17 अक्टूबर 2026 10:00 अपराह्न

हिमालय तबाही के कगार पर : घटती बर्फ, बढ़ती ग्लेशियल झीलें और नदी किनारे बसती आबादी को बड़ा खतरा

हिमालयी क्षेत्र में बाढ़ और भूस्खलन से तबाही का दृश्य, साथ में रिपोर्टर अंजनी कुमार त्रिपाठी

सुनने के लिए यहां क्लिक करें

The specified slider id does not exist.

अंजनी कुमार त्रिपाठी की रिपोर्ट

हिमालय को भारत और एशिया का जल-स्रोत कहा जाता है, लेकिन आज यही हिमालय तेजी से बढ़ते प्राकृतिक खतरों का केंद्र बनता जा रहा है। नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान हिमालय की बदलती भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों की ओर खींच दिया है। भोटेकोशी नदी और उसके आसपास के इलाकों में अचानक आई बाढ़ ने गांवों, सड़कों, पुलों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। शुरुआती रिपोर्टों के बाद मृतकों और लापता लोगों के आंकड़े लगातार बदल रहे हैं; ताजा रिपोर्टों में नेपाल और तिब्बत में मृतकों की संख्या 150 से अधिक बताई गई है और सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं।

यह घटना केवल एक अचानक आई बाढ़ की कहानी नहीं है। इसके पीछे हिमालय की बेहद अस्थिर भौगोलिक संरचना, तेजी से बदलता तापमान, ग्लेशियरों का पिघलना, हिमस्खलन, भूस्खलन, ग्लेशियल झीलों का बढ़ता खतरा और नदी घाटियों में तेजी से बढ़ता मानवीय दबाव जैसे कई कारक एक साथ काम कर रहे हैं।

नेपाल की तबाही ने फिर उठाया हिमालय की सुरक्षा का सवाल

नेपाल के रसुवा क्षेत्र में भोटेकोशी नदी का उफान इतना अचानक और शक्तिशाली था कि लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। तिमुरे और स्याफ्रुबेसी जैसे इलाकों में बाढ़ और मलबे ने भारी तबाही मचाई। पुल और सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं, मकान और अन्य निर्माण बह गए तथा कई इलाकों का संपर्क टूट गया।

वैज्ञानिक विश्लेषणों और उपलब्ध रिपोर्टों में इस आपदा को ऊपरी हिमालय में हुए भूस्खलन, हिम-पत्थर के मलबे और नदी तंत्र के अचानक अवरुद्ध होकर फिर टूटने जैसी प्रक्रियाओं से जोड़ा जा रहा है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक इस घटना के पीछे 4.4 तीव्रता के भूकंप के बाद हुए बड़े भूस्खलन की भूमिका की जांच की जा रही है। ल्हेंदे नदी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर भू-स्खलन के संकेत भी मिले हैं।

इसका अर्थ यह है कि हिमालय में बाढ़ का कारण हमेशा केवल भारी बारिश नहीं होता। कई बार पहाड़ों में जमा बर्फ, चट्टान और मलबा अचानक नदी का रास्ता रोक देते हैं। कुछ समय के लिए प्राकृतिक बांध बनता है और उसके पीछे पानी जमा होता रहता है। जैसे ही यह अस्थायी अवरोध टूटता है, पानी और मलबे की एक विशाल दीवार नीचे की ओर दौड़ पड़ती है।

धराली की घटना ने भारत को भी दिया था चेतावनी का संकेत

नेपाल की घटना को समझने के लिए उत्तराखंड के धराली की 5 अगस्त 2025 की आपदा को याद करना जरूरी है। उत्तरकाशी जिले के धराली और हर्षिल क्षेत्र में अचानक आई मलबे से भरी बाढ़ ने घरों, होटलों, सड़कों और पुलों को भारी नुकसान पहुंचाया था।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO के उपग्रह विश्लेषण में धराली में कheer Gad और भागीरथी नदी के संगम के आसपास लगभग 20 हेक्टेयर क्षेत्र में मलबे का विशाल जमाव पाया गया था। उपग्रह तस्वीरों में कई इमारतों के पूरी तरह या आंशिक रूप से मलबे में दबने के संकेत मिले।

बाद के वैज्ञानिक अध्ययन में इस घटना को कश्मीर से लेकर हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती जलवायु-जनित आपदा की व्यापक प्रवृत्ति से जोड़कर देखा गया। एक 2026 में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार धराली में मलबे का प्रवाह श्रीकंठ ग्लेशियर के नीचे स्थित अस्थिर मोरेन ढलान से बड़ी मात्रा में ढीली सामग्री को बहाकर लाया था। अध्ययन में लगभग 2.51 लाख टन मलबे और कई मीटर मोटी मलबा-परत के जमाव का अनुमान दिया गया।

