लेखक डाक्टर अनिल दिक्षित
रानी लक्ष्मीबाई और जॉन लैंग का संबंध भारतीय इतिहास की उन घटनाओं में से है, जहां तलवार उठाने से पहले एक रानी ने कानून, तर्क और प्रशासनिक अपील का रास्ता अपनाया था। 1853 में महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद झांसी के उत्तराधिकार का प्रश्न खड़ा हुआ। महाराजा ने मृत्यु से कुछ समय पहले आनंद राव नामक बालक को गोद लेकर उसका नाम दामोदर राव रखा था। रानी लक्ष्मीबाई का दावा था कि हिंदू परंपरा और झांसी से संबंधित पूर्व व्यवस्थाओं के अनुसार दामोदर राव को उत्तराधिकारी माना जाना चाहिए। लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ने इस दावे को राजनीतिक उत्तराधिकार के लिए स्वीकार नहीं किया और 1854 में झांसी को कंपनी के अधीन कर दिया।
इसी निर्णायक दौर में ऑस्ट्रेलियाई मूल के ब्रिटिश बैरिस्टर और पत्रकार जॉन लैंग का झांसी की रानी से संपर्क हुआ।*(कैसे?)* लैंग ने बाद में अपनी पुस्तक Wanderings in India में इस मुलाकात का विस्तृत विवरण लिखा। यही विवरण रानी लक्ष्मीबाई और जॉन लैंग की मुलाकात का सबसे चर्चित समकालीन अंग्रेजी वृत्तांत बन गया।
रानी लक्ष्मीबाई के सामने संकट आखिर क्या था?
रानी लक्ष्मीबाई के सामने केवल व्यक्तिगत अधिकार का प्रश्न नहीं था। असली विवाद झांसी के राजनीतिक उत्तराधिकार का था। महाराजा गंगाधर राव की कोई जीवित प्राकृतिक संतान नहीं थी। उनके निधन से पहले आनंद राव को गोद लिया गया और उसे दामोदर राव नाम दिया गया। रानी चाहती थीं कि इस दत्तक पुत्र को झांसी के उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता मिले।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की तत्कालीन विस्तारवादी नीति में दत्तक उत्तराधिकारी का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण बन चुका था। लॉर्ड डलहौजी के कार्यकाल में जिस नीति को सामान्यतः Doctrine of Lapse यानी विलय की नीति कहा जाता है, उसके तहत ऐसे आश्रित राज्यों को कंपनी अपने अधीन लेने का दावा करती थी, जहां शासक की प्राकृतिक संतान न हो और दत्तक उत्तराधिकारी को राजनीतिक उत्तराधिकार के लिए मान्यता न दी जाए। कैम्ब्रिज के ऐतिहासिक अध्ययन के अनुसार इस नीति के तहत कंपनी ने दत्तक उत्तराधिकार को कई राज्यों में राजनीतिक उत्तराधिकार के लिए अस्वीकार किया और झांसी का विलय 1854 में इसी व्यापक नीति के अंतर्गत हुआ।
ब्रिटिश पक्ष का तर्क यह था कि दत्तक पुत्र निजी संपत्ति और पारिवारिक उत्तराधिकार का अधिकारी हो सकता है, लेकिन राज्य की राजनीतिक सत्ता स्वतः उसके पास नहीं जाएगी। कंपनी के आधिकारिक दृष्टिकोण में झांसी के मामले में दत्तक पुत्र को राजनीतिक गद्दी का उत्तराधिकारी मानने से इनकार किया गया। उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों के संकलन में लॉर्ड डलहौजी ने भी इसी आधार पर झांसी को कंपनी के प्रशासन में लेने का समर्थन किया था।
यहीं से रानी लक्ष्मीबाई की कानूनी और राजनीतिक लड़ाई शुरू होती है।
क्या रानी ने तुरंत अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का रास्ता चुना था?
