16 अक्टूबर 2026 5:24 अपराह्न

धर्म को बड़ा मंच चाहिए, कुछ भी कहने के लिए या श्रद्धा को आकार ❓

लुधियाना में बागेश्वर बाबा से जुड़े विवाद पर संपादकीय, मौलाना की तस्वीर, स्क्रीनशॉट और संपादक अनिल अनूप का फोटो

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✍️ अनिल अनूप, संपादक

लुधियाना में पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की पांच दिवसीय श्री हनुमंत कथा समाप्त होने के साथ शायद पंडाल खाली हो जाएगा, भीड़ लौट जाएगी, मंच उतर जाएगा और शहर फिर अपनी रोजमर्रा की रफ्तार पकड़ लेगा। लेकिन इस आयोजन ने कुछ ऐसे सवाल छोड़ दिए हैं, जिनका जवाब किसी एक कथा, किसी एक बाबा या किसी एक धार्मिक समुदाय से नहीं, बल्कि हम सबको मिलकर तलाशना चाहिए। सवाल यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को हनुमान कथा सुनने का अधिकार है या नहीं। बिल्कुल है। सवाल यह भी नहीं कि कोई कथावाचक अपने धर्म और परंपरा का प्रचार क्यों करता है। उसे इसका अधिकार है। सवाल इससे कहीं अधिक बुनियादी है—धर्म के लिए इतना बड़ा तामझाम आखिर क्यों जरूरी हो गया है? क्या भगवान तक पहुंचने के लिए विशाल पंडाल चाहिए? क्या भक्ति के लिए हजारों लोगों की भीड़ चाहिए? क्या कथा सुनने के लिए वीआईपी व्यवस्था चाहिए? क्या धार्मिक विश्वास की ताकत का प्रमाण मंच की ऊंचाई, साउंड सिस्टम की क्षमता, स्क्रीन के आकार, सुरक्षा घेरे और भीड़ की संख्या से तय होगा? और क्या धर्म का प्रभाव इस बात से मापा जाएगा कि उसके आयोजन में कितने बड़े लोग पहुंचे?

लुधियाना में 26 से 30 सितंबर तक ग्लाडा ग्राउंड में आयोजित श्री हनुमंत कथा को लेकर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की तैयारी की गई थी। यातायात व्यवस्था में बदलाव हुए, सुरक्षा इंतजाम किए गए और आयोजन के लिए बड़े स्तर पर व्यवस्थाएं की गईं।

यह सब किसी बड़े सार्वजनिक आयोजन में असामान्य नहीं है। हजारों लोग आएंगे तो पानी चाहिए, बैठने की व्यवस्था चाहिए, चिकित्सा और सुरक्षा चाहिए, यातायात संभालना होगा। यह आयोजन की व्यावहारिक जरूरत है। लेकिन यहीं से हमारा सवाल शुरू होता है। व्यवस्था और आडंबर में फर्क आखिर कौन करेगा?

कथा थी या धार्मिक मेगा इवेंट?

भारत में कथा सुनने की परंपरा बहुत पुरानी है। गांवों में चौपाल लगी, मंदिर का आंगन भरा, किसी संत ने पेड़ के नीचे बैठकर रामकथा कही, किसी बुजुर्ग ने घर के बाहर बच्चों को पुराण की कथा सुनाई। कथा का मूल उद्देश्य सुनने वाले को अपने भीतर ले जाना था।

आज कथा का स्वरूप बदल रहा है। अब कथा एक बड़ा आयोजन है।

उसके लिए मैदान चाहिए, विशाल पंडाल चाहिए, मंच चाहिए, एलईडी स्क्रीन चाहिए, प्रवेश व्यवस्था चाहिए, विशेष अतिथि चाहिए, मीडिया कवरेज चाहिए और सोशल मीडिया पर उसके दृश्य चाहिए।

फिर कथा केवल कथा नहीं रहती। वह एक इवेंट बन जाती है। और इवेंट का अपना गणित होता है—कितनी भीड़ आई, कितने लोग देख रहे हैं, कितनी चर्चा हुई, कितनी तस्वीरें वायरल हुईं और कितनी बड़ी हस्तियां मंच पर दिखाई दीं।

यहीं धर्म पीछे छूटने लगता है और आयोजन आगे निकल आता है।

हम यह नहीं कह रहे कि बड़ा आयोजन अपने आप गलत है। किसी बड़े आयोजन में लाखों लोग एक साथ धार्मिक अनुभव साझा करते हैं तो उसमें सामुदायिक ऊर्जा भी हो सकती है। समस्या आकार में नहीं है। समस्या तब है जब आकार ही धार्मिकता का प्रमाण बनने लगे।

यदि छोटी कथा में भगवान नहीं हैं तो बड़ी कथा में भी नहीं होंगे।

और यदि किसी साधारण कमरे में श्रद्धा है तो खुले मैदान में हजारों लोगों के बीच भी वह श्रद्धा हो सकती है। लेकिन श्रद्धा का आकार नहीं होता।

लुधियाना का विवाद क्या कहता है?

