16 अक्टूबर 2026 6:01 अपराह्न

दिल्ली में इतने कॉकरोच? एसआईआर के विरोध में निकले लोकतंत्र के अनचाहे मेहमान!

दिल्ली में इतने कॉकरोच शीर्षक वाली राजनीतिक व्यंग्य फीचर इमेज, जिसमें संपादक अनिल अनूप, कॉकरोच जनता पार्टी का प्रतीक, एसआईआर विरोध प्रदर्शन, दिल्ली पुलिस और मतदाता सूची दिखाई गई है।

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व्यंग्य ✍️अनिल अनूप

दिल्ली में इन दिनों कॉकरोचों की चर्चा है। आप चौंकिए मत! यह मत समझिए कि राजधानी की नालियों, रसोईघरों और सरकारी दफ्तरों में अचानक कॉकरोचों की आबादी बढ़ गई है। मामला कुछ ज्यादा ही लोकतांत्रिक है। यहां कॉकरोच केवल दीवारों के पीछे नहीं, बल्कि सड़कों पर भी दिखाई देने लगे हैं। इनके नाम पर राजनीति हो रही है, इनके समर्थन में नारे लग रहे हैं और इन्हें पकड़ने के लिए बैरिकेड तक खड़े किए जा रहे हैं।

अब आप पूछेंगे कि आखिर दिल्ली में इतने कॉकरोच आ कहां से गए?

तो जनाब, जरा ठहरिए। यह वही दिल्ली है जहां किसी दिन मुद्दे पैदा होते हैं, किसी दिन मुद्दों पर समितियां बनती हैं और किसी दिन मुद्दों को उठाने वालों को ही मुद्दा बना दिया जाता है। इस बार कहानी में कॉकरोच हैं, एसआईआर है, चुनाव आयोग है, सत्ता है, विपक्ष है और बीच में बेचारा मतदाता है, जो अपनी उंगली पर स्याही लगवाने से पहले यह सोचने लगा है कि कहीं उसकी पहचान ही किसी फाइल के नीचे तो नहीं दब गई!

अक्टूबर 2026 में दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर विरोध प्रदर्शनों ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जांच जैसी मांगों को लेकर विपक्षी दलों तथा छात्र संगठनों ने आवाज उठाई है। इसी माहौल में कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी नाम से चर्चित युवा आंदोलन भी सुर्खियों में आया है। दस अक्टूबर को प्रस्तावित बड़े प्रदर्शन के दौरान राजधानी में भारी सुरक्षा व्यवस्था की गई और अनेक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। अगले दिन भी विरोध की आवाजें पूरी तरह शांत नहीं हुईं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, आंदोलन के नेताओं की हिरासत और रिहाई के बीच प्रदर्शन जारी रखने की घोषणा की गई। इंडियन एक्सप्रेस ने भी इस आंदोलन और एसआईआर विवाद को प्रमुखता से रिपोर्ट किया है।

अब इसमें व्यंग्य का कीड़ा कहां से घुसा, यह समझने के लिए थोड़ा पीछे चलिए।

कॉकरोच ने राजनीति में प्रवेश कैसे किया?

कॉकरोच ऐसा जीव है, जिसे देखकर आम आदमी सबसे पहले चप्पल खोजता है। लेकिन राजनीति का कमाल देखिए कि वही कॉकरोच अचानक प्रतीक बन जाए तो लोग चप्पल की जगह संविधान खोजने लगते हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी के नाम में छिपा हास्य अपने आप में दिलचस्प है। जिस जीव को मनुष्य अपने घर में बर्दाश्त नहीं करता, वही जीव राजनीतिक व्यंग्य का ऐसा प्रतीक बन जाए कि उसे लेकर राष्ट्रीय राजधानी में चर्चा होने लगे, तो समझिए कि नामकरण करने वाले ने जनता की नस पकड़ ली है।

