रीतेश कुमार गुप्ता की रिपोर्ट
सीतापुर। भागदौड़ भरी जिंदगी में जब इंसान के पास अपने आसपास के लोगों का दर्द सुनने और समझने तक का समय कम होता जा रहा है, ऐसे दौर में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बिना किसी स्वार्थ, पद, प्रतिष्ठा या राजनीतिक महत्वाकांक्षा के उन जीवों की सेवा में जुटे हैं, जो अपनी पीड़ा शब्दों में व्यक्त तक नहीं कर सकते। सीतापुर के गौरव बाजपेई, पुत्र संजय बाजपेई, ऐसे ही सेवाभावी व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने गौ सेवा और पशु-पक्षियों की सेवा को अपने जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य बना लिया है।
लालबाग क्षेत्र में अपनी छोटी सी दुकान चलाने वाले गौरव बाजपेई का नाम भले ही बड़े मंचों पर सुनाई न देता हो, लेकिन बेजुबान जीवों के बीच उनकी पहचान किसी परिचय की मोहताज नहीं है। चोटिल गाय हो, भूखी गौ माता हो, सड़क पर घायल पड़ा कोई पशु हो अथवा किसी पक्षी को उपचार की जरूरत हो—गौरव अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसकी मदद के लिए आगे बढ़ते हैं।
उनकी सेवा के पीछे न कोई राजनीतिक दृष्टिकोण है और न ही किसी प्रकार का व्यक्तिगत स्वार्थ। उनका कहना है कि बेजुबान जीव भी दर्द महसूस करते हैं और उनकी पीड़ा को समझना इंसानियत का दायित्व है। इसी सोच ने उन्हें धीरे-धीरे गौ सेवा और पशु सेवा के ऐसे रास्ते पर ला खड़ा किया, जहां अब उनका अधिकांश समय जरूरतमंद पशुओं की मदद में बीतता है।
छोटी दुकान, लेकिन सेवा का बड़ा संकल्प
सीतापुर के लालबाग क्षेत्र में गौरव बाजपेई एक छोटी सी दुकान चलाते हैं। सामान्य जीवन जीने वाले गौरव ने अपनी सीमित आय और संसाधनों के बावजूद पशु सेवा के लिए अपने जीवन में एक अलग स्थान बनाया है। उनके लिए सेवा किसी विशेष अवसर तक सीमित नहीं है।
किसी गाय को भोजन की आवश्यकता हो तो वह भोजन की व्यवस्था करते हैं। कोई पशु चोटिल दिखाई दे तो उसके उपचार के लिए दवा, मलहम, पट्टी और जरूरत के अनुसार अन्य चिकित्सा सामग्री का इंतजाम करते हैं। कई बार घायल पशु को उपचार के लिए सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी वह स्वयं उठाते हैं।
यही निरंतरता उनके सेवा कार्य को विशेष बनाती है। यह केवल भावनात्मक लगाव नहीं, बल्कि नियमित रूप से किया जाने वाला प्रयास है।
दुर्गापुरवा के निकट किराए पर बनाई गौशाला
गौरव बाजपेई की सेवा भावना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्होंने सीतापुर के दुर्गापुरवा के निकट किराए पर एक गौशाला भी बना रखी है। यहां विशेष रूप से चोटिल और जरूरतमंद गायों की देखभाल की जाती है।
सड़क दुर्घटना या किसी अन्य कारण से घायल हुई गाय जब उनके पास पहुंचती है तो उसके उपचार की व्यवस्था की जाती है। घाव की सफाई से लेकर दवा, मलहम-पट्टी और आवश्यक देखभाल तक का प्रयास किया जाता है। उनका उद्देश्य सिर्फ घायल गाय को कुछ समय के लिए आश्रय देना नहीं, बल्कि उसके स्वस्थ होने तक उसकी देखभाल करना है।
इस गौशाला में आने वाली गायों के लिए भोजन और देखभाल की व्यवस्था भी की जाती है। गौरव के लिए यह स्थान महज गौशाला नहीं, बल्कि उन बेजुबानों के लिए उपचार और आश्रय का केंद्र है, जिन्हें समाज अक्सर सड़क पर असहाय छोड़ देता है।
दूध का व्यापार नहीं, बछिया का अधिकार
गौरव बाजपेई की गौ सेवा की सबसे उल्लेखनीय बातों में से एक यह है कि उनके अनुसार गौशाला में रहने वाली गायों के दूध को व्यापार का माध्यम नहीं बनाया जाता। दूध पर पहली प्राथमिकता छोटी बछिया की रहती है।
यह सोच गौ सेवा को केवल धार्मिक भावना से आगे ले जाकर पशु कल्याण की भावना से जोड़ती है। गाय को केवल उपयोग की वस्तु मानने के बजाय एक जीवित प्राणी के रूप में देखना और उसकी जरूरतों का सम्मान करना गौरव के सेवा भाव की विशेषता है।
