रिपोर्ट ठाकुर के.के. सिंह
फरह। कभी-कभी किसी व्यक्ति का निधन केवल एक परिवार का दुख नहीं होता, बल्कि पूरे गांव, समाज और एक युग की स्मृतियों को झकझोर देता है। ऐसा ही क्षण उस समय आया जब 92 वर्षीय वरिष्ठ समाजसेवी ठाकुर गुलाब सिंह बौहरे ने अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ गांव की वह पीढ़ी भी इतिहास का हिस्सा बन गई, जिसने अभावों में जीवन जिया, संघर्षों में समाज को संभाला और अपने व्यवहार से आने वाली पीढ़ियों के लिए उदाहरण स्थापित किए। आज गांव के लोग केवल एक बुजुर्ग को नहीं, बल्कि अपनी स्मृतियों, परंपराओं और सामाजिक चेतना के एक जीवंत अध्याय को याद कर रहे हैं।
समाजसेवी बुजुर्ग की विरासत केवल उनके परिवार तक सीमित नहीं थी। गांव की चौपालों से लेकर सामाजिक आयोजनों तक उनकी उपस्थिति एक मार्गदर्शक की तरह महसूस की जाती थी। सिर पर टोपी, धोती-कुर्ता और हाथ में बेंत लिए उनकी पहचान दूर-दूर तक थी। लोग उन्हें सम्मान से सुनते थे और उनकी सलाह को महत्व देते थे। उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि नई पीढ़ी भी उनसे जुड़ाव महसूस करती थी।
वर्ष 1932 में जन्मे ठाकुर गुलाब सिंह बौहरे ने उस दौर को देखा था जब ग्रामीण जीवन आज की तरह सुविधाओं से सम्पन्न नहीं था। उस समय खेती ही जीवन का मुख्य आधार थी और उत्पादन भी सीमित हुआ करता था। अनेक परिवार आर्थिक तंगी में जीवन यापन करते थे। ऐसे कठिन समय में उन्होंने जरूरतमंदों की सहायता को अपना सामाजिक दायित्व माना। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि उन्होंने कभी किसी जरूरतमंद को खाली हाथ नहीं लौटाया। आर्थिक सहायता हो, सामाजिक सहयोग हो या किसी विवाद का समाधान, वे हमेशा आगे बढ़कर लोगों की मदद करते थे।
समाजसेवी बुजुर्ग की विरासत का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनका स्वाभिमान और अन्याय के प्रति विरोध भी था। स्थानीय लोगों के अनुसार जिस समय क्षेत्र में अंग्रेजी शासन का प्रभाव था और आसपास अंग्रेजी सेना की गतिविधियां बढ़ रही थीं, उस दौर में भी उन्होंने ग्रामीण हितों की आवाज बुलंद की। ग्रामीणों की स्मृतियों और स्थानीय जनश्रुतियों में आज भी यह चर्चा होती है कि उन्होंने अपने क्षेत्र और गांव के हितों की रक्षा के लिए प्रभावशाली प्रतिरोध दर्ज कराया था। यही कारण है कि उन्हें केवल समाजसेवी ही नहीं, बल्कि स्वाभिमान और जनहित के प्रतीक के रूप में भी याद किया जाता है।
उनके पिता नारायण सिंह भी क्षेत्र में प्रतिष्ठित बोहरे माने जाते थे। उस समय ‘बोहरे’ उपाधि केवल एक नाम नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती थी। ठाकुर गुलाब सिंह ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया और अपने कार्यों से समाज में सम्मान अर्जित किया। लंबे समय तक बोहरगत से जुड़े कार्यों ने उन्हें एक अलग पहचान प्रदान की। क्षेत्र के अनेक लोग आज भी उनके व्यवहार, निर्णय क्षमता और सामाजिक सक्रियता के उदाहरण देते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने कभी सामाजिक भेदभाव को महत्व नहीं दिया। उनके लिए गांव का हर व्यक्ति समान था। किसी के घर दुख हो या सुख, वे सबसे पहले पहुंचने वालों में शामिल रहते थे। यही कारण है कि उनके निधन की खबर फैलते ही क्षेत्र के विभिन्न गांवों से लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचे। अंतिम दर्शन के दौरान लोगों की आंखों में नमी और चेहरे पर सम्मान स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
