16 अक्टूबर 2026 6:35 अपराह्न

ब्रज का प्रहरी चला गया! पद्मश्री संत रमेश बाबा ने 88 वर्ष की उम्र में ली अंतिम विदाई

पद्मश्री संत रमेश बाबा महाराज की फूलों की माला पहने मुस्कुराती तस्वीर, ब्रज की प्राकृतिक पृष्ठभूमि के साथ

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ठाकुर के.के. सिंह की रिपोर्ट

मथुरा/बरसाना। ब्रज की धरती ने मंगलवार को अपने ऐसे संत को खो दिया, जिनके लिए साधना केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं थी, बल्कि गौ सेवा, वन संरक्षण, पहाड़ियों की रक्षा, पवित्र कुंडों के पुनर्जीवन और यमुना की निर्मलता भी उसी साधना का हिस्सा थी। ब्रज के महान विरक्त संत, प्रखर पर्यावरण संरक्षक और पद्मश्री से सम्मानित संत रमेश बाबा महाराज का 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वह लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके साकेत वास की खबर फैलते ही बरसाना समेत पूरे ब्रजमंडल में शोक की लहर दौड़ गई। संत समाज, श्रद्धालुओं, गोसेवकों और ब्रज संरक्षण से जुड़े लोगों ने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी।

संत रमेश बाबा का जीवन सामान्य अर्थों में किसी एक संत का जीवन नहीं था। उन्होंने ब्रज को केवल धार्मिक आस्था की भूमि नहीं माना, बल्कि इसे एक जीवंत सांस्कृतिक, प्राकृतिक और आध्यात्मिक धरोहर के रूप में देखा। यही कारण रहा कि उन्होंने राधा-कृष्ण की लीलास्थलियों, गहवरवन, पर्वतों, कुंडों, गौवंश और यमुना की रक्षा को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। उनके निधन के साथ ब्रज ने एक ऐसे प्रहरी को खो दिया है, जिसने अपनी तपस्या को सामाजिक और पर्यावरणीय सेवा का रूप दे दिया था।

प्रयागराज में जन्म, किशोरावस्था में जागा वैराग्य

संत रमेश बाबा का जन्म वर्ष 1938 में तीर्थराज प्रयागराज में पिता बलदेव प्रसाद शुक्ल और माता हेमेश्वरी देवी के घर हुआ था। बचपन से ही उनके भीतर आध्यात्मिकता और वैराग्य की गहरी प्रवृत्ति दिखाई देने लगी थी। किशोरावस्था में ही सांसारिक जीवन से उनका मोह भंग होने लगा और लगभग 15 से 17 वर्ष की अल्प आयु में उन्होंने घर छोड़कर ब्रज की राह पकड़ ली।

ब्रज पहुंचने के बाद उन्होंने पूज्य संत प्रियाशरण जी महाराज को अपना गुरु स्वीकार किया। बरसाना का मानगढ़, मान मंदिर और पावन गहवरवन उनकी साधना के केंद्र बन गए। कठिन परिस्थितियों के बीच उन्होंने ब्रज में रहकर साधना की और धीरे-धीरे उनका पूरा जीवन राधा-कृष्ण की भक्ति तथा ब्रज सेवा को समर्पित हो गया।

उनकी साधना का केंद्र राधारानी की भक्ति और ब्रजवास था। वह ब्रज, ब्रजवासियों और राधा-कृष्ण को अपने जीवन से अलग मानते ही नहीं थे। उनका विश्वास था कि ब्रज की रक्षा करना स्वयं ब्रजेश और राधारानी की सेवा है।

ब्रज की सीमा से बाहर नहीं रखा कदम

संत रमेश बाबा की सबसे चर्चित जीवन प्रतिज्ञाओं में एक यह थी कि वह ब्रज की सांस्कृतिक सीमा से बाहर नहीं जाएंगे। उन्होंने इस संकल्प को जीवन के अंतिम क्षण तक निभाया। वर्ष 2019 में जब भारत सरकार ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित करने का निर्णय लिया, तब भी वह सम्मान लेने दिल्ली नहीं गए।

उनके ब्रज से बाहर न जाने के संकल्प को देखते हुए प्रशासनिक अधिकारियों को स्वयं बरसाना पहुंचकर उन्हें पद्मश्री सम्मान सौंपना पड़ा। यह प्रसंग उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता और ब्रज के प्रति उनकी निष्ठा का प्रतीक बन गया।

सामान्यतः किसी बड़े सम्मान को प्राप्त करने के लिए लोग दूर-दूर तक जाते हैं, लेकिन रमेश बाबा के लिए सम्मान से बड़ा उनका संकल्प था। उन्होंने पद्मश्री को स्वीकार किया, लेकिन ब्रज की सीमा से बाहर जाने का अपना नियम नहीं बदला।

