17 अक्टूबर 2026 11:52 अपराह्न

योगी हैं तो मुमकिन है! अफसर का बंगला चपरासी को कैसे मिला? कानपुर नगर निगम की जांच में खुलते जा रहे भ्रष्टाचार के राज

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कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट

कानपुर नगर निगम में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर चल रही जांच के बीच एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में सामने आया है कि अधिकारियों के लिए निर्धारित नगर निगम का बंगला नंबर एक एक चपरासी को आवंटित कर दिया गया। हैरानी की बात यह है कि संबंधित कर्मचारी पिछले करीब तीन वर्षों से इस बंगले में रह रहा बताया जा रहा है।

मामला सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस आवास को प्रथम श्रेणी अथवा राजपत्रित अधिकारियों के लिए निर्धारित बताया जा रहा है, वह एक चपरासी के नाम कैसे आवंटित हो गया? इस दौरान नगर निगम में मेयर के साथ तीन नगर आयुक्त भी जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। ऐसे में आवास आवंटन की प्रक्रिया, संबंधित फाइलों और निर्णय लेने वाले अधिकारियों की भूमिका अब जांच के दायरे में है।

चपरासी को अफसरों वाला बंगला मिलने से उठे बड़े सवाल

पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल के मुताबिक, नगर निगम के चपरासी विनोद रावत को गोविंदनगर स्थित जागेश्वर अस्पताल परिसर में नगर निगम के बंगला नंबर एक का आवंटन किया गया था। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस आवंटन की अनुमति किस स्तर पर दी गई और इसके पीछे किन अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका रही।

बताया गया है कि जागेश्वर अस्पताल परिसर में नगर निगम का जोनल कार्यालय भी संचालित होता है। इसी परिसर के एक हिस्से में लगभग डेढ़ एकड़ क्षेत्र में बना यह बंगला पहले नगर स्वास्थ्य अधिकारी के पद पर रहे डॉ. आरके सिंह को आवंटित था। डॉ. आरके सिंह बाद में मुख्य चिकित्सा अधिकारी भी रहे।

यही वजह है कि पुराने आवंटन से लेकर नए आवंटन तक की पूरी प्रक्रिया अब जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है। जांच में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है कि बंगला कब खाली हुआ, उसके बाद किस आधार पर आवंटन किया गया और आवंटन से जुड़ी फाइलों में किस अधिकारी ने क्या आदेश दिया।

तीन साल पहले भी हुई थी शिकायत, जांच पर उठे सवाल

सूत्रों के अनुसार, वाहन चालक संघ के संस्थापक एवं प्रदेश अध्यक्ष बताए जाने वाले विनोद को बंगला आवंटित किए जाने को लेकर करीब तीन वर्ष पहले शिकायत की गई थी। शिकायत के बाद तत्कालीन अपर नगर आयुक्त प्रतिपाल सिंह को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

इसके लिए तीन सदस्यीय जांच समिति भी बनाई गई थी। हालांकि आरोप है कि उस समय जांच प्रभावी तरीके से आगे नहीं बढ़ी और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। अब नगर निगम में भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों की व्यापक जांच शुरू होने के बाद पुराना मामला फिर चर्चा में आ गया है।

जांच एजेंसियों की निगाह अब इस बात पर है कि पहले की जांच में क्या निष्कर्ष निकाला गया था, किन दस्तावेजों का परीक्षण किया गया और आखिर वह जांच किसी ठोस कार्रवाई तक क्यों नहीं पहुंच सकी।

बंगले की सजावट पर 20 लाख रुपये खर्च होने का दावा

जांच के दौरान एक और गंभीर बिंदु सामने आया है। सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि विनोद को बंगला आवंटित किए जाने के बाद उसकी सजावट और अन्य कार्यों पर नगर निगम की ओर से करीब 20 लाख रुपये खर्च किए गए।

यदि जांच में यह खर्च सरकारी धन से होने की पुष्टि होती है तो यह भी जांच का महत्वपूर्ण विषय होगा कि इतनी बड़ी राशि किस स्वीकृति के आधार पर खर्च की गई। काम किस मद से कराया गया, किस एजेंसी या फर्म को भुगतान किया गया और भुगतान से संबंधित फाइलों में क्या प्रक्रिया अपनाई गई—इन सभी सवालों के जवाब जांच में तलाशे जा रहे हैं।

