रिपोर्ट दुर्गा प्रसाद शुक्ला
झांसी। भारतीय सेना का इतिहास केवल रणभूमि में दुश्मन से मुकाबला करने वाले सैनिकों के शौर्य और पराक्रम की गाथाओं से नहीं बना है। इस इतिहास में ऐसे अनेक किरदार भी रहे हैं, जिन्होंने हथियार उठाकर नहीं, बल्कि सैनिकों के भीतर साहस, विश्वास और मानसिक दृढ़ता पैदा करके अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सेवानिवृत्त सूबेदार मेजर वी. बी. दीक्षित ऐसे ही एक सैन्यकर्मी रहे, जिनका जीवन भारतीय सेना की परंपरा, आस्था और राष्ट्रसेवा के अद्भुत संगम का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
उपलब्ध समाचार रिपोर्ट के अनुसार, वी. बी. दीक्षित ने स्वतंत्र भारत के बाद लड़े गए पांच प्रमुख युद्धों में से चार में प्रत्यक्ष रूप से अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध तथा 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान सेना के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विशेष बात यह रही कि उनका दायित्व केवल सैन्य इकाई के धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं था। वह सैनिकों के बीच विश्वास और मनोबल बनाए रखने वाले व्यक्ति के रूप में भी पहचाने जाते थे।
सेवानिवृत्ति के बाद भी जब सेना ने बुलाया तो लौट आए
वी. बी. दीक्षित वर्ष 1994 में भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हुए थे। सामान्य तौर पर सैन्य सेवा से विदाई के बाद व्यक्ति अपने परिवार और निजी जीवन में व्यस्त हो जाता है। दीक्षित भी सेवानिवृत्ति के बाद पेंशनभोगी का जीवन जी रहे थे, लेकिन देश और अपनी सैन्य इकाई के प्रति उनका जुड़ाव समाप्त नहीं हुआ था।
वर्ष 1999 में जब कारगिल युद्ध की परिस्थितियां बनीं, तब उनकी पुरानी सैन्य इकाई 108 मीडियम रेजिमेंट को उनकी जरूरत महसूस हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, यूनिट से आए बुलावे पर उन्होंने उम्र और सेवानिवृत्ति की परवाह किए बिना दोबारा सेना के साथ जुड़ने का निर्णय लिया।
यह प्रसंग अपने आप में उस सैन्य भावना को सामने लाता है, जिसमें वर्दी उतर जाने के बाद भी देश और साथी सैनिकों के प्रति जिम्मेदारी की भावना समाप्त नहीं होती। कारगिल युद्ध के दौरान दीक्षित की भूमिका धार्मिक और मनोबल संबंधी जिम्मेदारियों से जुड़ी रही।
पहली बोफोर्स तोप के साथ जुड़ा यादगार प्रसंग
कारगिल संघर्ष के दौरान द्रास क्षेत्र में भारतीय सेना और पाकिस्तानी घुसपैठियों के बीच जबरदस्त संघर्ष हुआ। उपलब्ध रिपोर्ट में बताया गया है कि गोलाबारी शुरू होने से पहले वी. बी. दीक्षित ने परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना की।
इसके बाद उन्होंने पहली बोफोर्स तोप का लीवर खींचा। इसके साथ ही भारतीय तोपखाने की कार्रवाई शुरू हुई। रिपोर्ट में इस कार्रवाई को पाकिस्तानी ठिकानों के खिलाफ भारतीय सेना की प्रभावी जवाबी कार्रवाई का हिस्सा बताया गया है।
यह प्रसंग केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उस समय सैनिकों के बीच विश्वास और मनोबल से भी जुड़ा हुआ था। युद्ध जैसी परिस्थितियों में जब सैनिक लगातार खतरे का सामना कर रहे होते हैं, तब मानसिक मजबूती और सामूहिक विश्वास भी उनकी कार्यक्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते हैं। दीक्षित की भूमिका इसी स्तर पर उल्लेखनीय रही।
1962 से कारगिल तक चार युद्धों के साक्षी
वी. बी. दीक्षित की सैन्य यात्रा का विस्तार कई दशकों तक रहा। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1960 में वह 108 मीडियम रेजिमेंट में नायब सूबेदार के रूप में शामिल हुए थे। यह वही तोपखाना इकाई थी, जिसने बाद के वर्षों में देश के विभिन्न युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ। इसके बाद 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध और 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से जुड़े भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी उन्होंने सैन्य इकाई के साथ सेवाएं दीं।
इस तरह उनका सैन्य जीवन उस दौर से होकर गुजरा जब भारतीय सेना को लगातार युद्ध और सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। रिपोर्ट में उन्हें उन सैनिकों में शामिल बताया गया है, जिन्होंने चार अलग-अलग युद्धों के दौरान देश की सेवा की।
1971 की लड़ाई में भी आया कठिन दौर
वी. बी. दीक्षित के सैन्य जीवन से जुड़ा एक उल्लेखनीय प्रसंग 1971 के युद्ध का भी है। रिपोर्ट के अनुसार, उस समय उनकी यूनिट फेनी नदी के निकट तैनात थी। युद्ध के दौरान उनकी यूनिट को दुश्मन की भारी गोलाबारी का सामना करना पड़ा।
