19 अक्टूबर 2026 1:40 पूर्वाह्न

चुंबन से सियासत तक! गांधी से राहुल तक के प्रतीकों पर उठे सवाल, राजनीति का असली चेहरा कौन दिखाएगा?

व्यंग्यकार अनिल अनूप की तस्वीर के साथ राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के सार्वजनिक स्नेह के दृश्य, महात्मा गांधी, भारतीय राजनीति, वायरल तस्वीरों और सियासी विमर्श को दर्शाती जनगणदूत की लैंडस्केप फीचर इमेज।

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जनगणदूत विशेष | व्यंग्यात्मक टिप्पणी | लेखक: अनिल अनूप

क्या आज की राजनीति में विचारों से अधिक तस्वीरें बोलती हैं? क्या सार्वजनिक मंच पर किसी नेता का सहज व्यवहार भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाता है? और क्या कैमरे के सामने घटने वाला एक क्षण उस नेता की पूरी राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधि बन सकता है? भारतीय राजनीति के वर्तमान रंगमंच पर ये सवाल जितने दिलचस्प हैं, उतने ही विचारणीय भी। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के बीच भारत जोड़ो यात्रा के दौरान सामने आया सार्वजनिक स्नेह का दृश्य इसी बहस का एक उदाहरण है।

जनवरी 2023 में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने मंच पर अपनी बहन प्रियंका गांधी को गले लगाया और गाल पर चूमा। इंडिया टुडे ने 3 जनवरी 2023 को इस घटना की रिपोर्ट प्रकाशित की। टाइम्स ऑफ इंडिया और एनडीटीवी ने भी उस दृश्य का उल्लेख किया। अर्थात घटना कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं, बल्कि समाचार माध्यमों में दर्ज सार्वजनिक प्रसंग है। लेकिन तस्वीर में जो दिखाई देता है, उससे आगे उसकी राजनीतिक मंशा का फैसला करना अलग विषय है।

यहीं से व्यंग्य की कलम अपना रास्ता खोजती है। सवाल यह नहीं कि भाई ने बहन को स्नेह क्यों दिया। सवाल यह है कि राजनीति के इस युग में सार्वजनिक व्यवहार, कैमरे की मौजूदगी और राजनीतिक छवि के बीच संबंध किस तरह जनता की बहस का हिस्सा बन जाते हैं। राजनीति में कभी तलवारों की धार चर्चा में रहती थी, फिर भाषणों की धार आई और अब तस्वीरों के कैप्शन भी सियासी हथियार बन गए हैं।

वैदिक काल से लोकतंत्र तक: राजधर्म बदला या केवल दरबार का रंग?

प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में शासक के दायित्व, न्याय, सामाजिक व्यवस्था और लोककल्याण पर गंभीर विचार मिलता है। वैदिक साहित्य में सभा और समिति जैसे संस्थागत संदर्भ हैं, जबकि बाद के भारतीय राजनीतिक विचार में राजधर्म तथा प्रजा के हित को महत्वपूर्ण स्थान मिला। हालांकि प्राचीन शासन प्रणालियों को आज के लोकतंत्र के समान मानना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं होगा, लेकिन एक मूल प्रश्न तब भी प्रासंगिक था और आज भी है: सत्ता का वास्तविक मूल्यांकन किस आधार पर होना चाहिए?

पुराने राजदरबारों में राजा के पराक्रम, दान, न्याय और प्रजा की सुरक्षा की चर्चा होती थी। आज लोकतंत्र में नेता की लोकप्रियता का हिसाब चुनावी परिणामों, जनसभाओं, नीतियों और डिजिटल पहुंच से लगाया जाता है। फर्क यह है कि अब एक तस्वीर कुछ ही मिनटों में हजारों राजनीतिक व्याख्याओं को जन्म दे सकती है। कोई उसे पारिवारिक स्नेह कहता है, कोई जनसंपर्क का दृश्य, कोई प्रचार का अवसर और कोई विरोधी पर कटाक्ष करने का बहाना।

