16 अक्टूबर 2026 7:09 अपराह्न

‘पाकीज़ा’ फिर लौट रही है… और दुनिया फिर मीना कुमारी की आंखों में डूबने को तैयार

54 साल बाद 4K रेस्टोरेशन के साथ लौट रही पाकीज़ा और मीना कुमारी, प्रस्तुति रजनी वर्मा, आलेख अनिल अनूप

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रजनी वर्मा की प्रस्तुति | आलेख- अनिल अनूप

54 साल पहले जिस फिल्म के पर्दे पर उतरने के कुछ ही सप्ताह बाद उसकी नायिका दुनिया छोड़ गई, वही ‘पाकीज़ा’ आज आधी सदी से ज्यादा वक्त गुजर जाने के बाद फिर बड़े पर्दे पर लौट रही है—और दर्शक अब भी उसके दीवाने हैं। अक्टूबर 2026 में प्रतिष्ठित बीएफआई लंदन फिल्म फेस्टिवल में इसके नए 4K रेस्टोरेशन की खास स्क्रीनिंग के टिकट करीब एक महीने पहले ही बिक जाना इस बात का प्रमाण है कि कुछ फिल्में वक्त के साथ पुरानी नहीं होतीं, बल्कि किंवदंती बन जाती हैं। लेकिन ‘पाकीज़ा’ की असली कहानी उसकी रिलीज से कहीं ज्यादा दर्दनाक, रोमांचक और मानवीय है।

पंद्रह साल तक यह फिल्म बनती रही। इस दौरान प्रेम टूटा, पति-पत्नी अलग हुए, कलाकार दुनिया से विदा हुए, संगीतकार गुलाम मोहम्मद नहीं रहे, मूल सिनेमैटोग्राफर का निधन हो गया और खुद मीना कुमारी बीमारी और शराब के कहर से जूझती हुई मृत्यु के करीब पहुंच गईं। फिर भी फिल्म अधूरी नहीं छोड़ी गई।

कमाल अमरोही के लिए ‘पाकीज़ा’ महज एक फिल्म नहीं थी। वह उनका जुनून, उनका स्वप्न और शायद मीना कुमारी के लिए उनकी सबसे बड़ी सिनेमाई श्रद्धांजलि थी। मीना के लिए यह उस जिंदगी का हिस्सा थी जिसमें प्रेम, पीड़ा, अकेलापन, शोहरत और टूटन सब एक साथ मौजूद थे।

विडंबना यह कि जब ‘पाकीज़ा’ 4 फरवरी 1972 को रिलीज हुई, तो शुरुआती दौर में आलोचकों ने उसे वह सम्मान नहीं दिया जिसकी उम्मीद थी। कुछ ने इसे भव्यता की फिजूलखर्ची कहा, कुछ ने इसकी कहानी को पुराने जमाने की। शुरुआती दिनों में फिल्म की कमाई भी उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई। फिर 31 मार्च को मीना कुमारी चली गईं। और उसके बाद जैसे पूरा देश ‘पाकीज़ा’ की ओर उमड़ पड़ा।

सिनेमाघरों में भीड़ बढ़ती गई और जिस फिल्म को फ्लॉप कहा जा रहा था, वही 1972 की सबसे सफल फिल्मों में शामिल हो गई। मानो दर्शक फिल्म देखने नहीं, मीना कुमारी की आखिरी झलक और उनकी अमर स्मृति के सामने सिर झुकाने पहुंच रहे हों।

आज, जब ‘पाकीज़ा’ का नया 4K रूप दुनिया के प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में फिर बड़े पर्दे पर चमकने जा रहा है, तो यह केवल एक क्लासिक फिल्म की पुनर्वापसी नहीं है। यह उस दौर, उस तहजीब और उस अदाकारा की वापसी है जिसने अपने दर्द को अभिनय में बदल दिया था।

