सरकारी खजाने पर भूतिया हमला ; जलकल विभाग में 43 फर्जी कर्मचारियों से हर महीने 5.50 लाख की चपत
अनुराग गुप्ता की रिपोर्ट
शाहाबाद नगर पालिका परिषद में भ्रष्टाचार, फर्जी नियुक्तियों और सरकारी धन की बंदरबांट का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि जलकल विभाग में वर्षों से “भूतिया कर्मचारियों” के नाम पर सरकारी खजाने से हर महीने लाखों रुपये निकाले जा रहे हैं। इस कथित घोटाले का खुलासा तब हुआ जब नामित सभासदों ने विभाग का औचक निरीक्षण किया और मौके पर जो तस्वीर सामने आई, उसने हर किसी को हैरान कर दिया।
बताया जा रहा है कि विभागीय अभिलेखों में कुल 59 कर्मचारियों की तैनाती दर्ज है, लेकिन वास्तविकता में मौके पर केवल 16 कर्मचारी ही काम करते मिले। बाकी 43 कर्मचारी सिर्फ कागजों, फाइलों और वेतन भुगतान सूची में मौजूद पाए गए। आरोप है कि इन्हीं “भूतिया कर्मचारियों” के नाम पर हर महीने लगभग 5 लाख 50 हजार रुपये की अवैध निकासी की जा रही है।
निरीक्षण में खुला फर्जीवाड़े का खेल
जानकारी के अनुसार नामित सभासद यदुवीर और महेंद्र वाल्मीकि सुबह करीब 9:40 बजे जलकल विभाग पहुंचे। निरीक्षण के दौरान उन्हें विभाग में कर्मचारियों की वास्तविक संख्या और रिकॉर्ड में दर्ज कर्मचारियों की संख्या में भारी अंतर दिखाई दिया। सूत्रों के मुताबिक रजिस्टरों में दर्ज कई कर्मचारी मौके पर मौजूद ही नहीं थे, जबकि उनके नाम पर नियमित रूप से वेतन जारी हो रहा था।
सभासदों ने आरोप लगाया कि नगर पालिका में लंबे समय से फर्जी हाजिरी और कागजी कर्मचारियों का खेल चल रहा है। उन्होंने कहा कि विभाग में कई ऐसे नाम दर्ज हैं जिन्हें कभी कार्यालय में काम करते नहीं देखा गया, लेकिन हर महीने उनके बैंक खातों में वेतन पहुंच रहा है।
जनता के टैक्स के पैसों पर डाका?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह पैसा सीधे जनता के टैक्स और सरकारी राजस्व से आता है। जिस धन का उपयोग पानी, सफाई, सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर होना चाहिए, वही पैसा कथित रूप से फर्जी कर्मचारियों के जरिए निकाला जा रहा है।
लोगों का आरोप है कि नगर पालिका क्षेत्र में पेयजल व्यवस्था पहले से बदहाल है। कई मोहल्लों में नियमित पानी नहीं पहुंचता, सफाई व्यवस्था चरमराई हुई है और विकास कार्यों की गति बेहद धीमी है। इसके बावजूद नगर पालिका के खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं। अब इस कथित घोटाले के सामने आने के बाद लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर सरकारी पैसा कहां खर्च हो रहा था।
अधिकारियों और रसूखदारों की भूमिका पर सवाल
मामले में कुछ अधिकारियों, कर्मचारियों और रसूखदार लोगों की कथित मिलीभगत की भी चर्चा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि बिना संरक्षण के इतने बड़े स्तर पर फर्जी वेतन भुगतान संभव नहीं हो सकता।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई एक-दो महीने का खेल नहीं बल्कि लंबे समय से चल रहा संगठित भ्रष्टाचार हो सकता है। यदि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो करोड़ों रुपये के घोटाले का खुलासा हो सकता है।
सिर्फ जलकल विभाग तक सीमित नहीं मामला!
विभागीय सूत्रों और स्थानीय नागरिकों का दावा है कि यह खेल केवल जलकल विभाग तक सीमित नहीं है। नगर पालिका के अन्य विभागों—जैसे सफाई, प्रकाश और निर्माण अनुभाग—में भी इसी प्रकार फर्जी कर्मचारियों के नाम पर सरकारी धन निकाले जाने की आशंका जताई जा रही है।
सूत्रों का कहना है कि कई विभागों में कर्मचारी सिर्फ फाइलों और भुगतान रजिस्टरों में सक्रिय हैं, जबकि जमीनी स्तर पर उनकी मौजूदगी नहीं दिखती। यही वजह है कि नगर पालिका की व्यवस्था लगातार सवालों के घेरे में बनी हुई है।
हर महीने लाखों की निकासी, सालाना करोड़ों का अनुमान
यदि केवल जलकल विभाग की बात की जाए तो हर महीने लगभग 5.50 लाख रुपये की निकासी का आरोप है। इस हिसाब से साल भर में यह रकम 66 लाख रुपये से अधिक बैठती है। यदि अन्य विभागों की भी जांच होती है और वहां भी इसी तरह का फर्जीवाड़ा सामने आता है, तो पूरा मामला करोड़ों रुपये के घोटाले में बदल सकता है।
वित्तीय मामलों के जानकारों का कहना है कि इस प्रकार के मामलों में अक्सर फर्जी उपस्थिति, बैंक खातों और भुगतान प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में बैंक रिकॉर्ड और उपस्थिति रजिस्टर की गहन जांच बेहद जरूरी होगी।
जांच की मांग हुई तेज
मामला सामने आने के बाद स्थानीय समाजसेवियों, व्यापारियों और नागरिक संगठनों ने उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज कर दी है। लोगों का कहना है कि विजिलेंस या किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए ताकि पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हो सके।
कई लोगों ने जिलाधिकारी और शासन स्तर के अधिकारियों से मांग की है कि इस मामले में दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए। नागरिकों का कहना है कि यदि इस मामले को दबाने की कोशिश हुई तो जनता सड़क पर उतरने को मजबूर होगी।
डिजिटल निगरानी व्यवस्था पर भी उठे सवाल
इस पूरे मामले ने नगर पालिका की उपस्थिति और वेतन भुगतान प्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। लोगों का कहना है कि यदि बायोमेट्रिक उपस्थिति और डिजिटल सत्यापन व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती तो इस प्रकार का फर्जीवाड़ा संभव नहीं हो पाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय निकायों में कर्मचारियों की ऑनलाइन उपस्थिति, लाइव मॉनिटरिंग और नियमित ऑडिट व्यवस्था लागू करना समय की जरूरत बन चुका है।
प्रशासनिक कार्रवाई का इंतजार
फिलहाल पूरे मामले को लेकर नगर क्षेत्र में चर्चा तेज है। आम जनता की नजर अब प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई है। लोग जानना चाहते हैं कि क्या इस बार भी मामला फाइलों और जांच तक सीमित रहेगा या वास्तव में दोषियों पर कार्रवाई होगी।
यदि निष्पक्ष जांच कराई गई तो यह मामला प्रदेश स्तर पर बड़ा मुद्दा बन सकता है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन “भूतिया कर्मचारियों” के इस कथित खेल पर कितनी सख्ती दिखाता है और सरकारी खजाने को चूना लगाने वालों के खिलाफ क्या कदम उठाए जाते हैं।