गौ सेवा बनी जीवन की सबसे बड़ी साधना

रमेश बाबा के जीवन की सबसे बड़ी पहचान गौ सेवा से जुड़ी रही। वर्ष 2007 में बरसाना में माताजी गौशाला की स्थापना उनके प्रयासों से हुई। देखते ही देखते यह गौशाला विशाल गौ सेवा केंद्र के रूप में विकसित होती चली गई।

यहां बेसहारा, बीमार, वृद्ध और असहाय गोवंश को आश्रय दिया जाता है। हजारों गायों की देखभाल, उनके उपचार, चारे और संरक्षण की व्यवस्था ने इस गौशाला को देश की विशालतम गौशालाओं में शामिल कर दिया।

रमेश बाबा के लिए गौ सेवा केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं थी। वह गाय को ग्रामीण अर्थव्यवस्था, भारतीय संस्कृति और पर्यावरणीय संतुलन से जोड़कर देखते थे। उनके प्रयासों से गौ सेवा को बड़े स्तर पर संगठित रूप मिला और देश-विदेश से लोग इस सेवा कार्य से जुड़ते चले गए।

माताजी गौशाला में गोवंश की सेवा के साथ गोबर से जैविक ऊर्जा और अन्य उपयोगी संसाधनों के निर्माण जैसे प्रयास भी किए गए। इस तरह गौ सेवा को आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की दिशा में भी काम हुआ।

ब्रज की पहाड़ियों को बचाने के लिए छेड़ा संघर्ष

रमेश बाबा का योगदान केवल गौ सेवा तक सीमित नहीं था। उन्होंने ब्रज की पौराणिक पहाड़ियों और प्राकृतिक भू-दृश्य को अवैध खनन से बचाने के लिए लंबा संघर्ष किया।

ब्रज की पहाड़ियां केवल पत्थरों और मिट्टी का भूभाग नहीं हैं। वे राधा-कृष्ण की लीलाओं, लोक आस्था और ब्रज की सांस्कृतिक स्मृतियों से जुड़ी हुई हैं। रमेश बाबा ने इसी सोच के साथ पहाड़ियों के संरक्षण का आंदोलन खड़ा किया।

अवैध खनन के खिलाफ उनके नेतृत्व में लंबे समय तक आंदोलन चला। ब्रजवासियों और साधु-संतों को साथ लेकर उन्होंने सरकार और प्रशासन तक अपनी आवाज पहुंचाई। उनके संघर्ष के परिणामस्वरूप लगभग 5,253 हेक्टेयर भूभाग को खनन मुक्त कर संरक्षित किए जाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।

उनके लिए पहाड़ बचाना केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं था। उनका मानना था कि यदि ब्रज की प्राकृतिक पहचान नष्ट हो गई तो उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाएगी।

गहवरवन और ब्रज के वनों की रक्षा

गहवरवन रमेश बाबा की साधना भूमि भी था और उनके लिए अत्यंत पवित्र प्राकृतिक धरोहर भी। उन्होंने ब्रज के वन-उपवनों और कृष्णलीला से जुड़े स्थलों के संरक्षण के लिए लगातार आवाज उठाई।

उनका जीवन इस बात का उदाहरण रहा कि धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। वह लोगों को समझाते रहे कि ब्रज की हरियाली, पेड़-पौधे, वन, पर्वत और कुंड केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि ब्रज की आत्मा का हिस्सा हैं।

इसी सोच ने उन्हें जीवनभर पर्यावरण संरक्षण के लिए सक्रिय रखा। उन्होंने अपने अनुयायियों और ब्रजवासियों को भी प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का भाव अपनाने के लिए प्रेरित किया।

सूखते कुंडों को फिर मिला जीवन

रमेश बाबा और मान मंदिर सेवा संस्थान के प्रयासों में ब्रज के प्राचीन कुंडों और जलस्रोतों का संरक्षण भी महत्वपूर्ण रहा।

ब्रज में कभी बड़ी संख्या में कुंड और सरोवर हुआ करते थे। समय के साथ इनमें से अनेक उपेक्षा, अतिक्रमण और प्रदूषण के कारण अस्तित्व के संकट में पहुंच गए। रमेश बाबा ने ऐसे जलस्रोतों को बचाने और उनका पुनर्जीवन करने की दिशा में काम किया।

रत्न कुंड, विह्वल कुंड, कृष्ण कुंड, बिछुआ कुंड, गया कुंड, लाल कुंड, गोपाल कुंड और रुद्र कुंड सहित अनेक जलस्रोतों के संरक्षण के प्रयासों ने ब्रज की पारंपरिक जल-संस्कृति को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनका मानना था कि ब्रज के कुंड केवल जलाशय नहीं हैं। वे ब्रज की धार्मिक स्मृति, लोकजीवन और प्राकृतिक संतुलन के अभिन्न अंग हैं।