राजनीति की विडंबना देखिए। बेरोजगारी पर गंभीर सवाल उठाइए तो बहस आंकड़ों में उलझ सकती है। महंगाई का मुद्दा उठाइए तो पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे के पुराने बयान खोजने लगते हैं। लेकिन किसी नेता की तस्वीर सामने आ जाए तो डिजिटल दरबार में अचानक न्यायाधीशों की संख्या बढ़ जाती है। हर व्यक्ति अपनी अदालत लगाता है और फैसला सुनाने की जल्दी में संदर्भ की फाइल अक्सर मेज के नीचे चली जाती है।

राजधर्म का आधुनिक रूप यही होना चाहिए कि जनता को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और न्याय मिले। नेता का निजी व्यवहार कानून और सार्वजनिक जिम्मेदारी के दायरे में हो, लेकिन उसकी तस्वीर को बिना प्रमाण चरित्र का अंतिम प्रमाणपत्र न बना दिया जाए।

चाणक्य की रणनीति और आज के कैमरे के सलाहकार

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में शासन, कूटनीति, प्रशासन, सुरक्षा और राज्य के संचालन की व्यावहारिक चुनौतियों पर विचार किया गया। आधुनिक राजनीति में भी रणनीति का महत्व कम नहीं हुआ है, लेकिन आज रणनीति का एक नया क्षेत्र उभर आया है—छवि प्रबंधन। कौन-सा दृश्य सार्वजनिक होगा, किस वक्त वक्तव्य दिया जाएगा, कौन-सी तस्वीर समर्थकों तक पहुंचेगी और किस घटना पर विरोधी की प्रतिक्रिया को राजनीतिक बहस में बदला जाएगा, इन सबका महत्व बढ़ गया है।

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बीच सार्वजनिक स्नेह के दृश्य को भी इसी व्यापक मीडिया संस्कृति के संदर्भ में देखा जा सकता है। समाचार माध्यमों ने उस क्षण को खबर बनाया, सोशल मीडिया ने उसे साझा किया और राजनीतिक दर्शकों ने अपनी-अपनी दृष्टि से उसका अर्थ निकाला। यह आधुनिक राजनीति का दृश्यात्मक पक्ष है। लेकिन केवल इतना जान लेने से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उस क्षण की योजना किसी खास राजनीतिक लाभ के लिए बनाई गई थी।

व्यंग्य का निशाना यहां किसी भाई-बहन का संबंध नहीं, बल्कि वह राजनीतिक मानसिकता होनी चाहिए जो प्रत्येक दृश्य को तत्काल रणनीति घोषित कर देती है। यदि कोई नेता मुस्कराए तो कहा जाता है कि वह अभिनय कर रहा है; गंभीर दिखे तो कहा जाता है कि वह नाटक कर रहा है; जनता से मिले तो प्रचार और न मिले तो अहंकार। ऐसी कसौटी पर कोई भी नेता हर समय दोषी सिद्ध किया जा सकता है, क्योंकि फैसला पहले लिख दिया गया और प्रमाण बाद में खोजे जा रहे हैं।

राजनीति में रणनीति की आलोचना जरूर होनी चाहिए, लेकिन रणनीति का आरोप प्रमाण के साथ होना चाहिए। अन्यथा चाणक्य का नाम लेने वाले भी अपनी कल्पना को ही राजनीति का सबसे बड़ा शास्त्र मान बैठेंगे।

महात्मा गांधी का संदर्भ: इतिहास को आज के कैमरे में कैद नहीं किया जा सकता

महात्मा गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्रीय व्यक्तित्व थे। उनके सार्वजनिक जीवन में जनसंपर्क, संवाद, सत्याग्रह, अहिंसा और नैतिक आग्रहों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। वे अलग-अलग समुदायों के लोगों से मिलते थे और अपने राजनीतिक अभियान को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ते थे। उनके जीवन और विचारों का मूल्यांकन ऐतिहासिक संदर्भ, उपलब्ध दस्तावेजों और उनके वास्तविक कार्यों के आधार पर होना चाहिए।

