लेखक अनिल अनूप
प्रस्तुति अंजनी कुमार त्रिपाठी
गीत को केवल गीत की तरह सुनना और गीत को साहित्य की तरह पढ़ना—इन दोनों में उतना ही अंतर है जितना किसी नदी को किनारे बैठकर देखना और उसमें उतरकर उसकी धारा को महसूस करना। लोकप्रिय गीतों की दुनिया में यह अंतर और भी दिलचस्प हो जाता है, क्योंकि वहाँ साहित्य किसी गंभीर पुस्तकालय में चश्मा लगाए बैठा नहीं मिलता; वह कभी चौपाल पर ठहाका लगाता है, कभी मेले में नाचता है, कभी विरह में रोता है और कभी प्रेमिका की एक झिड़की में पूरा प्रेमशास्त्र समेट देता है।
भोजपुरी गीत इसी जीवंत परंपरा का हिस्सा हैं।
आज की “गीतों की साहित्यिक यात्रा” में हम ऐसे ही एक गीत के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं, जिसकी पहली ही पुकार अपने भीतर शरारत, प्रेम और संकोच का त्रिकोण खड़ा कर देती है—“राजा रंगबाज़, हमरा लाज लागे।”
यह गीत “रंगबाज़” के नाम से खेसारी लाल यादव और शिल्पी राज की आवाज़ में सामने आया। उपलब्ध संगीत-सूचनाओं के अनुसार इसके गीतकार कृष्णा बेदर्दी, संगीतकार आर्या शर्मा हैं और इसमें प्रियंका राय भी फीचरिंग कलाकार के रूप में दिखाई देती हैं। गीत 12 दिसंबर 2025 को Khesari Music World के बैनर से रिलीज हुआ।
लेकिन आज हमारा उद्देश्य इसके रिलीज, व्यूज या लोकप्रियता की गिनती करना नहीं है। सवाल कुछ और है—
क्या एक चुलबुला भोजपुरी प्रेमगीत भी साहित्य की सामग्री बन सकता है? मेरा उत्तर है—क्यों नहीं? बशर्ते हम साहित्य को केवल गंभीर चेहरे, भारी-भरकम शब्दों और दुखी कवियों की संपत्ति न मानें।
भोजपुरी की असली ताकत : बोलचाल में कविता
भोजपुरी भाषा की सबसे बड़ी विशेषताओं में एक है—उसकी बोलचाल की काव्यात्मकता।
भोजपुरी में प्रेम के लिए अलग से शब्दकोश खोलने की जरूरत नहीं पड़ती। बातचीत ही कविता बन जाती है। संबोधन में आत्मीयता है, उलाहने में मिठास है, मना करने में आकर्षण है और मजाक में भी रिश्ते की गरमाहट बची रहती है।
“राजा”, “पिया”, “हो”, “हमरा”, “तोहरा”—ये शब्द केवल व्याकरणिक इकाइयाँ नहीं हैं। ये रिश्ते की दूरी और निकटता दोनों को व्यक्त करते हैं। हिंदी में कोई कह सकता है—“मुझे शर्म आती है।” लेकिन भोजपुरी का वही भाव जब “हमरा लाज लागे” बनता है, तो उसमें एक अतिरिक्त घरेलापन पैदा हो जाता है।
यहाँ “लाज” केवल सामाजिक संकोच नहीं है। यह प्रेम की भाषा भी है। यही इस गीत की पहली साहित्यिक उपलब्धि है।
“लाज” : संकोच भी, संवाद भी
भारतीय काव्य परंपरा में लज्जा का अपना लंबा इतिहास है। संस्कृत काव्य से लेकर लोकगीतों तक नायिका की लाज प्रेम के सबसे पुराने और सबसे प्रभावी भावों में रही है। लेकिन लोकगीतों की नायिका की लाज हमेशा निष्क्रिय नहीं होती।
वह कभी आँखें झुका देती है, कभी सखी से शिकायत करती है, कभी प्रियतम को रोकती है और कभी उसी रोकने में प्रेम का संकेत दे देती है।
“राजा रंगबाज़, हमरा लाज लागे” इसी परंपरा की आधुनिक, शहरी और चुलबुली प्रतिध्वनि की तरह पढ़ा जा सकता है। यहाँ लाज दीवार नहीं है। लाज संवाद का बहाना है। और यही वह बिंदु है जहाँ यह गीत महज छेड़छाड़ वाले मनोरंजन से थोड़ा ऊपर उठकर लोक-संवाद की एक परिचित संरचना में प्रवेश करता है।
