16 अक्टूबर 2026 8:05 अपराह्न

मुश्ताक खान : छोटे शहर से निकला वह चरित्र अभिनेता, जिसने हर किरदार में अपनी छाप छोड़ी

अभिनेता मुश्ताक खान के जीवन और अभिनय यात्रा पर आधारित फीचर इमेज, जिसमें उनके विभिन्न रूपों के साथ रिपोर्टर शामी एम इरफान की तस्वीर शामिल है।

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लेख : शामी एम. इरफान

हिंदी सिनेमा ने ऐसे अनेक कलाकार देखे हैं जिनके नाम से ज्यादा उनके किरदार याद रह जाते हैं। मुश्ताक खान भी ऐसे ही अभिनेता थे। पर्दे पर वे हमेशा नायक के रूप में केंद्र में नहीं रहे, लेकिन जब भी दिखाई दिए, अपनी सहज संवाद अदायगी, देहभाषा, चेहरे के भाव और खास कॉमिक टाइमिंग से दृश्य पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा गए। ‘आशिकी’, ‘हम हैं राही प्यार के’, ‘हेरा फेरी’, ‘जोड़ी नंबर 1’, ‘मुझसे शादी करोगी’, ‘गदर : एक प्रेम कथा’ और खास तौर पर ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा के उन चरित्र अभिनेताओं की कतार में खड़ा किया, जिन्हें दर्शक नाम से कम और उनके निभाए किरदारों से ज्यादा पहचानते हैं।

24 सितंबर 2026 को मुश्ताक खान के निधन की खबर ने फिल्म, टेलीविजन और रंगमंच से जुड़े लोगों को शोक में डुबो दिया। मुंबई में उपचार के दौरान उनका निधन हुआ। हाल की रिपोर्टों के अनुसार वे कैंसर से जूझ रहे थे और कुछ समय से अस्पताल में उपचाराधीन थे। उनके निधन के साथ हिंदी मनोरंजन जगत ने केवल एक हास्य अभिनेता नहीं, बल्कि रंगमंच से अपनी अभिनय-यात्रा शुरू करने वाले ऐसे कलाकार को खो दिया, जिसने दशकों तक छोटे-बड़े किरदारों में अपनी पहचान कायम रखी।

छोटे शहर से अभिनय की बड़ी दुनिया तक

मुश्ताक खान की कहानी उन कलाकारों की कहानी है जिनके लिए अभिनय कोई अचानक चुना गया पेशा नहीं था, बल्कि जीवन के आरंभिक वर्षों से भीतर पलता हुआ सपना था। उपलब्ध साक्षात्कार-सामग्री के अनुसार उनका संबंध मध्य प्रदेश के बैहर से था और बचपन से ही उन्हें अभिनय का आकर्षण था। एक पुराने साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि स्कूल के दिनों में ही वे नाटकों में अभिनय और गायन करते थे तथा मोनो-एक्टिंग भी करते थे। कॉलेज पहुंचने के बाद अभिनय का यह शौक और गंभीर हुआ। वे नाटक लिखते, उनमें अभिनय करते और निर्देशन भी करते थे।

यही रंगमंच उनके लिए अभिनय की पहली पाठशाला बना। मुंबई पहुंचने के बाद उन्होंने भारतीय जन नाट्य आंदोलन से जुड़े रंगकर्मियों के साथ काम किया। ‘ड्रोणाचार्य’ जैसे नाटक में उनके अभिनय को सराहना मिली। यह तथ्य उनकी अभिनय यात्रा को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मुश्ताक खान का अभिनय केवल कैमरे के सामने खड़े होकर संवाद बोल देने का अभिनय नहीं था। उसके पीछे रंगमंच की वह साधना थी जिसमें अभिनेता को आवाज, शरीर, भाव, लय और दर्शक की प्रतिक्रिया—इन सभी को एक साथ साधना पड़ता है।

महेश भट्ट की फिल्मों से मजबूत हुई पहचान

मुश्ताक खान के फिल्मी सफर में महेश भट्ट की फिल्मों का विशेष महत्व रहा। उपलब्ध जीवनी-सामग्री के अनुसार सलीम खान की सिफारिश के बाद उनकी मुलाकात महेश भट्ट से हुई और उन्हें फिल्म ‘कब्जा’ में काम करने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने महेश भट्ट की कई फिल्मों में काम किया। ‘आशिकी’, ‘दिल है कि मानता नहीं’ और ‘सड़क’ जैसी फिल्मों से उनका नाम फिल्म उद्योग में पहचाना जाने लगा।