आज किसी नेता के व्यवहार की तुलना गांधीजी से करना हो तो तुलना का आधार स्पष्ट होना चाहिए। क्या चर्चा जनसंपर्क की है? क्या विषय सार्वजनिक जीवन में प्रतीकों का है? क्या सवाल नैतिकता के दावों और वास्तविक आचरण के बीच अंतर का है? यदि ऐसा है, तो ऐतिहासिक तुलना उपयोगी हो सकती है। लेकिन केवल किसी तस्वीर में निकटता दिखाई देने के आधार पर दो अलग-अलग युगों के व्यक्तित्वों को एक ही राजनीतिक निष्कर्ष में बांध देना इतिहास को सरल बनाने की कोशिश होगी।

गांधीजी के नाम का राजनीतिक उपयोग भी भारतीय राजनीति में लंबे समय से होता आया है। अलग-अलग दल उनके विचारों के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखते हैं। लेकिन किसी महापुरुष के प्रति वास्तविक सम्मान उसकी तस्वीर या नाम के इस्तेमाल से आगे जाता है। वह उसके विचारों, मूल्यों और सार्वजनिक उत्तरदायित्व पर गंभीर चर्चा की मांग करता है।

आज के नेताओं पर भी यही नियम लागू होना चाहिए। यदि कोई नेता नैतिकता की बात करता है, तो उसकी नीतियों और कार्यों की जांच होनी चाहिए। यदि वह महिला सम्मान की बात करता है, तो उसके दल और सरकार के व्यवहार पर प्रश्न पूछे जाने चाहिए। और यदि कोई विरोधी उसकी तस्वीर के आधार पर चरित्र का फैसला सुनाना चाहता है, तो उससे पूछा जाना चाहिए कि उसके निष्कर्ष का प्रमाण क्या है।

राहुल गांधी की तस्वीर और राजनीतिक संदेश का सवाल

राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। उनके राजनीतिक अभियानों, सार्वजनिक वक्तव्यों और यात्राओं पर मीडिया की नजर रहती है। भारत जोड़ो यात्रा भी कांग्रेस का एक व्यापक जनसंपर्क अभियान था। ऐसे अभियान में मंच पर नेताओं का व्यवहार और आपसी संवाद समाचारों में आना स्वाभाविक है।

जनवरी 2023 में सामने आए इस दृश्य में राहुल गांधी अपनी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ हंसते हुए दिखाई दिए और उन्हें गाल पर चूमा। समाचार रिपोर्टों ने इसे भाई-बहन के स्नेह के रूप में प्रस्तुत किया। इस तथ्य को स्वीकार करने के बाद अगला प्रश्न यह हो सकता है कि किसी सार्वजनिक राजनीतिक कार्यक्रम में निजी स्नेह का दृश्य मीडिया की चर्चा का विषय क्यों बनता है। लेकिन यह अलग बात है कि दृश्य से किसी खास राजनीतिक रणनीति या छिपे हुए उद्देश्य का निष्कर्ष निकाल लिया जाए।

राजनीतिक संचार में मानवीय क्षणों की अपनी भूमिका होती है। वे नेता को उसके भाषणों और नीतिगत वक्तव्यों से अलग एक व्यक्तिगत छवि में भी प्रस्तुत कर सकते हैं। समर्थक ऐसे दृश्यों को सहजता और पारिवारिक निकटता के रूप में देखते हैं। आलोचक कभी-कभी पूछते हैं कि सार्वजनिक मंच पर ऐसे दृश्यों को कितनी जगह मिलनी चाहिए। दोनों प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया जा सकता है, लेकिन किसी एक प्रतिक्रिया को प्रमाणित मंशा का पर्याय नहीं बनाया जाना चाहिए।

