18 अक्टूबर 2026 12:27 पूर्वाह्न

संपादकीय | बदलता नेपाल और भारत : बालेन शाह के दौर में रिश्तों की नई परीक्षा

संपादक अनिल अनूप और नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के साथ भारत-नेपाल संबंधों पर आधारित फीचर इमेज

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संपादक अनिल अनूप

नेपाल की राजनीति में बालेन शाह का उदय केवल सत्ता परिवर्तन की घटना नहीं है। यह उस पीढ़ी के राजनीतिक आत्मविश्वास का संकेत है, जो पारंपरिक दलों, पुराने राजनीतिक समीकरणों और धीमी प्रशासनिक व्यवस्था से आगे बढ़कर कुछ नया चाहती है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई, रैप संगीत और काठमांडू के मेयर के रूप में काम करने के बाद राष्ट्रीय राजनीति के शीर्ष तक पहुंचे बालेंद्र शाह ने नेपाली राजनीति को यह संदेश दिया है कि जनता अब केवल राजनीतिक भाषण नहीं, बल्कि परिणाम भी चाहती है।

27 मार्च 2026 को बालेन शाह ने नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। उस समय उनकी उम्र 35 वर्ष थी और वे नेपाल के सबसे कम उम्र के लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री बने।

उनकी राजनीतिक यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे पारंपरिक राजनीतिक परिवार या स्थापित सत्ता संरचना से निकलकर नहीं आए। काठमांडू के मेयर के रूप में उनकी पहचान साफ-सफाई, शहरी प्रशासन और व्यवस्था को लेकर कड़े रवैये से बनी। यही छवि आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति में उनकी सबसे बड़ी पूंजी बनी।

अब सवाल केवल यह नहीं है कि बालेन शाह नेपाल को किस दिशा में ले जाएंगे। बड़ा प्रश्न यह है कि बदलते नेपाल के साथ भारत अपने रिश्ते को किस तरह नए सिरे से परिभाषित करेगा?

भारत के लिए नेपाल क्यों इतना महत्वपूर्ण है?

भारत और नेपाल का रिश्ता किसी सामान्य पड़ोसी देश जैसा नहीं है। दोनों देशों के बीच खुली सीमा है। भारत के उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम की सीमाएं नेपाल से जुड़ती हैं। दोनों देशों के नागरिकों के बीच रोजगार, व्यापार, शिक्षा, धार्मिक यात्राओं और पारिवारिक रिश्तों का सदियों पुराना संबंध है।

भारत में बड़ी संख्या में नेपाली नागरिक रोजगार करते हैं। सीमावर्ती भारतीय शहरों का कारोबार नेपाल से आने-जाने वाले लोगों पर निर्भर करता है। इसी तरह नेपाल के बाजारों, उद्योगों और परिवारों का भारत के साथ गहरा आर्थिक संपर्क है।

यही कारण है कि भारत-नेपाल संबंधों को केवल विदेश मंत्रालयों की बैठकों, संयुक्त वक्तव्यों और राजनयिक यात्राओं से नहीं समझा जा सकता। इस रिश्ते की वास्तविक ताकत सीमा के दोनों ओर रहने वाले सामान्य लोगों के जीवन में दिखाई देती है।

कभी-कभी भारत-नेपाल संबंधों को बेहद करीबी पारिवारिक रिश्ते की तरह समझाया जाता है। दोनों देशों की निकटता इतनी अधिक है कि छोटी राजनीतिक नाराजगी भी बड़ी प्रतिक्रिया पैदा कर सकती है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है—भारत और नेपाल दो संप्रभु राष्ट्र हैं। इसलिए भावनात्मक निकटता के साथ संप्रभुता और समानता का सम्मान भी जरूरी है।

यही वह संतुलन है जिसकी आने वाले वर्षों में सबसे अधिक आवश्यकता होगी।

बालेन शाह का उदय क्या बताता है?

