16 अक्टूबर 2026 7:33 अपराह्न

चित्रकूट की गौशालाओं के आवंटन पर बड़ा सवाल : महिला स्वयं सहायता समूहों की अनदेखी, एनजीओ के चयन में पारदर्शिता कहां?

चित्रकूट गौशाला आवंटन मामले में स्वयं सहायता समूहों की कथित अनदेखी, एनजीओ चयन की पारदर्शिता और जांच की मांग को दर्शाती रिपोर्टर संजय सिंह राणा की फीचर इमेज।

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रिपोर्ट: संजय सिंह राणा | चित्रकूट | विशेष पड़ताल

चित्रकूट जिले में निराश्रित गोवंश के आश्रय स्थलों यानी गौशालाओं के संचालन का जिम्मा किन संस्थाओं को सौंपा जा रहा है, चयन की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही और क्या ग्रामीण महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को उनका अधिकार मिला? इन सवालों ने जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली और महिला सशक्तिकरण के सरकारी दावों को लेकर गंभीर बहस खड़ी कर दी है। उपलब्ध सरकारी पत्रों और संलग्न दस्तावेजों के आधार पर गौशालाओं के आवंटन की प्रक्रिया, स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी तथा चयनित संस्थाओं के बीच संभावित हितों के टकराव की निष्पक्ष जांच जरूरी दिखाई देती है।

मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शासन स्तर पर गौशालाओं के संचालन के लिए स्वयंसेवी संगठनों, एनजीओ, पंजीकृत समितियों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और स्वयं सहायता समूहों से रुचि की अभिव्यक्ति (ईओआई) आमंत्रित किए जाने का उल्लेख मिलता है। दूसरी ओर, चित्रकूट जिले से संबंधित पत्राचार में चयनित संस्थाओं को गौशालाएं आवंटित किए जाने और संचालन की जिम्मेदारी सौंपने की प्रक्रिया का विवरण है। ऐसे में सवाल उठता है कि सभी पात्र आवेदकों को समान अवसर मिला या नहीं, चयन के मानदंड क्या थे और ग्रामीण महिलाओं के समूहों को इस प्रक्रिया में कितनी प्राथमिकता दी गई?

यह केवल गौशालाओं के प्रबंधन का प्रशासनिक मामला नहीं है। इसका संबंध सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग, पशु कल्याण, सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता और गांवों में महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से भी है। हालांकि, दस्तावेजों से सामने आए सवालों को किसी अनियमितता का अंतिम प्रमाण मानने के बजाय संबंधित अधिकारियों के जवाब, चयन अभिलेखों और संस्थाओं के पंजीकरण एवं बैंक विवरण की जांच के आधार पर ही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।

विज्ञप्ति से आवंटन तक: दस्तावेजों में दर्ज घटनाक्रम ने बढ़ाए सवाल

इस पूरे मामले की पड़ताल में उपलब्ध तीन दस्तावेज महत्वपूर्ण हैं। इनमें पशुपालन विभाग की ओर से जारी रुचि की अभिव्यक्ति संबंधी विज्ञप्ति, चित्रकूट के जिलाधिकारी कार्यालय का पत्र तथा मुख्य पशुचिकित्साधिकारी की ओर से खंड विकास अधिकारियों और संबंधित अधिकारियों को भेजा गया पत्र शामिल है। इन दस्तावेजों को एक साथ पढ़ने पर चयन प्रक्रिया, पात्रता की जांच और गौशालाओं का वास्तविक हस्तांतरण किए जाने के संबंध में कई ऐसे प्रश्न सामने आते हैं, जिनका जवाब जिला प्रशासन को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए।

