16 अक्टूबर 2026 5:59 अपराह्न

पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल से पहले भी कई अफसरों ने आजमाई राजनीति का “चखना”, जानिए किन अफसरों का “सुरूर” सिर चढ़कर बोला?

पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल के साथ पीएल पुनिया, असीम अरुण, बृजलाल और रिपोर्टर कमलेश कुमार चौधरी

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कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट

लखनऊ। प्रशासनिक सेवा में रहते हुए जिलों की कमान संभालना और फिर उसी अनुभव के सहारे राजनीति के मैदान में उतरना उत्तर प्रदेश के लिए कोई नई कहानी नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि किसी अफसर ने किसी स्थापित राजनीतिक दल का हाथ थामा, किसी ने चुनावी राजनीति में सीधे प्रवेश किया तो किसी ने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी खड़ी करने की कोशिश की। कुछ चेहरे विधानसभा और संसद तक पहुंचे, जबकि कुछ का राजनीतिक प्रयोग चुनावी आंकड़ों तक सीमित रह गया।

अब इस कड़ी में पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल का नाम जुड़ गया है। करीब 13 साल प्रशासनिक सेवा में रहने के बाद अगस्त 2026 में इस्तीफा देने वाली दिव्या मित्तल ने 29 सितंबर को अपनी राजनीतिक पारी का ऐलान किया। उन्होंने साफ कहा कि वह भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी या कांग्रेस जैसे किसी स्थापित दल में शामिल नहीं होंगी। उनका कहना है कि वह लोगों के साथ मिलकर स्वतंत्र राजनीतिक मंच तैयार करेंगी और इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश से होगी, जिसे वह अपनी कर्मभूमि मानती हैं।

लाल-भगवा साड़ी में राजनीतिक संदेश, लेकिन रास्ता अभी खुला

दिव्या मित्तल के राजनीतिक ऐलान ने इसलिए भी ध्यान खींचा है क्योंकि उन्होंने किसी मौजूदा दल का झंडा थामने के बजाय सीधे जनता के बीच जाने की बात कही है। उनके संदेश का केंद्रीय मुद्दा सरकारी व्यवस्था में आम आदमी की समस्याओं को लेकर रहा। उन्होंने प्रशासन में रहते हुए ऐसे लोगों की परेशानियां देखने का उल्लेख किया, जिनकी शिकायतें दफ्तरों तक पहुंचने के बाद भी समाधान की प्रक्रिया में अटक जाती हैं।

उनके सार्वजनिक संदेशों में स्कूलों की स्वीकृति के बावजूद निर्माण न होना, जमीन के पट्टों का लंबित रहना, सड़कों की स्थिति, शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक जैसे मुद्दों का उल्लेख सामने आया है। मिर्जापुर में जिलाधिकारी के कार्यकाल के दौरान ग्रामीण क्षेत्र की बुनियादी जरूरतों से जुड़े उनके अनुभवों को भी उन्होंने अपनी राजनीतिक सोच से जोड़ा है।

दिव्या मित्तल ने लोगों से संपर्क के लिए डिजिटल माध्यम, खासकर व्हाट्सऐप के जरिए जुड़ने की पहल का संकेत दिया है। यह तरीका पारंपरिक राजनीतिक संगठन से अलग है। हालांकि, डिजिटल संपर्क को बूथ स्तर के संगठन, स्थानीय नेतृत्व और लगातार जनसंपर्क में बदलना उनकी आगामी राजनीतिक यात्रा की महत्वपूर्ण चुनौती होगी।

फिलहाल यह भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि वह आगामी विधानसभा चुनाव में खुद किसी सीट से चुनाव लड़ेंगी या पहले संगठनात्मक ढांचा तैयार करेंगी। उनके राजनीतिक मंच का अंतिम स्वरूप और चुनावी रणनीति आने वाले समय में अधिक स्पष्ट होगी।

यूपी की राजनीति में अफसरों की एंट्री पुरानी कहानी

उत्तर प्रदेश की राजनीति में नौकरशाहों की आमद कई दशकों से होती रही है। प्रशासनिक सेवा से निकले अधिकारियों के पास शासन, कानून-व्यवस्था, सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक तंत्र का लंबा अनुभव होता है। लेकिन चुनावी राजनीति की प्रकृति अलग होती है। यहां संगठन, कार्यकर्ता, स्थानीय समीकरण, जनता से निरंतर संपर्क और चुनावी प्रबंधन की भी बड़ी भूमिका होती है।