‘पाकीज़ा’ का सफर किसी इम्तिहान से कम नहीं था

‘पाकीज़ा’ की शुरुआत 1957 में हुई और फिल्म 1972 में जाकर पूरी हुई। पंद्रह वर्ष का यह अंतराल अपने भीतर हिंदी सिनेमा की शायद सबसे असाधारण निर्माण-कथाओं में से एक समेटे हुए है।

कहानी शुरू होती है कमाल अमरोही और मीना कुमारी से।

1949 की ‘महल’ की सफलता ने कमाल अमरोही को बड़े निर्देशकों की कतार में ला खड़ा किया था। वे मशहूर लेखक भी थे और ‘मुगल-ए-आज़म’ से जुड़े लेखकों में उनका नाम शामिल था। दूसरी तरफ मीना कुमारी बचपन से फिल्मों में काम करते हुए धीरे-धीरे हिंदी सिनेमा की बड़ी अभिनेत्री बन रही थीं।

दोनों के बीच प्रेम हुआ और 14 फरवरी 1952 को उन्होंने शादी कर ली।

कमाल मीना से उम्र में बड़े थे और उनके जीवन में इससे पहले भी दो विवाह हो चुके थे। कमाल मीना को प्यार से ‘मंजू’ कहते थे और मीना उन्हें ‘चंदन’ कहकर पुकारती थीं।

1954 में दोनों ने ‘दायरा’ बनाई, लेकिन फिल्म सफल नहीं हुई। इसके बाद मीना कुमारी का सितारा तेजी से चमका। ‘बैजू बावरा’, ‘आज़ाद’ जैसी फिल्मों ने उन्हें लोकप्रियता की ऊंचाइयों तक पहुंचाया और वे फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का सम्मान पाने वाली शुरुआती अभिनेत्रियों में शामिल हुईं। इसी दौर में कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को केंद्र में रखकर ‘पाकीज़ा’ की कल्पना की। 17 जनवरी 1957 को भव्य मुहूर्त के साथ फिल्म की शुरुआत हुई।

यह फिल्म शुरू से ही कमाल अमरोही के लिए साधारण प्रोजेक्ट नहीं थी। वह इसे कुछ ऐसा बनाना चाहते थे जिसे समय के गुजर जाने के बाद भी देखा और याद किया जाए। मीना कुमारी पर लिखी विनोद मेहता की जीवनी में इसी भाव को ताजमहल के उदाहरण से जोड़ा गया है—जैसे शाहजहां ने मुमताज के लिए ताजमहल बनाया, वैसे ही कमाल अमरोही ‘पाकीज़ा’ को अपना स्मारक बनाना चाहते थे।

ब्लैक एंड व्हाइट से सिनेमास्कोप तक

शुरुआत में ‘पाकीज़ा’ ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म के रूप में बनाई जानी थी। फिर इसे रंगीन करने का फैसला हुआ। इसके बाद कमाल अमरोही ने फिल्म को सिनेमास्कोप में बनाने की ठान ली। यही फैसला फिल्म की निर्माण यात्रा को और लंबा करने वाला था।

उस दौर में सिनेमास्कोप भारतीय सिनेमा के लिए नई तकनीकी चुनौती थी। कमाल अमरोही ने लंदन के एमजीएम स्टूडियो से सिनेमास्कोप लेंस किराए पर लिए। उसका मासिक किराया करीब 50 हजार रुपये था—उस समय यह बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी। लेकिन कमाल अमरोही की नजर में फिल्म का सौंदर्य बजट से बड़ा था।

सिनेमास्कोप लेंस आने के बाद मीना कुमारी के कई महत्वपूर्ण दृश्यों की शूटिंग हुई। गुलाम मोहम्मद के संगीत से सजे ‘इन्हीं लोगों ने’, ‘ठाड़े रहियो’ और ‘चलते-चलते’ जैसे मुजरा गीतों को बेहद खूबसूरती से फिल्माया गया।

इन दृश्यों में मीना कुमारी की सुंदरता, अदाकारी और नृत्य-भंगिमा ने ‘पाकीज़ा’ को उसकी विशिष्ट पहचान देना शुरू कर दिया। लेकिन फिल्म का नायक तब तक तय नहीं हुआ था।