मुश्ताक खान का यह सफर उस दौर में आगे बढ़ा जब हिंदी फिल्मों में चरित्र अभिनेताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हुआ करती थी। मुख्य कलाकार कहानी को आगे बढ़ाते थे, लेकिन कहानी की सामाजिक जमीन, हास्य, तनाव और कई बार भावनात्मक राहत चरित्र कलाकारों के माध्यम से ही आती थी। मुश्ताक खान ने इसी क्षेत्र में अपनी जगह बनाई।

उन्होंने कभी खुद को एक ही प्रकार की भूमिका तक सीमित नहीं किया। पुलिसकर्मी, पड़ोसी, दुकानदार, रिश्तेदार, कर्मचारी, स्थानीय दबंग, हास्य पात्र या गंभीर चरित्र—उनकी अभिनय क्षमता विभिन्न भूमिकाओं में दिखाई दी। यही वजह है कि लंबे करियर में वे अलग-अलग पीढ़ियों के कलाकारों के साथ काम करते रहे।

‘वेलकम’ का बल्लू और लोकप्रियता का नया अध्याय

मुश्ताक खान के अभिनय करियर में वर्ष 2007 की फिल्म ‘वेलकम’ एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनी। फिल्म में बल्लू का उनका किरदार दर्शकों को खूब याद रहा। फिल्म के हास्य प्रसंगों में उनकी मौजूदगी ने उन्हें घर-घर तक पहुंचाया। उनका संवाद और उसे बोलने का अंदाज लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गया।

यहां मुश्ताक खान की खासियत समझना जरूरी है। वे जिस दृश्य में आते थे, उसमें बहुत ज्यादा नाटकीयता पैदा करने की कोशिश नहीं करते थे। उनका अभिनय सहजता से हास्य पैदा करता था। चेहरे के भाव, चाल-ढाल, बोलने की गति और संवाद के बीच का ठहराव उनके हास्य को प्रभावी बनाता था। यही कारण है कि कई बार फिल्म के बड़े सितारों के बीच भी उनके छोटे-से दृश्य दर्शकों की स्मृति में रह जाते थे।

‘वेलकम’ के बाद उनकी लोकप्रियता को नया विस्तार मिला, लेकिन वे केवल कॉमेडी तक सीमित नहीं हुए। ‘वेलकम बैक’ सहित बाद की फिल्मों में भी वे दिखाई दिए। ‘गदर 2’, ‘स्त्री 2’ और ‘जाट’ जैसी फिल्मों में उनकी मौजूदगी उनके लगातार सक्रिय रहने का प्रमाण है। उपलब्ध फिल्मोग्राफी में ‘उदयपुर फाइल्स’ का भी उल्लेख मिलता है।

‘हेरा फेरी’ से ‘स्त्री 2’ तक लंबी अभिनय यात्रा

मुश्ताक खान की अभिनय यात्रा की खूबसूरती यही थी कि उसमें किसी एक फिल्म या किसी एक दौर को पूरी कहानी नहीं कहा जा सकता। ‘हेरा फेरी’, ‘जोड़ी नंबर 1’, ‘मुझसे शादी करोगी’, ‘गदर : एक प्रेम कथा’ जैसी फिल्मों में उनकी भूमिकाओं ने उन्हें अलग-अलग दर्शक वर्गों तक पहुंचाया। वे उस पीढ़ी के अभिनेता थे जिनके लिए फिल्म का आकार मायने नहीं रखता था; भूमिका कितनी प्रभावी है, यह अधिक महत्वपूर्ण था।

उनका अभिनय कई बार कुछ मिनटों के दृश्य तक सीमित रहता था, लेकिन उन कुछ मिनटों में वे किरदार की पहचान स्थापित कर देते थे। यही चरित्र अभिनेता की असली परीक्षा होती है। मुख्य अभिनेता के पास कहानी का पर्याप्त समय होता है, जबकि चरित्र अभिनेता को कम समय में दर्शक को यह विश्वास दिलाना होता है कि उसका किरदार इसी दुनिया का स्वाभाविक हिस्सा है।

मुश्ताक खान इस कसौटी पर बार-बार खरे उतरते रहे।

टेलीविजन और रंगमंच से भी गहरा रिश्ता

फिल्मों के साथ मुश्ताक खान ने टेलीविजन में भी काम किया। ‘भारत एक खोज’, ‘नुक्कड़’, ‘अदालत’, ‘कुछ रंग प्यार के ऐसे भी’ और अन्य धारावाहिकों में उनकी उपस्थिति दर्ज हुई। ‘कुछ रंग प्यार के ऐसे भी’ में उन्होंने बलदेव त्रिपाठी का किरदार निभाया। टेलीविजन के लंबे प्रारूप ने उन्हें अलग तरह के चरित्र निभाने का अवसर दिया।

