18 अक्टूबर 2026 7:26 पूर्वाह्न

मांदर बोला, जंगल डोला! झारखंड के लोकगीतों में थिरकती जिंदगी

झारखंड के लोकगीतों में मांदर की थाप, सरहुल, करमा, झूमर और डोमकच लोकनृत्य के साथ प्रस्तुतकर्ता तरुण मोहम्मद की तस्वीर दर्शाती फीचर इमेज।

सुनने के लिए यहां क्लिक करें

The specified slider id does not exist.

आलेख — अनिल अनूप

प्रस्तुति — तरुण मोहम्मद

सांझ धीरे-धीरे जंगलों के कंधों पर उतर रही है। दूर कहीं मांदर की थाप सुनाई देती है—पहले धीमी, फिर कुछ तेज, और फिर उसके साथ मिलती हुई कई आवाजें। किसी के स्वर में प्रेम की मिठास है, किसी में प्रिय के बिछोह की कसक, तो किसी में धरती के प्रति ऐसा अपनापन, जिसे शब्दों में पूरी तरह बांध पाना आसान नहीं। गांव की पगडंडी से गुजरती हवा जैसे उन स्वरों को अपने साथ लेकर साल के पेड़ों तक पहुंचा देना चाहती है। कुछ ही देर में गीत के साथ कदम थिरकने लगते हैं। यहां कोई मंच नहीं, कोई औपचारिक उद्घोषणा नहीं, तालियों की प्रतीक्षा करता कोई कलाकार नहीं। जीवन स्वयं गा रहा है और पूरा गांव उसका श्रोता भी है, सहभागी भी।

यह झारखंड है—जहां गीत केवल गले से नहीं निकलते, जीवन से निकलते हैं।

यहां जंगलों की अपनी स्मृतियां हैं, नदियों का अपना संगीत है, ऋतुओं की अपनी भाषा है और मनुष्य के सुख-दुख को सहेजने वाली लोकधुनों का अपना संसार। खेत में श्रम करते हाथों से लेकर पर्व में थिरकते पैरों तक, विवाह के आंगन से लेकर प्रकृति के उत्सव तक, संगीत जीवन के साथ चलता है। कभी वह प्रेमी के मन की बात कहता है, कभी बेटी की विदाई पर भर आने वाली आंखों का मौन खोलता है, कभी धरती के नवजीवन का स्वागत करता है और कभी उस सामूहिक पहचान को स्वर देता है, जिसे कोई समाज सदियों के अनुभवों से अर्जित करता है।

झारखंड के लोकगीतों को सुनना इसलिए भी एक अनूठा अनुभव है कि उनके भीतर केवल धुनें नहीं, एक सभ्यता की स्मृति सांस लेती है। हर गीत के पीछे कोई अवसर हो सकता है, कोई लोकविश्वास, कोई पारिवारिक प्रसंग, कोई श्रमशील दिन या किसी पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक पहुंचती हुई अनुभूति। शब्द बदल जाते हैं, गाने वाले बदल जाते हैं, समय की परिस्थितियां बदल जाती हैं, लेकिन गीत में सुरक्षित जीवन का कोई अंश फिर किसी नई आवाज में लौट आता है।

झारखंड की सांस्कृतिक भूमि अनेक समुदायों, भाषाओं और परंपराओं से मिलकर बनी है। यहां की लोकसंगीत परंपरा को किसी एक भाषा, एक धुन या एक समुदाय में समेटना उसके विस्तार को छोटा कर देना होगा। मुंडारी, संताली, हो, कुड़ुख, नागपुरी, खोरठा, कुरमाली और क्षेत्र में प्रचलित दूसरी भाषाओं-बोलियों के बीच लोकस्वरों की अलग-अलग धाराएं बहती हैं। कहीं स्वर खुलकर आकाश की ओर उठता है, कहीं गीत की पंक्तियां एक-दूसरे का उत्तर देती हैं, कहीं मांदर की गूंज नृत्य को गति देती है, तो कहीं किसी वाद्य की एकाकी धुन मन के भीतर उतरती चली जाती है। इन विविधताओं के बीच एक साझा भाव बार-बार उभरता है—मनुष्य अपने जीवन को प्रकृति, समुदाय और स्मृति से अलग करके नहीं देखता।