इससे साफ होता है कि हिमालय में खतरा केवल नदी में बढ़ते पानी का नहीं है। खतरा उस पानी के साथ आने वाली चट्टानों, बर्फ, मिट्टी और मलबे का भी है।

हिमालय का भूगोल ही बनाता है आपदाओं को ज्यादा विनाशकारी

हिमालय दुनिया की युवा और सक्रिय पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल है। भारतीय प्लेट लगातार यूरेशियाई प्लेट की ओर बढ़ रही है और दोनों के बीच जारी भूगर्भीय गतिविधियां हिमालय को भूकंप, भूस्खलन और चट्टानों के टूटने के लिहाज से बेहद संवेदनशील बनाती हैं।

पहाड़ों की संकरी घाटियां इस खतरे को और बढ़ा देती हैं। जब ऊपरी क्षेत्र से अचानक बड़ी मात्रा में पानी और मलबा नीचे आता है तो उसके फैलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होती। पानी घाटी के संकरे हिस्से में एक तरह के ‘फनल’ की तरह तेजी से नीचे आता है।

समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब नदी के प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र में ही गांव, बाजार, होटल, सड़कें और अन्य निर्माण खड़े हो जाते हैं। आपदा आने पर पानी को अपना प्राकृतिक रास्ता चाहिए होता है, लेकिन रास्ते में मानव बस्तियां खड़ी मिलती हैं।

जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाया ग्लेशियरों का संकट

हिमालयी आपदाओं की बढ़ती तीव्रता को समझने में जलवायु परिवर्तन सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है। तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं और बर्फ के भंडार में कमी आ रही है।

अंतरराष्ट्रीय संस्था ICIMOD की 2026 की रिपोर्टों के मुताबिक हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की गति वर्ष 2000 के बाद लगभग दोगुनी हो चुकी है। 1990 से 2020 के बीच क्षेत्र के ग्लेशियरों के कुल क्षेत्रफल में करीब 12 प्रतिशत कमी दर्ज की गई। वहीं 1975 के बाद निगरानी किए गए ग्लेशियरों में औसतन 27 मीटर तक बर्फ की मोटाई का नुकसान दर्ज किया गया है।

ICIMOD के अनुसार हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर हैं और ये एशिया की कम से कम 10 प्रमुख नदी प्रणालियों के स्रोत हैं। इनसे मिलने वाला पानी करीब दो अरब लोगों के भोजन, पेयजल, ऊर्जा और आजीविका से जुड़ा है।

यानी ग्लेशियरों का पिघलना केवल पहाड़ों पर बर्फ कम होने की कहानी नहीं है। इसका सीधा संबंध आने वाले दशकों में पानी की उपलब्धता और प्राकृतिक आपदाओं दोनों से है।

बढ़ती ग्लेशियल झीलें बन सकती हैं ‘टाइम बम’

ग्लेशियरों के पीछे हटने का एक और गंभीर परिणाम ग्लेशियल झीलों का विस्तार है। जब ग्लेशियर पिघलता है तो उसके सामने या आसपास पानी जमा होने लगता है। कई बार ये झीलें अस्थिर बर्फ, चट्टान या मोरेन से घिरी होती हैं।

यदि अचानक भूस्खलन, हिमस्खलन या चट्टानों का बड़ा हिस्सा इन झीलों में गिरता है तो पानी का दबाव तेजी से बढ़ सकता है। प्राकृतिक बांध टूटने पर ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF की स्थिति पैदा होती है।

ऐसी बाढ़ कुछ ही मिनटों या घंटों में नीचे की घाटियों में भारी तबाही ला सकती है। ICIMOD ने भी छोटे आकार के ग्लेशियरों के तेजी से सिकुड़ने और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जैसे खतरों के बढ़ने की चेतावनी दी है।

बर्फ घटने का मतलब हमेशा कम बाढ़ नहीं

हिमालय में बर्फ घटने को केवल पानी की कमी के नजरिए से देखना भी अधूरा होगा। शुरुआती दौर में तेज ग्लेशियर पिघलाव कुछ नदियों में पानी बढ़ा सकता है, लेकिन लंबे समय में ग्लेशियरों के सिकुड़ने से सूखे मौसम में पानी की उपलब्धता घटने का खतरा बढ़ता है।

ICIMOD की रिपोर्ट बताती है कि हिमालयी क्रायोस्फियर यानी ग्लेशियर, बर्फ और पर्माफ्रॉस्ट में तेजी से बदलाव हो रहा है। इसका प्रभाव पानी, कृषि, जैव-विविधता और पर्वतीय समुदायों तक पहुंच रहा है।

इसलिए हिमालय के सामने दोहरी चुनौती है—एक ओर अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ और दूसरी ओर भविष्य में पानी की बढ़ती कमी।