कॉकरोच की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने की क्षमता के लिए जाना जाता है। उसे भगाइए, वह किसी कोने में छिप जाएगा। कोना साफ कीजिए, वह किसी दूसरे कोने में पहुंच जाएगा। रोशनी जलाइए, वह अंधेरे की तरफ भागेगा; अंधेरा कीजिए, तो उसकी मौजूदगी का पता ही नहीं चलेगा।

अब राजनीति में इस जीव का रूपक कितना सटीक बैठता है, इसका फैसला पाठक स्वयं करें।

यहां हर दल अपने आपको जनता का सच्चा प्रतिनिधि बताता है। हर नेता दावा करता है कि वह जनता की आवाज है। लेकिन जनता जब खुद बोलने लगे, तो उसके सुर को कभी विपक्ष की साजिश कहा जाता है, कभी सत्ता विरोधी एजेंडा और कभी किसी अदृश्य ताकत का षड्यंत्र।

कॉकरोच कम से कम इतना तो नहीं कहता कि वह जनता का मसीहा है। वह जहां होता है, अपनी मौजूदगी जाहिर कर देता है। राजनीति में यह ईमानदारी भी किसी दुर्लभ प्रजाति से कम नहीं!

एसआईआर: सूची की सफाई या सवालों की सफाई?

एसआईआर का पूरा नाम है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन, यानी मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण। इसका घोषित उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना, पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करना और अपात्र या दोहराए गए नामों जैसी त्रुटियों को दूर करना है।

सुनने में यह काम उतना ही अच्छा लगता है, जितना घर की सफाई करना। आखिर कौन चाहेगा कि मतदाता सूची में गलत नाम रहें या पात्र मतदाता मतदान से वंचित हों?

लेकिन लोकतंत्र में सफाई करने वाले से एक सवाल जरूर पूछा जाता है—सफाई किस चीज की हो रही है और कूड़ा किसे घोषित किया जा रहा है?

यदि किसी मृत व्यक्ति का नाम सूची में रह गया है, तो उसे हटाना उचित है। यदि किसी व्यक्ति का नाम दो जगह दर्ज है, तो नियमानुसार सुधार जरूरी है। यदि कोई अपात्र व्यक्ति सूची में है, तो उसकी जांच भी होनी चाहिए। लेकिन यदि कोई जीवित, पात्र और मतदान का अधिकार रखने वाला नागरिक दस्तावेजी उलझनों या प्रशासनिक चूक के कारण सूची से बाहर हो जाए, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

यही वह सवाल है जिस पर एसआईआर को लेकर विवाद गहराया है।

आलोचकों का आरोप है कि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने और पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित होने की आशंकाओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। चुनाव आयोग की ओर से प्रक्रिया का बचाव किया जाता है और नामों में संशोधन के पीछे वैध कारणों की बात कही जाती है। इसलिए किसी भी पक्ष के दावे को अंतिम सत्य मानने के बजाय पारदर्शी आंकड़ों, आपत्तियों के निपटारे और स्वतंत्र जांच की कसौटी पर परखना जरूरी है।

आखिर मतदाता सूची कोई पार्टी का सदस्यता रजिस्टर नहीं है, जिसे मनचाहे ढंग से छोटा या बड़ा कर दिया जाए। यह उस नागरिक का संवैधानिक अधिकार तय करने वाली महत्वपूर्ण सूची है, जो सरकार चुनने में भाग लेता है।

व्यंग्य की भाषा में कहें तो कॉकरोच को घर से बाहर करना अलग बात है और घर के मालिक को ही घर का सदस्य मानने से इनकार कर देना अलग बात!

दिल्ली में बैरिकेड ज्यादा, भरोसा कम?