इस संगीत का सौंदर्य समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि यहां गीत को केवल सुनने की वस्तु नहीं माना जा सकता। बहुत बार वह किसी सामूहिक क्रिया का हिस्सा होता है। गीत उठता है तो लोग उसके साथ जुड़ते हैं; लय आगे बढ़ती है तो शरीर भी उसकी भाषा बोलने लगता है। लोकगीत का रचयिता हमेशा किसी पुस्तक के शीर्षक पृष्ठ पर दर्ज नाम नहीं होता। उसकी रचना कई बार पीढ़ियों के सामूहिक अनुभव में होती है। किसी ने एक पंक्ति कही, दूसरे ने उसे आगे बढ़ाया, किसी ने उसमें अपना दुख जोड़ दिया, किसी ने उसे नए अवसर के अनुरूप गाया—और धीरे-धीरे गीत समुदाय की धरोहर बन गया। इसीलिए लोकगीतों का साहित्यिक मूल्य केवल उनके शब्दों में नहीं, उस सामूहिक रचनात्मकता में भी है जो उन्हें जीवित रखती है।

जब साल के फूलों के साथ जागता है गीत

वसंत का आगमन जंगलों को नया रंग देता है। साल के पेड़ों पर फूल आते हैं, हवा में बदलते मौसम की आहट होती है और गांवों के भीतर प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव उत्सव का रूप लेने लगता है। सरहुल इसी जीवनानुभूति से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे मुंडा, उरांव और हो सहित अनेक समुदाय अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार मनाते हैं। साल के फूलों, धरती और सामुदायिक जीवन के बीच इस पर्व का गहरा संबंध है। झारखंड की सांस्कृतिक पहचान में सरहुल केवल एक उत्सव नहीं, प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंध की सार्वजनिक अभिव्यक्ति भी है।

सरहुल के गीतों की कल्पना कीजिए। उनके भीतर खिलते फूलों का उल्लास है, नए मौसम का स्वागत है, गांव की मंगलकामना है और उस धरती के प्रति आभार है, जो मनुष्य को जीवन देती है। यहां प्रकृति कोई दूर खड़ी सुंदर तस्वीर नहीं, जीवन का सहभागी है। पेड़ केवल लकड़ी नहीं, नदी केवल पानी नहीं और जंगल केवल संसाधन नहीं। इनसे मनुष्य की स्मृतियां, आजीविका, विश्वास और सांस्कृतिक पहचान जुड़ी हुई है। जब कोई समुदाय फूलों के मौसम में गीत गाता है, तो वह मानो अपने परिवेश से फिर एक बार संवाद करता है।

सरहुल की इस अनुभूति को संताली परंपरा के बाहा पर्व से भी समझा जा सकता है। बाहा का संबंध फूलों के खिलने और प्रकृति के नवजीवन से है। दोनों पर्वों में प्रकृति के प्रति आदर का भाव दिखाई देता है, लेकिन उनकी अपनी सांस्कृतिक पहचान और अनुष्ठान हैं। इन परंपराओं को एक ही रंग में रंग देने के बजाय उनकी विशिष्टताओं का सम्मान करना चाहिए। यही झारखंड की सांस्कृतिक बहुलता की खूबसूरती है—एक ही धरती पर प्रकृति के प्रति अपनापन कई भाषाओं, कई प्रतीकों और कई सुरों में व्यक्त होता है।

इन गीतों का साहित्यिक अर्थ भी यहीं खुलता है। फूल यहां केवल फूल नहीं रहते; वे जीवन की निरंतरता, नई शुरुआत और सामूहिक आशा के प्रतीक बन जाते हैं। ऋतु का बदलना समय के बदलने जैसा है, लेकिन लोकगीत उस परिवर्तन को उत्सव में बदल देता है। वह मनुष्य को याद दिलाता है कि जीवन केवल संघर्ष और जीविका का नाम नहीं; उसमें आभार, उल्लास और अपने परिवेश के साथ संबंध बनाए रखने की भी जगह है।

करम की डाल और युवाओं की धड़कन

फिर आता है करम या करमा का समय। मांदर और नगाड़े की थाप के बीच जब युवक-युवतियां गीत और नृत्य में शामिल होते हैं, तो लगता है जैसे पूरा गांव एक साझा लय में सांस ले रहा हो। करम पर्व झारखंड की प्रमुख लोक-सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल है। इसके साथ जुड़े गीतों और नृत्य में प्रकृति, सामुदायिक विश्वास, युवा ऊर्जा और जीवन की कामना एक-दूसरे से मिलते हैं। करम की डाल के आसपास जुटना और समूह में गाना-नाचना केवल मनोरंजन नहीं, सामाजिक संबंधों को फिर से मजबूत करने का अवसर भी है।