यही वजह है कि यूपी में राजनीति में आए सभी अफसरों की कहानी एक जैसी नहीं रही। कुछ ने बड़े राजनीतिक दलों के सहारे अपनी जगह बनाई और संसद या विधानसभा तक पहुंचे, जबकि कुछ ने स्वतंत्र पार्टी बनाकर चुनावी मैदान में उतरने का रास्ता चुना।

पी.एल. पुनिया : प्रशासन से संसद तक पहुंचा सफर

पूर्व आईएएस अधिकारी पन्ना लाल पुनिया यानी पी.एल. पुनिया उन नौकरशाहों में शामिल हैं, जिन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश के बाद राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। यूपी कैडर के आईएएस अधिकारी रहे पुनिया ने प्रशासनिक सेवा के बाद कांग्रेस का रुख किया।

उन्होंने 2009 का लोकसभा चुनाव बाराबंकी से जीता और 15वीं लोकसभा के सदस्य बने। इसके बाद वह उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के सदस्य भी रहे। वह राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। यानी पुनिया का राजनीतिक सफर प्रशासनिक सेवा से निकलकर लोकसभा, राज्यसभा और संवैधानिक संस्था के शीर्ष पद तक पहुंचा।

आलोक रंजन : सत्ता के गलियारों से राज्यसभा तक

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन का राजनीतिक सफर भी नौकरशाही और राजनीति के बीच की एक अलग कड़ी दिखाता है। 1978 बैच के आईएएस अधिकारी आलोक रंजन मई 2014 से जून 2016 तक उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव रहे। सेवानिवृत्ति के बाद वह तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सलाहकार भी बने।

बाद में समाजवादी पार्टी के साथ उनकी राजनीतिक भूमिका अधिक स्पष्ट हुई। 2024 में समाजवादी पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवार बनाया। इससे यह उदाहरण सामने आया कि प्रशासनिक अनुभव रखने वाले अधिकारी सक्रिय पार्टी राजनीति में आए बिना भी किसी राजनीतिक दल की रणनीतिक और नीतिगत गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका हासिल कर सकते हैं।

असीम अरुण : आईपीएस से विधानसभा और मंत्री पद तक

पूर्व आईपीएस अधिकारी असीम अरुण का राजनीतिक प्रवेश अपेक्षाकृत सीधे चुनावी राजनीति में हुआ। 1994 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे अरुण ने जनवरी 2022 में वीआरएस लेकर भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश किया।

2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कन्नौज सदर सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार में उन्हें समाज कल्याण तथा अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण से संबंधित विभागों की जिम्मेदारी मिली। इस तरह उनका सफर पुलिस सेवा से सीधे पार्टी राजनीति, विधानसभा और फिर मंत्री पद तक पहुंचा।

राम बहादुर : बसपा के चुनावी मैदान से भाजपा तक

पूर्व आईएएस अधिकारी राम बहादुर ने भी राजनीति में प्रवेश चुनावी मैदान से किया। 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर मोहनलालगंज से चुनाव लड़ा था। बाद में जनवरी 2022 में विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की।

राम बहादुर का उदाहरण यह भी बताता है कि नौकरशाह के लिए राजनीति में प्रवेश केवल एक पार्टी से जुड़ने तक सीमित नहीं रहता। चुनावी राजनीति में सक्रिय रहने के दौरान राजनीतिक संबद्धता बदलने की संभावना भी रहती है।

चंद्रपाल ने बनाई अपनी पार्टी

पूर्व आईएएस अधिकारी डॉ. चंद्रपाल ने स्थापित राजनीतिक दल में शामिल होने के बजाय अपना राजनीतिक संगठन खड़ा करने का रास्ता चुना। आदर्श समाज पार्टी की आधिकारिक वेबसाइट उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी के रूप में दर्ज करती है।