व्यंग्य का प्रश्न यह है कि क्या हमारी राजनीतिक बहस इतनी दृश्य-केंद्रित हो गई है कि नेता की एक तस्वीर उसके पूरे राजनीतिक रिकॉर्ड से अधिक चर्चा पा जाती है? यदि ऐसा है, तो नुकसान केवल किसी एक दल का नहीं है। इससे जनता का ध्यान नीतियों, संसदीय बहस, सरकारी जवाबदेही और चुनावी वादों से हट सकता है।

अविवाहित नेता, निजी जीवन और सार्वजनिक जवाबदेही

भारतीय राजनीति में नेताओं के परिवार, विवाह और निजी संबंधों पर अक्सर चर्चा होती है। मगर किसी व्यक्ति का अविवाहित होना उसकी राजनीतिक योग्यता का प्रमाण भी नहीं है और अयोग्यता का प्रमाण भी नहीं। लोकतंत्र में सार्वजनिक पद की कसौटी संविधान के प्रति निष्ठा, कानून का पालन, नीति संबंधी समझ, सार्वजनिक कार्य और जनता के प्रति जवाबदेही होनी चाहिए।

यदि किसी नेता की नीति गलत है, तो उसकी आलोचना नीति के आधार पर कीजिए। यदि उसके भाषण में तथ्यात्मक त्रुटि है, तो प्रमाण सामने रखिए। यदि वह अपने सार्वजनिक दायित्वों को पूरा नहीं करता, तो उसके काम का हिसाब मांगिए। निजी स्थिति को राजनीतिक उपहास का केंद्र बना देने से आलोचना की वास्तविक धार कमजोर पड़ती है।

व्यंग्यकार को भी अपनी कलम से यह पूछना चाहिए कि क्या वह सत्ता की जवाबदेही पर चोट कर रहा है या केवल किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी को मजाक का विषय बना रहा है। पहला रास्ता लोकतांत्रिक विमर्श को मजबूत कर सकता है; दूसरा रास्ता अक्सर क्षणिक चर्चा के बाद समाप्त हो जाता है।

महिला सम्मान का अर्थ फोटो फ्रेम से कहीं आगे है

महिलाओं के साथ तस्वीर खिंचवाना या मंच पर उनके साथ खड़ा होना अपने आप में महिला सशक्तीकरण का प्रमाण नहीं है। उसी तरह किसी तस्वीर में निकटता दिखाई देने मात्र से अनुचित संबंध का निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं। महिला सम्मान का वास्तविक अर्थ समान अवसर, सुरक्षा, न्याय, निर्णय लेने में भागीदारी और सार्वजनिक जीवन में बराबरी है।

सभी राजनीतिक दलों से पूछा जाना चाहिए कि उनकी नीतियों में महिलाओं की भूमिका कितनी प्रभावी है। क्या महिलाओं को संगठन में निर्णयकारी जिम्मेदारियां मिलती हैं? क्या उनकी सुरक्षा से जुड़े मामलों पर लगातार काम होता है? क्या चुनावी मंचों पर सम्मान की बात करने वाले दल अपने व्यवहार में भी समानता का पालन करते हैं? इन सवालों का उत्तर फोटो के रंग, कोण या कैप्शन में नहीं, बल्कि नीतियों और परिणामों में मिलेगा।

व्यंग्य की भाषा में कहें तो महिला सम्मान कोई सजावटी पोस्टर नहीं, जिसे चुनाव के समय दीवार पर चिपकाकर कर्तव्य पूरा मान लिया जाए। यह निरंतर व्यवहार और जवाबदेही की मांग करता है। किसी नेता की तस्वीर पर बहस हो सकती है, मगर महिला अधिकारों पर बहस उससे कहीं अधिक गंभीर और जरूरी है।