सबसे पहले 25 फरवरी 2026 को प्रकाशित विज्ञप्ति पर गौर करना जरूरी है। उपलब्ध समाचार पत्र की कटिंग के अनुसार, उत्तर प्रदेश के पशुपालन विभाग ने निराश्रित गोवंश आश्रय स्थलों के सुचारु संचालन के लिए पात्र एवं अनुभवी एनजीओ, ट्रस्ट, गोसेवा संस्थाओं, एफपीओ और पंजीकृत समितियों से रुचि की अभिव्यक्ति आमंत्रित की थी। विज्ञप्ति में इच्छुक संस्थाओं को निर्धारित प्रारूप में अपना प्रस्ताव 10 मार्च 2026 को शाम पांच बजे तक निदेशक, प्रशासन एवं विकास, पशुपालन विभाग, उत्तर प्रदेश, बादशाहबाग, लखनऊ के कार्यालय में जमा करने की बात कही गई थी।

इस विज्ञप्ति में एक महत्वपूर्ण शर्त यह भी दर्ज है कि प्राधिकारी को किसी भी प्रस्ताव को बिना कारण बताए निरस्त करने का अधिकार सुरक्षित रहेगा। इसका अर्थ है कि आवेदन आमंत्रित करना अपने आप में किसी संस्था को गौशाला आवंटित करने की गारंटी नहीं था। प्रत्येक आवेदन की पात्रता, अनुभव, उपलब्ध संसाधन और निर्धारित शर्तों के अनुरूप जांच के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाना अपेक्षित था।

लेकिन यहां मूल सवाल यह है कि क्या चित्रकूट जिले में चयन की पूरी प्रक्रिया इसी पारदर्शी भावना के अनुरूप पूरी की गई? क्या सभी पात्र संस्थाओं को समान अवसर दिया गया? क्या महिला स्वयं सहायता समूहों को आवेदन करने, अपनी योग्यता प्रस्तुत करने और चयन प्रक्रिया में भाग लेने का पर्याप्त अवसर मिला? इन प्रश्नों का उत्तर केवल मौखिक स्पष्टीकरण से नहीं, बल्कि आवेदन रजिस्टर, चयन समिति की कार्यवाही और आवंटन संबंधी अभिलेखों से ही सामने आ सकता है।

12 संस्थाओं के चयन का उल्लेख, लेकिन हस्तांतरण से पहले मांगी गई जानकारी कहां है?

चित्रकूट के मुख्य पशुचिकित्साधिकारी कार्यालय से जारी पत्र में चयन प्रक्रिया और उसके बाद की प्रशासनिक कार्रवाई का उल्लेख मिलता है। पत्र के अनुसार, शासन स्तर से प्राप्त निर्देशों के क्रम में जनपद की गौशालाओं का संचालन एनजीओ, कॉरपोरेट फर्मों, पंजीकृत समितियों, एफपीओ और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से कराए जाने के लिए प्राप्त आवेदनों पर विचार किया गया।

दस्तावेज में चयन समिति के गठन और उसके बाद चयन सूची तैयार किए जाने की प्रक्रिया का भी उल्लेख है। पत्र में 13 में से 12 एनजीओ को गोआश्रय स्थलों के संचालन के लिए चयनित किए जाने की बात दर्ज है। इसके साथ ही अन्य संबंधित संगठनों की सूची संलग्न करने तथा चयनित संस्थाओं को गौशालाओं के संचालन का जिम्मा सौंपने से पहले आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने का निर्देश दिया गया है।

यहां एक बुनियादी अंतर समझना आवश्यक है। किसी संस्था का चयन होना और उसे वास्तव में गौशाला का संचालन सौंप दिया जाना दो अलग-अलग प्रशासनिक चरण हैं। चयन के बाद भी संस्था के दस्तावेजों का सत्यापन, पात्रता की पुष्टि, बैंक खाते की जानकारी, संचालन की शर्तों का पालन और हस्तांतरण की औपचारिकताएं जरूरी हो सकती हैं।

मुख्य पशुचिकित्साधिकारी के पत्र में इसी प्रकार की जानकारी मांगे जाने का उल्लेख है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि चयनित संस्थाओं को संचालन का दायित्व सौंपने से पहले आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराना जरूरी था, तो सभी संस्थाओं के दस्तावेजों का सत्यापन कब और किस स्तर पर किया गया? क्या चयनित संस्थाओं के अनुभव और उनकी वास्तविक संचालन क्षमता की जांच हुई? क्या चयनित सूची में शामिल प्रत्येक संस्था निर्धारित शर्तों पर खरी उतरी?