यमुना की निर्मलता के लिए सड़क पर उतरे संत

ब्रज की जीवनधारा यमुना की दुर्दशा भी रमेश बाबा को हमेशा बेचैन करती रही। उन्होंने यमुना को प्रदूषण से मुक्त कराने के लिए आंदोलन चलाए और लोगों को इससे जोड़ने का प्रयास किया।

मथुरा से दिल्ली तक पदयात्राओं और जनआंदोलनों के माध्यम से उन्होंने यमुना की बदहाल स्थिति को देश के सामने रखने का प्रयास किया। उनका स्पष्ट संदेश था कि यमुना केवल एक नदी नहीं, बल्कि ब्रज की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जीवनरेखा है।

यदि यमुना प्रदूषित होती है तो उसका असर केवल पानी पर नहीं पड़ता, बल्कि ब्रज की पूरी जीवनशैली, धार्मिक परंपरा और पर्यावरणीय व्यवस्था प्रभावित होती है।

ब्रज यात्रा को बनाया जनजागरण का माध्यम

रमेश बाबा ने ब्रज की धार्मिक परंपराओं को जनसामान्य से जोड़ने के लिए राधारानी ब्रजयात्रा को भी व्यापक स्वरूप दिया। ब्रज चौरासी कोस की यात्रा के माध्यम से उन्होंने लोगों को ब्रज के गांवों, वनों, पर्वतों, कुंडों और धार्मिक स्थलों से जोड़ने का प्रयास किया।

उनके लिए ब्रज यात्रा केवल तीर्थाटन नहीं थी। यह ब्रज की मिट्टी, पर्वत, वन, कुंड, गांव और धार्मिक स्थलों को समझने तथा उनके संरक्षण के प्रति जनभावना जगाने का माध्यम भी थी।

इस यात्रा से हजारों श्रद्धालु जुड़े और ब्रज की परिक्रमा तथा उसके संरक्षण का संदेश दूर-दूर तक पहुंचा।

पद्मश्री मिला, लेकिन नहीं बदली जीवन शैली

वर्ष 2019 में भारत सरकार ने गौ सेवा और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। लेकिन इस सम्मान के बाद भी उनके जीवन में कोई दिखावटी परिवर्तन नहीं आया।

वैराग्य, सादगी और ब्रज सेवा उनके जीवन का आधार बने रहे। पद्मश्री उनके लिए उपलब्धि जरूर था, लेकिन उनकी दृष्टि में सबसे बड़ा सम्मान ब्रज की सेवा थी।

उन्होंने न तो अपनी साधना बदली और न ही अपने जीवन के मूल संकल्पों से समझौता किया। यही कारण रहा कि वह संत समाज के साथ-साथ पर्यावरण और गौ सेवा से जुड़े लोगों के बीच भी विशिष्ट पहचान बना सके।

संत गया, लेकिन ब्रज सेवा का संकल्प छोड़ गया

संत रमेश बाबा का साकेत वास ब्रज के लिए केवल एक संत की विदाई नहीं है। यह उस परंपरा के एक बड़े अध्याय का अंत है जिसमें भक्ति के साथ प्रकृति, गौवंश, जल, जंगल, पर्वत और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा को धर्म का हिस्सा माना गया।

उनकी साधना स्थली मान मंदिर, माताजी गौशाला, ब्रज के संरक्षित पर्वत, पुनर्जीवित कुंड और यमुना संरक्षण के लिए उठी आवाज उनके जीवन की जीवित स्मृतियां हैं।

उन्होंने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि किसी भूमि से प्रेम केवल उसके मंदिरों में माथा टेकने से नहीं, बल्कि उसके वन, जल, जीव-जंतु, पर्वत और सांस्कृतिक विरासत को बचाने से भी साबित होता है।

आज बरसाना की गलियों में उनके साकेत वास की खबर से शोक है। संत समाज उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है और हजारों श्रद्धालुओं की आंखें नम हैं। लेकिन उनके जाने के साथ एक बड़ा सवाल भी सामने खड़ा है—जिस ब्रज को बचाने के लिए रमेश बाबा ने अपना पूरा जीवन लगा दिया, उस ब्रज की रक्षा का संकल्प अब कौन आगे बढ़ाएगा?

संत रमेश बाबा शरीर से विदा हो गए हैं, लेकिन ब्रज की मिट्टी में उनके तप, संघर्ष और सेवा की छाप लंबे समय तक बनी रहेगी। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए यह प्रेरणा छोड़ गया है कि भक्ति केवल आराधना नहीं, संरक्षण भी है; सेवा केवल मनुष्य की नहीं, प्रकृति और समस्त जीव-जगत की भी है।

ब्रज ने अपना एक संत खोया है, लेकिन रमेश बाबा की तपस्या ने ब्रज को एक ऐसा विचार दे दिया है जो उनके बाद भी जीवित रहेगा—राधा-कृष्ण की भूमि की रक्षा ही सच्ची ब्रज सेवा है।

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