बालेन शाह का प्रधानमंत्री बनना नेपाल की राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव का प्रतीक माना जा सकता है। उनका राजनीतिक मॉडल पारंपरिक दलगत राजनीति से अलग दिखाई देता है।

उनकी पृष्ठभूमि में इंजीनियरिंग, संगीत और शहरी प्रशासन तीन अलग-अलग क्षेत्र हैं। लेकिन इन तीनों के बीच एक समानता है—व्यवस्था को अलग नजर से देखने की कोशिश।

काठमांडू के मेयर के रूप में बालेन ने जिस तरह शहरी समस्याओं, खासकर कचरा प्रबंधन और अतिक्रमण जैसे मुद्दों को राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनाया, उसने उन्हें युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाया। बाद में उनकी राष्ट्रीय राजनीति में सफलता ने यह साबित किया कि नेपाल का मतदाता पुराने राजनीतिक चेहरों के विकल्प तलाश रहा है।

यह बदलाव भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है।

नई दिल्ली को नेपाल की राजनीति को केवल पुराने नेताओं, पुराने दलों और पुराने समीकरणों के माध्यम से देखने के बजाय नेपाली समाज में हो रहे व्यापक परिवर्तन को समझना होगा। नेपाल की नई पीढ़ी रोजगार, बेहतर शहरी सुविधाएं, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, आर्थिक अवसर, डिजिटल सेवाएं और राष्ट्रीय सम्मान चाहती है।

इस पीढ़ी के लिए विदेश नीति भी केवल वैचारिक मुद्दा नहीं है। वह यह देखना चाहती है कि भारत या चीन के साथ संबंधों से उसके जीवन में क्या बदलाव आता है।

सीमा विवाद: भावनाओं से नहीं, संवाद से समाधान

भारत-नेपाल संबंधों की सबसे कठिन चुनौतियों में सीमा विवाद प्रमुख है। कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर दोनों देशों के दावे अलग-अलग हैं। विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 1816 की सुगौली संधि और महाकाली नदी की उत्पत्ति की अलग-अलग व्याख्याओं से जुड़ी है।

नेपाल ने इन क्षेत्रों को अपने आधिकारिक मानचित्र में शामिल किया है, जबकि भारत इन क्षेत्रों को अपना हिस्सा मानता है।

2025 में नेपाल ने 100 रुपये के नए नोट पर ऐसा मानचित्र प्रदर्शित किया जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल के हिस्से के रूप में दिखाया गया। भारत ने इस दावे पर आपत्ति जताते हुए अपनी स्थिति दोहराई कि एकतरफा कार्रवाई से जमीनी वास्तविकता नहीं बदलती।

यह घटना बताती है कि सीमा विवाद केवल कूटनीतिक फाइलों तक सीमित नहीं है। वह नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति और जनभावना में भी गहराई से मौजूद है।

भारत के लिए यहां दोहरी रणनीति जरूरी है। पहला, अपने क्षेत्रीय दावे और राष्ट्रीय हितों पर स्पष्टता कायम रखना। दूसरा, संवाद के दरवाजे बंद न करना।

सीमा विवाद का समाधान किसी सार्वजनिक बयान, नक्शे या राजनीतिक भाषण से नहीं होगा। इसके लिए ऐतिहासिक दस्तावेजों, सीमा निर्धारण और दोनों देशों के बीच गंभीर राजनयिक वार्ता की आवश्यकता होगी।

क्या नेपाल चीन की ओर जा रहा है?

भारत-नेपाल संबंधों पर चर्चा होते ही चीन का मुद्दा सामने आ जाता है। नेपाल और चीन के बढ़ते संपर्क को लेकर भारत में अक्सर चिंता व्यक्त की जाती है। लेकिन नेपाल को केवल भारत-चीन प्रतिस्पर्धा के मैदान के रूप में देखना शायद सबसे बड़ी रणनीतिक भूल होगी।

नेपाल अपनी भौगोलिक स्थिति से परिचित है। उसके दक्षिण में भारत है और उत्तर में चीन। दोनों उसके लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में काठमांडू की कोशिश स्वाभाविक रूप से दोनों देशों के साथ संबंध बनाए रखने की होगी।

नेपाल की विदेश नीति को केवल “भारत बनाम चीन” के नजरिए से देखना नेपाली संप्रभुता की वास्तविकता को कम करके आंकना होगा।

भारत के लिए सही रणनीति यह नहीं होनी चाहिए कि नेपाल चीन के साथ संबंध न रखे। बेहतर रणनीति यह होनी चाहिए कि नेपाल भारत के साथ संबंधों को अधिक उपयोगी और भरोसेमंद क्यों समझे।