उनकी राजनीतिक सक्रियता का एक प्रमाण चुनावी मैदान में भी मिलता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में वह आगरा से आदर्श समाज पार्टी के उम्मीदवार थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी वह आगरा सुरक्षित सीट से इसी पार्टी के उम्मीदवार रहे। निर्वाचन संबंधी सार्वजनिक आंकड़ों में उनका पेशा सेवानिवृत्त आईएएस और सामाजिक कार्य से जुड़ा दर्ज है।

विजय शंकर पांडेय : अपनी पार्टी के साथ चुनावी मैदान

पूर्व आईएएस अधिकारी विजय शंकर पांडेय ने भी सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र राजनीतिक संगठन बनाने की कोशिश की। उन्होंने लोक गठबंधन पार्टी के बैनर पर 2019 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट से चुनाव लड़ा।

चुनावी आंकड़ों के अनुसार उन्हें 2,056 वोट मिले और वह इस चुनाव में दसवें स्थान पर रहे। यह आंकड़ा यह दिखाता है कि प्रशासनिक पहचान को सीधे चुनावी वोट में बदलना कितना अलग और कठिन राजनीतिक अभ्यास हो सकता है।

अमिताभ ठाकुर : आईपीएस से आजाद अधिकार सेना तक

पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने भी नौकरी के बाद स्थापित राजनीतिक दल का रास्ता चुनने के बजाय अपना राजनीतिक संगठन खड़ा करने की कोशिश की। उन्होंने 2021 में अपनी राजनीतिक पार्टी की घोषणा की, जिसे बाद में आजाद अधिकार सेना के रूप में स्थापित किया गया। पार्टी के संस्थापकों में अमिताभ ठाकुर और डॉ. नूतन ठाकुर का नाम दर्ज है।

उनकी राजनीतिक पहल का आधार प्रशासनिक सेवा के दौरान उठाए गए मुद्दों और नागरिक अधिकारों से जुड़े विषयों को राजनीतिक मंच देने की कोशिश रहा।

सुलखान सिंह ने उठाया अलग बुंदेलखंड राज्य का मुद्दा

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह ने नवंबर 2023 में बुंदेलखंड लोकतांत्रिक पार्टी की शुरुआत की। उनके राजनीतिक प्रयास का प्रमुख मुद्दा बुंदेलखंड क्षेत्र से जुड़ा रहा। पार्टी ने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के 15 जिलों को मिलाकर अलग बुंदेलखंड राज्य बनाने की मांग उठाई।

यह उदाहरण बताता है कि सेवानिवृत्त अफसरों की राजनीति केवल विधानसभा या लोकसभा चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं रही है। कुछ ने क्षेत्रीय अस्मिता और प्रशासनिक पुनर्गठन जैसे मुद्दों को भी राजनीतिक एजेंडे का आधार बनाया।

ब्रजलाल : पुलिस सेवा से भाजपा और राज्यसभा तक

पूर्व डीजीपी ब्रजलाल का राजनीतिक सफर अलग तरह का रहा। उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक रहे ब्रजलाल ने 2015 में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। बाद में अप्रैल 2018 में उन्हें उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। 2020 में वह उत्तर प्रदेश से भाजपा के राज्यसभा सदस्य बने।

उनका सफर उन अधिकारियों के उदाहरणों में गिना जा सकता है जिन्होंने स्वतंत्र पार्टी बनाने के बजाय सीधे स्थापित राजनीतिक दल के संगठन में प्रवेश किया और आगे संवैधानिक संस्था तथा संसद तक पहुंचे।

एसआर दारापुरी ने चुना सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन का रास्ता

पूर्व आईपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी ने सेवानिवृत्ति के बाद सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता का रास्ता अपनाया। वह ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट से जुड़े और सामाजिक, मानवाधिकार तथा लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहे। उनकी सार्वजनिक प्रोफाइल में उन्हें सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी और ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट का राष्ट्रीय अध्यक्ष बताया गया है।

इस तरह दारापुरी का राजनीतिक सफर पारंपरिक चुनावी राजनीति की तुलना में आंदोलन और सामाजिक मुद्दों से अधिक जुड़ा दिखाई देता है।

