भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जा रही है। हाल ही में जारी पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़ों ने फिर यह संदेश दिया कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत गति से आगे बढ़ रही है। सरकार इसे वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में बड़ी उपलब्धि बता रही है। दूसरी ओर कुछ अर्थशास्त्रियों और पूर्व अधिकारियों ने इन आंकड़ों की व्याख्या और आधार वर्ष की गणना को लेकर सवाल भी उठाए हैं।
लेकिन इस पूरे विवाद से अलग एक सवाल ऐसा है जो आम आदमी के मन में लगातार उठ रहा है—यदि अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है, तो फिर आम नागरिक की आर्थिक स्थिति उतनी तेजी से क्यों नहीं सुधर रही? आखिर क्यों यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि अमीर और अमीर हो रहे हैं तथा गरीब और गरीबतर?
यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक वास्तविकताओं से जुड़ा हुआ है। जीडीपी वृद्धि और आम लोगों की समृद्धि के बीच मौजूद अंतर को समझे बिना इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल सकता।
जीडीपी बढ़ने का मतलब क्या है?
ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GDP) किसी देश में एक निश्चित अवधि में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल आर्थिक मूल्य का माप है। यदि जीडीपी बढ़ती है तो इसका अर्थ है कि अर्थव्यवस्था का कुल आकार बढ़ रहा है।
लेकिन एक महत्वपूर्ण तथ्य अक्सर चर्चा से बाहर रह जाता है। जीडीपी यह नहीं बताती कि उत्पन्न हुई संपत्ति किसके पास जा रही है।
यदि देश में 100 रुपये की अतिरिक्त संपत्ति पैदा हुई और उसमें से 80 रुपये पहले से संपन्न वर्ग के पास चले गए तथा केवल 20 रुपये शेष आबादी में बंटे, तो जीडीपी तो बढ़ेगी, लेकिन आर्थिक असमानता भी बढ़ेगी।
यही वह बिंदु है जहां विकास और वितरण के बीच अंतर पैदा होता है।
विकास की चमक और असमानता की परछाईं
पिछले दो दशकों में भारत ने उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति की है। देश दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। डिजिटल भुगतान, बुनियादी ढांचे, स्टार्टअप और सेवा क्षेत्र में तेज़ विस्तार हुआ है।
इसके बावजूद संपत्ति और आय के वितरण में असमानता लगातार बढ़ती दिखाई देती है।
अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध विभिन्न अध्ययनों के अनुसार भारत में कुल संपत्ति का बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत छोटे वर्ग के पास केंद्रित है। शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी राष्ट्रीय संपत्ति का अत्यधिक बड़ा हिस्सा नियंत्रित करती है जबकि निचले तबके की हिस्सेदारी सीमित बनी हुई है।
यह स्थिति केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और कई विकसित देशों में भी संपत्ति का केंद्रीकरण बढ़ा है। लेकिन भारत जैसे विकासशील देश में इसका सामाजिक प्रभाव अधिक गहरा होता है क्योंकि यहां बड़ी आबादी अभी भी सीमित आय, अनौपचारिक रोजगार और न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा पर निर्भर है।
जीडीपी और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी
एक समय था जब आर्थिक विकास का सीधा संबंध रोजगार वृद्धि से माना जाता था। कारखाने खुलते थे, उद्योग बढ़ते थे और बड़ी संख्या में लोगों को काम मिलता था।
आज स्थिति बदल चुकी है। तकनीक आधारित उत्पादन, स्वचालन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल प्रक्रियाओं ने उत्पादन बढ़ाया है, लेकिन रोजगार वृद्धि उसी अनुपात में नहीं हुई। अर्थशास्त्री इसे “जॉबलेस ग्रोथ” या रोजगार-विहीन विकास कहते हैं।
कई क्षेत्रों में उत्पादन और मुनाफा बढ़ रहा है, लेकिन श्रमिकों की संख्या नहीं बढ़ रही। इससे पूंजी के मालिकों की आय तेजी से बढ़ती है जबकि श्रमिकों की आय सीमित रहती है।
यही कारण है कि जीडीपी बढ़ने के बावजूद बड़ी संख्या में लोग आर्थिक असुरक्षा महसूस करते हैं।
कॉर्पोरेट मुनाफा बनाम मजदूरी
हाल के वर्षों में बड़ी कंपनियों के लाभ में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। शेयर बाजार के रिकॉर्ड स्तर, बढ़ती बाजार पूंजी और बड़े कारोबारी समूहों की संपत्ति वृद्धि इसके संकेत हैं।
दूसरी ओर कई क्षेत्रों में मजदूरी वृद्धि महंगाई की गति से पीछे रही है। यदि किसी व्यक्ति की आय 5 प्रतिशत बढ़ती है लेकिन जीवन यापन की लागत 7 या 8 प्रतिशत बढ़ जाती है, तो वास्तविक रूप से उसकी क्रय शक्ति घट जाती है।
यानी कागज पर आय बढ़ी हुई दिख सकती है लेकिन जीवन स्तर में सुधार नहीं होता।
महंगाई का सबसे बड़ा बोझ कौन उठाता है?