यानी प्रतिस्पर्धा प्रभाव की नहीं, विकास की होनी चाहिए।

यदि भारत नेपाल में बेहतर सड़कें बनाता है, बिजली खरीदता है, डिजिटल भुगतान को आसान करता है, व्यापारिक बाधाएं कम करता है और नेपाली युवाओं के लिए आर्थिक अवसर पैदा करता है, तो भारत के साथ संबंध अपने आप मजबूत होंगे।

भारत-नेपाल संबंधों में कनेक्टिविटी का महत्व

21वीं सदी की कूटनीति केवल राजधानियों में नहीं बनती। वह सड़कों, रेल लाइनों, बिजली ग्रिड, इंटरनेट नेटवर्क और व्यापार गलियारों में दिखाई देती है।

इसी दृष्टि से भारत और नेपाल के बीच बढ़ती कनेक्टिविटी बेहद महत्वपूर्ण है।

2026 में भारत और नेपाल के बीच पहली सीधी वाणिज्यिक कंटेनर मालगाड़ी का संचालन हुआ, जिसने कोलकाता बंदरगाह से बिराटनगर तक माल पहुंचाया। यह रेल संपर्क दोनों देशों के बीच व्यापार को अधिक सुगम और कम लागत वाला बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

ऐसी परियोजनाओं का महत्व केवल परिवहन तक सीमित नहीं है। जब किसी व्यापारी का माल सीमा पर कम समय में पहुंचता है, जब औद्योगिक उत्पादों की लागत घटती है और जब बाजारों तक पहुंच आसान होती है, तो उसका प्रभाव सीधे लोगों की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

यही वह क्षेत्र है जहां भारत नेपाल के साथ अपने रिश्ते को नई मजबूती दे सकता है।

ऊर्जा सहयोग बन सकता है गेमचेंजर

भारत और नेपाल के रिश्ते में जलविद्युत सबसे बड़े आर्थिक अवसरों में से एक है।

नेपाल के पास विशाल जलविद्युत क्षमता है, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था को लगातार अधिक ऊर्जा की आवश्यकता है। दोनों देशों ने दीर्घकालिक बिजली व्यापार को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण समझौते किए हैं।

2024 में हुए दीर्घकालिक बिजली व्यापार समझौते में अगले दस वर्षों के भीतर नेपाल से भारत को 10,000 मेगावाट तक बिजली निर्यात का लक्ष्य रखा गया है।

यदि इस लक्ष्य को व्यावहारिक रूप से लागू किया जाता है तो यह दोनों देशों के लिए आर्थिक परिवर्तन का आधार बन सकता है।

नेपाल को बिजली निर्यात से विदेशी मुद्रा और राजस्व मिलेगा। भारत को स्वच्छ ऊर्जा का एक अतिरिक्त स्रोत मिलेगा। सीमा पार विद्युत ग्रिड मजबूत होगा और दोनों अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे पर अधिक निर्भर होंगी।

यही आर्थिक परस्पर निर्भरता राजनीतिक रिश्तों को भी स्थिरता देती है।

अरुण-3 जैसी परियोजनाएं इसी संभावित साझेदारी की मिसाल हैं। लेकिन चुनौती परियोजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि उनका समय पर पूरा होना है।

नेपाल में अक्सर यह शिकायत सुनाई देती है कि बड़ी परियोजनाओं में देरी होती है। इसलिए भारत के लिए जरूरी है कि वह परियोजनाओं की गति, पारदर्शिता और स्थानीय हितों पर विशेष ध्यान दे।

व्यापार असंतुलन और नेपाली चिंताओं को भी समझना होगा

भारत और नेपाल के रिश्ते को केवल भारत की चिंताओं से नहीं देखा जा सकता। नेपाल की अपनी आर्थिक और राजनीतिक चिंताएं भी हैं।

नेपाल में भारत के साथ व्यापार असंतुलन पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। नदियों से जुड़े समझौते, बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं, पंचेश्वर परियोजना, 1950 की भारत-नेपाल संधि और विभिन्न द्विपक्षीय समझौतों पर नेपाली राजनीति में बहस होती रही है।

भारत के लिए इन सवालों को केवल राजनीतिक बयानबाजी मानकर खारिज करना सही रणनीति नहीं होगी। करीबी पड़ोसी के साथ रिश्ते तभी टिकते हैं जब दोनों पक्षों को लगे कि उनके हितों और चिंताओं को महत्व दिया जा रहा है।