इतिहास का यह हिस्सा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि लोकप्रिय कथाओं में रानी लक्ष्मीबाई की छवि मुख्यतः युद्धभूमि की वीरांगना के रूप में सामने आती है। लेकिन 1853-54 के घटनाक्रम में उनका पहला रास्ता युद्ध नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व, अपील और कानूनी तर्क था।
उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों और गवर्नर-जनरल के सामने अपने दावे रखे। उनका तर्क था कि झांसी के उत्तराधिकार से जुड़े पूर्व समझौतों, स्थानीय परंपराओं और हिंदू उत्तराधिकार व्यवस्था को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ऐतिहासिक स्रोतों में उनके कई प्रतिवेदनों और अपीलों का उल्लेख मिलता है। बाद में उन्होंने जॉन लैंग को बैरिस्टर के रूप में अपने पक्ष की पैरवी के लिए नियुक्त किया। ऑक्सफोर्ड से संबंधित ऐतिहासिक संकलन में 1854 की रानी की अपीलों और जॉन लैंग द्वारा उनके बैरिस्टर के रूप में प्रस्तुत किए गए पत्राचार का उल्लेख मिलता है।
इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि रानी लक्ष्मीबाई ने कानूनी और प्रशासनिक माध्यमों से झांसी के विलय को रोकने की पूरी कोशिश की और इसी प्रक्रिया में जॉन लैंग उनके कानूनी प्रतिनिधि बने।
जॉन लैंग कौन थे?
जॉन लैंग मूलतः ऑस्ट्रेलियाई थे और भारत में वकालत, पत्रकारिता तथा लेखन से जुड़े रहे। वह ईस्ट इंडिया कंपनी के आलोचक माने जाते थे और भारतीय समाज तथा ब्रिटिश प्रशासन पर लिखते थे।
लैंग केवल वकील नहीं थे। वह लेखक और पत्रकार भी थे। उनकी रचनाओं में औपनिवेशिक भारत के प्रशासन, समाज और ब्रिटिश अधिकारियों के व्यवहार पर टिप्पणियां मिलती हैं। उनके जीवन पर शोध करने वाले इतिहासकारों के अनुसार, 1851 में उन्होंने आगरा के बैंकर ज्योति प्रसाद के मामले में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सफल कानूनी लड़ाई लड़ी थी। इसके कुछ ही वर्षों बाद 1854 में उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई के मामले में भी पैरवी की।
यही पिछला अनुभव संभवतः उनके चयन को समझने में मदद करता है। रानी को ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो अंग्रेजी प्रशासन और उसकी कानूनी भाषा को समझता हो तथा कंपनी के सामने भारतीय पक्ष की बात प्रभावी ढंग से रख सके।
रानी लक्ष्मीबाई और जॉन लैंग का संपर्क कैसे हुआ?
यहीं इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू सामने आता है।
जॉन लैंग ने स्वयं लिखा है कि 1854 में झांसी के विलय का आदेश जारी होने के लगभग एक महीने बाद उन्हें रानी की ओर से फारसी भाषा में लिखा हुआ एक पत्र मिला। पत्र सुनहरे कागज पर लिखा था और उसमें रानी ने उन्हें झांसी आने का अनुरोध किया था।
लैंग के अनुसार यह पत्र दो प्रतिष्ठित भारतीय व्यक्तियों के हाथ उनके पास पहुंचा। उनमें से एक झांसी के दिवंगत महाराजा का वित्तीय मंत्री था और दूसरा रानी का प्रधान वकील अर्थात वकील/वकील-ए-खास था।
इससे एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है—रानी और लैंग की पहली संपर्क-श्रृंखला सीधे किसी अचानक हुई मुलाकात से नहीं, बल्कि उनके प्रतिनिधियों के माध्यम से शुरू हुई थी।
लैंग ने यह भी लिखा कि रानी ने उनसे संपर्क एक ऐसे सिविल सेवा अधिकारी की सलाह पर किया था जो पहले किसी देशी दरबार में रेजिडेंट या गवर्नर-जनरल के एजेंट रह चुके थे और झांसी के विलय को अनुचित मानते थे।
अर्थात रानी ने किसी अपरिचित अंग्रेज वकील को अचानक नहीं चुन लिया था। उनके आसपास मौजूद राजनीतिक और प्रशासनिक संपर्कों के माध्यम से जॉन लैंग की पहचान बनी और फिर उन्हें झांसी बुलाया गया।
रानी ने जॉन लैंग को झांसी क्यों बुलाया?