उनकी कोशिश रहती है कि जिस गाय ने किसी बछड़े या बछिया को जन्म दिया है, उसकी संतान को उसका प्राकृतिक अधिकार मिले। यही सोच उनके सेवा कार्य को अलग पहचान देती है।
सरकारी गौशालाओं में भी पहुंचते हैं गौरव
गौरव बाजपेई की सेवा किसी एक स्थान या अपनी गौशाला तक सीमित नहीं है। वह सरकारी गौशालाओं में भी जाकर जरूरतमंद और चोटिल गायों के उपचार में सहयोग करते हैं।
जहां कहीं उन्हें लगता है कि किसी पशु को उपचार या अतिरिक्त देखभाल की जरूरत है, वहां अपनी क्षमता के अनुसार मदद करने का प्रयास करते हैं। इस कार्य में उनके कुछ साथी भी जुड़े हुए हैं, जो आवश्यकता पड़ने पर उनके साथ खड़े रहते हैं।
यह टीम भावना बताती है कि सेवा का संदेश धीरे-धीरे अन्य लोगों तक भी पहुंच रहा है। गौरव अकेले शुरुआत करने वाले व्यक्ति हो सकते हैं, लेकिन उनके साथ जुड़ने वाले लोगों की संख्या यह संकेत देती है कि समाज में आज भी संवेदना जीवित है।
गाय ही नहीं, हर बेजुबान के लिए संवेदना
गौरव बाजपेई की सेवा का दायरा केवल गायों तक सीमित नहीं है। घायल अथवा जरूरतमंद अन्य पशु-पक्षियों की मदद के लिए भी वह आगे आते हैं।
किसी पशु को चोट लगने पर दवा और मलहम-पट्टी की व्यवस्था करना हो या किसी पक्षी को उपचार की जरूरत हो, वह यथासंभव उसकी सहायता करते हैं। उनके लिए बेजुबान होने का अर्थ यह नहीं कि उसकी पीड़ा को नजरअंदाज कर दिया जाए।
उनकी यही सोच पशु सेवा को व्यापक मानवीय संवेदना से जोड़ती है।
न प्रचार की लालसा, न किसी लाभ की अपेक्षा
आज के समय में जब सामाजिक कार्य भी कई बार प्रचार और प्रसिद्धि का माध्यम बन जाते हैं, गौरव बाजपेई का कार्य इस दृष्टि से अलग दिखाई देता है। वह अपनी सेवा को किसी राजनीतिक मंच या व्यक्तिगत प्रचार से जोड़कर नहीं देखते।
उनका उद्देश्य बेजुबानों की मदद करना है। इसी कारण स्थानीय स्तर पर काम करने के बावजूद उनका सेवा कार्य धीरे-धीरे लोगों के बीच चर्चा का विषय बन रहा है।
गौरव की कहानी यह सवाल भी खड़ा करती है कि समाज सेवा के लिए बड़े संसाधन, बड़े संगठन या बड़ी घोषणाएं ही जरूरी हैं क्या? शायद नहीं। यदि इच्छा सच्ची हो तो सीमित साधनों से भी किसी जरूरतमंद जीव की जिंदगी बदली जा सकती है।
इंसानियत का जीवंत संदेश
आज समाज में संवेदनशीलता को लेकर अक्सर चिंता व्यक्त की जाती है। लोग अपने आसपास घट रही घटनाओं को देखते हुए भी कई बार आगे आने से हिचकते हैं। ऐसे माहौल में गौरव बाजपेई का काम एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
एक घायल गाय सड़क किनारे पड़ी हो और अधिकांश लोग उसे देखकर आगे निकल जाएं, लेकिन कोई व्यक्ति रुककर उसकी स्थिति समझे, उपचार की व्यवस्था करे और उसे सुरक्षित स्थान तक पहुंचाए—यही छोटी सी पहल किसी जीव के लिए जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन सकती है।
गौरव का सेवा कार्य समाज को यही संदेश देता है कि इंसानियत केवल इंसानों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जिन जीवों की आवाज नहीं है, उनकी पीड़ा को समझना भी मानवीय जिम्मेदारी का हिस्सा है।
नैमिषारण्य क्षेत्र की धरती का गौरव
सीतापुर जिला धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। नैमिषारण्य जैसी पवित्र भूमि से जुड़े इस क्षेत्र में सेवा और करुणा की परंपरा का अपना महत्व है।
ऐसे क्षेत्र में गौरव बाजपेई का बेजुबान जीवों के प्रति समर्पण निश्चित रूप से प्रेरणादायी है। वह कोई चर्चित सार्वजनिक चेहरा नहीं हैं। उनकी पहचान किसी बड़े पद या राजनीतिक हैसियत से नहीं है। उनकी पहचान उनके काम से बन रही है।
इसी अर्थ में कहा जा सकता है कि गौरव बाजपेई केवल एक नाम नहीं, बल्कि सीतापुर और नैमिषारण्य क्षेत्र में सेवा, संवेदना और इंसानियत का एक छोटा लेकिन प्रभावशाली उदाहरण हैं।
गौ सेवा को राष्ट्र सेवा से जोड़ने की सोच
गौरव बाजपेई की सेवा भावना से जुड़ा संदेश है कि “गौ माता की सेवा, राष्ट्र सेवा के समान है।” गौ माता को राष्ट्र माता का दर्जा दिलाने की मांग भी इसी भावनात्मक दृष्टिकोण का हिस्सा है।