इन प्रश्नों का उत्तर मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आवंटन प्रक्रिया में कहीं नियमों की अनदेखी हुई या नहीं।

जिलाधिकारी के पत्र में बैंक स्टेटमेंट और प्रमाणपत्रों का उल्लेख क्यों महत्वपूर्ण है?

उपलब्ध पत्राचार का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा जिलाधिकारी कार्यालय से संबंधित है। दस्तावेज में 12 मई 2026 के पत्र का संदर्भ देते हुए चयनित आवेदकों से पंजीकरण प्रमाणपत्र और बैंक स्टेटमेंट की प्रतियां उपलब्ध कराने के लिए कहा गया है। इसमें आठ एनजीओ/एफपीओ आवेदकों से संबंधित दस्तावेजों का उल्लेख है।

इस पत्राचार का महत्व इसलिए है क्योंकि किसी संस्था को सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत गौशाला संचालन की जिम्मेदारी सौंपते समय केवल उसके नाम या पंजीकरण को पर्याप्त नहीं माना जा सकता। संस्था की कानूनी स्थिति, बैंक खाते की प्रामाणिकता, वित्तीय गतिविधियों की जांच और पशुओं की देखभाल करने की क्षमता जैसे पहलुओं का सत्यापन भी महत्वपूर्ण है।

मुख्य पशुचिकित्साधिकारी के 29 मई 2026 के पत्र में इससे संबंधित जानकारी उपलब्ध न होने की बात दर्ज है। पत्र के अनुसार, 19 मई 2026 के पूर्ववर्ती पत्र से भी सूचना मांगी गई थी, लेकिन संबंधित जानकारी उपलब्ध नहीं हुई थी। इसी क्रम में आवंटित गौशालाओं के हस्तांतरण तथा मई 2026 के भुगतान को लेकर निर्देश दिए जाने का उल्लेख मिलता है।

पत्र में कहा गया है कि जब तक संबंधित गौशालाओं के संचालन का हस्तांतरण निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पूरा नहीं हो जाता, तब तक मई 2026 के भुगतान के लिए बिल प्रस्तुत न किए जाएं और उन्हें विकासखंड स्तर से अग्रसारित भी न किया जाए।

यह उल्लेख अपने आप में महत्वपूर्ण प्रशासनिक संकेत है। इससे पता चलता है कि संबंधित समय पर दस्तावेजी औपचारिकताओं और हस्तांतरण की स्थिति को लेकर विभागीय स्तर पर पत्राचार चल रहा था। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि सभी चयनित संस्थाएं अपात्र थीं या किसी ने निश्चित रूप से फर्जीवाड़ा किया। वास्तविक स्थिति जानने के लिए यह देखना होगा कि मांगे गए दस्तावेज बाद में उपलब्ध कराए गए या नहीं और उसके बाद क्या कार्रवाई हुई।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि आवश्यक दस्तावेजों की उपलब्धता और हस्तांतरण की स्थिति स्पष्ट नहीं थी, तो प्रत्येक संस्था के संबंध में अंतिम निर्णय किस आधार पर लिया गया? जिला प्रशासन को संबंधित पत्रों पर की गई कार्रवाई का विवरण सार्वजनिक करना चाहिए।

महिला स्वयं सहायता समूहों की अनदेखी का आरोप: सशक्तिकरण के दावे की परीक्षा

चित्रकूट की गौशालाओं के आवंटन से जुड़ा सबसे संवेदनशील मुद्दा ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी है। स्वयं सहायता समूहों ने गांवों में बचत, सामूहिक आर्थिक गतिविधियों, आजीविका संवर्धन और सामाजिक भागीदारी के माध्यम से अपनी उपयोगिता साबित की है। सरकारी योजनाओं में इन समूहों को प्रोत्साहित करने का उद्देश्य महिलाओं को केवल लाभार्थी बनाए रखना नहीं, बल्कि उन्हें आर्थिक गतिविधियों में निर्णय लेने और प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाने का अवसर देना भी है।