समाजसेवी बुजुर्ग की विरासत केवल उनके कार्यों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने परिवार को भी मजबूत सामाजिक मूल्यों की सीख दी। अपने जीवनकाल में उन्होंने पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र तक का स्नेह प्राप्त किया। चार पीढ़ियों को एक साथ देखने का सौभाग्य बहुत कम लोगों को मिलता है। परिवार के सदस्यों का कहना है कि उन्होंने हमेशा एकता, परिश्रम और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश दिया।
गांव के लोगों के लिए उनका घर किसी औपचारिक भवन से अधिक एक सामाजिक केंद्र की तरह था। यहां आने वाला व्यक्ति केवल अतिथि नहीं होता था, बल्कि परिवार का सदस्य माना जाता था। अनेक ग्रामीण बताते हैं कि जब भी गांव में कोई सामाजिक या पारिवारिक समस्या आती थी, तो लोग सबसे पहले उनसे सलाह लेने पहुंचते थे। उनकी बातों में अनुभव की गहराई और व्यवहार में अपनापन होता था।
उनके निधन के साथ गांव की सबसे वरिष्ठ पीढ़ी का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी समाप्त हो गया है। आधुनिकता और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच ऐसे लोग अब बहुत कम बचे हैं, जिन्होंने इतिहास को अपनी आंखों से देखा हो और समाज को अपने हाथों से गढ़ा हो। यही कारण है कि लोग उनके जाने को केवल व्यक्तिगत क्षति नहीं, बल्कि सामाजिक क्षति मान रहे हैं।
श्रद्धांजलि देने उमड़ा जनसमूह
वरिष्ठ समाजसेवी के निधन पर राष्ट्रीय क्षत्रिय महासेना के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने विशेष रूप से शोक व्यक्त किया। संगठन के पदाधिकारियों ने मुंडन कराकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। महासेना के कोषाध्यक्ष ठाकुर के.के. सिंह ने कहा कि ठाकुर गुलाब सिंह बौहरे अपने समय के दूरदर्शी, सामाजिक चेतना से संपन्न और जनहित के लिए समर्पित व्यक्तित्व थे। उनके निधन से समाज को अपूरणीय क्षति हुई है।
श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में गौरव तरकर, दीपक सिंह, निरंजन सिंह, गिर्राज सिंह, राजकुमार सिंह प्रधान, लाल सिंह, सुरवीर सिंह एडवोकेट, पोहप सिंह, बनवारी लाल प्रधान, शक्तिपाल सिंह, प्रदीप सिंह, राजवीर सिंह, हरेंद्र सिंह, धर्मवीर सिंह, श्याम सिंह, हरिओम सिंह प्रधान, राहुल, महिपाल सिंह, पप्पू, उत्तम सिंह, राजा चौधरी, इंद्रपाल सिंह, सुरेंद्र सिंह सिसोदिया, प्रमोद सिंह, तनुज सिंह, कृष्ण मुरारी उर्फ भोपा, पंकज ठाकुर, आदित्य ठाकुर, गोविंद सिंह, अशोक सिंह ठाकरेला, अरुण सिंह चौहान, राजपाल सिंह उर्फ कलुआ सहित सैकड़ों लोग शामिल रहे।
ठाकुर गुलाब सिंह बौहरे आज भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन समाजसेवी बुजुर्ग की विरासत आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करती रहेगी। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके पद, संपत्ति या प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि समाज के प्रति उसके योगदान और लोगों के दिलों में छोड़ी गई छाप से बनती है।