दिल्ली की सड़कों पर जब प्रदर्शनकारी उतरते हैं, तो प्रशासन की पहली चिंता अक्सर यातायात, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था होती है। यह चिंता अपनी जगह जायज है। किसी भी शहर को हिंसा, अव्यवस्था और आम नागरिकों की परेशानी से बचाना जरूरी है।

लेकिन लोकतंत्र की सड़क पर एक और यातायात चलता है—विचारों का यातायात।

इसे रोकने के लिए लोहे के बैरिकेड पर्याप्त नहीं होते।

अक्टूबर के प्रदर्शनों के दौरान राजधानी के कई इलाकों में सुरक्षा बढ़ाई गई, रास्ते प्रभावित हुए और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। प्रदर्शन की अनुमति, पुलिस की कार्रवाई और नागरिकों के शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार को लेकर भी बहस उठी। इन घटनाओं के विवरण और विभिन्न पक्षों के दावे सार्वजनिक रिपोर्टों में सामने आए हैं।

अब जरा एक काल्पनिक दृश्य की कल्पना कीजिए।

एक नागरिक पुलिसकर्मी से पूछता है, “साहब, मैं अपनी बात कहने आया हूं। क्या यहां बोलने की अनुमति है?”

पुलिसकर्मी कहता है, “बोलने की अनुमति है, लेकिन आवाज इतनी धीमी होनी चाहिए कि सरकार तक न पहुंचे।”

नागरिक पूछता है, “और अगर आवाज सरकार तक पहुंच गई?”

“तो फिर आपको समझाया जाएगा कि आपकी आवाज में राजनीतिक उद्देश्य है!”

नागरिक चुप हो जाता है। तभी पीछे से एक कॉकरोच निकलता है और कहता है, “भाई, हम तो सदियों से बिना अनुमति दीवारों पर घूमते रहे। अब तुम्हारे लोकतंत्र में चलने के लिए भी अनुमति चाहिए?”

पुलिसकर्मी चौंकता है। नागरिक हंसता है। और कॉकरोच अगले बैरिकेड की तरफ बढ़ जाता है।

यह दृश्य काल्पनिक है, लेकिन इसके पीछे का सवाल वास्तविक है—शांतिपूर्ण असहमति और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए?

लोकतंत्र में प्रदर्शन का अधिकार निरंकुश नहीं होता, पर प्रशासनिक सुविधा के नाम पर नागरिकों की आवाज को अनिश्चितकाल तक दबाया भी नहीं जा सकता। कानून का पालन प्रदर्शनकारियों को भी करना है और कानून लागू करने वाली संस्थाओं को भी।

बैरिकेड रास्ता रोक सकता है, सवाल नहीं। सवाल का उत्तर देना ही पड़ता है।

सत्ता कहती है—सब ठीक है, विपक्ष कहता है—सब गड़बड़ है!

राजनीति की एक पुरानी परंपरा है। सत्ता में बैठा पक्ष अपने काम को ऐतिहासिक बताता है और विपक्ष उसी काम को लोकतंत्र का अंतिम संस्कार घोषित कर देता है।

एक कहता है कि व्यवस्था सुधारी जा रही है। दूसरा कहता है कि व्यवस्था बिगाड़ी जा रही है। एक कहता है कि सूची साफ हो रही है। दूसरा कहता है कि मतदाता गायब हो रहे हैं।

बेचारा मतदाता दोनों की प्रेस कॉन्फ्रेंस देखता है। उसे समझ नहीं आता कि वह नागरिक है, आंकड़ा है, लाभार्थी है या किसी राजनीतिक प्रयोगशाला में रखा गया नमूना।

यदि विपक्ष के आरोप सही हैं, तो उन्हें प्रमाणों के साथ सामने आना चाहिए। यदि चुनाव आयोग का पक्ष सही है, तो उसे आंकड़ों और पारदर्शी प्रक्रिया से जनता का भरोसा मजबूत करना चाहिए। आरोपों का उत्तर आरोपों से और सवालों का उत्तर नारों से देने पर लोकतंत्र की सेहत ठीक नहीं होती।