इसी आयोजन के दौरान पंडित धीरेंद्र शास्त्री की कुछ कथित टिप्पणियों को लेकर विवाद खड़ा हुआ। उनके कथित वक्तव्य का एक हिस्सा धार्मिक पहचान और दूसरे धर्मों के संदर्भ में की गई टिप्पणियों से जुड़ा है। शाही इमाम मुहम्मद उस्मान रहमानी लुधियानवी और पंजाब क्रिश्चियन यूनाइटेड फेडरेशन के अध्यक्ष अल्बर्ट दुआ ने इन टिप्पणियों पर आपत्ति जताई।

धीरेंद्र शास्त्री के कथित बयान का वह अंश, जिसे लेकर विवाद सामने आया, इस प्रकार रिपोर्ट किया गया—

“जब आप सनातन धर्म में पैदा हुए हो तो हली-उल्लाह वालों के पास जाने की जरूरत नहीं। जो अपने पड़ोसी को बाप कहते हैं, भैया को सैंया बना लेते हैं, वह किसी काम के नहीं होते।”

— कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, लुधियाना समागम के दौरान कथित बयान

इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए शाही इमाम मुहम्मद उस्मान रहमानी लुधियानवी ने धीरेंद्र शास्त्री को संबोधित करते हुए कहा—

“आज का यह संदेश जो है, वह लुधियाना में आए पंडित धीरेंद्र शास्त्री जी के नाम है। पहले तो मैं उन्हें यह बताना चाहता हूं कि लुधियाना जो शहर है, यह भारत की जंग-ए-आजादी में और भारत के उद्योग, भारत के आपसी भाईचारे में अपना एक विशिष्ट इतिहास रखता है। हमारे लुधियाना में आए हो, आपका स्वागत है, लेकिन आपने आकर जिस अंदाज के साथ नफरत भरी कुछ बातें की हैं, वह किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जा सकतीं।”

— मुहम्मद उस्मान रहमानी लुधियानवी, शाही इमाम

शाही इमाम ने इस बयान को लेकर माफी की मांग भी की और माफी न मिलने की स्थिति में कानूनी कार्रवाई की बात कही। यह प्रतिक्रिया मीडिया रिपोर्टों में भी सामने आई है।

वहीं पंजाब क्रिश्चियन यूनाइटेड फेडरेशन के प्रेजिडेंट अल्बर्ट दुआ ने भी इन टिप्पणियों पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा—

“मैं सभी साथियों से कहना चाहता हूं कि यह बातचीत सभी तक पहुंचे। हमारे लुधियाना में हिंदुत्व के एक प्रचारक आए हुए हैं। अपनी टीआरपी, वाहवाही के लिए वह अपना धार्मिक प्रचार कर रहे थे। उन्होंने हमारे पवित्र शब्द, पवित्र नारे हलेलुइया के बारे में गलत टिप्पणी की।”

— अल्बर्ट दुआ, प्रेजिडेंट, पंजाब क्रिश्चियन यूनाइटेड फेडरेशन

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, विवादित टिप्पणियों को लेकर संबंधित पक्षों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। दूसरी ओर धीरेंद्र शास्त्री की ओर से यह कहा गया कि वे मुसलमानों या ईसाइयों के खिलाफ नहीं हैं और सनातन धर्म का प्रचार कर रहे हैं। यानी दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात कह रहे हैं।

हम यहां किसी न्यायालय की भूमिका निभाने नहीं बैठे हैं कि किस शब्द का कानूनी अर्थ क्या है। वह अलग विषय है। लेकिन संपादकीय का सवाल इससे भी बड़ा है।

यदि किसी धर्म का प्रचार करना है तो क्या उसके लिए दूसरे धर्म को संदर्भ बनाना जरूरी है?

किसी व्यक्ति को सनातन पर बोलना है—बोले। राम पर बोले। कृष्ण पर बोले। हनुमान पर बोले। वेद, उपनिषद, गीता और भारतीय संत परंपरा पर बोले। सनातन के दर्शन पर बोले। भारतीय संस्कृति की विशेषताओं पर बोले।

लेकिन अपनी बात की ऊंचाई बढ़ाने के लिए दूसरे की आस्था को नीचे खींचने की जरूरत क्यों पड़े?