करमा गीतों में लय का विशेष महत्व है। उनमें आगे बढ़ने और लौटकर आने वाली गति है, जैसे कोई प्रश्न उठता हो और पूरा समूह अपने स्वर में उसका उत्तर देता हो। गीत के इस सामूहिक ढांचे में अकेले व्यक्ति का स्वर भी अपना स्थान पाता है, मगर वह समूह से कटता नहीं। कोई एक स्वर आरंभ करता है, दूसरे स्वर उसे थाम लेते हैं, फिर ताल सबको एक साझा गति दे देती है।

इस दृश्य में जीवन का एक सुंदर लोकतांत्रिक भाव भी छिपा है। गीत किसी एक के अधिकार में बंद नहीं रहता। उसमें शामिल होने के लिए किसी औपचारिक शिक्षा, किसी विशेष उपाधि या किसी बड़े मंच की आवश्यकता नहीं होती। लोक की अपनी कसौटी होती है—लय को महसूस करना, परंपरा का सम्मान करना और अपने स्वर से दूसरों के स्वरों को जगह देना। यह सामूहिकता संगीत को केवल कलात्मक अनुभव नहीं रहने देती; वह सामाजिक जुड़ाव की भाषा बन जाता है।

करमा के गीतों को सुनते हुए यह भी समझ में आता है कि लोकसंस्कृति में उल्लास और गंभीरता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। जिस परंपरा में रात भर नृत्य और गायन की ऊर्जा है, उसी में प्रकृति के प्रति श्रद्धा और जीवन की मंगलकामना भी है। उत्सव यहां जीवन की कठिनाइयों से आंख चुराने का साधन नहीं, उनसे जूझते हुए सामूहिक मन को बल देने का माध्यम है।

प्रेम, प्रतीक्षा और मन की अनकही बातें

लोकगीतों का संसार केवल पर्वों और अनुष्ठानों तक सीमित नहीं। उसमें मनुष्य का निजी जीवन भी पूरी कोमलता के साथ उपस्थित है। प्रेम, आकर्षण, प्रतीक्षा, रूठना, मनाना, दूरी और मिलन—इन भावों को लोकगीत जिस सहजता से व्यक्त करते हैं, वह किसी बड़े साहित्यिक कौशल से कम नहीं। प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए उन्हें भारी-भरकम शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। कभी प्रकृति का कोई दृश्य मन की दशा कह देता है, कभी प्रिय के आने-जाने का प्रसंग विरह को जन्म देता है, कभी किसी छोटी-सी घरेलू घटना में प्रेम की पूरी कहानी समा जाती है।

झारखंड की नागपुरी, खोरठा, संताली और अन्य क्षेत्रीय संगीत परंपराओं में प्रेम और श्रृंगार के अलग-अलग रंग मिलते हैं। झूमर जैसी लोकनृत्य-संगीत परंपराओं में लय, गीत और सामूहिक भागीदारी का खास स्थान है। झूमर की पहचान उसके एक ही रूप में नहीं बंधती; अलग-अलग क्षेत्रों और अवसरों के साथ उसकी शैली, गति और प्रस्तुति में विविधता दिखाई देती है। झूमर की लय में अक्सर ऐसा सहज आकर्षण होता है कि सुनने वाला केवल दर्शक बनकर नहीं रहना चाहता। संगीत उसे अपने भीतर खींचता है, जैसे कोई पुरानी स्मृति अचानक परिचित हो उठी हो।

लोकगीतों में प्रेम की सबसे मार्मिक विशेषता यह है कि वह केवल सुख का वर्णन नहीं करता। उसमें प्रतीक्षा की लंबाई भी है और दूरी की बेचैनी भी। प्रिय के लौटने की आशा, बिछुड़ने का दुख और मन में रह गई अनकही बात—ये सब लोकस्वरों में जगह पाते हैं। कई बार गीत की सादगी ही उसकी ताकत बन जाती है। जहां लिखित साहित्य में भाव को समझाने के लिए कई पृष्ठ खर्च हो सकते हैं, वहां लोकगीत की एक छोटी-सी पंक्ति, यदि सही अवसर पर गाई जाए, तो मन की पूरी दुनिया खोल सकती है।