जॉन लैंग के अपने शब्दों में रानी का उद्देश्य स्पष्ट था—वह यह जानना चाहती थीं कि क्या झांसी के विलय का आदेश रद्द या वापस कराया जा सकता है।
लैंग जब रानी से मिलने जा रहे थे, तब झांसी के विलय की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी थी। ब्रिटिश प्रशासन राज्य पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की तैयारी में था।
लैंग के अनुसार झांसी की आय लगभग छह लाख रुपये सालाना के बराबर बताई गई थी और खर्चों के बाद पर्याप्त राजस्व बचता था। विलय के बाद रानी को लगभग 6,000 पाउंड वार्षिक पेंशन दिए जाने की व्यवस्था की गई थी।
लेकिन रानी के लिए यह केवल आर्थिक प्रश्न नहीं था। उनके सामने एक ऐसा राज्य था जिसकी वह संरक्षिका और शासक बन सकती थीं, क्योंकि दत्तक पुत्र दामोदर राव नाबालिग था। लैंग ने लिखा कि महाराजा की इच्छा के अनुसार रानी दामोदर राव की संरक्षिका और उसके वयस्क होने तक उसकी रीजेंट हो सकती थीं।
इसलिए राज्य का विलय उनके राजनीतिक अधिकार, प्रशासनिक भूमिका और दत्तक पुत्र के भविष्य—तीनों पर सीधा असर डाल रहा था।
क्या जॉन लैंग को “वकील चुनने की मजबूरी” थी?
इस प्रश्न में शब्दों का चयन बहुत महत्वपूर्ण है।
यदि “मजबूरी” का अर्थ यह है कि रानी के पास किसी भी तरह का कानूनी प्रतिनिधित्व लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं था, तो यह कहना ऐतिहासिक रूप से बहुत कठोर होगा। उनके पास ब्रिटिश सरकार को प्रतिवेदन भेजने और राजनीतिक अपील करने के रास्ते पहले से मौजूद थे और उन्होंने उनका इस्तेमाल किया।
लेकिन यदि “मजबूरी” का अर्थ यह है कि ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन की कानूनी और राजनीतिक व्यवस्था में अपने दावे को प्रभावी ढंग से रखने के लिए उन्हें अंग्रेजी कानून और प्रशासनिक प्रक्रिया समझने वाले बैरिस्टर की आवश्यकता महसूस हुई, तो यह बात ऐतिहासिक परिस्थितियों से मेल खाती है।
रानी स्वयं ब्रिटिश प्रशासनिक कानूनी तंत्र का हिस्सा नहीं थीं। दूसरी ओर, कंपनी के अधिकारी, गवर्नर-जनरल और उनके सलाहकार अंग्रेजी प्रशासनिक व्यवस्था और औपनिवेशिक कानून की भाषा में निर्णय ले रहे थे। इसलिए जॉन लैंग की नियुक्ति एक रणनीतिक कदम थी।

जॉन लैंग की झांसी यात्रा
रानी का पत्र मिलने के समय लैंग आगरा में थे। उनके अनुसार आगरा से झांसी की यात्रा लगभग दो दिन की थी। वह रानी के निमंत्रण पर झांसी के लिए रवाना हुए।
यात्रा के दौरान झांसी के पूर्व वित्तीय मंत्री और रानी के प्रधान वकील उनके साथ थे। रास्ते में ग्वालियर में ठहराव हुआ और वहां से रानी की ओर से भेजे गए विशेष वाहन में उन्हें झांसी ले जाया गया।
यह विवरण केवल यात्रा का प्रसंग नहीं है। इससे यह पता चलता है कि रानी ने इस मुलाकात को अत्यंत गंभीर राजनीतिक और कानूनी अवसर माना था।
रानी और जॉन लैंग की ऐतिहासिक मुलाकात
झांसी पहुंचने के बाद लैंग की रानी से मुलाकात हुई। उनके संस्मरण के अनुसार यह बातचीत शाम से शुरू होकर देर रात तक चली।
रानी ने अपने मामले पर उनसे सलाह ली। मुख्य प्रश्न यही था कि क्या ब्रिटिश सरकार द्वारा झांसी के विलय का निर्णय पलटा जा सकता है।
लैंग ने उन्हें समझाया कि तत्कालीन गवर्नर-जनरल अपने स्तर पर झांसी को वापस करने का अधिकार नहीं रखता था और मामले को इंग्लैंड तक ले जाना अधिक उपयुक्त रास्ता हो सकता है। उन्होंने रानी को ब्रिटिश सम्राट के नाम याचिका भेजने की सलाह दी। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि पेंशन स्वीकार कर ली जाए, लेकिन यह स्पष्ट किया जाए कि पेंशन स्वीकार करना दामोदर राव के उत्तराधिकार के दावे को छोड़ना नहीं माना जाएगा।
यहीं से रानी की कानूनी लड़ाई का एक नया चरण शुरू हुआ।
रानी के तर्क क्या थे?
