचां अंदर नीच जात,
नीचां तों अति नीच!
नानक तिनके संग-साथ,
वड्डेआं सिउं क्या रीस!

ईसाई सामाजिक समूह

इसी प्रकार ईसाई धर्म यानी ईसाई सामाजिक समूह की शुरुआत पहली शताब्दी ईस्वी में (लगभग 30-33 ईस्वी के दौरान) यरूशलेम और फिलिस्तीन क्षेत्र में हुई थी। ईसा मसीह (यीशु) इसके संस्थापक हैं। दीर्घकाल में यह धर्म दो संप्रदायों (कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट) में बंट गया। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में ईसाइयों की संख्या लगभग 2.8 करोड़ है। केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा और मुंबई में ईसाइयों की काफी आबादी है। देश के लगभग दो-तिहाई ईसाई दक्षिण भारत में रहते हैं। इसके अलावा पूर्वोत्तर राज्यों जैसे नागालैंड, मिजोरम, मेघालय और मणिपुर में यह प्रमुख धर्म है।

इन प्रमुख सामाजिक समूहों के अलावा कुछ और समूहों ने दुनिया में अपने राज स्थापित किए हैं।

मोटे तौर पर देखा जाए तो विभिन्न धर्मों के रूप में स्थापित विभिन्न सामाजिक समूहों ने अपने-अपने राज (राज्य) कायम किए।

राजतंत्र से लोकतंत्र तक: टकराव का इतिहास

जिन कालखंडों में राजा-महाराजाओं और हुक्मरानों का दौर जारी रहा, उस दौर को राजतंत्र या राजशाही (Monarchy) कहा गया। इतिहास गवाह है कि चंद अपवादों को छोड़कर राजतंत्र में अधिकांश शासक निरंकुश (Autocrat) हुआ करते थे। इस बीच राज और समाज (State and Society) के बीच टकराव की स्थिति भी पैदा होती रही।

राजशाही द्वारा शासित राज्यों में राज और समाज के बीच असहमति के कारण टकराव बढ़ने लगा और परिणामस्वरूप लोकतांत्रिक व्यवस्था के रास्ते खुलने लगे। सबसे पहले दुनिया में प्राचीन यूनान के ग्रीस शहर में लोकतंत्र का शुरुआती बिगुल बजा। यह समय लगभग पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व था। इस शुरुआती लोकतंत्र में महिलाओं, दासों और विदेशियों को वोट देने का अधिकार नहीं था।

अब चूंकि दुनिया में लोकतंत्र का बिगुल बज चुका था। फ्रांसीसी और रूसी क्रांति से होते हुए भारत में भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ विरोध की आवाज उठने लगी और अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों में दुनिया के अलग-अलग देशों ने अलग-अलग समय में स्वतंत्रता प्राप्त की।

असहमति और टकराव से ही मजबूत होता है लोकतंत्र

हमारा ऐतिहासिक अनुभव यह बताता है कि शासन व्यवस्था चाहे जैसी रही हो, राज और समाज के बीच सहमति के साथ असहमति और टकराव एक अवश्यंभावी दशा है। असहमति और टकराव राजतंत्र और प्रजातंत्र, दोनों व्यवस्थाओं में देखे गए हैं।

भारत इस दशा का एक खरा उदाहरण है, जहां जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि लोकप्रिय सरकार तो बनाते हैं, मगर असहमति और टकराव प्रजातांत्रिक व्यवस्था को साधते भी हैं और सुधारते भी हैं।

संपादकीय सूचना


‘राज-समाज’ का यह स्तंभ विशेष रूप से रविवारीय अंक के लिए निर्धारित है। इसका पहला अंक निर्धारित समय पर जारी कर दिया गया था, लेकिन तकनीकी व्यवधान के कारण वह अंक डिलीट हो गया। इसलिए हम इस अंक को ‘राज-समाज’ के प्रथम अंक के रूप में पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। इसमें लेखक केवल कृष्ण पनगोत्रा की मूल रचना को यथावत स्थान दिया गया है। पाठकों को हुई इस असुविधा के लिए हमें खेद है। हमें विश्वास है कि पाठकों का स्नेह और सहयोग इस वैचारिक यात्रा को निरंतर मजबूती प्रदान करता रहेगा।

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