यही लोकसाहित्य की खूबी है। वह भावनाओं को परिभाषित नहीं करता, उन्हें जीने की जगह देता है। गीत गाने वाला अपने अनुभव को स्वर देता है और सुनने वाला उसमें अपना अनुभव पहचान लेता है। इस तरह किसी एक व्यक्ति की बात धीरे-धीरे अनेक लोगों की बात बन जाती है। लोकगीत का निजी दुख भी सामूहिक अनुभव में बदल सकता है, और निजी प्रेम समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति में जगह पा सकता है।

विवाह के आंगन में हंसी, अपनापन और विदाई का दर्द

झारखंड के लोकजीवन में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, परिवारों और सामाजिक रिश्तों का उत्सव भी है। विवाह से जुड़े गीतों में इसलिए भावनाओं का पूरा संसार दिखाई देता है। कहीं हंसी-मजाक है, कहीं रिश्तेदारों के बीच चुहल, कहीं नए संबंध के स्वागत का उल्लास, तो कहीं बेटी के विदा होने की कल्पना से मन में उठती उदासी। डोमकच जैसी लोकनृत्य-संगीत परंपरा विवाह और सामाजिक उत्सवों से जुड़ी रही है, हालांकि उसके रूप और प्रचलन क्षेत्र तथा समुदाय के अनुसार बदलते हैं।

विवाह के गीतों की दुनिया में स्त्रियों की आवाज विशेष महत्व रखती है। घर-परिवार की रोजमर्रा की जिम्मेदारियों के बीच जो भाव सीधे कह पाना कठिन होता है, गीत उन्हें व्यक्त करने का अवसर देता है। किसी रिश्ते पर चुटकी ली जा सकती है, किसी व्यवहार पर हंसी उड़ाई जा सकती है, किसी आशंका को हल्के व्यंग्य में कहा जा सकता है। गीत का आंगन इस तरह संवाद का ऐसा स्थान बन जाता है, जहां सामाजिक मर्यादा के भीतर रहते हुए भी मन अपनी बात कह सकता है।

लेकिन जब विदाई का क्षण आता है, तो वही गीत भावनाओं का दूसरा रंग ग्रहण कर लेता है। हंसी के बीच पलती उदासी अचानक आंखों तक पहुंच जाती है। बेटी जिस घर में बचपन से बड़ी हुई, वह घर उसके पीछे रह जाने वाला है; जिन आंगनों में उसकी आवाज गूंजती थी, उनसे उसका संबंध बदलने वाला है। विदाई का गीत इस परिवर्तन को शब्द देता है। उसमें केवल बिछोह नहीं, रिश्तों की गहराई और स्मृतियों का भार भी है।

इन गीतों को साहित्यिक दृष्टि से देखें तो वे घरेलू जीवन के मौखिक दस्तावेज हैं। इनमें परिवार की संरचना, स्त्री के अनुभव, रिश्तों की अपेक्षाएं और सामाजिक व्यवहार के अनेक संकेत मिल सकते हैं। लोकगीत हर बार समाज की प्रशंसा ही नहीं करते; कभी-कभी वे उसके भीतर छिपी विडंबनाओं को भी सामने लाते हैं। हंसी के पीछे कोई शिकायत, छेड़छाड़ के भीतर कोई सामाजिक टिप्पणी और विदाई के भीतर किसी स्त्री की बदलती स्थिति का गहरा अनुभव छिपा हो सकता है। इसीलिए लोकगीतों को केवल मनोरंजन समझकर छोड़ देना उनके साहित्यिक महत्व को कम करके आंकना होगा।

खेत, श्रम और रोजमर्रा की जिंदगी का संगीत

झारखंड के लोकगीतों की एक महत्वपूर्ण धारा श्रम और रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी है। खेतों में काम, फसल की उम्मीद, मौसम की अनिश्चितता, घर की जिम्मेदारियां और सामूहिक श्रम—ये सभी लोकानुभव के हिस्से हैं। काम करते हुए गाया जाने वाला गीत समय की थकान को कम कर सकता है, साथ काम कर रहे लोगों के बीच तालमेल बना सकता है और कठिन श्रम को साझा अनुभव में बदल सकता है।