रानी के दावे का मूल आधार दामोदर राव की वैधता और झांसी के राजनीतिक अधिकार से जुड़ा था।
वह यह मानने को तैयार नहीं थीं कि दत्तक पुत्र को राजनीतिक उत्तराधिकार से पूरी तरह अलग कर दिया जाए। उनके पक्ष में हिंदू दत्तक परंपरा का प्रश्न था, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण झांसी और ब्रिटिश सत्ता के बीच पुराने संबंधों की व्याख्या थी।
ऐतिहासिक संकलनों में रानी के पत्रों से यह संकेत मिलता है कि उन्होंने पूर्व संधियों और झांसी के शासकों की स्थिति का हवाला दिया। उनका दावा केवल धार्मिक परंपरा पर आधारित नहीं था; उसमें राजनीतिक और संविदात्मक तर्क भी शामिल थे।
यही वह बिंदु है जहां रानी लक्ष्मीबाई की छवि केवल योद्धा की नहीं, बल्कि एक गंभीर राजनीतिक तर्क प्रस्तुत करने वाली शासक की भी दिखाई देती है।
ब्रिटिश सरकार ने दत्तक पुत्र को क्यों नहीं माना?
यह विवाद उस समय की ब्रिटिश नीति की व्यापक समस्या से जुड़ा था।
ईस्ट इंडिया कंपनी यह अंतर करती थी कि किसी भारतीय शासक का दत्तक पुत्र उसकी निजी संपत्ति और पारिवारिक स्थिति का उत्तराधिकारी हो सकता है, लेकिन राज्य की राजनीतिक सत्ता का उत्तराधिकारी तभी बनेगा जब ब्रिटिश सर्वोच्च सत्ता उसे मान्यता दे।
कैम्ब्रिज के ऐतिहासिक अध्ययन के अनुसार, ब्रिटिश नीति में दत्तक उत्तराधिकार के मामले में राजनीतिक उत्तराधिकार को स्वीकार न करने का सिद्धांत कई राज्यों के विलय में इस्तेमाल किया गया। झांसी 1854 में इसी प्रक्रिया का एक प्रमुख उदाहरण बनी।
इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रिटिश अधिकारियों और भारतीय पक्ष के बीच कानून की कोई साझा और निर्विवाद व्याख्या थी। उलटे, यही वह क्षेत्र था जहां संप्रभुता, संधियों, दत्तक परंपरा और ब्रिटिश सर्वोच्चता की परस्पर विरोधी व्याख्याएं सामने आईं।
जॉन लैंग की पैरवी का परिणाम क्या हुआ?