यहां भी उनकी रंगमंचीय पृष्ठभूमि काम आई। थिएटर अभिनेता कैमरे के सामने अक्सर इसलिए अलग दिखाई देता है क्योंकि वह संवाद के साथ चरित्र की आंतरिक गति को समझता है। मुश्ताक खान के अभिनय में यही बात दिखाई देती थी। उनका हास्य केवल हावभाव नहीं था; वह चरित्र की प्रकृति से निकलता था।

चाईबासा के इप्टा कलाकार तरुण मोहम्मद से आत्मीय संबंध

मुश्ताक खान की अभिनय यात्रा का एक कम चर्चित पहलू रंगकर्मियों और साहित्य-संस्कृति से जुड़े लोगों के साथ उनका जुड़ाव भी रहा। झारखंड के चाईबासा के इप्टा कलाकार, अभिनेता, लेखक और पत्रकार तरुण मोहम्मद से उनके काफी अच्छे और आत्मीय संबंध रहे। तरुण मोहम्मद चाईबासा के सांस्कृतिक और रंगकर्म के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं और उपलब्ध समाचार सामग्री में उन्हें इप्टा के संस्थापक के रूप में भी उल्लेखित किया गया है।

मुश्ताक खान और तरुण मोहम्मद का यह संबंध केवल दो कलाकारों के बीच परिचय का मामला नहीं था, बल्कि रंगमंच और व्यापक भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े दो रचनात्मक व्यक्तित्वों की आत्मीयता के रूप में देखा जा सकता है। मुश्ताक खान स्वयं रंगमंच से आए थे और तरुण मोहम्मद भी इप्टा जैसी जनपक्षधर सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े रहे हैं। इसलिए दोनों के बीच संवाद और आत्मीयता का आधार अभिनय से आगे जाकर रंगकर्म, समाज और कला की साझा संवेदना में तलाशा जा सकता है।

चाईबासा जैसे शहर से जुड़े तरुण मोहम्मद के लिए मुंबई की फिल्म दुनिया के इस महत्वपूर्ण चरित्र अभिनेता से निकटता निश्चित ही एक विशेष सांस्कृतिक सेतु का अनुभव रही होगी। दूसरी ओर मुश्ताक खान के लिए भी देश के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय रंगकर्मियों से जुड़े रहना उनके उस व्यक्तित्व की ओर संकेत करता है जिसमें अभिनय केवल फिल्मी प्रसिद्धि का माध्यम नहीं, बल्कि व्यापक सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा था।

आज जब मुश्ताक खान हमारे बीच नहीं हैं, तब तरुण मोहम्मद जैसे रंगकर्मी से उनके संबंधों का उल्लेख इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि किसी कलाकार की पहचान केवल उसकी फिल्मोग्राफी से पूरी नहीं होती। उसके मित्र, सहकर्मी, रंगकर्मी साथी और रचनात्मक संबंध भी उसकी यात्रा का हिस्सा होते हैं।

चरित्र अभिनेता की असली ताकत

हिंदी सिनेमा में चरित्र अभिनेता का योगदान अक्सर मुख्य सितारों की चमक के पीछे दब जाता है। लेकिन किसी भी फिल्म की विश्वसनीयता उसके छोटे-छोटे पात्रों से बनती है। मुश्ताक खान इसी परंपरा के अभिनेता थे।

वे जानते थे कि भूमिका चाहे पांच मिनट की हो या पचास मिनट की, उसे जीवंत बनाना अभिनेता की जिम्मेदारी है। उनकी संवाद अदायगी में बनावटीपन कम और सहजता अधिक थी। वे किरदार को ‘करते’ नहीं थे, उसे ‘जीते’ हुए दिखाई देते थे। कॉमेडी में उनकी टाइमिंग और गंभीर दृश्यों में उनकी संयमित उपस्थिति इस बात का प्रमाण थी।

उनके अभिनय की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही थी कि दर्शक उन्हें देखकर यह महसूस करता था कि यह व्यक्ति वास्तविक जीवन में भी ऐसा ही होगा। अभिनय की भाषा में इसे स्वाभाविकता कहा जा सकता है और यही स्वाभाविकता मुश्ताक खान को विशिष्ट बनाती थी।

संघर्ष से सफलता तक की कहानी

मुश्ताक खान की यात्रा यह भी बताती है कि फिल्म उद्योग में सफलता हमेशा एक बड़े अवसर से नहीं मिलती। कई बार कलाकार वर्षों तक छोटे-छोटे अवसरों से अपनी पहचान बनाता है। मुश्ताक खान ने भी लंबी प्रतीक्षा, रंगमंच, छोटे किरदारों और लगातार काम के माध्यम से अपना स्थान बनाया।