ऐसे गीतों की लय को केवल संगीत की तकनीकी कसौटी पर समझना पर्याप्त नहीं। उनकी गति कई बार काम की गति से जुड़ती है। हाथों की चाल, कदमों की ताल और सामूहिक आवाज एक-दूसरे का सहारा बनती हैं। श्रम यहां केवल शरीर की क्रिया नहीं रह जाता; उसमें गीत जुड़ते ही अनुभव का एक सांस्कृतिक आयाम पैदा हो जाता है। काम की कठिनाई मिट नहीं जाती, लेकिन उसे सहने और साझा करने का एक रास्ता बनता है।

कृषि और ऋतु से जुड़े गीत मनुष्य की आशाओं को भी सामने लाते हैं। बारिश का समय, खेतों की तैयारी, फसल की प्रतीक्षा और उपज के प्रति उम्मीद—इन सबमें प्रकृति की अनिश्चितता के साथ जीने का अनुभव शामिल है। किसान आकाश की ओर देखता है, धरती में बीज डालता है और परिणाम की प्रतीक्षा करता है। लोकगीत इस प्रतीक्षा को स्वर देते हैं। उनमें मेहनत का गर्व भी हो सकता है और विपरीत परिस्थितियों का दुख भी।

यहां एक गहरी साहित्यिक बात समझने योग्य है। लोकगीत जीवन को चमकदार बनाकर प्रस्तुत करने के लिए बाध्य नहीं हैं। वे भूख, श्रम, मौसम की मार, दूरी और अभाव को भी अपने भीतर जगह दे सकते हैं। उनकी सुंदरता इस बात में नहीं कि वे कठिनाइयों को छिपा देते हैं, बल्कि इस बात में है कि वे कठिनाइयों के बीच भी मनुष्य की आवाज को बचाए रखते हैं। कभी गीत प्रतिरोध का स्वर बनता है, कभी सांत्वना का, कभी उम्मीद का। इस तरह लोकसंगीत जीवन की सजावट नहीं, जीवन को समझने का माध्यम बन जाता है।

वाद्य जब बोलते हैं: मांदर, नगाड़ा और बांसुरी की भाषा

झारखंड की संगीत परंपरा में वाद्ययंत्र केवल गायन के पीछे चलने वाले सहायक उपकरण नहीं हैं। वे अपने ढंग से वातावरण बनाते हैं और गीत के भाव को आकार देते हैं। मांदर की गहरी थाप समूह को एक लय में बांधती है। नगाड़े और ढोल की गूंज उत्सव को दूर तक सुनाई देने वाली उपस्थिति देती है। झांझ और घुंघरू लय में चमक जोड़ते हैं, जबकि बांसुरी की धुन अपेक्षाकृत एकांत और कोमल अनुभूति जगा सकती है। अलग-अलग क्षेत्रों में इनके साथ अन्य पारंपरिक वाद्य भी प्रयुक्त होते हैं।

मांदर की थाप में एक ऐसा धरातलीय बल है, जो शरीर को लय के प्रति जाग्रत कर देता है। वह सुनाई भर नहीं देता, मानो पैरों के नीचे की जमीन तक पहुंचता है। जब समूह में लोग नृत्य करते हैं, तो थाप उन्हें अलग-अलग व्यक्तियों से एक सामूहिक आकृति में बदलती दिखाई देती है। संगीत यहां शरीर को भी भाषा देता है—कदमों के उठने, झुकने, मुड़ने और आगे बढ़ने में अर्थ पैदा होता है।

इसके विपरीत, बांसुरी की धुन कई बार श्रोता को भीतर की ओर ले जाती है। खुले परिवेश में बहती हवा, दूर तक फैली हरियाली और किसी अकेले क्षण का मौन—इनके साथ बांसुरी का स्वर एक अलग ही अनुभूति रच सकता है। यह कहना सही नहीं होगा कि हर वाद्य का केवल एक निश्चित भाव होता है; संगीत का असर अवसर, धुन, वादन और सुनने वाले के अनुभव से भी बनता है। लेकिन यही विविधता झारखंड की लोकसंगीत परंपरा को जीवंत बनाती है।