देवमणि द्विवेदी : रेलवे सेवा से विधानसभा तक

पूर्व आईआरटीएस अधिकारी देवमणि द्विवेदी ने 2016 में रेलवे सेवा से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थामा। इसके अगले वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में वह सुल्तानपुर की लंभुआ विधानसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार के रूप में विजयी हुए और 17वीं विधानसभा के सदस्य बने। निर्वाचन संबंधी आंकड़ों में भी उन्हें 2017 में लंभुआ से विजेता दर्ज किया गया है।

यह उदाहरण दिखाता है कि प्रशासनिक या रेलवे सेवा की पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति यदि किसी बड़े राजनीतिक दल के संगठनात्मक ढांचे में प्रवेश करता है तो चुनावी राजनीति में उसका सफर अलग गति पकड़ सकता है।

दिव्या मित्तल के सामने अब सबसे बड़ा सवाल क्या?

दिव्या मित्तल के सामने सबसे दिलचस्प सवाल यह नहीं है कि उन्होंने राजनीति में आने का फैसला क्यों किया, बल्कि यह है कि प्रशासनिक सेवा से मिली पहचान को वह किस तरह राजनीतिक संगठन में बदलती हैं। जिला प्रशासन में काम करने का अनुभव और चुनावी राजनीति में लगातार जनता के बीच सक्रिय रहना दो अलग प्रक्रियाएं हैं।

उनकी चुनौती तीन स्तरों पर दिखाई देती है। पहला, जनता से डिजिटल संपर्क को जमीन पर सक्रिय कार्यकर्ताओं के नेटवर्क में बदलना। दूसरा, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में स्थानीय मुद्दों को एक व्यापक राजनीतिक एजेंडे से जोड़ना। तीसरा, किसी स्थापित दल के संगठनात्मक ढांचे के बिना चुनावी राजनीति के लिए संसाधन और कार्यकर्ता तैयार करना।

दिव्या मित्तल ने फिलहाल अपने राजनीतिक अभियान को जनता के सहयोग और स्वतंत्रता से जोड़कर पेश किया है। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि वह किसी मौजूदा दल में शामिल नहीं होंगी। लेकिन आगे उनका संगठन किस स्वरूप में सामने आता है, उसका विस्तार कितना होता है और वह चुनावी राजनीति में किस भूमिका में उतरती हैं, यह आने वाला समय तय करेगा।

अफसर से नेता बनने के सफर का पुराना सवाल

उत्तर प्रदेश में नौकरशाहों का राजनीति में प्रवेश अब तक कई रूपों में सामने आया है। पी.एल. पुनिया लोकसभा और राज्यसभा तक पहुंचे, असीम अरुण विधानसभा और मंत्री पद तक पहुंचे, ब्रजलाल राज्यसभा पहुंचे, देवमणि द्विवेदी विधानसभा पहुंचे, जबकि चंद्रपाल, अमिताभ ठाकुर, विजय शंकर पांडेय और सुलखान सिंह जैसे अधिकारियों ने स्वतंत्र राजनीतिक संगठन खड़े करने का रास्ता अपनाया।

इन उदाहरणों से इतना जरूर स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक सेवा का अनुभव राजनीति में एक आधार दे सकता है, लेकिन राजनीतिक सफर का परिणाम केवल सरकारी सेवा की पिछली पहचान से तय नहीं होता। संगठन, स्थानीय स्वीकार्यता, लगातार जनसंपर्क, मुद्दों की स्पष्टता और चुनावी भागीदारी जैसे अनेक कारक इसमें भूमिका निभाते हैं।

अब दिव्या मित्तल ने भी इसी रास्ते पर कदम बढ़ाया है। उन्होंने जिस उत्तर प्रदेश को अपनी कर्मभूमि बताया है, वहीं उन्हें प्रशासनिक अधिकारी के रूप में काम करने का लंबा अनुभव मिला। अब वही अनुभव राजनीति की कसौटी पर कैसे आकार लेता है, यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल उनकी घोषणा ने उत्तर प्रदेश में उन पूर्व अफसरों की पुरानी कहानी को फिर चर्चा में ला दिया है, जिन्होंने सरकारी फाइलों से निकलकर जनता की अदालत में अपनी राजनीतिक पारी आजमाई थी।

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