हालांकि इस तरह के सामाजिक और सांस्कृतिक विचारों पर समाज में अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन गौ सेवा के माध्यम से पशु कल्याण, करुणा और जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है।
गौरव की प्राथमिकता किसी बहस से अधिक सेवा है। वह अपने स्तर पर घायल और जरूरतमंद पशुओं की मदद करके यह संदेश देने का प्रयास करते हैं कि गौ संरक्षण केवल चर्चा का विषय न रहकर व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए।
सेवा से जुड़े साथी बढ़ा रहे हैं कारवां
गौरव बाजपेई के इस अभियान में अब कई साथी भी जुड़े हैं। सेवा कार्य में सहयोग करने वाले लोग जरूरत के समय उपचार, भोजन और अन्य व्यवस्थाओं में योगदान देते हैं।
यह किसी भी सामाजिक अभियान की सबसे बड़ी सफलता होती है कि एक व्यक्ति की सोच धीरे-धीरे सामूहिक प्रयास में बदलने लगे। यदि ऐसे प्रयासों से और लोग प्रेरित हों और अपने आसपास के घायल पशुओं की मदद के लिए आगे आएं, तो समाज में पशु कल्याण की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है।
युवाओं के लिए प्रेरणा
गौरव बाजपेई की कहानी विशेष रूप से युवाओं के लिए प्रेरणादायी है। आज युवा अपनी ऊर्जा को विभिन्न क्षेत्रों में लगा रहे हैं। यदि इसी ऊर्जा का कुछ हिस्सा समाज और पर्यावरण के साथ-साथ पशु-पक्षियों की सेवा में भी लगाया जाए तो अनेक समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर संभव है।
इसके लिए हर व्यक्ति को गौशाला चलाने की आवश्यकता नहीं है। किसी घायल पशु को देखकर संबंधित पशु चिकित्सक तक पहुंचाना, गर्मी में पक्षियों के लिए पानी रखना, जरूरतमंद पशु को भोजन देना या स्थानीय पशु सेवा समूह की मदद करना भी सेवा का हिस्सा हो सकता है।
गौरव का जीवन यही बताता है कि सेवा का मूल्य उसकी विशालता से नहीं, बल्कि उसकी निस्वार्थ भावना से तय होता है।
जरूरत है संवेदना को आंदोलन बनाने की
सीतापुर के गौरव बाजपेई की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उस संवेदना की कहानी है जो आज भी समाज में मौजूद है। जरूरत केवल उसे पहचानने और आगे बढ़ाने की है।
यदि स्थानीय प्रशासन, पशु चिकित्सक, सामाजिक संगठन और आम नागरिक मिलकर घायल पशुओं के उपचार तथा संरक्षण की व्यवस्था को मजबूत करें तो सड़कों पर बेसहारा घूमने वाले पशुओं की स्थिति में काफी सुधार हो सकता है।
गौरव जैसे लोग इस दिशा में जमीनी स्तर पर पहले से काम कर रहे हैं। समाज को चाहिए कि ऐसे प्रयासों को सहयोग और प्रोत्साहन मिले, ताकि सेवा का यह छोटा दीपक और अधिक घरों तक पहुंच सके।
नाम छोटा हो सकता है, काम नहीं
सीतापुर के लालबाग में छोटी सी दुकान चलाने वाले गौरव बाजपेई शायद बड़े मंचों पर दिखाई न दें। उनके पास कोई बड़ा राजनीतिक पद नहीं है, न ही सेवा कार्य को प्रचारित करने के लिए कोई विशाल संसाधन। लेकिन घायल गायों की मरहम-पट्टी, जरूरतमंद पशुओं की देखभाल, पक्षियों और अन्य बेजुबानों की मदद तथा सरकारी और निजी गौशालाओं में उपचार के लिए पहुंचना उनके कार्य की वास्तविक पहचान है।
उनकी कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि समाज में बदलाव हमेशा बड़े आंदोलनों से ही नहीं आता। कभी-कभी एक व्यक्ति का छोटा सा संवेदनशील कदम भी बड़ी प्रेरणा बन जाता है।
गौरव बाजपेई की गौ सेवा हमें यही संदेश देती है कि जिस समाज में बेजुबानों की पीड़ा समझने वाले लोग मौजूद हों, वहां इंसानियत अभी जिंदा है।
गौ सेवा को सेवा, करुणा और पशु कल्याण की भावना से जोड़कर गौरव बाजपेई जिस रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं, वह निश्चित रूप से प्रेरणा देने वाला है। सीतापुर की धरती पर उनका यह प्रयास आने वाले समय में और लोगों को जोड़ सके—यही इस सेवा यात्रा की सबसे बड़ी सफलता होगी।