एक हजारवें मिलीमीटर की गलती पकड़ने वाला निर्देशक

कमाल अमरोही की परफेक्शन के प्रति दीवानगी ‘पाकीज़ा’ के निर्माण की सबसे चर्चित कहानियों में से एक है।

शुरुआती शूटिंग के बाद उन्हें लगा कि सिनेमास्कोप लेंस का फोकस सही नहीं है। कैमरामैन जोसेफ विर्सचिंग ने कहा कि फोकस बिल्कुल ठीक है। दूसरी लैब में जांच कराई गई और वहां भी रिपोर्ट यही थी कि सब सही है। कमाल अमरोही संतुष्ट नहीं हुए।

फुटेज लंदन के एमजीएम स्टूडियो भेजी गई। वहां भी फोकस को सही पाया गया। लेकिन निर्देशक अपनी आंखों पर भरोसा कर रहे थे।आखिरकार हॉलीवुड की एक लैब में जांच से पता चला कि फोकस में लगभग 1/1000 मिलीमीटर का अंतर था। कमाल अमरोही की आंख ने वह बारीकी पकड़ ली थी जिसे तकनीकी जांचें पहले नजरअंदाज कर चुकी थीं। उनकी इस सूक्ष्म दृष्टि से प्रभावित होकर एमजीएम ने आगे की शूटिंग के लिए लेंस का किराया माफ कर दिया।

यह घटना बताती है कि ‘पाकीज़ा’ केवल पैसा लगाकर बनाई गई फिल्म नहीं थी। उसके हर फ्रेम के पीछे एक निर्देशक की असाधारण जिद थी।

‘बाज़ार-ए-हुस्न’ की भव्य दुनिया

‘पाकीज़ा’ के निर्माण में भव्यता का अपना अलग अध्याय है। फिल्म के ‘बाज़ार-ए-हुस्न’ के विशाल सेट पर कथित तौर पर दस लाख रुपये से अधिक खर्च हुए। चार मंजिला इस सेट को तैयार करने में सैकड़ों लोग महीनों तक काम करते रहे।

इसे वास्तविक बाजार जैसा दिखाने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से सामान और दुकानों की व्यवस्था की गई। मुजरे के दृश्यों के लिए सैकड़ों कलाकारों और नर्तकियों को तैयार किया गया।

आज डिजिटल तकनीक के दौर में जब किसी भी दृश्य को कंप्यूटर की मदद से रचा जा सकता है, उस समय की यह मेहनत अपने आप में एक कला थी।

‘पाकीज़ा’ के सेट केवल फिल्म के लिए बनाए गए ढांचे नहीं थे। वे एक गुजरती हुई तहजीब को कैमरे में सुरक्षित रखने की कोशिश थे।

प्रेम टूटा, लेकिन फिल्म बची रही

फिल्म बन रही थी, लेकिन कमाल अमरोही और मीना कुमारी का निजी रिश्ता टूटने लगा। मार्च 1964 में दोनों अलग हो गए। यह ‘पाकीज़ा’ के लिए भी निर्णायक मोड़ था। फिल्म अधूरी थी और उसके केंद्र में वही अभिनेत्री थी, जो अब निर्देशक से अलग हो चुकी थी।

अलगाव के बाद मीना कुमारी का जीवन कठिन होता गया। शराब की लत बढ़ी और स्वास्थ्य लगातार गिरता गया। 1968 में इलाज के लिए उन्हें लंदन जाना पड़ा। इसके बाद जेनेवा में भी उन्होंने कई सप्ताह बिताए। कुछ समय के लिए राहत मिली, लेकिन बीमारी ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उधर ‘पाकीज़ा’ अब भी अधूरी थी। एक तरफ टूटता हुआ रिश्ता था, दूसरी तरफ पंद्रह साल से अटका हुआ सपना।

