17 अक्टूबर 2026 10:01 अपराह्न

फर्जी RBI जीएम बनकर 95 लाख की ठगी, कानपुर में पति-पत्नी गिरफ्तार

कानपुर साइबर ठगी मामले में गिरफ्तार पति-पत्नी के साथ रिपोर्टर चुन्नीलाल प्रधान की फीचर इमेज

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चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश के कानपुर में साइबर अपराध का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां खुद को भारतीय रिजर्व बैंक यानी Reserve Bank of India (RBI) का जनरल मैनेजर बताकर एक रिटायर्ड जूनियर इंजीनियर से करीब 95 लाख रुपये की डिजिटल ठगी कर ली गई। इस हाईटेक फ्रॉड में शामिल एक पति-पत्नी को पुलिस ने गिरफ्तार कर पूरे नेटवर्क का खुलासा किया है।

साइबर अपराधियों ने बेहद शातिर तरीके से फर्जी वेबसाइट तैयार कर पीड़ित को अपने जाल में फंसाया। इसके बाद प्रोसेसिंग फीस, टैक्स क्लीयरेंस, फाइल चार्ज और अन्य बहानों के जरिए लगातार रकम ट्रांसफर करवाई जाती रही। जब तक पीड़ित को ठगी का अहसास हुआ, तब तक उसकी जीवनभर की जमा पूंजी साइबर ठगों के खातों में पहुंच चुकी थी।

गूगल सर्च बना ठगी का रास्ता

जानकारी के अनुसार, पीड़ित रिटायर्ड जूनियर इंजीनियर अपनी पुरानी बीमा पॉलिसी की मैच्योरिटी राशि प्राप्त करने के लिए इंटरनेट पर संबंधित जानकारी खोज रहे थे। इसी दौरान उन्होंने गूगल पर एक वेबसाइट देखी, जो देखने में बिल्कुल आधिकारिक वेबसाइट जैसी लग रही थी।

साइबर अपराधियों ने इस वेबसाइट को इस तरह डिजाइन किया था कि आम व्यक्ति आसानी से धोखा खा जाए। वेबसाइट पर मौजूद कस्टमर सपोर्ट और संपर्क नंबर भी पूरी तरह फर्जी थे, लेकिन उन्हें इस प्रकार प्रदर्शित किया गया था कि वे किसी बड़े वित्तीय संस्थान से जुड़े लगें।

जैसे ही पीड़ित ने वेबसाइट पर अपनी निजी जानकारी और बैंकिंग डिटेल्स दर्ज कीं, साइबर ठग सक्रिय हो गए। इसके बाद आरोपियों ने फोन कॉल और डिजिटल माध्यमों से पीड़ित से संपर्क साधा और खुद को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का वरिष्ठ अधिकारी बताना शुरू कर दिया।

खुद को RBI का जीएम बताकर जमाया भरोसा

मुख्य आरोपी ने बेहद आत्मविश्वास के साथ खुद को RBI का जनरल मैनेजर बताया। उसने पीड़ित को विश्वास दिलाया कि उनकी रुकी हुई बीमा राशि जल्द जारी कर दी जाएगी।

साइबर ठगों ने शुरुआत में छोटी रकम जमा करवाने की बात कही ताकि पीड़ित को किसी प्रकार का संदेह न हो। बाद में अलग-अलग बहानों से लगातार पैसे मांगे जाने लगे।

कभी फाइल चार्ज, कभी दस्तावेज सत्यापन शुल्क, कभी टैक्स क्लीयरेंस और कभी प्रोसेसिंग फीस के नाम पर रकम ट्रांसफर करवाई जाती रही। आरोपी इतने सुनियोजित तरीके से बातचीत करते थे कि पीड़ित को लंबे समय तक यह एहसास ही नहीं हुआ कि वह साइबर ठगी का शिकार बन चुका है। धीरे-धीरे रकम बढ़ती गई और कुल मिलाकर करीब 95 लाख रुपये विभिन्न बैंक खातों में ट्रांसफर करवा लिए गए।

रकम डूबने का अहसास होने पर पुलिस से लगाई गुहार

जब काफी समय बीतने के बाद भी बीमा पॉलिसी की राशि खाते में नहीं पहुंची और आरोपी लगातार नए बहाने बनाते रहे, तब पीड़ित को संदेह हुआ।

इसके बाद उन्होंने पूरे मामले की शिकायत पुलिस से की। शिकायत मिलते ही पुलिस प्रशासन हरकत में आया और मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष जांच शुरू की गई।