यह प्रश्न केवल धीरेंद्र शास्त्री से नहीं है। यह प्रश्न हर धर्म के हर प्रचारक से है।

अपने धर्म को बड़ा करने का सबसे आसान तरीका

धर्म के क्षेत्र में सबसे आसान काम है कहना—हम श्रेष्ठ हैं और दूसरा गलत है। इसमें तर्क की जरूरत कम पड़ती है। अपने धर्म के भीतर झांकना कठिन है।

अपने अनुयायियों से कहना कठिन है कि जाति के नाम पर भेदभाव मत करो। दहेज मत लो। नशा मत करो। गरीब का शोषण मत करो। स्त्री का अपमान मत करो। मजदूर की मजदूरी मत दबाओ। झूठ मत बोलो। भ्रष्टाचार मत करो। दूसरे धर्म के पड़ोसी से नफरत मत करो।

यह बातें सुनने में साधारण हैं, लेकिन समाज बदलने के लिए इन्हीं की जरूरत है। इसके मुकाबले मंच से यह कहना आसान है कि हमारा धर्म सबसे महान है। भीड़ तालियां बजाती है। वीडियो बनता है। क्लिप वायरल होती है। और अगले दिन चर्चा शुरू हो जाती है।

लेकिन क्या इससे धर्म मजबूत होता है? या केवल धार्मिक पहचान का शोर बढ़ता है?

हनुमान की कथा में हनुमान कहां हैं?

यह सवाल जानबूझकर तीखा है। हनुमान भारतीय धार्मिक मानस में शक्ति, सेवा, समर्पण और विनम्रता के प्रतीक हैं।

हनुमान को याद करने वाला समाज यदि अपने भीतर अहंकार बढ़ाता जाए तो क्या वह हनुमान की भक्ति कर रहा है या केवल हनुमान के नाम का आयोजन?

हनुमान की कथा सुनकर यदि कोई व्यक्ति लौटते हुए गरीब को देखकर मुंह फेर ले, अपने कर्मचारी का शोषण करे, अपने पड़ोसी से नफरत करे और अपने धर्म को लेकर अहंकार से भर जाए तो फिर कथा ने उसके भीतर क्या बदला?

यही असली परीक्षा है। कथा सुनने वालों की संख्या नहीं। कथा के बाद बदले हुए जीवन की संख्या।

वीआईपी भक्ति का नया अध्याय

लुधियाना के आयोजन से जुड़ी रिपोर्टों में अलग-अलग बैठने और प्रवेश व्यवस्थाओं का उल्लेख सामने आया। बाद में धीरेंद्र शास्त्री की ओर से वीआईपी प्रवेश को लेकर ऐसा संदेश भी रिपोर्ट हुआ कि भगवान के दरबार में कोई छोटा-बड़ा नहीं और आगे बैठने की व्यवस्था पहले आने वालों के आधार पर होनी चाहिए।

यह बात महत्वपूर्ण है। क्योंकि धार्मिक आयोजन में वीआईपी संस्कृति अपने आप में एक बड़ा विरोधाभास पैदा करती है।

ईश्वर के सामने आदमी की पहचान क्या है? उसका पद? उसकी संपत्ति? उसकी राजनीतिक पहुंच? उसका प्रभाव? या उसकी श्रद्धा?

यदि भगवान के सामने सभी बराबर हैं तो धार्मिक आयोजनों को भी इस समानता का संदेश देना चाहिए।

किसी उद्योगपति को अलग प्रवेश मिले, किसी राजनेता के लिए अलग स्थान हो, किसी अधिकारी के लिए विशेष व्यवस्था हो और सामान्य श्रद्धालु घंटों कतार में खड़ा रहे—तो धार्मिक समानता का संदेश कमजोर होता है। फिर यह केवल व्यवस्था नहीं रह जाती।

यह धर्म के भीतर सामाजिक हैसियत की पुनर्स्थापना बन जाती है।

क्या बड़ा खर्च ही बड़ी श्रद्धा है?

यह प्रश्न और असुविधाजनक है। हमने धार्मिक आयोजनों को धीरे-धीरे खर्च और प्रदर्शन से जोड़ दिया है। बड़ा पंडाल। महंगा मंच। विशेष प्रकाश व्यवस्था। बड़ी स्क्रीन। विशाल प्रचार। हजारों कुर्सियां। विशेष सुरक्षा। विशेष प्रवेश।

बड़े-बड़े पोस्टर। और फिर सोशल मीडिया पर आयोजन की भव्यता का प्रदर्शन।

लेकिन क्या कोई यह पूछता है कि इसी पैसे से कितने लोगों की जिंदगी बदल सकती थी?