एक पक्ष आगे बढ़ता है। दूसरा पक्ष कहता है—रुकिए! पहला पक्ष शायद मुस्कराता है। दूसरा फिर कहता है—इतना भी मत बढ़िए! और इसी “रुको-रुको” में गीत आगे बढ़ता रहता है।
यानी गीत का कथानक किसी बड़े सामाजिक संघर्ष पर नहीं, बल्कि नोकझोंक पर चलता है। भोजपुरी लोकसंस्कृति में यही नोकझोंक प्रेम की अपनी एक स्वतंत्र व्याकरण रचती है।
“रंगबाज़” शब्द का साहित्यिक खेल
अब आते हैं गीत के दूसरे महत्वपूर्ण शब्द पर—“रंगबाज़”। सामान्य बोलचाल में रंगबाज़ का अर्थ ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो अपने अंदाज, तेवर या शरारती व्यक्तित्व के कारण ध्यान खींचता है। गीतकार ने इसी शब्द को प्रेम-संवाद का विशेषण बना दिया। यहाँ “रंगबाज़” कोई दार्शनिक शब्द नहीं है। लेकिन इसकी ध्वनि में व्यक्तित्व है। “राजा” के साथ जुड़कर यह शब्द एक चुलबुला चरित्र बना देता है।
राजा भी और रंगबाज़ भी! अर्थात प्रेमी केवल प्रेमी नहीं रहा; वह अपने अंदाज का प्रदर्शन करने वाला पात्र बन गया। और प्रेमिका? वह केवल शर्माने वाली नायिका नहीं है। वह उस “रंगबाज़ी” पर टिप्पणी भी कर रही है। यहीं गीत में हास्य पैदा होता है।
प्रेम में हास्य क्यों जरूरी है?
हमने प्रेम पर हजारों गंभीर कविताएँ पढ़ी हैं। विरह पर आँसू बहाए हैं। प्रतीक्षा पर कविताएँ लिखी गई हैं। मिलन पर शास्त्रीय काव्य रचा गया है। लेकिन प्रेम का एक दूसरा चेहरा भी है—हँसी।
प्रेमी-प्रेमिका का रिश्ता केवल त्याग, विरह और समर्पण से नहीं बनता। उसमें मजाक भी है, छेड़छाड़ भी है, बनावटी नाराजगी भी है और एक-दूसरे को चिढ़ाने का आनंद भी है।
भोजपुरी गीत इस हिस्से को छिपाता नहीं। वह प्रेम को गंभीर बैठक में बैठाकर बयान नहीं करता। वह प्रेम को हँसते हुए बोलता है। “रंगबाज़” की यही चुलबुली प्रकृति उसकी लोकप्रियता की एक वजह समझी जा सकती है। समकालीन रिपोर्टों में भी गीत की धुन, ऊर्जा और खेसारी लाल यादव-शिल्पी राज की गायकी की केमिस्ट्री को दर्शकों की पसंद से जोड़ा गया है।
भोजपुरी गीत में स्त्री-स्वर की भूमिका
इस गीत को केवल पुरुष की दृष्टि से पढ़ना अधूरा होगा। इसकी संरचना में महिला स्वर बहुत महत्वपूर्ण है। वह प्रेमी की हरकतों पर प्रतिक्रिया देती है। वह संकोच व्यक्त करती है। वह रोकती है। वह अपनी सीमा का संकेत देती है। और यही संवाद गीत को एकतरफा प्रेम-प्रदर्शन बनने से रोकता है। लोकगीतों में स्त्री-स्वर का यह पक्ष बहुत पुराना है।
सोहर हो, कजरी हो, चैता हो, विवाह गीत हो या सावन की रचना—स्त्री केवल विषय नहीं रही; वह गाने वाली आवाज़ भी रही है। भोजपुरी की स्त्रियों ने लोकगीतों में अपनी इच्छाएँ, शिकायतें, घरेलू अनुभव और प्रेम की आकांक्षाएँ खूब व्यक्त की हैं।
इस दृष्टि से “हमरा लाज लागे” जैसी पंक्ति को केवल शर्म की अभिव्यक्ति मानना पर्याप्त नहीं है। यह अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाली आवाज़ भी है।