विकास की दौड़ ने बढ़ाई संवेदनशीलता

प्राकृतिक खतरे को आपदा में बदलने में मानव गतिविधियों की भी बड़ी भूमिका है। हिमालयी घाटियों में पर्यटन और सड़क संपर्क बढ़ने के साथ होटल, बाजार, घर और अन्य निर्माण तेजी से बढ़े हैं।

जहां नदी को बाढ़ के समय फैलने की जगह चाहिए, वहां यदि स्थायी निर्माण कर दिया जाए तो नुकसान कई गुना बढ़ जाता है। पहाड़ों में सड़क निर्माण के दौरान ढलानों की कटाई, सुरंगों का निर्माण, नदी के किनारे निर्माण और कमजोर ढलानों पर भारी संरचनाएं भी जोखिम बढ़ा सकती हैं।

इसलिए हिमालय में सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितनी सड़कें या कितने होटल बनाए गए। सवाल यह भी होना चाहिए कि वे कहां बनाए गए और क्या उस स्थान की भूगर्भीय क्षमता का वैज्ञानिक अध्ययन किया गया था।

हिमालयी आपदाएं अब अलग-अलग घटनाएं नहीं रहीं

2013 की केदारनाथ त्रासदी से लेकर 2025 की धराली आपदा और 2026 की नेपाल-तिब्बत सीमा की बाढ़ तक घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक बड़े पैटर्न के रूप में समझने की जरूरत है।

ICIMOD की 2023 की व्यापक रिपोर्ट पहले ही चेतावनी दे चुकी थी कि हिंदूकुश हिमालय में ग्लेशियरों का नुकसान 2011-2020 के दौरान पिछले दशक की तुलना में 65 प्रतिशत अधिक तेज हुआ। रिपोर्ट ने यह भी कहा था कि मौजूदा उत्सर्जन पथ जारी रहने पर सदी के अंत तक ग्लेशियरों के मौजूदा आयतन का लगभग 80 प्रतिशत तक समाप्त हो सकता है।

यह आंकड़ा भविष्य की उस तस्वीर की ओर इशारा करता है जिसमें हिमालय में पानी, बर्फ और आपदाओं का संतुलन तेजी से बदल सकता है।

समाधान अब चेतावनी से आगे बढ़कर तैयारी में है

हिमालय को बचाने के लिए सबसे पहले वैज्ञानिक निगरानी का मजबूत नेटवर्क जरूरी है। ICIMOD के 2026 आकलन में बताया गया है कि व्यापक क्षेत्र में ग्लेशियर निगरानी अभी भी अपर्याप्त है और 38 निगरानी किए गए ग्लेशियरों में केवल सात ही विश्व ग्लेशियर निगरानी सेवा के निर्धारित बेंचमार्क मानकों पर खरे उतरते हैं।

इसका अर्थ है कि कई संवेदनशील क्षेत्रों में खतरा मौजूद हो सकता है, लेकिन उसके बारे में हमारे पास पर्याप्त वास्तविक समय का डेटा नहीं है।

ग्लेशियल झीलों की नियमित निगरानी, उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सेंसर और रडार नेटवर्क, भूस्खलन की पूर्व चेतावनी प्रणाली, नदी घाटियों का वैज्ञानिक जोनिंग और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण पर कड़े नियम समय की मांग हैं।

साथ ही भारत, नेपाल, भूटान, चीन और पाकिस्तान जैसे हिमालयी देशों के बीच आपदा संबंधी सूचनाओं का तत्काल आदान-प्रदान जरूरी है। क्योंकि नदी किसी सीमा को नहीं मानती। ऊपरी पहाड़ों में पैदा हुआ संकट कुछ ही घंटों में दूसरे देश की आबादी तक पहुंच सकता है।

हिमालय बचा तो एशिया की जल सुरक्षा बचेगी

हिमालय केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है। यह एशिया की जल सुरक्षा, कृषि, ऊर्जा और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। यहां ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, बर्फ का कम होना और ग्लेशियल झीलों का बढ़ना आने वाले समय की बड़ी चुनौती है।

नेपाल की भोटेकोशी त्रासदी ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि हिमालय अब केवल प्राकृतिक सौंदर्य का क्षेत्र नहीं, बल्कि बढ़ते जलवायु और भूगर्भीय जोखिमों का संवेदनशील क्षेत्र बन चुका है।

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने की जगह आपदा आने से पहले खतरे को पहचान लिया जाए। नदियों के प्राकृतिक रास्ते बचाए जाएं, अस्थिर ढलानों पर निर्माण रोका जाए, ग्लेशियरों और झीलों की लगातार निगरानी हो तथा स्थानीय आबादी को समय रहते चेतावनी मिल सके।

क्योंकि हिमालय में अब सवाल यह नहीं रह गया है कि अगली बड़ी आपदा आएगी या नहीं। असली सवाल यह है कि जब अगली आपदा आएगी, तब क्या हम उसके लिए तैयार होंगे?

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Read More

Cricket Live Score

Rashifal

और पढ़ें