महंगाई का प्रभाव सभी पर समान नहीं पड़ता। एक करोड़पति के लिए खाद्यान्न, शिक्षा या ईंधन की कीमतों में वृद्धि अपेक्षाकृत छोटी समस्या हो सकती है, लेकिन सीमित आय वाले परिवार के लिए यही वृद्धि मासिक बजट को संकट में डाल सकती है।
गरीब और निम्न मध्यम वर्ग अपनी आय का बड़ा हिस्सा भोजन, आवास, परिवहन और स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं। इसलिए महंगाई का असर उन पर अधिक पड़ता है।
संपत्ति से पैसा बनाम श्रम से पैसा
आर्थिक असमानता बढ़ने का एक बड़ा कारण यह भी है कि आज संपत्ति रखने वालों की आय की गति श्रम आधारित आय से अधिक है।
यदि किसी व्यक्ति के पास बड़ी मात्रा में भूमि, शेयर, व्यवसाय या अचल संपत्ति है तो उसकी संपत्ति का मूल्य समय के साथ तेजी से बढ़ सकता है। दूसरी ओर केवल वेतन या मजदूरी पर निर्भर व्यक्ति की आय वृद्धि सीमित रहती है।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने भी अपने शोध में बताया था कि जब पूंजी पर मिलने वाला प्रतिफल आर्थिक वृद्धि दर से अधिक हो जाता है तो संपत्ति कुछ हाथों में केंद्रित होने लगती है।
शिक्षा और अवसरों की असमानता
अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई केवल आय का मामला नहीं है। यह अवसरों की असमानता का भी प्रश्न है।
एक संपन्न परिवार का बच्चा बेहतर स्कूल, कोचिंग, स्वास्थ्य सुविधा और तकनीकी संसाधनों तक पहुंच रखता है। वहीं गरीब परिवार का बच्चा कई बार प्राथमिक सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करता है।
परिणामस्वरूप अगली पीढ़ी में भी आर्थिक अंतर बना रहता है। यानी असमानता केवल वर्तमान की समस्या नहीं बल्कि भविष्य की भी चुनौती बन जाती है।
ग्रामीण और शहरी भारत की कहानी
भारत की आर्थिक वृद्धि का बड़ा हिस्सा शहरों में केंद्रित है। महानगरों में आईटी, वित्तीय सेवाएं, स्टार्टअप और आधुनिक उद्योग तेजी से बढ़े हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आय की वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही है।
कृषि अभी भी करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है, लेकिन राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान अपेक्षाकृत कम है। इससे ग्रामीण और शहरी आय के बीच भी अंतर बढ़ता है।
क्या जीडीपी गलत है?
यह कहना उचित नहीं होगा कि जीडीपी एक गलत मापदंड है। दुनिया भर में इसे आर्थिक गतिविधि मापने का महत्वपूर्ण साधन माना जाता है। समस्या तब पैदा होती है जब जीडीपी को ही विकास का एकमात्र पैमाना मान लिया जाता है।
किसी देश की वास्तविक प्रगति को समझने के लिए प्रति व्यक्ति आय, रोजगार दर, गरीबी स्तर, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा की गुणवत्ता, पोषण स्थिति और आय वितरण जैसे संकेतकों को भी देखना आवश्यक है।
क्या भारत में असमानता चिंता का विषय है?
अर्थशास्त्रियों का बड़ा वर्ग मानता है कि अत्यधिक असमानता किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकती है। जब संपत्ति कुछ हाथों में केंद्रित हो जाती है तो उपभोग क्षमता सीमित वर्ग तक सिमट जाती है। इससे मांग प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा सामाजिक तनाव, अवसरों की कमी और आर्थिक असंतोष भी बढ़ सकता है। इसलिए केवल आर्थिक वृद्धि ही पर्याप्त नहीं होती। विकास का समावेशी होना भी उतना ही आवश्यक है।
समाधान क्या हो सकते हैं?
आर्थिक असमानता कम करने के लिए रोजगार सृजन को विकास नीति का केंद्र बनाना होगा। केवल पूंजी आधारित विकास मॉडल के बजाय श्रम-प्रधान क्षेत्रों को प्रोत्साहन देना होगा। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तक व्यापक पहुंच, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती तथा छोटे और मध्यम उद्यमों को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।
असली सवाल जीडीपी नहीं, विकास के वितरण का है
भारत की अर्थव्यवस्था का विस्तार एक सकारात्मक तथ्य है। मजबूत जीडीपी वृद्धि किसी भी देश के लिए उत्साहजनक संकेत मानी जाती है। लेकिन विकास का मूल्यांकन केवल उत्पादन की मात्रा से नहीं बल्कि उसके वितरण से भी किया जाना चाहिए।
यदि आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचता है, रोजगार बढ़ते हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता सुधरती है तथा गरीब वर्ग की आय वास्तविक रूप से बढ़ती है, तभी विकास व्यापक अर्थों में सफल माना जाएगा।
आज का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या आर्थिक वृद्धि का लाभ नीचे तक पहुंच रहा है या वह ऊपर के स्तरों पर अधिक केंद्रित हो रहा है?
यही प्रश्न “अमीर और अमीर, गरीब और गरीबतर” की बहस का मूल है। जीडीपी की बहस महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह देखना है कि विकास की गाड़ी में आखिर कौन-कौन सवार है और कौन अब भी प्लेटफॉर्म पर खड़ा अपनी बारी का इंतजार कर रहा है।
आलेख :
अनिल अनूप
प्रकाशक-संपादक, जनगणदूत.कॉम













