चित्रकूट

गौशाला में गायें कम, अव्यवस्थाएं ज़्यादा! कुत्तों के सहारे हो रही गौवंशों की रखवाली पर उठे सवाल

संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

पीआरसी जिले के मानिकपुर ब्लॉक के अंतर्गत ग्राम पंचायत बाराहा माफ़ी में संचालित श्री नारायण स्टूडियो में एक बार फिर से मंडलों और क्षेत्रों को लेकर चर्चा की गई है। शासन स्तर पर गौवंश संरक्षण को लेकर लगातार बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी मानक इन सलाहकारों से बिल्कुल उल्टा दिखाई दे रहा है। सचिवालय की स्थिति ऐसी है कि यहां गौवंशों की सुरक्षा, भोजन, उत्पाद और प्रबंधन को लेकर गंभीर प्रश्न पूछे जा रहे हैं।

स्थानीय लोगों और धार्मिक विद्वानों का आरोप है कि इस अध्ययन में न तो गौवंश मौजूद है और न ही उनकी शिक्षा की व्यवस्था मौजूद है। अधिकांश विशेषज्ञों वाली बात सामने आई है कि गौवंशों के छोटे-छोटे बच्चों की राखावली के आंकड़े बनाए जा रहे हैं, जबकि शासन के निर्देश-निर्देशों में आश्रमों के अभिलेखों को बनाए रखने पर स्पष्ट प्रतिबंध बताया जा रहा है।

निरीक्षण में खुला पोल

“चलो गांव की ओर जागरूकता अभियान” की टीम जब श्री नारायण गैलरी गई तो वहां की तस्वीरें देखकर सदस्य भी हैरान रह गए। पहेली में तीन सौ से अधिक गौवंशों के व्याख्यान का दावा किया जा रहा है, लेकिन मस्जिद पर केवल दो-तीन बड़े गौवंशों की ही चर्चा सामने आई है।

इसके विपरीत बड़ी संख्या में छोटे-छोटे कंधे और नवजात गौवंश मौजूद मिले। इन मासूम आश्रम के आसपास दो कुत्ते और लेटे नीचे दिखाई देते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि ये कुत्ते इन बच्चों की रखवाली करते हैं।

निरीक्षण टीम ने जब इएलेवल प्लेयर से पूछा कि बाकी गायें कहां हैं, तो जवाब मिला कि सभी गायें चरने के लिए निकली हुई हैं। हालाँकि इस उत्तर में कई नए प्रश्न दिए गए हैं। यदि इतने बड़े स्तर पर गौवंश मौजूद है तो उनके पर्यवेक्षक कौन कर रहे हैं? चाराने के लिए कितने कर्मचारी लगाए गए हैं? और असेंबली परिसर लगभग खाली क्यों दिख रहा था?

‍असली किताब ऑपरेशन पर विवाद

म्यूजियम में मौजूद कलाकारों को लेकर भी गंभीर कलाकार जा रहे हैं। निरीक्षण के दौरान जब लीडर से पूछा गया कि गौवंशों के बच्चों के बीच कुत्ते क्यों मौजूद हैं, तो उसने कहा कि ये कुत्ते छोटे गौवंशों की सुरक्षा करते हैं।

तुलना से विवाद और गहरा गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि शासन की ओर से सचिवालयों के संचालन के लिए जो नियम बनाए गए हैं, उन्हें अभिलेखों में रखने की अनुमति नहीं है। इसके बावजूद यदि गौवंशों की रखवाली पेंटिंग्स की विशेषता की जा रही है, तो इसे सीधे तौर पर चतुर्थांश और स्थापत्य की अनदेखी माना जाता है।

ग्रामीणों का आरोप है कि गौशाला में पर्याप्त कर्मचारी भी नहीं दिखते। निरीक्षण के दौरान कोई चरवाहा या देखभाल करने वाला व्यक्ति मौजूद नहीं मिला। इससे यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इतने बड़े स्तर की गौशाला का संचालन कैसे किया जा रहा है।

कागज़ों में सैकड़ों गौवंश, ज़मीन पर खाली परिसर

स्थानीय लोगों के अनुसार गौशाला में अक्सर गौवंशों की संख्या को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रहती है। कागज़ों में संख्या अधिक दिखाई जाती है, लेकिन मौके पर हालात अलग दिखाई देते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि वास्तव में तीन सौ से अधिक गौवंश मौजूद हैं तो उनके चारे, पानी, चिकित्सा और सुरक्षा की व्यापक व्यवस्था होनी चाहिए। लेकिन निरीक्षण में ऐसी कोई ठोस व्यवस्था नहीं दिखी।

कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि कई बार गौवंश खुले में छोड़ दिए जाते हैं और गौशाला केवल नाम के लिए संचालित होती दिखाई देती है। यदि यह आरोप सही हैं तो यह न केवल सरकारी धन के उपयोग पर सवाल खड़े करता है बल्कि गौसंरक्षण की पूरी व्यवस्था की गंभीरता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

दो-दो गौशालाओं की जिम्मेदारी, फिर भी बदहाल हालात

सूत्रों के मुताबिक श्री नारायण गौशाला के संचालक को केवल बराह माफ़ी की गौशाला ही नहीं, बल्कि ऐलहा बढैया की गौशाला के संचालन की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है। बताया जा रहा है कि भविष्य में ग्राम पंचायतों से गौशालाओं का संचालन हटाकर निजी या अन्य संचालकों को जिम्मेदारी देने की योजना पर भी विचार किया जा रहा है।

जानकारी के अनुसार इस संबंध में शासन स्तर से पत्राचार भी किया जा चुका है। लेकिन सवाल यह है कि जब एक गौशाला की व्यवस्थाएं ही संतोषजनक नहीं हैं, तो अतिरिक्त गौशालाओं की जिम्मेदारी देना कितना उचित होगा?

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि बिना निगरानी और जवाबदेही के गौशालाओं का संचालन निजी हाथों में सौंपा गया, तो हालात और खराब हो सकते हैं।

गौवंश संरक्षण की योजनाओं पर उठ रहे सवाल

उत्तर प्रदेश सरकार लगातार गौवंश संरक्षण को लेकर कई योजनाएं चला रही है। गौशालाओं के निर्माण, चारे की व्यवस्था, पशु चिकित्सा और रखरखाव के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर कई गौशालाओं की तस्वीर बेहद चिंताजनक बनी हुई है।

चित्रकूट की इस गौशाला का मामला भी उसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है, जहां व्यवस्थाओं की कमी और निगरानी के अभाव ने पूरी व्यवस्था को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते व्यवस्थाओं में सुधार नहीं किया गया तो गौवंशों की स्थिति और दयनीय हो सकती है। खासकर छोटे बछड़ों की सुरक्षा और पोषण को लेकर तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है।

प्रशासनिक जांच की मांग तेज

मामले को लेकर स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रशासन से निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि गौशाला में मौजूद गौवंशों की वास्तविक संख्या, चारे की व्यवस्था, कर्मचारियों की नियुक्ति और सरकारी धन के उपयोग की जांच होनी चाहिए।

साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या गौशाला संचालन शासन के निर्धारित मानकों के अनुरूप हो रहा है या नहीं। यदि कहीं अनियमितता पाई जाती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

ग्रामीणों में बढ़ रही नाराजगी

बराह माफ़ी और आसपास के ग्रामीण इलाकों में इस मुद्दे को लेकर नाराजगी लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। ग्रामीणों का कहना है कि गौवंश भारतीय संस्कृति और ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा और देखभाल केवल सरकारी औपचारिकता बनकर नहीं रहनी चाहिए।

लोगों का यह मानना ​​है कि यदि सचिवालयों में ही गौवंश सुरक्षित नहीं रहेगा तो फिर संरक्षण मंजूरी का उद्देश्य अधूरा रहेगा।

सुधार की उम्मीद या फिर वही पुरानी कहानी?

श्री नारायण रिले का मामला केवल एक स्टूडियो तक सीमित नहीं माना जा रहा है, बल्कि यह संपूर्ण तंत्र की पहेली पर सवाल उठाने वाला उदाहरण बन रहा है। शासन स्तर पर योजनाएं बन रही हैं, बजट जारी हो रहे हैं, लेकिन अगर पर्यवेक्षण और मजबूती नहीं होगी तो गिरावट में कठिनाई सामने आ रही है।

अब परस्पर विरोधी सरकारी कार्रवाई पर टिकी हैं। देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले को किन-किन पदों पर बिठाते हैं और गौवंशों की समष्टि स्थिति को ठिकानों के लिए क्या कदम उठाते हैं।

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