मुंबई में शुरुआती संघर्ष से लेकर स्थापित चरित्र अभिनेता बनने तक की उनकी यात्रा नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध पुराने साक्षात्कार में उन्होंने अभिनय के प्रति अपने बचपन के आकर्षण और थिएटर के अनुभवों को याद किया था। यही अनुभव आगे चलकर उनके फिल्मी अभिनय की बुनियाद बने।

निजी जीवन और सार्वजनिक छवि

मुश्ताक खान को सहकर्मी कलाकारों के बीच सहज और मिलनसार व्यक्ति के रूप में भी याद किया गया है। फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज के अध्यक्ष बी.एन. तिवारी ने उनके निधन के बाद उन्हें प्रतिभाशाली कलाकार और मिलनसार व्यक्ति के रूप में याद किया। रिपोर्ट के अनुसार फिल्म उद्योग से जुड़े संगठन ने उनके पुराने बकाये के मामले में भी सहायता की थी।

यह पक्ष बताता है कि कलाकार की असली विरासत केवल पुरस्कारों और फिल्मों की संख्या में नहीं होती। वह इस बात में भी होती है कि सहकर्मी उसे किस रूप में याद करते हैं।

बीमारी, अंतिम समय और विदाई

मुश्ताक खान लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे थे। सितंबर 2026 में उनकी हालत बिगड़ने के बाद मुंबई में उनका उपचार चल रहा था। 24 सितंबर को उनके निधन की खबर सामने आई। अंतिम संस्कार के बाद फिल्म जगत से कई लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। अभिनेता रजा मुराद ने उनकी अंतिम विदाई में फिल्म उद्योग की कम मौजूदगी पर सार्वजनिक रूप से अपनी निराशा व्यक्त की।

हालांकि अंतिम विदाई का दृश्य किसी कलाकार की पूरी विरासत का मापदंड नहीं हो सकता। मुश्ताक खान की वास्तविक विरासत उनकी फिल्मों, उनके निभाए पात्रों और उन दर्शकों की स्मृतियों में है जिन्होंने उन्हें पर्दे पर देखकर हंसी, मनोरंजन और कई बार भावनात्मक जुड़ाव महसूस किया।

एक कलाकार जो किरदारों में जीवित रहेगा

मुश्ताक खान उन कलाकारों में थे जिन्होंने यह साबित किया कि सिनेमा में अमर होने के लिए हमेशा नायक होना जरूरी नहीं। कई बार सहायक भूमिका ही अभिनेता को दर्शकों की स्मृति में स्थायी बना देती है। बल्लू जैसे किरदार से मिली लोकप्रियता इसका उदाहरण है।

उनकी यात्रा रंगमंच से शुरू हुई, फिल्मों और टेलीविजन तक पहुंची और कई दशकों तक चलती रही। इस यात्रा में संघर्ष था, अवसर थे, छोटे-बड़े किरदार थे और लगातार अपने हुनर को साबित करने की जिद थी।

चाईबासा के इप्टा कलाकार, अभिनेता, लेखक और पत्रकार तरुण मोहम्मद के साथ उनके आत्मीय संबंध इस यात्रा के उस मानवीय पक्ष को सामने लाते हैं जो फिल्मी पर्दे की चकाचौंध से अलग है। कलाकारों के बीच बनने वाले ऐसे रिश्ते ही भारतीय रंग-संस्कृति की वास्तविक धरोहर हैं।

मुश्ताक खान अब पर्दे पर नया किरदार निभाने के लिए हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके निभाए किरदार अभी भी मौजूद हैं। ‘वेलकम’ का बल्लू हो, किसी फिल्म का पुलिसकर्मी हो, पड़ोसी हो, रिश्तेदार हो या कोई साधारण-सा व्यक्ति—उन्होंने साधारण पात्रों को भी यादगार बनाने की क्षमता दिखाई। यही किसी चरित्र अभिनेता की सबसे बड़ी सफलता है।

मुश्ताक खान का जीवन हमें यह याद दिलाता है कि सिनेमा केवल सितारों से नहीं बनता। वह उन असंख्य कलाकारों से बनता है जो कहानी को विश्वसनीय, जीवंत और मानवीय बनाते हैं। मुश्ताक खान उन्हीं कलाकारों में एक थे—और इसलिए उनका जाना केवल एक अभिनेता का जाना नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा के एक पूरे अभिनय-संसार की एक आवाज का मौन हो जाना है।

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