हाँ, आधुनिक गीतों की प्रस्तुति में यह भी जरूरी है कि चुलबुलापन और सहमति के बीच की रेखा को समझा जाए। साहित्यिक आलोचना का काम गीत को नैतिक पुलिसिंग के डंडे से पीटना नहीं, बल्कि उसके संवाद, संकेत और सांस्कृतिक अर्थों को समझना है।
“छोड़” का बार-बार लौटना : ध्वनि का खेल
गीत की संरचना में एक शब्द बार-बार लौटता है—“छोड़”। काव्यशास्त्र की भाषा में पुनरावृत्ति केवल शब्द दोहराना नहीं होती। यह लय बनाती है। यह भाव को तीव्र करती है। यह श्रोता को मुखड़े से जोड़ती है।
लोकगीतों में दोहराव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि गीत केवल पढ़ा नहीं जाता—गाया और सामूहिक रूप से याद किया जाता है। एक अच्छा लोकधर्मी मुखड़ा वही होता है जिसे श्रोता दूसरी बार सुनते-सुनते खुद गुनगुनाने लगे। यही कारण है कि भोजपुरी गीतों में छोटे, ध्वन्यात्मक और बार-बार लौटने वाले वाक्यांश इतनी ताकत रखते हैं।
“राजा रंगबाज़” का मुखड़ा इसी स्मृति-विज्ञान पर काम करता है। शब्द कम। लय स्पष्ट। भाव तुरंत समझ में आने वाला। और सबसे बड़ी बात—सुनते ही दोहराने योग्य। यही लोकप्रिय गीत की शिल्पगत सफलता है।
देहभाषा और लोकभाषा
गीत में श्रृंगार का तत्व स्पष्ट है।लेकिन श्रृंगार साहित्य में कोई नई चीज नहीं। संस्कृत साहित्य का श्रृंगार रस, हिंदी रीतिकाल, लोकगीतों की प्रणय-परंपरा—सबमें देह, सौंदर्य, आकर्षण और मिलन की कल्पनाएँ मौजूद रही हैं।
अंतर केवल अभिव्यक्ति के माध्यम का है। शास्त्रीय कवि उपमा खोजता था। लोकगीतकार सीधे दृश्य बना देता है। आधुनिक भोजपुरी गीतकार दृश्य को संवाद में बदल देता है। यही परिवर्तन “रंगबाज़” में दिखाई देता है।
यह गीत फूलों और चाँद की लंबी उपमाएँ नहीं गढ़ता। यह प्रेम को बातचीत की चंचलता में पकड़ता है। यह आधुनिकता का अपना सौंदर्यशास्त्र है।
“लाज” बनाम “बिंदासपन”
गीत का सबसे रोचक अंतर्विरोध शायद यही है— एक ओर लाज। दूसरी ओर रंगबाज़ी। एक ओर रोकना। दूसरी ओर आगे बढ़ना। एक ओर संकोच। दूसरी ओर आत्मविश्वास। यही द्वंद्व गीत में ऊर्जा पैदा करता है। यदि दोनों पात्र शुरू से ही एकमत होते, तो गीत में नोकझोंक कहाँ से आती?
लोकप्रिय गीतों में कथा कई बार इसी छोटे-से तनाव से पैदा होती है। ना और हाँ के बीच का क्षेत्र ही गीत का खेल बन जाता है। यही कारण है कि चुलबुला प्रेमगीत भी अपने भीतर एक छोटा-सा नाट्य रच सकता है।
गीतकार कृष्णा बेदर्दी की भाषा-चाल
उपलब्ध क्रेडिट के अनुसार इस गीत के बोल कृष्णा बेदर्दी ने लिखे हैं। गीत की भाषा देखकर स्पष्ट होता है कि लक्ष्य कठिन साहित्यिक शब्दावली नहीं, बल्कि तत्काल ग्रहणीय भोजपुरी मुहावरा है। यहाँ भाषा का मूल्य उसकी दुर्लभता में नहीं, उसकी जीवंतता में है। “हमरा”, “तोहरा”, “पिया”, “राजा”, “लाज”—ये शब्द किसी शब्दकोश के प्रदर्शन के लिए नहीं आए। वे सीधे श्रोता की स्मृति में प्रवेश करते हैं। यही लोकभाषा का लोकतंत्र है। जिस भाषा को विश्वविद्यालय का आलोचक कभी-कभी “बोलचाल” कहकर किनारे कर देता है, वही भाषा लाखों लोगों के बीच गीत बनकर जीवित रहती है।
आर्या शर्मा का संगीत और शब्दों की चाल