साइबर सेल और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई

मामले की जांच के लिए डीसीपी सेंट्रल के निर्देशन में साइबर सेल और स्थानीय पुलिस की संयुक्त टीम गठित की गई। पुलिस ने बैंक खातों के लेनदेन, मोबाइल नंबरों, डिजिटल लोकेशन और सर्विलांस की मदद से आरोपियों तक पहुंचने की रणनीति बनाई।

जांच के दौरान कई बैंक खातों और डिजिटल ट्रांजैक्शन की कड़ियां सामने आईं। तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने आखिरकार मुख्य आरोपी दीपक सिंह और उसकी पत्नी आंचल सिंह को गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, दोनों आरोपी लंबे समय से साइबर ठगी के नेटवर्क से जुड़े हुए थे और बेहद योजनाबद्ध तरीके से लोगों को निशाना बनाते थे।

ठगी के पैसों से खरीदी गई कार भी बरामद

पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से वारदात में इस्तेमाल किए गए कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए हैं। इनमें लैपटॉप, स्मार्टफोन, एटीएम कार्ड और अन्य डिजिटल डिवाइस शामिल हैं।

इसके अलावा ठगी के पैसों से खरीदी गई एक कार भी जब्त की गई है। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इस गिरोह में और कौन-कौन लोग शामिल हैं तथा किन-किन बैंक खातों का इस्तेमाल धन ट्रांसफर करने के लिए किया गया। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि आरोपियों ने इसी तरह अन्य लोगों को भी अपना शिकार बनाया है या नहीं।

डिजिटल ठगी के नए तरीके बढ़ा रहे चिंता

विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल तकनीक के विस्तार के साथ साइबर अपराधियों के तरीके भी लगातार आधुनिक होते जा रहे हैं। अब ठग केवल फोन कॉल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि फर्जी वेबसाइट, नकली मोबाइल एप, सोशल मीडिया लिंक और डिजिटल दस्तावेजों का उपयोग कर लोगों को फंसाने लगे हैं।

आमतौर पर बुजुर्ग, रिटायर्ड कर्मचारी और तकनीकी जानकारी कम रखने वाले लोग ऐसे अपराधियों का आसान निशाना बन जाते हैं। साइबर ठग भरोसा जीतने के लिए सरकारी संस्थानों, बैंकों और बीमा कंपनियों के नाम का इस्तेमाल करते हैं।

पुलिस ने लोगों को किया सतर्क

पुलिस प्रशासन ने इस घटना के बाद आम लोगों से विशेष सावधानी बरतने की अपील की है। अधिकारियों ने कहा है कि किसी भी बैंक, बीमा कंपनी या वित्तीय संस्था की वेबसाइट पर जाने से पहले उसके आधिकारिक डोमेन की जांच अवश्य करें।

यदि कोई व्यक्ति फोन पर खुद को बैंक अधिकारी या सरकारी एजेंसी का प्रतिनिधि बताकर पैसे मांगता है, तो बिना सत्यापन के कोई भी रकम ट्रांसफर न करें। पुलिस ने यह भी कहा कि किसी भी संदिग्ध वेबसाइट पर अपनी निजी जानकारी, ओटीपी, बैंक डिटेल्स या पासवर्ड साझा करने से बचें।

साइबर सुरक्षा के लिए अपनाएं ये सावधानियां

  • केवल आधिकारिक वेबसाइट और मोबाइल एप का ही उपयोग करें।
  • गूगल सर्च में दिखने वाले हर नंबर पर भरोसा न करें।
  • बैंक या बीमा कंपनी कभी फोन पर ओटीपी या पासवर्ड नहीं मांगती।
  • किसी भी ऑनलाइन भुगतान से पहले संबंधित संस्था की पुष्टि करें।
  • संदिग्ध कॉल आने पर तुरंत साइबर हेल्पलाइन या पुलिस से संपर्क करें।
  • समय-समय पर बैंक खातों की गतिविधियों की जांच करते रहें।

बढ़ते साइबर अपराध प्रशासन के लिए चुनौती

देशभर में तेजी से बढ़ रहे साइबर अपराध अब कानून व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं। डिजिटल इंडिया के दौर में जहां ऑनलाइन सेवाओं का दायरा बढ़ा है, वहीं साइबर अपराधी भी नई तकनीकों का दुरुपयोग कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि केवल पुलिस कार्रवाई से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। आम लोगों को भी डिजिटल जागरूकता बढ़ानी होगी।

कानपुर पुलिस की इस कार्रवाई को एक बड़ी सफलता माना जा रहा है, लेकिन यह मामला यह भी दर्शाता है कि थोड़ी सी असावधानी किस तरह किसी व्यक्ति की जीवनभर की कमाई को खतरे में डाल सकती है।

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