पुलिस कमिश्नर के अनुसार, चपरासी को अधिकारियों के लिए निर्धारित बंगला आवंटित होने का मामला भी विशेष जांच टीम की पड़ताल में शामिल है। उनका कहना है कि आवंटन कैसे हुआ और इसके पीछे कौन लोग जिम्मेदार हैं, इसकी जांच की जा रही है। जांच के बाद संबंधित लोगों की भूमिका सामने आने की उम्मीद है।

दागी अफसरों और कर्मचारियों पर विजिलेंस जांच की तैयारी

नगर निगम में भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों की जांच का दायरा अब बढ़ता दिखाई दे रहा है। पुलिस को मिली शिकायतों की प्राथमिक जांच में कथित अनियमितताओं से जुड़े कई तथ्य सामने आने के बाद कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ विजिलेंस जांच की संस्तुति शासन को भेजे जाने की बात सामने आई है।

पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल के अनुसार, नगर निगम के कुछ इंजीनियरों समेत अन्य अधिकारियों के नाम जांच में सामने आ रहे हैं। इन अधिकारियों की भूमिका की विस्तृत जांच के लिए विजिलेंस को मामला भेजने की तैयारी है।

विजिलेंस जांच में केवल सरकारी कामकाज से जुड़ी अनियमितताओं को ही नहीं, बल्कि संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की चल-अचल संपत्तियों की भी पड़ताल किए जाने की संभावना है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि कथित भ्रष्टाचार से किसी को आर्थिक लाभ हुआ या नहीं।

हालांकि, किसी अधिकारी या कर्मचारी की दोषसिद्धि जांच पूरी होने और सक्षम कानूनी प्रक्रिया के बाद ही मानी जा सकती है।

टेंडर रैकेट और मुकदमे की धमकी के आरोपों की भी जांच

नगर निगम से जुड़ी एक शिकायत में एक पार्षद पर गंभीर आरोप लगाए जाने की बात भी सामने आई है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि कथित टेंडर रैकेट में शामिल नहीं होने वाले लोगों पर दबाव बनाने के लिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दी जाती थी।

शिकायत के मुताबिक, पहले संबंधित पार्षद का नाम लेकर डराने का आरोप है और कथित तौर पर बात नहीं मानने पर मुकदमा दर्ज कराने की बात कही गई। पुलिस अब शिकायत में लगाए गए इन आरोपों की भी जांच कर रही है।

इसके अलावा नगर निगम में सफाई तथा अन्य कार्यों के लिए खरीदी गई मशीनों के उपयोग पर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायत में दावा किया गया है कि कुछ मशीनों का इस्तेमाल ही नहीं हुआ। खेल सामग्री की खरीद के बाद उसके गायब होने का आरोप भी जांच के दायरे में बताया जा रहा है।

चपरासी से ड्राइवर पद पर पदोन्नति का मामला भी विवादों में

विनोद कुमार से जुड़ा एक अन्य मामला भी जांच में सामने आया है। बताया गया है कि कुछ वर्ष पहले उन्हें चपरासी के पद से ड्राइवर के पद पर पदोन्नत करने का प्रस्ताव तैयार किया गया था।

हालांकि तत्कालीन नगर आयुक्त की ओर से नियमित पदोन्नति नहीं की गई, बल्कि उन्हें ड्राइवर पदनाम दिए जाने की बात सामने आई है। साथ ही यह शर्त रखी गई थी कि इस पदनाम के आधार पर उन्हें पदोन्नति से संबंधित वित्तीय लाभ नहीं मिलेगा और वे इस आधार पर वेतन वृद्धि अथवा अन्य लाभ के लिए अदालत का रुख नहीं कर सकेंगे।

इसके बाद विनोद कुमार ने हाईकोर्ट की शरण ली, लेकिन उनकी पदोन्नति से संबंधित याचिका खारिज हो गई। इसके बाद उन्हें चपरासी के पद पर वापस कर दिया गया।

जांच में यह तथ्य भी सामने आया है कि विनोद कुमार के नाम पर अभी भी एक जेसीबी और फॉगिंग मशीन आवंटित होने की बात कही जा रही है। अब इन परिसंपत्तियों के आवंटन और इस्तेमाल से संबंधित रिकॉर्ड भी जांचे जाने की संभावना है।