यदि गौशालाओं के संचालन के लिए पात्र स्वयं सहायता समूहों ने आवेदन किया था, लेकिन उन्हें चयन प्रक्रिया में उचित अवसर नहीं मिला, तो इसकी जांच आवश्यक है। दूसरी ओर, यदि किसी समूह ने आवेदन ही नहीं किया था, वह निर्धारित पात्रता पूरी नहीं करता था या उसके पास संचालन की जरूरी क्षमता नहीं थी, तो केवल महिला समूह होने के आधार पर उसे गौशाला आवंटित करने की अनिवार्यता भी स्वतः नहीं मानी जा सकती।

इसलिए महिला समूहों की अनदेखी के आरोप की जांच के लिए कुछ स्पष्ट तथ्य सामने आने चाहिए। कितने स्वयं सहायता समूहों ने आवेदन किया? उनमें से कितने पात्र पाए गए? कितने समूह चयन प्रक्रिया में शामिल हुए? कितने समूहों को गौशालाएं आवंटित की गईं और कितनों के आवेदन निरस्त हुए? यदि किसी आवेदन को खारिज किया गया, तो उसके पीछे क्या कारण था?

इन आंकड़ों के बिना महिला सशक्तिकरण के नाम पर नियमों की अनदेखी या जानबूझकर समूहों को वंचित करने का अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन इन आंकड़ों को सार्वजनिक न करना भी पारदर्शिता के उद्देश्य के अनुकूल नहीं होगा।

जिला प्रशासन को चाहिए कि वह विकासखंडवार स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी, उनके आवेदनों की स्थिति और चयनित संस्थाओं की सूची सार्वजनिक करे। इससे न केवल आरोपों की वास्तविकता सामने आएगी, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के बीच सरकारी व्यवस्था के प्रति विश्वास भी मजबूत होगा।

तीन संस्थाएं, एक बैंक खाता? आरोप की जांच के लिए वित्तीय रिकॉर्ड जरूरी

इस मामले में एक और गंभीर आरोप सामने रखा गया है। आरोप है कि तीन अलग-अलग स्वयंसेवी संगठनों का बैंक खाता एक ही है। यदि यह दावा सही है, तो इसकी जांच जरूरी है। लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर अभी यह प्रमाणित नहीं माना जा सकता कि तीनों संस्थाओं के बैंक खाते वास्तव में एक ही हैं या उन्होंने नियमों के विरुद्ध किसी वित्तीय व्यवस्था का इस्तेमाल किया है।

यहां जांच का आधार अनुमान नहीं, बल्कि मूल अभिलेख होने चाहिए। संबंधित संस्थाओं के पंजीकरण प्रमाणपत्र, उनके नाम पर संचालित बैंक खातों के सत्यापित विवरण, अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं की जानकारी, संस्था के पदाधिकारियों का विवरण और गौशाला संचालन के लिए किए गए अनुबंधों का मिलान किया जाना चाहिए।

यदि वास्तव में अलग-अलग संस्थाओं के नाम पर संचालन का दायित्व सौंपा गया है, लेकिन वित्तीय लेन-देन के लिए एक ही खाते का उपयोग किया जा रहा है, तो उसके कारण और वैधता की जांच जरूरी होगी। यह भी देखा जाना चाहिए कि कहीं संस्थाओं के बीच साझा प्रबंधन, अधिकृत वित्तीय व्यवस्था या किसी अन्य वैध कारण से ऐसा तो नहीं हुआ। केवल समान बैंक विवरण का आरोप अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करता, लेकिन यदि रिकॉर्ड में गंभीर विसंगतियां मिलती हैं तो उन्हें नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।

जिला प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि चयनित संस्थाओं के बैंक विवरण का सत्यापन किस अधिकारी ने किया, जांच की तारीख क्या थी और क्या सत्यापन रिपोर्ट चयन समिति के समक्ष प्रस्तुत की गई थी।

यदि किसी संस्था ने गलत जानकारी देकर पात्रता प्राप्त की है, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि आरोप जांच में गलत साबित होते हैं, तो संबंधित संस्था की स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए, ताकि किसी के विरुद्ध बिना प्रमाण के निष्कर्ष न निकाला जाए।

गौशालाओं का संचालन या जिम्मेदारी का हस्तांतरण: वास्तविक स्थिति क्या है?