जॉन लैंग ने रानी के पक्ष को ब्रिटिश प्रशासन के सामने रखने में भूमिका निभाई, लेकिन वह झांसी को बचाने में सफल नहीं हुए।
1854 में झांसी का विलय कंपनी के अधीन हो गया। रानी को पेंशन दी गई और उन्हें झांसी के किले से हटना पड़ा।
ऐतिहासिक अभिलेखों में 1854 में जॉन लैंग द्वारा रानी की ओर से भेजे गए पत्राचार का भी उल्लेख मिलता है। एक ऐतिहासिक संकलन में 8 जून 1854 के रानी के प्रतिवेदन के साथ जॉन लैंग को उनका बैरिस्टर बताया गया है। इसके बाद भी रानी ने अपने दावे को छोड़ नहीं दिया और आगे भी ब्रिटिश अधिकारियों को पत्र भेजती रहीं।
इस प्रकार लैंग की नियुक्ति किसी एक मुकदमे तक सीमित नहीं थी। यह झांसी के विलय के विरुद्ध चलाए गए व्यापक राजनीतिक-कानूनी प्रयास का हिस्सा थी।
जॉन लैंग की नजर में रानी लक्ष्मीबाई
जॉन लैंग के संस्मरण का एक दूसरा महत्व भी है। उन्होंने रानी के व्यक्तित्व का अंग्रेजी में वर्णन किया। उनका विवरण रानी की शक्ल-सूरत, व्यवहार और बातचीत के बारे में समकालीन अंग्रेजी स्रोतों में चर्चित वर्णनों में शामिल है।
हालांकि यहां सावधानी जरूरी है। लैंग का वर्णन उनका व्यक्तिगत संस्मरण है, इसलिए उसे किसी निष्पक्ष प्रशासनिक रिपोर्ट की तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए। उसमें उनके व्यक्तिगत प्रभाव और दृष्टिकोण की छाप स्वाभाविक रूप से मौजूद है।
फिर भी उनके संस्मरण से यह स्पष्ट होता है कि रानी ने उनसे मुलाकात के दौरान अपने राजनीतिक मामले को गंभीरता से रखा था। लैंग ने लिखा कि उन्होंने रानी को समझाने की कोशिश की कि तत्कालीन सैन्य और प्रशासनिक परिस्थिति में सीधे टकराव से बचना उनके हित में होगा।
“मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी” और ऐतिहासिक तथ्य
रानी लक्ष्मीबाई से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध वाक्य है—“मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।”
यह वाक्य भारतीय जनस्मृति में उनकी पहचान का हिस्सा बन चुका है। लेकिन इतिहास लेखन में इसे सावधानी से देखना चाहिए। जॉन लैंग के संस्मरण में रानी के मुंह से इससे मिलता-जुलता वाक्य दर्ज है, जिसे उन्होंने रोमन लिपि में “Mera Jhansi nahin dengee” के रूप में लिखा।
इसलिए इस कथन की लोकप्रियता का आधार पूरी तरह आधुनिक लोककथा नहीं है; उसका एक ऐतिहासिक स्रोत जॉन लैंग का संस्मरण भी है। हालांकि बाद की साहित्यिक और लोक परंपराओं में इस वाक्य को अधिक व्यापक और नाटकीय अर्थ मिला।
क्या रानी और लैंग की मुलाकात के बाद सब कुछ बदल गया?