कॉकरोच जनता पार्टी के उभार को भी इसी व्यापक संदर्भ में समझना चाहिए। किसी आंदोलन के नाम में हास्य होना उसके मुद्दों को अपने आप सही या गलत नहीं बना देता। न नाम से आरोप सिद्ध होते हैं, न व्यंग्य से व्यवस्था दोषी साबित हो जाती है। असली परीक्षा तथ्यों, मांगों और कार्रवाई की है।

फिर भी, नाम में छिपा संदेश गौर करने लायक है। जब युवा अपने आंदोलन के लिए कॉकरोच जैसा प्रतीक चुनते हैं, तो वह शायद यह बताना चाहते हैं कि उन्हें आसानी से मिटाया नहीं जा सकता। सत्ता उन्हें अप्रासंगिक समझे, विरोधी उन्हें अवसरवादी कहें या आलोचक उनके तरीकों पर सवाल उठाएं—वे अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहते हैं।

लोकतंत्र में किसी आंदोलन की सार्थकता इस बात से तय होगी कि वह कितना टिकता है, यह भी महत्वपूर्ण है; लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह जिन सवालों को उठाता है, उनके उत्तर मिलते हैं या नहीं।

कॉकरोचों का भी कोई चुनावी घोषणापत्र होगा?

कल्पना कीजिए कि कॉकरोच जनता पार्टी अपना घोषणापत्र जारी करती है।

पहला वादा—हर नागरिक का नाम मतदाता सूची में तभी तक रहेगा, जब तक उसकी पात्रता और पहचान की विधिवत पुष्टि हो; किसी पात्र नागरिक का नाम हटे तो उसे समय पर सूचना और आपत्ति का अवसर मिले।

दूसरा वादा—चुनाव आयोग के हर महत्वपूर्ण निर्णय के पीछे स्पष्ट कारण होंगे, ताकि नागरिकों को अफवाहों के सहारे अपनी राय न बनानी पड़े।

तीसरा वादा—जो नेता जनता को जागरूक करने निकलेंगे, वे अपने भाषणों में तथ्यों का इस्तेमाल करेंगे। केवल विरोध के लिए विरोध और समर्थन के लिए समर्थन नहीं करेंगे।

चौथा वादा—प्रदर्शनकारियों को कानून के दायरे में अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा और प्रशासन अपनी कार्रवाई के लिए जवाबदेह होगा।

पांचवां वादा—किसी भी पार्टी का नेता इतना बड़ा नहीं होगा कि उससे सवाल पूछना लोकतंत्र के लिए खतरा बन जाए।

घोषणापत्र सुनकर एक पत्रकार पूछता है, “आपके पास इन वादों को पूरा करने के लिए संसाधन कहां से आएंगे?”

कॉकरोच अध्यक्ष जवाब देता है, “हमारे पास संसाधन कम हैं, लेकिन एक सुविधा है। हम अंधेरे में भी रास्ता ढूंढ़ लेते हैं।”

पत्रकार फिर पूछता है, “और यदि आप खुद सत्ता में आ गए तो?”

अध्यक्ष कुछ देर चुप रहता है। फिर कहता है, “तब हमें भी आईना दिखाने के लिए एक दूसरी कॉकरोच जनता पार्टी की जरूरत होगी!”

बस, यहीं आकर हास्य गंभीर हो जाता है। सत्ता से सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन किसी आंदोलन को भी सवालों से ऊपर नहीं रखा जा सकता। जो आज जवाब मांग रहा है, कल उसे भी जवाब देना होगा।

असली कॉकरोच कौन है?

इस प्रश्न का उत्तर किसी एक राजनीतिक दल, नेता या संस्था के नाम में खोज लेना आसान होगा, लेकिन जरूरी नहीं कि सही भी हो।

क्या कॉकरोच वह है जो व्यवस्था की खामियां उजागर करता है? या वह, जो खामी सामने आने के बाद भी उसे देखने से इनकार करता है?

क्या कॉकरोच वह है जो सूची में गड़बड़ी का आरोप लगाता है? या वह जो बिना जांच के आरोप को सच मान लेता है?