कमाल अमरोही की वह चिट्ठी

25 अगस्त 1968 को कमाल अमरोही ने अलग रह रही मीना कुमारी को एक चिट्ठी लिखी। चिट्ठी का मूल भाव था कि अब केवल ‘पाकीज़ा’ को पूरा करना बाकी है। इस फिल्म से कई लोगों का भविष्य जुड़ा है और अनेक लोगों की उम्मीदें भी।

कमाल ने मीना को यह भरोसा भी दिया कि अगर वह तलाक चाहती हैं तो वह इसके लिए तैयार हैं। लेकिन यदि वह ‘पाकीज़ा’ पूरी करने में सहयोग करेंगी तो उन्हें खुशी होगी।

यह सिर्फ पति का अपनी पत्नी को लिखा पत्र नहीं था। यह एक निर्देशक की अपने सबसे बड़े स्वप्न को बचाने की पुकार भी थी। इसी बीच नरगिस ने मीना कुमारी से मुलाकात की। उन्होंने उन्हें समझाया कि यदि ‘पाकीज़ा’ अधूरी रह गई तो यह बहुत बड़ी त्रासदी होगी। मीना ने वापसी के लिए हामी भर दी।

लेकिन इसके लिए उन्हें अपनी जीवनशैली बदलनी थी, स्वास्थ्य सुधारना था और शराब से दूरी बनानी थी।

पांच साल बाद लौटीं मीना

30 जनवरी 1969 को मीना कुमारी की ‘पाकीज़ा’ में वापसी की घोषणा हुई। फिल्म के नायक को लेकर भी बदलाव आया। धर्मेंद्र के बजाय राज कुमार को लिया गया। उधर मूल सिनेमैटोग्राफर जोसेफ विर्सचिंग का निधन हो चुका था। उनकी जगह जाल मिस्त्री ने जिम्मेदारी संभाली। फिल्म का बेमिसाल संगीत रचने वाले गुलाम मोहम्मद भी 1968 में दुनिया से विदा हो चुके थे।16 मार्च 1969 को मीना कुमारी पांच साल बाद फिर ‘पाकीज़ा’ के सेट पर लौटीं। कमाल अमरोही ने उनका स्वागत किया। वर्षों की दूरी और टूटन के बावजूद दोनों फिर एक ही फिल्म के सामने खड़े थे। मार्च 1969 से दिसंबर 1971 तक फिल्म पर लगातार काम हुआ। लेकिन अब मीना कुमारी बदल चुकी थीं।

बीमारी और लंबे संघर्ष ने उनके शरीर पर असर डाला था। उनका वजन बढ़ गया था और चेहरे पर उम्र व बीमारी की छाप साफ दिखाई देने लगी थी।

कमाल अमरोही ने रोशनी, परछाइयों और लॉन्ग शॉट्स का ऐसा इस्तेमाल किया कि मीना की कमजोर होती देह भी पर्दे पर एक अद्भुत सौंदर्य में बदल गई।

यह केवल निर्देशन नहीं था। यह अपने कलाकार को उसके सबसे कठिन दौर में भी गरिमा के साथ पर्दे पर बचाए रखने की कला थी।

जब सपना पूरा हुआ

दिसंबर 1971 में ‘पाकीज़ा’ की शूटिंग पूरी हुई। 4 फरवरी 1972 को फिल्म रिलीज हुई। एक दिन पहले 3 फरवरी को मुंबई के मराठा मंदिर में इसका भव्य प्रीमियर आयोजित किया गया। फिल्म की रीलों के डिब्बे पालकी में रखकर थिएटर तक लाए गए। करीब डेढ़ करोड़ रुपये की लागत और पंद्रह साल की मेहनत के बाद ‘पाकीज़ा’ आखिरकार दर्शकों के सामने थी।

मीना कुमारी सफेद साड़ी में प्रीमियर में पहुंचीं। राज कुमार ने कैमरों के सामने उनके हाथ पर किस किया। फिर दोनों फिल्म देखने अंदर गए। 38 साल की मीना कुमारी सबसे आगे बैठीं। पर्दे पर उनकी जिंदगी का सबसे लंबा सपना पहली बार पूरी तरह उनके सामने था। शायद उस रात उन्हें यह एहसास नहीं रहा होगा कि कुछ ही सप्ताह बाद वह इस दुनिया में नहीं होंगी।