सोशल मीडिया का दरबार: फैसला पहले, तथ्य बाद में

पहले राजदरबारों में प्रशस्तियां लिखी जाती थीं। आज डिजिटल मंचों पर समर्थक अपने नेताओं के पक्ष में संदेश लिखते हैं और विरोधी उन्हीं दृश्यों पर कटाक्ष करते हैं। पहले दरबार की चर्चा सीमित लोगों तक रहती थी; अब एक तस्वीर कुछ ही समय में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। तकनीक ने नागरिकों को अभिव्यक्ति के अधिक अवसर दिए हैं, लेकिन उसने अपुष्ट दावों को तेजी से फैलने का रास्ता भी दिया है।

एक ही तस्वीर को अलग-अलग शीर्षकों के साथ साझा किया जा सकता है। पुराना दृश्य नई घटना से जोड़ दिया जाता है। वीडियो का एक छोटा हिस्सा पूरे प्रसंग की तरह प्रस्तुत किया जाता है। इसलिए तस्वीर की तारीख, स्थान, स्रोत और मूल संदर्भ की जांच आवश्यक है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के इस प्रसंग में मूल समाचार रिपोर्टें घटना का समय और स्वरूप स्पष्ट करती हैं। किसी अन्य दावे को जोड़ने के लिए अलग प्रमाण चाहिए।

लोकतंत्र में आलोचना की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन तथ्य-जांच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। किसी नेता की आलोचना करने के लिए काल्पनिक आरोपों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। सार्वजनिक रिकॉर्ड, नीतियां, भाषण, संसदीय कामकाज और सरकारी निर्णय ही इतने व्यापक विषय हैं कि गंभीर आलोचना के लिए पर्याप्त आधार उपलब्ध करा सकते हैं।

असली राजनीतिक चुंबन: चुनावी वादे और जनता की उम्मीदें

यदि राजनीति पर तीखा व्यंग्य करना है, तो उसकी असली धार जनता और सत्ता के बीच के संबंध पर होनी चाहिए। चुनाव के समय जनता को रोजगार, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं, सुरक्षा और विकास के वादे दिए जाते हैं। इन वादों की पूर्ति का मूल्यांकन चुनावी प्रचार से अलग, वास्तविक नतीजों के आधार पर किया जाना चाहिए।

युवा भर्ती और रोजगार का हिसाब मांगते हैं। किसान लागत, बाजार और आय की स्थिरता पर प्रश्न उठाते हैं। महिलाएं सुरक्षा और समान अवसर चाहती हैं। विद्यार्थी विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और रोजगारोन्मुख शिक्षा की गुणवत्ता पर जवाब चाहते हैं। आम नागरिक महंगाई, सार्वजनिक सेवाओं और सरकारी योजनाओं के परिणामों का आकलन करता है। ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर किसी भी नेता को गंभीर प्रश्नों का सामना करना चाहिए।

जनता के साथ राजनीतिक निकटता का वास्तविक अर्थ यह है कि नेता नागरिकों की समस्याएं सुने, उनके अधिकारों के लिए काम करे और अपने वादों पर जवाब दे। मंच पर मुस्कराना या कैमरे के सामने सहज दिखाई देना अपने आप में न उपलब्धि है, न विफलता। उसकी वास्तविक राजनीतिक प्रासंगिकता उस व्यापक काम से तय होगी जिसे नेता अपने सार्वजनिक जीवन में करता है।

व्यंग्यकार की कलम यहां पूछ सकती है कि नेताओं की तस्वीरों पर बहस करने वाले नागरिक अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था का हिसाब भी उसी उत्साह से मांगते हैं या नहीं। यदि डिजिटल दरबार में तस्वीरों के लिए हजारों टिप्पणियां लिखी जा सकती हैं, तो सार्वजनिक बजट और चुनावी वादों पर सवाल पूछने के लिए भी उतनी ही नागरिक ऊर्जा होनी चाहिए।

पक्ष और विपक्ष के लिए अलग-अलग नैतिकता क्यों?