उपलब्ध स्रोतों में संगीत का श्रेय आर्या शर्मा को दिया गया है। इस प्रकार के गीत में संगीत केवल शब्दों का सहायक नहीं होता। वह शब्दों के अर्थ को शरीर देता है। “रंगबाज़” जैसे शब्द को यदि गंभीर धीमी धुन में गाया जाए तो उसका पूरा चरित्र बदल जाएगा।
लेकिन चंचल लय में वही शब्द शरारती बन जाता है। यही संगीत और भाषा का गठजोड़ है। गीतकार शब्द देता है। गायक आवाज़ देता है। संगीतकार गति देता है। और श्रोता उसे अपनी स्मृति में जगह देता है। तभी गीत जीवन पाता है।
खेसारी लाल यादव और शिल्पी राज : दो आवाज़ों का संवाद
इस गीत की एक विशेषता इसकी द्विस्वरीय संरचना है। खेसारी लाल यादव की आवाज़ में भोजपुरी लोकप्रिय संगीत की वह परिचित ऊर्जा है, जिसमें अभिनय और गायकी के बीच की सीमा अक्सर मिट जाती है।
शिल्पी राज की आवाज़ संवाद को दूसरा पक्ष देती है। इससे गीत केवल एक व्यक्ति का प्रदर्शन नहीं रह जाता। यह संवादी गीत बन जाता है। और संवाद जितना जीवंत होगा, चुलबुलापन उतना ही स्वाभाविक लगेगा। उपलब्ध विवरण भी दोनों को मुख्य गायकों के रूप में दर्ज करते हैं।
लोकप्रियता बनाम साहित्य : क्या दोनों साथ चल सकते हैं?
यह प्रश्न जरूरी है। हमारे यहाँ अक्सर लोकप्रियता और साहित्य को दो अलग-अलग डिब्बों में रख दिया जाता है। जो करोड़ों लोग सुनें, उसे मनोरंजन। जो कम लोग पढ़ें, उसे साहित्य। यह विभाजन हमेशा सही नहीं।
लोकगीत साहित्य हैं। लोककथा साहित्य है। कबीर की साखियाँ पहले जनता के बीच थीं, पुस्तकालयों में बाद में पहुँचीं। तुलसीदास का काव्य भी जनता के कंठ से होकर घर-घर पहुँचा।
इसलिए किसी गीत का लोकप्रिय होना अपने आप में उसकी साहित्यिक श्रेष्ठता का प्रमाण तो नहीं है, लेकिन लोकप्रियता उसे साहित्यिक अध्ययन से बाहर भी नहीं कर देती। “रंगबाज़” को महान काव्य घोषित करना अतिशयोक्ति होगी। लेकिन इसे समकालीन भोजपुरी लोकप्रिय गीत-संस्कृति के एक दस्तावेज की तरह पढ़ना बिल्कुल उचित है।
यह गीत हमें आज के भोजपुरी समाज के बारे में क्या बताता है?
यह गीत प्रेम को किसी पुराने, आदर्शीकृत संसार में नहीं रखता। यह आधुनिक सज्जा, आकर्षण, फैशन, रोमांस और सार्वजनिक प्रदर्शन की दुनिया में आता है। इसमें प्रेम निजी भी है और प्रदर्शनकारी भी। यही डिजिटल युग की प्रेम-संस्कृति है।
आज गीत केवल गाँव के चौक पर नहीं बजता। वह मोबाइल स्क्रीन पर आता है। छोटे वीडियो में कटता है। रील में दोहराया जाता है। और मुखड़े का एक हिस्सा पूरे गीत से अधिक प्रसिद्ध हो सकता है। इस नई परिस्थिति ने गीतकार की प्राथमिकताएँ भी बदल दी हैं।
अब पहली पंक्ति को ही श्रोता को पकड़ना पड़ता है। “राजा रंगबाज़, हमरा लाज लागे”—इस दृष्टि से अत्यंत प्रभावी हुकलाइन है। इसमें संबोधन है। चरित्र है। भाव है। और हास्य की संभावना भी।
लेकिन साहित्यिक दृष्टि से सावधानी भी जरूरी
किसी गीत की लोकप्रियता के साथ आलोचनात्मक विवेक समाप्त नहीं होना चाहिए। भोजपुरी गीतों की दुनिया में एक लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि मनोरंजन के नाम पर भाषा कितनी दूर जा सकती है।
