16 अक्टूबर 2026 6:35 अपराह्न

बद्रीनाथ में तेज संगीत और डीजे पर उठे सवाल, हिमालयी पर्यावरण और वन्यजीवों पर शोर के असर की चिंता

बद्रीनाथ में तेज संगीत और डीजे के संभावित प्रभावों पर रिपोर्टर रजनी वर्मा की फीचर इमेज, हिमालयी पर्वत, मंदिर, ग्लेशियर, वन्यजीव और लाउडस्पीकर का दृश्य

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रजनी वर्मा की रिपोर्ट

बद्रीनाथ। उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र बद्रीनाथ में आयोजित देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव 2026 के बाद तेज संगीत और डीजे को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं सामने आई हैं। 19 और 20 सितंबर को बद्रीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में आयोजित इस दो दिवसीय महोत्सव की थीम ‘हमारी विरासत, हमारा भविष्य’ थी। कार्यक्रम में लोक संगीत, लोकनृत्य और लाइव म्यूजिक सहित विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियां हुईं। महोत्सव के बाद सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ वीडियो में बद्रीनाथ जैसे संवेदनशील उच्च हिमालयी क्षेत्र में तेज आवाज में संगीत और डीजे बजते दिखाई दिए, जिसके बाद मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ वन्यजीवों और हिमालयी पारिस्थितिकी पर शोर के संभावित प्रभाव को लेकर चर्चा तेज हुई है।

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बद्रीनाथ केवल एक प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि अत्यंत संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है। यहां पर्यटन और तीर्थयात्रा के बढ़ते दबाव के साथ यातायात, निर्माण, भीड़ और अन्य मानवीय गतिविधियों से पैदा होने वाला शोर भी पर्यावरणीय बहस का हिस्सा बनता जा रहा है।

चारधाम यात्रा के दौरान बढ़ जाता है वाहनजनित शोर

मानवजनित शोर के प्रभावों को समझने के लिए उत्तराखंड में किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों का संदर्भ महत्वपूर्ण है। वर्ष 2016 में International Journal of Advanced Research में प्रकाशित ‘Analysis of Vehicular Noise Pollution at Different Locations in Srinagar Town of Garhwal Uttarakhand, India’ नामक शोधपत्र में श्रीनगर क्षेत्र में वाहनजनित शोर का अध्ययन किया गया था।

शोधपत्र के लेखक डॉ. मोहन सिंह पंवार और पल्लवी उप्रेती ने चारधाम यात्रा के संदर्भ में श्रीनगर में यात्रा सीजन और गैर-यात्रा सीजन के दौरान वाहनों की संख्या तथा उनसे उत्पन्न होने वाले शोर की तुलना की। उस समय यमुनोत्री, गंगोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ जाने वाले यात्रियों के लिए एनएच-58 एक महत्वपूर्ण मार्ग था और श्रीनगर इसी मार्ग पर स्थित प्रमुख कस्बों में शामिल था।

अध्ययन के अनुसार यात्रा सीजन में औसत शोर की तीव्रता 73.8 डेसिबल दर्ज की गई, जबकि गैर-यात्रा सीजन में यह 68.3 डेसिबल थी। शोधकर्ताओं ने यात्रा के व्यस्त समय में वाहनों की बढ़ी आवाजाही को शोर के बढ़े स्तर से जोड़ा।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि यात्रा सीजन के दौरान भारी वाहनों और चार पहिया वाहनों की आवाजाही में वृद्धि हुई। इसका सबसे स्पष्ट प्रभाव मुख्य सड़क के आसपास दिखाई दिया। श्रीनगर के पांच स्थानों पर किए गए अध्ययन में चार स्थानों पर शोर निर्धारित मानकों से ऊपर पाया गया।

तेज शोर का असर केवल कानों तक सीमित नहीं

शोर प्रदूषण को अक्सर केवल असुविधा या कानों पर पड़ने वाले प्रभाव के रूप में देखा जाता है, लेकिन श्रीनगर में किए गए अध्ययन ने इसके व्यापक प्रभावों की ओर भी संकेत किया।

शोधकर्ताओं ने 100 लोगों का सर्वे किया। इसमें लोगों ने शोर के संपर्क के दौरान सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, परेशानी, अनिद्रा, मानसिक सतर्कता में कमी और काम करने की क्षमता प्रभावित होने जैसी समस्याओं की जानकारी दी।

अध्ययन में शोर के संपर्क में रहने की अवधि और स्वास्थ्य संबंधी शिकायतों के बीच भी संबंध देखा गया। चार से पांच घंटे तक तेज शोर के संपर्क में रहने वाले लोगों में अनिद्रा, परेशानी और सिरदर्द की शिकायत अपेक्षाकृत अधिक दर्ज की गई।