राजनीतिक बहस में अक्सर एक ही घटना के दो अर्थ निकाले जाते हैं। अपने नेता का सार्वजनिक व्यवहार सहजता और लोकप्रियता का प्रतीक बताया जाता है, जबकि विरोधी का वैसा ही व्यवहार दिखावा या प्रचार घोषित कर दिया जाता है। इस दोहरे मापदंड में तथ्य पीछे छूट जाता है और दलगत निष्ठा फैसला करने लगती है।

यदि किसी तस्वीर की प्रामाणिकता पर प्रश्न है, तो उसकी जांच कीजिए। यदि तस्वीर वास्तविक है, तो उसके संदर्भ को समझिए। यदि कोई सार्वजनिक हित का सवाल पैदा होता है, तो प्रमाण के आधार पर बहस कीजिए। लेकिन केवल इसलिए कि कोई दृश्य राजनीतिक रूप से असुविधाजनक है, उसे चरित्र का अंतिम फैसला बनाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।

यह कसौटी राहुल गांधी पर भी लागू होती है, नरेंद्र मोदी पर भी, क्षेत्रीय दलों के नेताओं पर भी और प्रत्येक सार्वजनिक प्रतिनिधि पर भी। लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सभी को है, लेकिन आलोचना का आधार तथ्य होना चाहिए। अपने नेता के लिए उदार और विरोधी के लिए कठोर प्रमाण-मानक अपनाने से सार्वजनिक विमर्श की विश्वसनीयता कमजोर होती है।

तस्वीर नहीं, सार्वजनिक काम इतिहास लिखता है

वैदिक काल से आधुनिक लोकतंत्र तक शासन की संस्थाएं, संचार के माध्यम और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के तरीके बदलते रहे हैं। आज तस्वीरें और वीडियो सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे राजनीतिक संचार को प्रभावित कर सकते हैं, बहस पैदा कर सकते हैं और नेताओं की छवि के बारे में लोगों की धारणाओं को आकार दे सकते हैं। लेकिन वे किसी व्यक्ति की पूरी राजनीति का विकल्प नहीं हैं।

राहुल गांधी द्वारा जनवरी 2023 में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान प्रियंका गांधी वाड्रा को गाल पर चूमने की घटना समाचार माध्यमों में दर्ज है। इस तथ्य को स्वीकार करना और उस पर राजनीतिक-सांस्कृतिक विमर्श करना उचित है। लेकिन इसे किसी विशेष राजनीतिक रणनीति का प्रमाण मानने के लिए अलग साक्ष्य आवश्यक होगा। सार्वजनिक व्यवहार की आलोचना की जा सकती है, पर आलोचना और अप्रमाणित मंशा-निर्धारण के बीच की रेखा बनाए रखना जरूरी है।

राजनीति में प्रतीकों का महत्व है, लेकिन जनविश्वास का आधार केवल प्रतीक नहीं हो सकते। नेता के सार्वजनिक काम, नीतिगत प्रस्ताव, संसदीय भूमिका, जनता से संवाद और जवाबदेही ही उसके राजनीतिक जीवन की अधिक व्यापक तस्वीर बनाते हैं। गांधीजी जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का संदर्भ भी उनके विचारों और ऐतिहासिक संदर्भ की गंभीर समझ के साथ ही सार्थक है।

आखिर लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं कि नेता किसी सार्वजनिक तस्वीर में किसके साथ खड़ा है। प्रश्न यह है कि जनता के संकट के समय वह किसके साथ खड़ा है, उसके वादों का क्या हुआ और वह अपने सार्वजनिक दायित्वों का कितना निर्वहन करता है।

यदि राजनीति सचमुच रणभूमि है, तो वहां जीत का निर्णय केवल कैमरे की चमक, वायरल कैप्शन या समर्थकों की तालियों से नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में सबसे टिकाऊ पहचान सार्वजनिक काम, तथ्य और जनता के विश्वास से बनती है। तस्वीरें इतिहास का हिस्सा हो सकती हैं, लेकिन इतिहास का पूरा फैसला नहीं।

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