यह बहस महत्वपूर्ण है। लोकप्रियता के लिए देह और उत्तेजना का प्रयोग नया नहीं, लेकिन आधुनिक डिजिटल माध्यम उसे बहुत तेजी से लाखों लोगों तक पहुँचा देता है। इसलिए गीत को पढ़ते समय दो बातें साथ रखनी चाहिए— पहली, लोकभाषा की स्वतंत्र अभिव्यक्ति। दूसरी, प्रस्तुति की सामाजिक जिम्मेदारी।
“राजा रंगबाज़, हमरा लाज लागे” को साहित्यिक नजर से देखने का अर्थ यह नहीं कि उसकी हर पंक्ति को आदर्श घोषित कर दिया जाए। बल्कि इसका अर्थ है—हम समझें कि वह किस तरह हास्य, श्रृंगार, संवाद और लय से अपना प्रभाव बनाता है। यही आलोचनात्मक साहित्य-दृष्टि है।
भोजपुरी गीत : गाँव से ग्लोबल स्क्रीन तक
भोजपुरी भाषा का भूगोल उसके गीतों से कहीं बड़ा है। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड के कुछ हिस्सों से लेकर देश के महानगरों और प्रवासी समाज तक भोजपुरी बोलने-सुनने वालों की दुनिया फैली हुई है।
गीत इस सांस्कृतिक भूगोल को जोड़ते हैं। आज एक भोजपुरी गीत गाँव के विवाह समारोह में भी सुनाई दे सकता है और किसी महानगर के मोबाइल फोन पर भी। यही कारण है कि भोजपुरी लोकप्रिय संगीत को केवल “गाँव का मनोरंजन” कह देना उसके वर्तमान स्वरूप को छोटा कर देना है।
यह अब डिजिटल लोक-संस्कृति है। “रंगबाज़” इसी बदलती हुई संस्कृति का एक उदाहरण है।
अंततः “लाज” ही क्यों याद रह जाती है?
गीत का सबसे सुंदर साहित्यिक विरोधाभास यही है कि उसका नाम “रंगबाज़” है, लेकिन श्रोता को बार-बार याद रहता है—“लाज लागे।” यानी रंगबाज़ी के बीच लाज। शरारत के बीच संकोच। प्रेम के बीच नोकझोंक। और आधुनिकता के बीच लोकभाषा। शायद यही भोजपुरी गीत की असली ताकत है। वह प्रेम को बहुत बड़ा दार्शनिक प्रश्न बनाकर सामने नहीं रखता।
वह बस इतना कहता है— तुम अपनी अदा में रंगबाज़ बने रहो, मगर मेरी लाज का भी थोड़ा खयाल रखो! और यही बात जब भोजपुरी में कही जाती है तो उसमें किताब से ज्यादा जीवन की आवाज़ सुनाई देती है।
गीत की साहित्यिक यात्रा का पड़ाव
“राजा रंगबाज़, हमरा लाज लागे” को हम प्रेम का महाकाव्य नहीं कहेंगे। न ही इसे किसी शास्त्रीय काव्य-परंपरा की ऊँचाई पर रखेंगे। लेकिन यह गीत एक जरूरी चीज जरूर करता है— यह भोजपुरी की जीवंत बोलचाल को आधुनिक लोकप्रिय संगीत में साहित्यिक अध्ययन योग्य सामग्री बना देता है।
इसमें भाषा है। लोक-स्मृति है। श्रृंगार है। हास्य है। संवाद है। स्त्री-स्वर है। पुनरावृत्ति की लय है। और सबसे बढ़कर—वह चंचलता है जिसके बिना लोकगीत का जीवन अधूरा है। इसलिए आज की यात्रा का निष्कर्ष बहुत गंभीर भी है और थोड़ा शरारती भी— भोजपुरी गीत में प्रेम जब बहुत गंभीर होने लगता है, तो कोई न कोई “राजा रंगबाज़” आकर उसे हँसा देता है; और जब रंगबाज़ी हद पार करने लगती है, तो भोजपुरी की नायिका आँखें दिखाकर कह देती है—“हमरा लाज लागे!”
यही लाज गीत को केवल देह का नहीं, संवाद का गीत बनाती है। और शायद यही लोकभाषा की सबसे बड़ी खूबसूरती है— वह प्रेम को संस्कार भी देती है और मुस्कराहट भी।
