भारत को नेपाल से यह अपेक्षा करने का अधिकार है कि वह भारत की संप्रभुता और सुरक्षा चिंताओं को समझे। लेकिन नेपाल को भी यह भरोसा होना चाहिए कि भारत उसकी संप्रभुता, आर्थिक हितों और विकास की आकांक्षाओं को सम्मान देता है। यही पारस्परिक सम्मान रिश्ते को स्थायी बनाएगा।

गोरखा सैनिकों का मुद्दा भी संवेदनशील

भारत-नेपाल संबंधों की एक अनूठी कड़ी भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की परंपरागत भर्ती रही है। गोरखा सैनिकों का इतिहास दोनों देशों के साझा संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हजारों नेपाली परिवारों का भारतीय सेना के साथ पीढ़ियों पुराना संबंध रहा है।

अग्निपथ योजना के बाद नेपाली नागरिकों की भारतीय सेना में भर्ती का प्रश्न लंबे समय से स्पष्ट समाधान की प्रतीक्षा कर रहा है। यह मामला केवल सैन्य भर्ती का नहीं है। इसके पीछे रोजगार, परिवार, पेंशन, सामाजिक प्रतिष्ठा और ऐतिहासिक विश्वास का प्रश्न जुड़ा हुआ है।

भारत और नेपाल को इस विषय पर संवेदनशील और व्यावहारिक बातचीत करनी चाहिए। किसी भी समाधान में दोनों देशों की वर्तमान नीतियों के साथ उस ऐतिहासिक रिश्ते की भावना को भी जगह मिलनी चाहिए।

खुली सीमा ताकत भी है और चुनौती भी

भारत-नेपाल की खुली सीमा दोनों देशों के लिए असाधारण सुविधा है। लेकिन यही खुलापन सुरक्षा चुनौतियां भी पैदा करता है। मानव तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी, अवैध व्यापार और अन्य सीमा अपराधों पर नियंत्रण जरूरी है। लेकिन इसका समाधान सीमा को कठोर और आम लोगों के लिए मुश्किल बनाना नहीं है। सीमा प्रबंधन ऐसा होना चाहिए जिसमें सुरक्षा मजबूत हो और वैध आवाजाही आसान बनी रहे। आधुनिक इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट, डिजिटल रिकॉर्ड, बेहतर निगरानी और दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान इस दिशा में उपयोगी हो सकता है।

सीमा पर रहने वाले लोगों के लिए भारत और नेपाल की सीमा केवल नक्शे पर खींची गई रेखा नहीं है। उनके लिए यह रिश्तेदारों, बाजारों, स्कूलों और रोजगार के बीच आने-जाने का रास्ता है। इस मानवीय वास्तविकता को किसी भी सीमा नीति के केंद्र में रखना होगा।

बालेन शाह और भारत के सामने नई परीक्षा

बालेन शाह के सामने सबसे बड़ी चुनौती नेपाल की जनता की उम्मीदों को वास्तविक नतीजों में बदलने की होगी। उन्होंने जिस राजनीतिक असंतोष के बीच सत्ता हासिल की है, वह केवल पुरानी सरकारों के खिलाफ नाराजगी नहीं है। यह बेहतर शासन की मांग है।

रोजगार, आर्थिक विकास, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक सुधार उनके सामने बड़ी चुनौतियां हैं। भारत के लिए भी यह बदलाव एक अवसर है।

यदि नई दिल्ली बालेन शाह सरकार के साथ केवल राजनीतिक समीकरण बनाने के बजाय विकास आधारित साझेदारी पर जोर देती है, तो भारत-नेपाल संबंधों को नई दिशा मिल सकती है।

नेपाल को सड़क चाहिए तो भारत मदद करे। नेपाल को बिजली बाजार चाहिए तो भारत खरीदार बने। नेपाल को डिजिटल भुगतान की सुविधा चाहिए तो तकनीकी सहयोग बढ़े। सीमा व्यापार आसान करना है तो प्रक्रियाओं को सरल किया जाए। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना है तो संस्थागत साझेदारी विकसित की जाए। यही आधुनिक पड़ोसी नीति होगी।

भारत को नेपाल से क्या सीखना चाहिए?