आलोचकों ने नकारा, दर्शकों ने अमर कर दिया

‘पाकीज़ा’ को शुरुआती दौर में आलोचकों से बहुत उत्साह नहीं मिला। कुछ समीक्षकों ने इसे अत्यधिक खर्च वाली फिल्म माना। कुछ को इसकी कहानी पुरानी और साधारण लगी। शुरुआती हफ्तों में बॉक्स ऑफिस पर भी फिल्म की गति धीमी रही। फिल्म को फ्लॉप कहने की बातें शुरू हो गईं। लेकिन फिर मार्च 1972 में मीना कुमारी की तबीयत तेजी से बिगड़ने लगी। अस्पताल में भर्ती मीना ने अपनी बहन से कहा कि अब उनके जीवन का कोई बड़ा काम अधूरा नहीं है। ‘पाकीज़ा’ पूरी हो चुकी है। 25 मार्च को उन्होंने मानो मृत्यु के लिए खुद को तैयार बताया। लेकिन 29 मार्च की रात उनकी हालत बेहद खराब हो गई। दर्द के बीच उन्होंने अपनी बहन को पुकारा— “आपा… मैं मरना नहीं चाहती।” 31 मार्च 1972 को मीना कुमारी का निधन हो गया। उम्र केवल 38 वर्ष थी।

मीना गईं और ‘पाकीज़ा’ अमर हो गई

मीना कुमारी की मौत की खबर ने पूरे देश को हिला दिया। और फिर ‘पाकीज़ा’ की किस्मत अचानक बदल गई। सिनेमाघरों में भीड़ उमड़ने लगी। लोग फिल्म देखने के साथ-साथ जैसे मीना कुमारी को आखिरी बार देखने पहुंच रहे थे। अभिनेत्री नादिरा ने इस भाव को बेहद मार्मिक ढंग से व्यक्त किया था—लोग ‘पाकीज़ा’ देखने नहीं, मानो मीना कुमारी की मज़ार पर आ रहे थे।

जिस फिल्म को शुरुआती दौर में फ्लॉप कहा जा रहा था, वही 1972 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल हो गई। यहीं से ‘पाकीज़ा’ फिल्म से आगे बढ़कर किंवदंती बन गई।

‘पाकीज़ा’ सिर्फ तवायफ की कहानी नहीं

‘पाकीज़ा’ को केवल तवायफ की कहानी कहना उसके अर्थ को सीमित कर देना होगा।

यह एक ऐसी स्त्री की कहानी है जिसे समाज उसकी पहचान से बांध देता है, लेकिन जिसके भीतर सम्मान, प्रेम और सामान्य जीवन की वही इच्छाएं हैं जो किसी भी इंसान के भीतर होती हैं।

साहिबजान का किरदार इसलिए याद रहता है क्योंकि मीना कुमारी ने उसे सिर्फ निभाया नहीं था। उन्होंने उसमें अपनी निजी पीड़ा, अपनी खामोशी और अपने अनुभवों की छाया भी जैसे उतार दी थी। यही कारण है कि ‘पाकीज़ा’ देखते हुए दर्शक केवल कहानी नहीं देखते। वे एक पूरा संसार देखते हैं।

एक ऐसी तहजीब, जिसमें भाषा में नफासत थी, संगीत में ठहराव था, नृत्य में शास्त्रीय अनुशासन था और कैमरा भी सौंदर्य को जल्दबाजी में नहीं देखता था।

4K रेस्टोरेशन में लौटता हुआ एक युग

2026 में ‘पाकीज़ा’ का 4K रेस्टोरेशन के साथ अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में लौटना इस बात का प्रमाण है कि महान सिनेमा की उम्र रिलीज डेट से तय नहीं होती।

फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन ने अमरोही परिवार के सहयोग से फिल्म का संरक्षण किया है। फ्रांस के ल्यों में फेस्टिवल ल्यूमिएर में नए संस्करण का वर्ल्ड प्रीमियर होना और उसके बाद बीएफआई लंदन फिल्म फेस्टिवल में इसका प्रदर्शन होना भारतीय सिनेमा की उस विरासत को वैश्विक मंच पर फिर से स्थापित करता है, जिसे समय कभी मिटा नहीं सका।

18 अक्टूबर 2026 को बीएफआई आईमैक्स में होने वाली विशेष स्क्रीनिंग के टिकट पहले ही बिक जाना इस विरासत की ताकत बताता है। पर्दे बदल गए हैं। दर्शकों की पीढ़ियां बदल गई हैं। तकनीक बदल गई है। लेकिन ‘पाकीज़ा’ अब भी वहीं है।

मीना कुमारी की आंखों में वही दर्द है। गुलाम मोहम्मद का संगीत आज भी वही असर पैदा करता है। कमाल अमरोही की रोशनी और परछाइयां अब भी दर्शक को उस दुनिया में खींच ले जाती हैं जो शायद वास्तविक जीवन में कब की खत्म हो चुकी है।

‘पाकीज़ा’ मीना कुमारी की अंतिम फिल्म नहीं थी

एक आम धारणा है कि ‘पाकीज़ा’ मीना कुमारी की आखिरी फिल्म थी। वास्तव में उनकी अंतिम रिलीज फिल्म निर्देशक सावन कुमार की ‘गोमती के किनारे’ थी, जो नवंबर 1972 में रिलीज हुई।

उस फिल्म में भी मीना कुमारी ने तवायफ का किरदार निभाया था, लेकिन फिल्म ‘पाकीज़ा’ जैसी सफलता हासिल नहीं कर सकी।

इतिहास ने हालांकि मीना कुमारी और ‘पाकीज़ा’ को अलग नहीं किया।

शायद इसलिए कि ‘पाकीज़ा’ उनके जीवन की तरह ही थी—दर्द से भरी, खूबसूरत, संघर्षशील और अधूरी होकर भी पूरी।

समय गुजर गया, ‘पाकीज़ा’ नहीं

पंद्रह साल में बनी ‘पाकीज़ा’ के निर्माण के दौरान कई लोग चले गए। रिश्ते टूटे। शरीर टूटे। सपने टूटने की कगार तक पहुंचे। लेकिन फिल्म बची रही।

और आज, 54 साल बाद, वही फिल्म दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म मंचों में से एक पर फिर बड़े पर्दे पर दिखाई जा रही है।

इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जिस फिल्म को उसके समय में कुछ आलोचकों ने ‘पुरानी’ कहकर खारिज किया था, उसे देखने के लिए आज की नई पीढ़ी के दर्शक टिकट पहले ही खरीद रहे हैं। यही महान कला की ताकत है।

समय उसे पुराना करता है, लेकिन मिटा नहीं पाता।

‘पाकीज़ा’ इसलिए अमर नहीं है कि उसमें बड़े सेट थे, महंगे परिधान थे या सिनेमास्कोप तकनीक थी। वह इसलिए अमर है क्योंकि उसमें एक कलाकार का जीवन, एक निर्देशक का जुनून, एक टूटे रिश्ते की पीड़ा, एक स्त्री की गरिमा और एक पूरे दौर की तहजीब एक साथ कैद है।

मीना कुमारी चली गईं।कमाल अमरोही भी नहीं रहे। गुलाम मोहम्मद नहीं रहे। वह दुनिया भी नहीं रही जिसमें ‘पाकीज़ा’ बनी थी। लेकिन पर्दा जब भी रोशन होता है और मीना कुमारी की आवाज गूंजती है— “चलते-चलते, यूं ही कोई मिल गया था…” तो लगता है जैसे वक्त कुछ पल के लिए ठहर गया हो। यही ‘पाकीज़ा’ की असली जीत है।

पंद्रह साल में बनी यह फिल्म अब समय की फिल्म बन चुकी है—और समय की बनाई हुई चीजें आसानी से नहीं मिटतीं।

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