तीन नगर निगम कर्मचारियों से एसआईटी ने की पूछताछ

नगर निगम में कथित टेंडर अनियमितताओं की जांच कर रही एसआईटी ने शनिवार को तीन कर्मचारियों को पूछताछ के लिए बुलाया। इनमें संजय कटियार, कमरूद्दीन और रफजुल रहमान के बयान दर्ज किए गए।

पूछताछ के दौरान टेंडर प्रक्रिया, संबंधित फर्मों से संबंध, फाइलों में कथित गड़बड़ी, कमीशन के आरोप, अधिकारियों और कर्मचारियों से जुड़ी फर्मों, संविदा कर्मचारियों की भर्ती, खातों में कथित हेराफेरी और स्टोर में रखे सामान से संबंधित सवाल पूछे गए।

बताया गया है कि कर्मचारियों ने पूछताछ के दौरान टेंडर अथवा संबंधित मामलों में अपनी भूमिका से इनकार किया और कहा कि उनका इन प्रकरणों से कोई संबंध नहीं है। अब एसआईटी उनके बयानों का दस्तावेजों और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों से मिलान करेगी।

छह फर्मों से जुड़े टेंडरों की करीब 2000 पन्नों की कॉपी

जांच को आगे बढ़ाने के लिए एसआईटी ने एफआईआर से सीधे जुड़े टेंडरों की फाइलों की फोटो कॉपी भी मांगी है। बताया गया है कि छह फर्मों से जुड़े टेंडरों की फाइलों की प्रतियां तैयार करने में नगर निगम के अभियंत्रण विभाग के कर्मचारियों को पूरा दिन लग गया।

कई फाइलों में लगभग 200 पन्ने होने की वजह से दस्तावेजों की कॉपी तैयार करने में काफी समय लगा। सात फाइलों की प्रतियां तैयार करने में शाम तक का समय लगने की बात सामने आई है। एसआईटी ने सभी फोटो कॉपी पर संबंधित बाबुओं के हस्ताक्षर कराने के निर्देश दिए थे, ताकि उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों की प्रमाणिकता सुनिश्चित की जा सके।

इन दस्तावेजों में कुछ ठेकेदारों के पंजीकरण से संबंधित रिकॉर्ड भी शामिल बताए जा रहे हैं। अब एसआईटी इन फाइलों की जांच कर टेंडर प्रक्रिया में किसी तरह की अनियमितता, नियमों की अनदेखी या कथित वित्तीय गड़बड़ी के साक्ष्य तलाशेगी।

अब जांच के केंद्र में है बंगला नंबर एक

कानपुर नगर निगम में भ्रष्टाचार की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे पुराने फैसलों और आवंटनों पर भी सवाल उठ रहे हैं। अफसरों के लिए निर्धारित बताए जा रहे बंगले का चपरासी को आवंटन इसी कड़ी में सबसे चर्चित मामलों में शामिल हो गया है।

अब जांच का सबसे अहम सवाल यही है कि बंगला नंबर एक का आवंटन किस नियम के तहत हुआ, किस अधिकारी ने फाइल को मंजूरी दी और तीन साल पहले शिकायत आने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इसके साथ ही बंगले पर कथित रूप से खर्च किए गए 20 लाख रुपये, विनोद कुमार के पदनाम और सरकारी संसाधनों के आवंटन से जुड़े रिकॉर्ड भी जांच के महत्वपूर्ण बिंदु बन सकते हैं।

एसआईटी और संबंधित जांच एजेंसियां यदि दस्तावेजों के आधार पर इन सवालों के जवाब तक पहुंचती हैं तो नगर निगम में लंबे समय से चली आ रही कथित अनियमितताओं की परतें और खुल सकती हैं। फिलहाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले जांच के निष्कर्ष और कानूनी प्रक्रिया का इंतजार करना जरूरी है।

फोकस कीफ्रेज: कानपुर नगर निगम भ्रष्टाचार जांच

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मेटा डिस्क्रिप्शन: कानपुर नगर निगम की भ्रष्टाचार जांच में अधिकारियों के लिए निर्धारित बंगला चपरासी को आवंटित होने का मामला सामने आया है। एसआईटी और विजिलेंस जांच में टेंडर, संपत्ति और सरकारी खर्च से जुड़े कई सवालों की पड़ताल हो रही है।

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