बालेन शाह की राजनीतिक सफलता भारत के लिए सीधे तौर पर कोई राजनीतिक मॉडल नहीं है। लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण संदेश जरूर निकलता है—जनता तेजी से बदल रही है।

युवा मतदाता अब केवल विचारधारा नहीं देखता। वह परिणाम चाहता है। वह पूछता है कि सड़क कब बनेगी, कचरा कब उठेगा, रोजगार कब मिलेगा, सरकारी सेवा कितनी जल्दी मिलेगी और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई कब होगी। नेपाल में यह बदलाव राजनीतिक सत्ता के शीर्ष तक पहुंच गया है।

भारत को भी नेपाल के इस परिवर्तन को गंभीरता से समझना होगा। पड़ोसी देश की नई पीढ़ी के साथ संबंध केवल सरकारों के माध्यम से नहीं बनाए जा सकते। विश्वविद्यालयों, स्टार्टअप, व्यापार, संस्कृति, पर्यटन, मीडिया, खेल और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए जनता से जनता का संपर्क बढ़ाना होगा।

भारत-नेपाल रिश्ते का अगला अध्याय

भारत और नेपाल के रिश्ते को अब पुराने भावनात्मक नारों से आगे ले जाने की जरूरत है। इतिहास दोनों देशों को जोड़ता है, लेकिन भविष्य केवल इतिहास से नहीं बनता। भविष्य तब बनेगा जब सीमा पर व्यापार आसान होगा। जब रेल समय पर चलेगी। जब बिजली दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ेगी। जब डिजिटल भुगतान सीमापार लेन-देन को सरल बनाएगा। जब युवाओं को रोजगार और शिक्षा के अवसर मिलेंगे। जब सीमा विवादों पर बातचीत बंद नहीं होगी।

भारत को नेपाल की संप्रभुता का सम्मान करते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी होगी। नेपाल को भी भारत की सुरक्षा चिंताओं और संवेदनशीलताओं को समझना होगा। दोनों देशों के बीच मतभेद होना असामान्य नहीं है। असली परीक्षा यह है कि मतभेद रिश्ते को तोड़ते हैं या संवाद को और मजबूत बनाते हैं।

बदलते नेपाल के साथ बदलना होगा भारत को भी

बालेन शाह का उदय नेपाल की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत का संकेत है। यह दौर युवाओं की आकांक्षाओं, जवाबदेह शासन और राष्ट्रीय आत्मसम्मान की राजनीति से जुड़ा हुआ है। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह इस नए नेपाल को पुराने नजरिए से न देखे।

नेपाल को केवल चीन के प्रभाव का संभावित क्षेत्र मानना पर्याप्त नहीं होगा। उसे एक स्वतंत्र, संप्रभु और अपनी प्राथमिकताओं वाला पड़ोसी समझना होगा।

भारत और नेपाल के बीच संबंधों की सबसे बड़ी पूंजी दोनों देशों के नागरिकों के बीच मौजूद असाधारण निकटता है। लेकिन यह निकटता अपने आप हमेशा कायम नहीं रहेगी। हर नई पीढ़ी को इसे नए अनुभवों के आधार पर स्वीकार करना होगा। इसलिए भारत-नेपाल संबंधों का भविष्य किसी एक प्रधानमंत्री, किसी एक सरकार या किसी एक विवाद से तय नहीं होगा।

वह तय होगा उन सड़कों से जो दोनों देशों को जोड़ेंगी, उन रेल पटरियों से जिन पर व्यापार चलेगा, उन बिजली लाइनों से जो दोनों अर्थव्यवस्थाओं को ऊर्जा देंगी, उन डिजिटल नेटवर्कों से जो लोगों को करीब लाएंगे और उस विश्वास से जो सीमा के दोनों ओर रहने वाली नई पीढ़ी के मन में पैदा होगा।

बालेन शाह का नेपाल भारत के सामने एक नई राजनीतिक वास्तविकता लेकर आया है। यह भारत के लिए चिंता का कारण बनने के बजाय अवसर भी बन सकता है—बशर्ते नई दिल्ली नेपाल को केवल अपने प्रभाव क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि बराबरी के साझेदार के रूप में देखे।

भारत और नेपाल के रिश्ते की अगली कहानी शायद इसी सवाल का जवाब होगी—क्या पुरानी दोस्ती को नई पीढ़ी की जरूरतों के मुताबिक नया रूप दिया जा सकता है?

अगर दोनों देश इसका सकारात्मक उत्तर खोज लेते हैं, तो हिमालय की यह साझेदारी आने वाले दशकों में दक्षिण एशिया की सबसे मजबूत और उपयोगी पड़ोसी साझेदारियों में बदल सकती है।

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