क्या कॉकरोच वह है जो विरोध करता है? या वह जो विरोध करने वाले को बिना सुने खारिज कर देता है?

इन सवालों के उत्तर राजनीतिक निष्ठा के अनुसार बदल सकते हैं। लेकिन एक लोकतांत्रिक कसौटी ऐसी होनी चाहिए, जो दल बदलने पर न बदले—तथ्य, निष्पक्षता, पारदर्शिता और नागरिक अधिकार।

किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसका सुधार होना चाहिए। किसी नाम को हटाने का निर्णय नियमों के अनुसार हुआ है, तो उसके कारण स्पष्ट होने चाहिए। किसी अधिकारी से चूक हुई है, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। किसी प्रदर्शन में हिंसा हुई है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी को अनुचित तरीके से रोका गया है, तो उस पर भी सवाल उठने चाहिए।

लोकतंत्र की सफाई का अर्थ यह नहीं कि केवल दूसरे पक्ष के कचरे को बाहर निकाला जाए। अपने आंगन की गंदगी देखना भी उतना ही जरूरी है।

यही वह जगह है जहां कॉकरोच का रूपक सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए आईना बन सकता है।

आखिरी सवाल मतदाता से

दिल्ली की सड़कों पर आंदोलन हो रहे हैं। नेता बयान दे रहे हैं। पुलिस व्यवस्था संभाल रही है। चुनाव आयोग अपनी प्रक्रिया का बचाव कर रहा है। विपक्ष सवाल उठा रहा है। युवा अपना प्रतीक लेकर सामने आ रहे हैं।

इन सबके बीच मतदाता कहां है?

वह शायद अपने घर में बैठा है और सोच रहा है कि अगली बार जब कोई नेता उसके दरवाजे पर आएगा, तो वह उससे क्या पूछेगा।

क्या वह पूछेगा कि आपने सड़क बनवाई या नहीं? पानी पहुंचाया या नहीं? रोजगार दिया या नहीं? ये सवाल जरूरी हैं। लेकिन एक सवाल और है—क्या मेरी लोकतांत्रिक पहचान सुरक्षित है? क्या मेरा नाम मतदाता सूची में सही है? क्या मुझे अपनी बात कहने का अवसर मिलेगा? और क्या मेरी शिकायत का उत्तर मिलेगा?

लोकतंत्र केवल मतदान के दिन उंगली पर स्याही लगाने का नाम नहीं है। वह उस पूरी प्रक्रिया का नाम है, जिसमें नागरिक की पहचान सुरक्षित रहे, उसकी आवाज सुनी जाए और संस्थाएं अपने निर्णयों का हिसाब दें।

अब लौटते हैं पहले सवाल पर—दिल्ली में इतने कॉकरोच क्यों हैं?

शायद इसलिए कि देश की राजधानी में इस बार कॉकरोचों ने केवल दीवारों के पीछे रहने से इनकार कर दिया है। वे सड़क पर आ गए हैं, सवाल पूछ रहे हैं और अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।

लेकिन सावधान! केवल कॉकरोच का नाम लेकर हंस लेने से काम नहीं चलेगा। उसकी हंसी में छिपे सवालों को भी सुनना पड़ेगा। और यह भी देखना पड़ेगा कि जो लोग आज लोकतंत्र की सफाई का दावा कर रहे हैं, वे कहीं अपने सुविधाजनक अंधेरे को ही व्यवस्था की स्वच्छता तो नहीं बता रहे।

क्योंकि कॉकरोच चाहे घर में हो या राजनीति में, समस्या केवल उसकी मौजूदगी नहीं होती। समस्या तब होती है, जब रोशनी जलाने के बजाय लोग एक-दूसरे पर अंधेरा फैलाने का आरोप लगाने लगते हैं।

दिल्ली में कॉकरोचों की चर्चा जारी है। असली परीक्षा यह नहीं कि उन्हें कौन भगाता है; असली परीक्षा यह है कि रोशनी जलाने की हिम्मत कौन करता है।

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