वाद्यों की दुनिया में कारीगरों और वादकों की भूमिका को भी नहीं भुलाया जाना चाहिए। कोई वाद्य बनाना, उसे ठीक स्वर में साधना और पीढ़ियों तक उसकी परंपरा को आगे बढ़ाना अपने आप में ज्ञान और कौशल का काम है। लोकसंगीत का संरक्षण केवल गीतों के शब्द लिख लेने से नहीं होगा; उन वाद्यों, उन्हें बनाने वाले हाथों और उन्हें बजाने वाले कलाकारों का सम्मान भी जरूरी है।

लोकगीतों में इतिहास की स्मृति और समाज की आवाज

लोकगीतों की एक विशेषता यह भी है कि वे औपचारिक इतिहास की किताबों से अलग ढंग से अतीत को सहेजते हैं। किसी गीत में पुरानी यात्रा की स्मृति हो सकती है, किसी में संघर्ष की गूंज, किसी में किसी स्थानीय नायक का उल्लेख, तो किसी में गांव और समुदाय के बदलते संबंधों की झलक। हर गीत को ऐतिहासिक घटना का प्रत्यक्ष प्रमाण मान लेना उचित नहीं, क्योंकि लोकस्मृति समय के साथ बदलती भी है। फिर भी गीतों में सुरक्षित सामूहिक अनुभव हमें यह समझने में मदद करता है कि लोगों ने अपने समय को किस तरह महसूस किया, याद रखा और अगली पीढ़ी तक पहुंचाया।

झारखंड की सांस्कृतिक पहचान में आदिवासी समाजों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके गीतों और नृत्यों में प्रकृति के साथ संबंध, सामुदायिक जीवन और अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को बचाए रखने की आकांक्षा कई रूपों में दिखाई देती है। लेकिन इस सांस्कृतिक संसार को केवल अतीत की वस्तु मानना भी भूल होगी। ये परंपराएं आज के जीवन में भी बदलती परिस्थितियों के बीच अपने अर्थ तलाश रही हैं। गांव से शहर की ओर पलायन, शिक्षा और रोजगार की नई संभावनाएं, संचार माध्यमों का विस्तार और बदलती जीवनशैली—इन सबका प्रभाव संगीत पर भी पड़ता है।

जब कोई युवा पारंपरिक गीत को नए वाद्य के साथ प्रस्तुत करता है, तो जरूरी नहीं कि वह अपनी परंपरा से दूर जा रहा हो। संभव है कि वह उसे नए श्रोताओं तक पहुंचाने का रास्ता तलाश रहा हो। दूसरी ओर, यदि किसी गीत की भाषा, संदर्भ और मूल भाव को समझे बिना उसे केवल आकर्षक धुन में बदल दिया जाए, तो उसके सांस्कृतिक अर्थ खोने का खतरा भी रहता है। परंपरा और प्रयोग के बीच यह तनाव किसी एक प्रदेश तक सीमित नहीं; हर जीवंत लोकसंस्कृति को इसका सामना करना पड़ता है।

इसलिए संरक्षण का अर्थ परंपरा को शीशे के भीतर बंद कर देना नहीं होना चाहिए। लोकगीत तभी जीवित रहेंगे जब लोग उन्हें गाएंगे, बच्चे उन्हें सुनेंगे, कलाकार उनका अर्थ समझाएंगे और नई पीढ़ी अपने अनुभवों के साथ उनका संवाद बनाएगी। रिकॉर्डिंग, अभिलेखन और डिजिटल माध्यम उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन वे उस जीवंत अवसर का पूरा विकल्प नहीं बन सकते जिसमें लोग आमने-सामने बैठकर गाते हैं, एक-दूसरे के स्वर को पकड़ते हैं और गीत को साझा अनुभव में बदल देते हैं।

लोकगीतों के दस्तावेजीकरण में भाषा और समुदाय के प्रति संवेदनशीलता भी उतनी ही जरूरी है। गीतों के बोल लिखते समय उनके मूल उच्चारण, स्थानीय शब्दों और संदर्भ को समझना चाहिए। जहां संभव हो, गीत गाने वाले लोगों और परंपरा के जानकारों का नाम दर्ज किया जाना चाहिए। इससे लोकसंगीत किसी अनाम सांस्कृतिक सामग्री की तरह नहीं, बल्कि उन लोगों की जीवित रचनात्मक धरोहर के रूप में सामने आएगा जिन्होंने उसे बचाए रखा है।