यहां हम किसी आयोजन के खर्च की कोई अपुष्ट रकम नहीं बताएंगे। लुधियाना के इस कार्यक्रम पर “करोड़ों रुपये खर्च” होने का कोई प्रमाणित सार्वजनिक आंकड़ा हमारे सामने नहीं है। इसलिए करोड़ों के खर्च को तथ्य बताना उचित नहीं होगा।

लेकिन खर्च की अवधारणा पर सवाल उठाना पूरी तरह जायज है।

यदि धार्मिक आयोजन के लिए निजी श्रद्धा से धन खर्च किया जा रहा है, तो आयोजक उसकी उपयोगिता पर विचार करें।

यदि समाज से चंदा लिया जा रहा है, तो पारदर्शिता हो। यदि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग हो रहा है, तो जवाबदेही हो।

और यदि धर्म के नाम पर इतना बड़ा आयोजन किया जा रहा है तो समाज यह पूछने का अधिकार रखता है कि इस आयोजन का सामाजिक प्रतिफल क्या है?

कितने गरीबों को भोजन? कितने बच्चों को शिक्षा? कितने बीमारों को इलाज? कितने युवाओं को नशे से मुक्ति? कितने जरूरतमंद परिवारों को सहायता? कितने बुजुर्गों को सहारा?

अगर इन सवालों का जवाब सकारात्मक है तो भव्यता का एक सामाजिक अर्थ निकलता है।

लेकिन यदि पूरा जोर केवल मंच और भीड़ पर है तो सवाल उठेगा ही।

धर्म को प्रचार चाहिए या प्रमाण?

आज सनातन धर्म के प्रचार की बात बहुत सुनाई देती है। लेकिन धर्म का प्रचार केवल भाषण से होता है?

क्या एक ईमानदार दुकानदार सनातन का प्रचार नहीं करता? क्या किसी भूखे को भोजन कराने वाला सनातन का प्रचार नहीं करता? क्या किसी अनाथ बच्चे की शिक्षा का खर्च उठाने वाला सनातन का प्रचार नहीं करता?

क्या किसी विधवा के घर राशन पहुंचाने वाला सनातन का प्रचार नहीं करता? क्या भ्रष्टाचार से इनकार करने वाला सनातन का प्रचार नहीं करता?

क्या किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति की मुसीबत में उसके साथ खड़ा होना सनातन का प्रचार नहीं है?

फिर धार्मिक प्रचार को केवल विशाल मंच और हजारों की भीड़ से जोड़ने की जरूरत क्यों?

शायद इसलिए कि सेवा की तस्वीर देर से वायरल होती है, मंच की तस्वीर तुरंत। शायद इसलिए कि चुपचाप किया गया पुण्य मीडिया इवेंट नहीं बनता।

शायद इसलिए कि समाज ने धर्म को धीरे-धीरे अनुभव से अधिक प्रदर्शन में बदलना शुरू कर दिया है।

धर्म का बाजार और श्रद्धा का ग्राहक

यह शब्द कठोर लग सकता है—“धर्म का बाजार”। लेकिन बाजार का अर्थ केवल पैसा नहीं है। जहां मांग है, वहां आपूर्ति है।

जहां आस्था का विशाल जनसमूह है, वहां आयोजन उद्योग भी विकसित होगा।

टेंट लगेंगे। साउंड सिस्टम आएगा। खाना बनेगा। लंगर लगेगा। प्रचार होगा। परिवहन होगा। सुरक्षा होगी। मीडिया कवरेज होगा। सोशल मीडिया प्रचार होगा। यह आधुनिक समय की वास्तविकता है।

समस्या तब नहीं जब यह सब व्यवस्था के लिए हो। समस्या तब है जब श्रद्धा की जगह उपभोग की मानसिकता लेने लगे।

हम कथा सुनने नहीं, अनुभव खरीदने लगें। हम धर्म समझने नहीं, धार्मिक आयोजन का हिस्सा बनने जाएं।

हम संत को सुनने नहीं, संत के साथ तस्वीर लेने पहुंचें। हम भगवान के दर्शन नहीं, वीआईपी प्रवेश की उपलब्धि लेकर लौटें।