यह अध्ययन बद्रीनाथ में आयोजित किसी कार्यक्रम के प्रभाव का प्रत्यक्ष अध्ययन नहीं है। हालांकि, यह उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ती मानवीय गतिविधियों और शोर के बीच संबंध को समझने के लिए एक उपयोगी वैज्ञानिक संदर्भ उपलब्ध कराता है।

बढ़ते पर्यटन के बीच वन्यजीवों पर भी नजर जरूरी

उत्तराखंड में पर्यटन और तीर्थयात्रा का विस्तार लगातार बढ़ रहा है। पर्यटकों और श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने के साथ पर्वतीय क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों का दबाव भी बढ़ता है। ऐसे में पर्यावरणीय चर्चा केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं रह सकती।

उच्च हिमालयी क्षेत्र अनेक पक्षियों, स्तनधारियों और अन्य वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास हैं। इनके लिए ध्वनि भी पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। मानव गतिविधियों से पैदा होने वाला कृत्रिम शोर उनके प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।

इसी विषय पर क्लिंटन डी. फ्रांसिस और जेस आर. बारबर ने ‘A Framework for Understanding Noise Impacts on Wildlife: An Urgent Conservation Priority’ शीर्षक से शोधपत्र प्रकाशित किया था। यह शोध Frontiers in Ecology and the Environment में प्रकाशित हुआ। इसमें मानव गतिविधियों से पैदा होने वाले शोर और वन्यजीवों पर उसके संभावित प्रभावों से जुड़े वैज्ञानिक अध्ययनों की समीक्षा की गई।

लगातार और अचानक आने वाला शोर वन्यजीवों के व्यवहार को बदल सकता है

शोधकर्ताओं के अनुसार अलग-अलग प्रजातियां अलग-अलग परिस्थितियों में शोर के प्रति अलग प्रतिक्रिया दे सकती हैं। लगातार आने वाला शोर वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवाजों को सुनने में बाधा पैदा कर सकता है।

कई जीव अपने आसपास के वातावरण को समझने, साथी से संपर्क करने, खतरे की पहचान करने या भोजन खोजने के लिए ध्वनि संकेतों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में कृत्रिम और लगातार शोर प्राकृतिक ध्वनि संकेतों को दबा सकता है।

वहीं अचानक और अप्रत्याशित तेज आवाज को कुछ जानवर खतरे के संकेत के रूप में ले सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप उनके व्यवहार में बदलाव आ सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि हर व्यवहारिक बदलाव मनुष्य को आसानी से दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है।

किसी क्षेत्र में वन्यजीवों का मौजूद रहना यह साबित नहीं करता कि वहां होने वाले शोर का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा। वैज्ञानिक समीक्षा में इस बात पर जोर दिया गया है कि किसी प्रजाति की प्रतिक्रिया को केवल इस आधार पर नहीं समझा जा सकता कि वह शोर वाले क्षेत्र से चली गई या वहीं बनी रही।

शोर की आदत पड़ना असर खत्म होने का प्रमाण नहीं

वन्यजीवों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि यदि कोई जानवर लंबे समय तक शोर वाले क्षेत्र में बना रहता है तो क्या इसका अर्थ यह है कि वह शोर का अभ्यस्त हो चुका है?

शोधकर्ताओं के अनुसार ऐसा निष्कर्ष सीधे नहीं निकाला जा सकता। कोई जानवर बाहरी रूप से शोर के साथ रहने का अभ्यस्त दिखाई दे सकता है, लेकिन उसके व्यवहार में ऐसे बदलाव हो सकते हैं जिनका प्रभाव उसके जीवन, भोजन, सुरक्षा या प्रजनन से जुड़ी प्रक्रियाओं पर पड़ता हो।

इसीलिए वन्यजीवों पर शोर प्रदूषण के प्रभाव का अध्ययन करते समय केवल उनकी मौजूदगी या अनुपस्थिति देखना पर्याप्त नहीं माना जाता। अलग-अलग स्तर के शोर, उसकी अवधि, आवृत्ति, अचानक होने वाली आवाज और संबंधित प्रजाति के व्यवहार को साथ में देखना जरूरी है।

शोर का स्तर घटाना क्यों जरूरी

वैज्ञानिक शोध में शोर को कम करने के लिए विभिन्न उपायों पर भी चर्चा की गई है। शोर के स्तर को कम करने से मनुष्यों और वन्यजीवों दोनों को लाभ मिल सकता है। कुछ औद्योगिक गतिविधियों में शोर को सीमित करने के लिए अवरोधक संरचनाओं का इस्तेमाल किया जाता है।