नहीं।
लैंग ने रानी को ब्रिटिश सत्ता के सामने उपलब्ध कानूनी और राजनीतिक रास्तों का इस्तेमाल करने की सलाह दी। लेकिन कंपनी का प्रशासन झांसी के विलय के निर्णय पर कायम रहा।
रानी ने इसके बाद भी अपने अधिकार का दावा छोड़ा नहीं। उन्होंने लगातार प्रतिवेदन और अपीलें जारी रखीं। 1854 के बाद भी यह प्रश्न उनके राजनीतिक जीवन का केंद्रीय मुद्दा बना रहा।
बाद में 1857 का विद्रोह शुरू हुआ और झांसी की परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं। रानी की भूमिका भी बदल गई। लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि 1857 से पहले की रानी लक्ष्मीबाई केवल युद्ध की तैयारी करने वाली शासक नहीं थीं; वह पहले अपने राज्य को संवैधानिक, प्रशासनिक और कानूनी तर्कों के माध्यम से बचाने का प्रयास कर रही थीं।
रानी लक्ष्मीबाई और जॉन लैंग की कहानी का असली महत्व
रानी लक्ष्मीबाई और जॉन लैंग की कहानी को केवल “एक भारतीय रानी ने अंग्रेज वकील को अपना मुकदमा लड़ने के लिए चुना” जैसी रोचक घटना मान लेना अधूरा होगा।
इस कहानी में औपनिवेशिक भारत की पूरी राजनीतिक संरचना दिखाई देती है।
एक तरफ झांसी की रानी थीं, जिनके सामने अपने दत्तक पुत्र के उत्तराधिकार और राज्य की राजनीतिक स्वायत्तता का प्रश्न था। दूसरी तरफ ईस्ट इंडिया कंपनी थी, जो अपने सर्वोच्च राजनीतिक अधिकार के आधार पर भारतीय राज्यों के उत्तराधिकार को नियंत्रित करने का दावा कर रही थी।
बीच में कानून था—लेकिन कानून की व्याख्या दोनों पक्ष अलग-अलग कर रहे थे।
रानी ने समझ लिया था कि केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं होगी। उन्हें उस सत्ता की भाषा में भी अपना पक्ष रखना होगा जो उनके राज्य के भविष्य का फैसला कर रही थी। इसलिए जॉन लैंग जैसे बैरिस्टर को साथ लेना उनकी राजनीतिक समझ का हिस्सा था।
तलवार से पहले कानून की लड़ाई
रानी लक्ष्मीबाई को जॉन लैंग के पास जाने की कहानी वास्तव में झांसी के अस्तित्व की लड़ाई का वह अध्याय है जिसे 1857 की वीरगाथा के पीछे अक्सर भुला दिया जाता है।
1853 में महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु और दामोदर राव के दत्तक उत्तराधिकारी बनने के बाद रानी ने ब्रिटिश सरकार से झांसी के राजनीतिक उत्तराधिकार की मान्यता मांगी। लॉर्ड डलहौजी की सरकार ने दत्तक पुत्र को राजनीतिक उत्तराधिकारी मानने से इनकार किया और 1854 में झांसी का विलय कर दिया।
इसके बाद रानी ने अपने दावे को आगे बढ़ाने के लिए जॉन लैंग की कानूनी विशेषज्ञता का सहारा लिया। लैंग के स्वयं के विवरण के अनुसार, उन्हें रानी ने अपने प्रधान वकील और दिवंगत महाराजा के वित्तीय मंत्री के माध्यम से पत्र भेजकर झांसी बुलाया था। उन्होंने रानी से मुलाकात की और विलय के आदेश को पलटवाने की संभावनाओं पर चर्चा की।
लैंग की पैरवी अंततः झांसी को कंपनी के कब्जे में जाने से नहीं रोक सकी। लेकिन उनकी भूमिका ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इससे पता चलता है कि रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजी सत्ता के सामने पहले कानून, तर्क, संधि और अपील के माध्यम से अपना अधिकार बचाने की कोशिश की थी।
इसलिए रानी लक्ष्मीबाई की कहानी केवल तलवार की कहानी नहीं है। यह उस महिला शासक की कहानी भी है जिसने औपनिवेशिक सत्ता की कानूनी भाषा को समझने वाले एक अंग्रेजी बैरिस्टर की सहायता लेकर अपने राज्य के अधिकार की लड़ाई लड़ी।
और जॉन लैंग से उनका संपर्क भी किसी संयोग मात्र का परिणाम नहीं था। यह एक सोची-समझी राजनीतिक और कानूनी रणनीति थी—ऐसी रणनीति जिसमें झांसी की रानी ने अपने सामने मौजूद हर शांतिपूर्ण और संवैधानिक रास्ते को आजमाया, इससे पहले कि इतिहास ने उन्हें 1857 की सबसे प्रसिद्ध वीरांगनाओं में शामिल कर दिया।














एक प्रतिक्रिया
Long Live Rani Jhansi Laxmi Bai 🪷