पहले लगता था काश मेरा भी बच्चा होता : नसबंदी खुलने के बाद पूर्व नक्सलियों के घर गूंजी किलकारियां
गढ़चिरौली पुलिस की पहल से बदली जिंदगी, 50 आत्मसमर्पित नक्सलियों की नसबंदी खोली गई, 14 परिवारों में जन्मे बच्चे
सदानंद इंगीली की रिपोर्ट
कभी बंदूक थामकर जंगलों में भटकने वाले और परिवार की खुशियों से दूर रहने को मजबूर नक्सलियों की जिंदगी आज पूरी तरह बदल चुकी है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा से जुड़े कई पूर्व नक्सलियों के घर अब बच्चों की किलकारियों से गूंज रहे हैं। जिन लोगों को संगठन के नियमों के कारण माता-पिता बनने का अधिकार तक नहीं मिला था, वे आज अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के सपने देख रहे हैं।
गढ़चिरौली पुलिस की विशेष पुनर्वास योजना और चिकित्सा सहायता के माध्यम से ऐसे पूर्व नक्सलियों की नसबंदी दोबारा खोली गई, जिनकी शादी से पहले या संगठन में रहते हुए नसबंदी कर दी गई थी। इस पहल ने दर्जनों परिवारों को नया जीवन दिया है।

मां बनने की अधूरी चाह आखिर हुई पूरी
गढ़चिरौली के एक गांव में रहने वाली मंदा दोरपेड्डी आज अपनी दो बेटियों के साथ खुशहाल जीवन बिता रही हैं। लेकिन एक समय ऐसा था जब उन्हें लगता था कि वह कभी मां नहीं बन पाएंगी।
मंदा बताती हैं कि जब वह दूसरे लोगों के बच्चों को खेलते-कूदते देखती थीं, तब उनके मन में भी एक टीस उठती थी। उन्हें लगता था कि काश उनका भी बच्चा होता, जिसे वह प्यार करतीं, गोद में खिलातीं और उसके साथ जीवन की खुशियां साझा करतीं।
लेकिन उनके पति कृष्णा दोरपेड्डी की नसबंदी नक्सली संगठन में रहते हुए हो चुकी थी। ऐसे में उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनका परिवार कभी पूरा हो पाएगा। हालांकि आत्मसमर्पण के बाद परिस्थितियां बदलीं और उनकी जिंदगी में खुशियों ने दस्तक दी।
मंदा कहती हैं कि जब उन्हें गर्भवती होने की जानकारी मिली तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्हें लगा कि वर्षों से देखा गया सपना आखिरकार पूरा होने वाला है।

नक्सल आंदोलन से जुड़ने की कहानी
कृष्णा दोरपेड्डी वर्ष 2003 में नक्सली आंदोलन में शामिल हुए थे। उस समय गांवों में नक्सलियों का प्रभाव काफी था। उनके रहन-सहन, अनुशासन और हथियारों से प्रभावित होकर कई युवाओं की तरह कृष्णा भी संगठन का हिस्सा बन गए।
कुछ वर्षों बाद उनकी शादी तय हुई, लेकिन संगठन के नियमों के तहत उनकी नसबंदी कर दी गई। नक्सली संगठन का मानना था कि परिवार और बच्चे आंदोलन में बाधा बन सकते हैं, इसलिए कई सदस्यों को संतान पैदा करने की अनुमति नहीं दी जाती थी।
कृष्णा लगभग 11 वर्षों तक जंगलों में सक्रिय रहे। लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलने लगीं। सुरक्षा बलों की गतिविधियां बढ़ीं, लगातार अभियान चलने लगे और जंगलों में रहना कठिन होता गया।
जंगल की जिंदगी बनी बोझ
पूर्व नक्सली कृष्णा बताते हैं कि जंगल में जीवन बेहद कठिन था। कई बार भोजन और पानी तक उपलब्ध नहीं होता था। लगातार स्थान बदलना पड़ता था और हर समय सुरक्षा बलों का डर बना रहता था।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2009 के बाद सुरक्षा बलों की कार्रवाई तेज हो गई थी। हालात ऐसे हो गए थे कि सामान्य जीवन की कल्पना भी मुश्किल लगने लगी थी। इसी दौरान उन्होंने अपनी पत्नी के साथ आत्मसमर्पण करने का फैसला किया।
आखिरकार दोनों ने गढ़चिरौली पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया।
पिता बनने की इच्छा ने दिखाई नई राह
आत्मसमर्पण के बाद कृष्णा के मन में पहली बार परिवार बढ़ाने की इच्छा जागी। उन्होंने पुलिस अधिकारियों से अपनी समस्या साझा की और बताया कि उनकी नसबंदी हो चुकी है।
उन्होंने पूछा कि क्या आधुनिक चिकित्सा तकनीक की मदद से नसबंदी को दोबारा खोला जा सकता है। पुलिस प्रशासन ने उनकी इस इच्छा को गंभीरता से लिया और चिकित्सकीय जांच के बाद सर्जरी कराई गई।
सर्जरी सफल रही और कुछ समय बाद उनके घर पहली बेटी का जन्म हुआ। आज उनकी दो बेटियां हैं और पूरा परिवार खुशहाल जीवन जी रहा है।
कृष्णा कहते हैं कि जब उनकी बेटियां उन्हें देखकर दौड़ती हुई आती हैं और “पापा आ गए” कहकर गले लगती हैं, तो वह खुशी शब्दों में बयान नहीं की जा सकती।