हालांकि, हर समाधान के अपने पर्यावरणीय प्रभाव भी हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर सड़कों के किनारे बनाई गई ध्वनि अवरोधक दीवारें एक तरफ शोर कम कर सकती हैं, लेकिन दूसरी तरफ वन्यजीवों की आवाजाही में बाधा डाल सकती हैं। इससे उनके आवासों के बीच संपर्क प्रभावित होने की आशंका हो सकती है।

इसलिए हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में शोर नियंत्रण की रणनीति बनाते समय केवल ध्वनि का स्तर घटाना ही नहीं, बल्कि उसके व्यापक पारिस्थितिक प्रभावों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

बद्रीनाथ के हैंगिंग ग्लेशियर को लेकर विशेषज्ञ की चिंता

बद्रीनाथ क्षेत्र में हिमनदों और पर्वतीय ढलानों की संवेदनशीलता को देखते हुए पर्यावरण विशेषज्ञ प्रोफेसर एसपी सती ने उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तेज आवाज और डीजे जैसी गतिविधियों से बचने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

उनका कहना है कि बद्रीनाथ क्षेत्र में हैंगिंग ग्लेशियर का खतरा मौजूद है और ऐसे संवेदनशील इलाके में अत्यधिक तेज आवाज वाली गतिविधियों को लेकर सावधानी बरती जानी चाहिए। प्रोफेसर सती के अनुसार अत्यधिक शोर से ग्लेशियरों में दरारें पड़ने की आशंका हो सकती है और इन दरारों का प्रभाव तत्काल दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है। उनके अनुसार बाद की परिस्थितियों में ऐसी कमजोरियां हिमस्खलन जैसी घटनाओं से जुड़ सकती हैं।

हालांकि, ग्लेशियरों में दरार और तेज संगीत के बीच प्रत्यक्ष कारण-परिणाम संबंध को लेकर वैज्ञानिक निष्कर्ष के लिए विशिष्ट क्षेत्रीय अध्ययन जरूरी होगा। इसलिए इस दावे को विशेषज्ञ की चिंता के रूप में देखना और व्यापक वैज्ञानिक प्रमाणों से अलग रखना महत्वपूर्ण है।

हिमालय की कैरिंग कैपेसिटी पर फिर बहस जरूरी

प्रोफेसर एसपी सती के अनुसार बद्रीनाथ क्षेत्र के पशु-पक्षी भी अत्यधिक मानवीय शोर के लिए स्वाभाविक रूप से अनुकूलित नहीं हैं और लगातार तेज आवाज उनके व्यवहार को प्रभावित कर सकती है।

उनका यह भी कहना है कि अत्यधिक यातायात और ब्लैक कार्बन जैसी मानवीय गतिविधियों से हिमालय पहले ही पर्यावरणीय दबाव का सामना कर रहा है। ऐसे में हिमालयी तीर्थस्थलों के लिए कैरिंग कैपेसिटी निर्धारित करना जरूरी है—अर्थात किसी क्षेत्र में पर्यावरण की सहनशीलता को ध्यान में रखते हुए कितनी मानवीय गतिविधि और कितना दबाव स्वीकार्य है।

बद्रीनाथ जैसे तीर्थस्थल पर सांस्कृतिक आयोजनों और पर्यटन गतिविधियों के साथ पर्यावरणीय संवेदनशीलता के बीच संतुलन का सवाल इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है।

सांस्कृतिक आयोजन और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की जरूरत

‘हमारी विरासत, हमारा भविष्य’ थीम पर आयोजित देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव ने उत्तराखंड की लोक संस्कृति, संगीत और परंपराओं को मंच दिया। लेकिन इसी आयोजन के वीडियो सामने आने के बाद तेज आवाज को लेकर उठे सवाल यह भी याद दिलाते हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में सांस्कृतिक और पर्यटन गतिविधियों की योजना बनाते समय स्थानीय पर्यावरण की संवेदनशीलता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

बद्रीनाथ जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्र में शोर प्रदूषण, बढ़ता यातायात, पर्यटन दबाव, वन्यजीवों का व्यवहार और ग्लेशियरों की संवेदनशीलता एक-दूसरे से जुड़े व्यापक पर्यावरणीय विमर्श का हिस्सा हैं।

आपदाओं को पूरी तरह रोकना हमेशा संभव नहीं हो सकता, लेकिन जोखिमों की पहचान, वैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरणीय क्षमता का आकलन और मानवीय गतिविधियों का बेहतर नियमन उनके संभावित प्रभावों को कम करने में मदद कर सकता है। यही वजह है कि बद्रीनाथ में तेज संगीत और डीजे को लेकर उठी बहस को केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम तक सीमित रखने के बजाय हिमालयी पर्यावरण और टिकाऊ पर्यटन के बड़े सवाल से जोड़कर देखना जरूरी है।

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