गीतों की साहित्यिक यात्रा अभी जारी है

आज जब संगीत कुछ ही क्षणों में मोबाइल की स्क्रीन से हजारों लोगों तक पहुंच सकता है, तब झारखंड के लोकगीतों के सामने अवसर भी हैं और चुनौतियां भी। नई रिकॉर्डिंग, मंचीय प्रस्तुतियां और डिजिटल मंच इन स्वरों को व्यापक श्रोता दे सकते हैं। पर इसके साथ यह जिम्मेदारी भी जुड़ती है कि लोकगीतों को केवल आकर्षक दृश्य या मनोरंजन की सामग्री बनाकर न छोड़ दिया जाए। उनके पीछे की भाषा, जीवन-पद्धति, सामाजिक संबंध और सांस्कृतिक स्मृति को भी समझा जाए।

लोकसंगीत की असली ताकत उसकी सहजता में है। वह कठिन विचार को भी जीवन के परिचित दृश्य से जोड़ सकता है। किसी फूल के खिलने में नई शुरुआत देखना, किसी सामूहिक नृत्य में एकता का अनुभव करना, किसी विदाई गीत में रिश्तों की गहराई पहचानना और श्रम के बीच उठते स्वर में मनुष्य का आत्मबल सुनना—ये सभी अनुभव लोकगीतों को साहित्य के व्यापक संसार से जोड़ते हैं। साहित्य केवल वह नहीं जो पुस्तक के पन्नों पर लिखा गया हो; वह भी साहित्यिक अनुभव है जो पीढ़ियों के कंठ से गुजरते हुए मनुष्य के भाव, कल्पना और सामाजिक स्मृति को जीवित रखता है।

झारखंड के लोकगीतों की यात्रा इसीलिए किसी बीते हुए समय की यात्रा भर नहीं है। वह वर्तमान में भी जारी है। जब सरहुल के अवसर पर प्रकृति के नवजीवन का स्वागत होता है, जब करम की लय पर युवा समूह में थिरकते हैं, जब विवाह के आंगन में हंसी और विदाई के स्वर साथ-साथ उठते हैं, जब खेतों और घरों के बीच काम करते लोग अपनी थकान को गीत में बदलते हैं—तब लोकसंगीत नए सिरे से जन्म लेता है।

और शायद इसी में इसकी सबसे बड़ी साहित्यिक खूबी छिपी है। लोकगीत किसी एक लेखक की संपत्ति नहीं, बल्कि उन असंख्य आवाजों का संसार हैं जिन्होंने जीवन को अपने ढंग से समझा और उसे सुरों में सुरक्षित किया। उनका सौंदर्य केवल उनके शब्दों में नहीं, उस अंतरंग संबंध में है जो गाने वाले, सुनने वाले और उस धरती के बीच बनता है जहां गीत जन्म लेता है।

जब अगली बार झारखंड की किसी शाम में दूर से मांदर की थाप सुनाई दे, तो उसे केवल उत्सव की आवाज समझकर अनसुना न कीजिएगा। संभव है, उस थाप में किसी पुराने प्रेम की स्मृति हो, किसी ऋतु का स्वागत हो, किसी परिवार की हंसी हो, किसी समुदाय का इतिहास हो या आने वाली पीढ़ी के लिए बचाकर रखी जा रही कोई सांस्कृतिक धरोहर। उस आवाज में मिट्टी की गंध भी है और मनुष्य के मन की नमी भी।

झारखंड के लोकगीत हमें बताते हैं कि संगीत जीवन के बाहर खड़ी कोई कला नहीं। वह जीवन के भीतर बहती हुई वह धारा है, जो मनुष्य को अपने परिवेश, अपने लोगों और अपनी स्मृतियों से जोड़े रखती है। जंगल बदल सकते हैं, गांवों के रास्ते बदल सकते हैं, समय के साथ वाद्यों और प्रस्तुतियों के रूप बदल सकते हैं—लेकिन जब तक कोई आवाज अपने अनुभव को गीत में ढालने के लिए उठती रहेगी, लोकसंगीत की यह यात्रा चलती रहेगी।

क्योंकि झारखंड की आत्मा में संगीत बसा है—और इस संगीत में केवल सुर नहीं, एक पूरी दुनिया धड़कती है।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Read More

Cricket Live Score

Rashifal

और पढ़ें