दुश्मन की गोलाबारी का निशाना गोला-बारूद का डंप भी था। ऐसी स्थिति किसी भी सैन्य इकाई के लिए अत्यंत जोखिमपूर्ण हो सकती थी, क्योंकि गोला-बारूद के भंडार के आसपास हमला होने पर गंभीर नुकसान की आशंका रहती है।
रिपोर्ट के अनुसार, उस कठिन परिस्थिति में यूनिट ने संयम बनाए रखा। दीक्षित और उनके साथियों ने ईश्वर पर भरोसा रखते हुए परिस्थिति का सामना किया और सुरक्षित बाहर निकलने में सफल रहे। इसके बाद यूनिट के कमांडिंग ऑफिसर और अन्य अधिकारियों ने आक्रामक कार्रवाई की, जिसमें रिपोर्ट के मुताबिक दुश्मन की एक इकाई को भारी नुकसान पहुंचा।
इस प्रसंग में धार्मिक विश्वास और सैन्य अनुशासन दोनों एक साथ दिखाई देते हैं। दीक्षित की भूमिका सैनिकों को मानसिक रूप से मजबूत बनाए रखने वाले व्यक्ति की थी, जबकि युद्ध की रणनीतिक और सैन्य कार्रवाई सेना के कमांड ढांचे के तहत आगे बढ़ी।
राष्ट्रपतियों से मिले विशेष सम्मान
दीक्षित की सेवाओं का उल्लेख केवल उनकी सैन्य इकाई तक सीमित नहीं रहा। समाचार रिपोर्ट के अनुसार, उनकी सेवाओं के लिए उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपतियों आर. वेंकटरमन और शंकर दयाल शर्मा की ओर से विशेष प्रशस्तियां भी मिली थीं।
यह उनके लंबे सैन्य जीवन में प्राप्त सम्मान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा सकता है। चार युद्धों में भागीदारी, सैनिकों के बीच धार्मिक और मानसिक संबल की भूमिका तथा लंबे समय तक सैन्य इकाई से जुड़े रहना उनके सेवा जीवन की विशिष्टता को रेखांकित करता है।
सेना में धार्मिक भूमिका का अलग महत्व
भारतीय सेना में धार्मिक और आध्यात्मिक सेवाओं की अपनी एक परंपरा रही है। अलग-अलग धार्मिक समुदायों से आने वाले सैनिकों के लिए धार्मिक अधिकारी और संबंधित व्यवस्थाएं सैनिकों को मानसिक सहारा देने का काम करती हैं। युद्ध की परिस्थितियों में यह भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
वी. बी. दीक्षित इसी परंपरा से जुड़े रहे। उनका काम केवल पूजा-पाठ कराना नहीं था। सैनिकों के साथ रहना, कठिन परिस्थितियों में उन्हें मानसिक संबल देना और उनके भीतर विश्वास बनाए रखना भी उनके दायित्व का हिस्सा रहा।
युद्ध के मैदान में सैनिकों के पास हथियार और सैन्य प्रशिक्षण तो होता ही है, लेकिन लंबे समय तक तनावपूर्ण परिस्थितियों में मानसिक संतुलन बनाए रखना भी बड़ी चुनौती होती है। ऐसे समय में धार्मिक विश्वास और साथियों का मनोबल सैनिकों के लिए सहायक हो सकता है।
नब्बे की उम्र पार करने के बाद भी सक्रिय
रिपोर्ट में वी. बी. दीक्षित को नब्बे वर्ष से अधिक उम्र का बताया गया है। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह पूरी तरह सक्रिय बताए गए हैं। हालांकि उनके घुटनों में परेशानी है, जिसे रिपोर्ट में लद्दाख में बिताए उनके सैन्य कार्यकाल की याद से भी जोड़ा गया है।
सेवानिवृत्ति के बाद उनका जीवन धार्मिक गतिविधियों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा। लेकिन सैन्य सेवा की स्मृतियां और देश के प्रति उनका जुड़ाव आज भी उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा दिखाई देता है।
वी. बी. दीक्षित की कहानी इस बात को रेखांकित करती है कि राष्ट्रसेवा हमेशा केवल हथियार लेकर सीमा पर खड़े होने का नाम नहीं है। सेना के भीतर अलग-अलग भूमिकाएं निभाने वाले लोग मिलकर सैन्य शक्ति का निर्माण करते हैं। कोई मोर्चे पर लड़ता है, कोई रणनीति बनाता है, कोई चिकित्सा सेवा देता है और कोई सैनिकों के मनोबल को मजबूत करता है।
चार युद्धों से जुड़े उनके लंबे सैन्य जीवन में यही भूमिका सबसे अलग दिखाई देती है। 1962 से 1971 और फिर 1999 के कारगिल युद्ध तक उनका सफर भारतीय सैन्य इतिहास के कई महत्वपूर्ण अध्यायों का साक्षी रहा। सेवानिवृत्ति के बाद कारगिल युद्ध के समय फिर सेना के बुलावे पर लौटना इस बात का उदाहरण है कि उनके लिए सैन्य सेवा केवल नौकरी नहीं, बल्कि जीवन का एक गहरा दायित्व थी।
वी. बी. दीक्षित की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें युद्ध की वीरता के साथ-साथ विश्वास, अनुशासन, मानसिक दृढ़ता और कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता की कहानी भी दिखाई देती है। चार युद्धों के अनुभवों से गुजर चुके इस पूर्व सैनिक ने अपनी भूमिका में हथियार से अधिक सैनिकों के मनोबल को महत्व दिया और इसी कारण उनका जीवन भारतीय सेना की उन अनकही कहानियों में शामिल होता है, जिन्हें याद किया जाना चाहिए।