तब धर्म की आत्मा धीरे-धीरे आयोजन की चमक में छिप जाती है।

लुधियाना की घटना से एक और सबक

धार्मिक मंच जितना बड़ा होगा, शब्दों की जिम्मेदारी उतनी बड़ी होगी। लुधियाना में विवाद इसी बात की याद दिलाता है।

एक कथावाचक अपने लाखों समर्थकों के बीच जो बोलता है, उसका प्रभाव सामान्य बातचीत से अलग होता है। इसलिए धार्मिक वक्ता को यह समझना होगा कि उसका हर वाक्य किसी समुदाय के बीच तनाव भी पैदा कर सकता है और संवाद भी।

इसी तरह आपत्ति करने वालों को भी यह समझना होगा कि किसी धार्मिक आयोजन का विरोध यदि हिंसक भीड़ या टकराव में बदलता है तो उससे समस्या हल नहीं होगी।

धर्म का उत्तर धर्म से नहीं, संवाद से होना चाहिए। कानून का रास्ता है तो कानून अपना काम करे।

आपत्ति है तो तथ्य सामने आएं। गलत बात है तो उसका प्रतिवाद हो। लेकिन शहर को समुदायों के बीच संघर्ष का मैदान बनाना किसी के हित में नहीं।

हमें आखिर कैसी कथा चाहिए?

हमें ऐसी कथा चाहिए जिसमें हनुमान की शक्ति हो, लेकिन भाषा में विनम्रता भी हो।

हमें ऐसा धार्मिक आयोजन चाहिए जिसमें हजारों लोग आएं तो उनका स्वागत हो, लेकिन किसी को यह महसूस न हो कि वह दूसरे दर्जे का श्रद्धालु है।

हमें ऐसा मंच चाहिए जहां नेता भी आएं तो वह धार्मिक मंच की गरिमा बनाए रखें।

हमें ऐसा कथावाचक चाहिए जो अपने धर्म की महानता बताए, लेकिन दूसरे की आस्था का अपमान किए बिना।

हमें ऐसा भक्त चाहिए जो कथा से लौटकर थोड़ा कम क्रोधित और थोड़ा अधिक करुणामय हो।

हमें ऐसी भक्ति चाहिए जो मंदिर की सीढ़ियों से उतरकर सड़क पर भी दिखाई दे।

और हमें ऐसा धर्म चाहिए जिसे अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए किसी दूसरे धर्म को छोटा करने की जरूरत न पड़े।

धर्म जितना भीतर, आयोजन उतना छोटा

शायद हमें यह स्वीकार करने का समय आ गया है कि धर्म को हमेशा बड़ा मंच नहीं चाहिए।

कभी-कभी धर्म बहुत छोटा होता है। एक बूढ़ी मां के पैर दबाता बेटा। एक भूखे को रोटी देता हाथ। एक डरे हुए व्यक्ति को सांत्वना देता कंधा। एक मजदूर को समय पर मिलती मजदूरी। एक लड़की को पढ़ने का अवसर। एक बीमार के इलाज में मदद। एक पड़ोसी के दुख में खड़ा दूसरा पड़ोसी।

यही धर्म है तो फिर इसके लिए लाखों की भीड़ की आवश्यकता कहां है? धर्म की शक्ति भीड़ में नहीं, हर मनुष्य के भीतर है।

भव्य आयोजन से कोई समस्या नहीं—यदि वह भक्ति का माध्यम है। समस्या तब है जब भव्यता ही भक्ति का प्रमाण बन जाए।

लुधियाना की हनुमंत कथा का विवाद इसी बड़े सवाल की ओर संकेत करता है। विवादित कथनों पर संबंधित पक्षों की अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं हैं और उसका कानूनी-सामाजिक निष्कर्ष अलग प्रक्रिया से निकलेगा। लेकिन इससे बड़ा सामाजिक सवाल हमारे सामने पहले से मौजूद है—क्या धार्मिक आयोजन का उद्देश्य मनुष्य को ईश्वर के करीब ले जाना है या धर्म को एक विशाल सार्वजनिक तमाशे में बदल देना?

इस सवाल का उत्तर कोई बाबा नहीं देगा। कोई मौलवी नहीं देगा। कोई पादरी नहीं देगा। कोई राजनेता नहीं देगा।

यह उत्तर समाज को स्वयं देना होगा। और शायद उत्तर की शुरुआत बहुत छोटी जगह से होगी—अपने भीतर से।

क्योंकि अगर भगवान हमारे भीतर नहीं जागता तो लाखों वाट की रोशनी भी हमारे धार्मिक मंच को रोशन कर सकती है, हमारे भीतर के अंधेरे को नहीं।

—अनिल अनूप, संपादक

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