50 पूर्व नक्सलियों को मिला नया जीवन
गढ़चिरौली पुलिस की इस पहल के तहत अब तक 50 आत्मसमर्पित नक्सलवादियों की नसबंदी दोबारा खोली जा चुकी है। इनमें से 14 लोगों को संतान सुख प्राप्त हो चुका है, जबकि कई अन्य परिवार भी इस उम्मीद में हैं कि जल्द ही उनके घर भी खुशियां आएंगी।
इन लोगों का मानना है कि बच्चों के जन्म ने उनके जीवन को नई दिशा दी है। अब उनका ध्यान हिंसा या संघर्ष पर नहीं बल्कि परिवार, शिक्षा और भविष्य निर्माण पर केंद्रित है।
बच्चों के लिए देख रहे सुनहरे सपने
कृष्णा और मंदा स्वयं अधिक शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके। लेकिन वे अपनी बेटियों को अच्छी शिक्षा देना चाहते हैं।
उनकी बड़ी बेटी गांव के स्कूल में पढ़ती है और परिवार का सपना है कि वह आगे चलकर उच्च शिक्षा हासिल करे। कृष्णा का कहना है कि वे मजदूरी करके भी अपनी बेटियों की पढ़ाई जारी रखेंगे।
उनका मानना है कि शिक्षा ही बच्चों को बेहतर भविष्य दे सकती है और यही उनकी सबसे बड़ी पूंजी होगी।
जानू हेडो की कहानी भी प्रेरणादायक
पूर्व नक्सली जानू हेडो भी उन लोगों में शामिल हैं जिनकी नसबंदी दोबारा खोली गई। आज उनके परिवार में एक बेटा और एक बेटी है।
जानू कहते हैं कि बच्चे जीवन को अर्थ देते हैं। जंगल में रहते समय यह संभव नहीं था, लेकिन अब वे सामान्य नागरिक की तरह जीवन जी रहे हैं।
उनका मानना है कि बच्चों के कारण ही व्यक्ति अपने भविष्य के बारे में गंभीरता से सोचता है और समाज के प्रति जिम्मेदार बनता है।
नक्सली संगठन में क्यों कराई जाती थी नसबंदी?
विशेषज्ञों के अनुसार नक्सली संगठनों में सक्रिय सदस्यों को पारिवारिक जिम्मेदारियों से दूर रखने की नीति अपनाई जाती थी। जंगलों में लगातार अभियान, स्थान परिवर्तन और संघर्षपूर्ण परिस्थितियों के कारण बच्चों का पालन-पोषण लगभग असंभव माना जाता था।
इसी वजह से कई सदस्यों की शादी से पहले नसबंदी कर दी जाती थी। संगठन का उद्देश्य था कि सदस्य पूरी तरह आंदोलन के लिए समर्पित रहें।
पूर्व नक्सली शिवकुमार तल्लम बताते हैं कि जंगल में बच्चों के साथ रहना बेहद जोखिम भरा था। किसी भी समय सुरक्षा बलों की कार्रवाई हो सकती थी। ऐसे में परिवार बसाने का सवाल ही नहीं उठता था।
पुलिस की पुनर्वास नीति बनी उम्मीद
गढ़चिरौली पुलिस ने आत्मसमर्पित नक्सलियों के पुनर्वास को लेकर कई योजनाएं शुरू की हैं। इनमें रोजगार, आवास, आर्थिक सहायता और चिकित्सा सुविधाएं शामिल हैं।
इसी क्रम में नसबंदी रीओपन कार्यक्रम शुरू किया गया। अधिकारियों का मानना था कि यदि पूर्व नक्सली सामान्य पारिवारिक जीवन जी सकेंगे तो उनका समाज में पुनर्वास और अधिक प्रभावी होगा।
इस पहल का सकारात्मक परिणाम अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। जिन लोगों ने कभी हथियार उठाए थे, वे आज अपने बच्चों को स्कूल भेजने और उनका भविष्य संवारने में लगे हुए हैं।
जंगल में अप्रशिक्षित लोगों द्वारा होती थीं सर्जरी
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि जंगलों में कई नसबंदी सर्जरियां प्रशिक्षित सर्जनों के बजाय संगठन से जुड़े लोगों द्वारा की जाती थीं।
आत्मसमर्पण कर चुके अर्जुन इचामी बताते हैं कि उन्होंने जंगल में सैकड़ों नसबंदी सर्जरियां की थीं। उन्हें सीमित चिकित्सकीय प्रशिक्षण दिया गया था।
हालांकि चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि कई मामलों में सर्जरियां मानक प्रक्रियाओं के अनुरूप नहीं थीं। बाद में विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा आधुनिक तकनीक से इन प्रक्रियाओं को ठीक किया गया।
मुख्यधारा में लौटने की मिसाल
गढ़चिरौली में पूर्व नक्सलियों के पुनर्वास की यह कहानी केवल बच्चों के जन्म तक सीमित नहीं है। यह उन लोगों की कहानी है जिन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज में सम्मानजनक जीवन जीने का फैसला किया।
आज उनके घरों में बच्चों की किलकारियां गूंज रही हैं, खेतों में खेती हो रही है, बच्चे स्कूल जा रहे हैं और परिवार बेहतर भविष्य के सपने देख रहे हैं। यह बदलाव बताता है कि अवसर और सहयोग मिलने पर कोई भी व्यक्ति नई शुरुआत कर सकता है।
गढ़चिरौली की यह पहल पुनर्वास और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा उदाहरण बन गई है, जिसने कई पूर्व नक्सलियों की जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया है।