गौशालाओं का संचालन केवल कागजों पर संस्था का नाम दर्ज कर देने तक सीमित नहीं है। इसमें पशुओं के लिए पर्याप्त चारा, स्वच्छ पानी, सुरक्षित आश्रय, उपचार, साफ-सफाई, बीमार और घायल गोवंश की देखभाल तथा दैनिक निगरानी जैसी जिम्मेदारियां शामिल होती हैं। इसलिए किसी भी संस्था को संचालन सौंपने से पहले उसकी क्षमता का मूल्यांकन जरूरी है।

चित्रकूट में आवंटन से जुड़े विवाद के बीच यह भी जांचा जाना चाहिए कि चयनित संस्थाओं ने वास्तव में कितनी गौशालाओं का संचालन संभाला है। क्या उनके पास पर्याप्त कर्मचारी और संसाधन हैं? क्या पशुओं की संख्या के अनुरूप चारे और उपचार की व्यवस्था है? क्या प्रत्येक गौशाला का भौतिक सत्यापन किया गया है? क्या संचालन संबंधी रजिस्टर और खर्च का रिकॉर्ड नियमित रूप से रखा जा रहा है?

यदि किसी संस्था को एक से अधिक गौशालाओं का दायित्व सौंपा गया है, तो उसके लिए उपलब्ध संसाधनों और प्रबंधन क्षमता की जांच और भी जरूरी हो जाती है। एक संस्था के नाम पर कई गौशालाओं का आवंटन होना अपने आप में अनियमितता नहीं है, लेकिन आवंटन की संख्या और वास्तविक संचालन क्षमता के बीच संतुलन होना चाहिए।

इसी तरह, किसी एनजीओ या समिति को गौशाला संचालन की जिम्मेदारी सौंपना तभी सार्थक है, जब उसका परिणाम पशुओं की बेहतर देखभाल और सरकारी धन के उचित उपयोग के रूप में दिखाई दे। यदि प्रशासनिक कागजी कार्रवाई पूरी होने के बावजूद गौशालाओं में व्यवस्थाएं कमजोर हैं, तो संबंधित अधिकारियों को इसकी जवाबदेही तय करनी चाहिए।

‘कितने आदमी थे?’ वाला तंज और चयन प्रक्रिया का सवाल

गौशालाओं के आवंटन पर उठ रहे सवालों को लेकर स्थानीय स्तर पर फिल्म ‘शोले’ के प्रसिद्ध संवाद ‘कितने आदमी थे?’ के संदर्भ में भी व्यंग्य किया जा रहा है। आरोप लगाने वालों का कहना है कि जिस तरह इस संवाद में संख्या पूछी जाती है, उसी तरह गौशालाओं के संचालन के संदर्भ में कुछ संस्थाओं द्वारा पहले से संचालित गौशालाओं की संख्या को महत्व दिया जा रहा है।

यह व्यंग्य प्रशासनिक चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन किसी संस्था के अनुभव को महत्व देना अपने आप में गलत नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या अनुभव का आकलन सभी आवेदकों के लिए समान मानकों पर किया गया? क्या पूर्व अनुभव के साथ-साथ संस्था की वास्तविक क्षमता, वित्तीय पारदर्शिता, पशु कल्याण का रिकॉर्ड और स्थानीय स्तर पर उसकी सक्रियता भी जांची गई?

यदि चयन का आधार केवल गौशालाओं की संख्या रहा और अन्य महत्वपूर्ण मानकों की अनदेखी की गई, तो चयन प्रक्रिया की समीक्षा जरूरी होगी। लेकिन इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए चयन समिति की कार्यवाही, मूल्यांकन अंक और पात्रता संबंधी रिकॉर्ड सामने आना आवश्यक है।

लखनऊ में प्रकाशित विज्ञप्ति और चित्रकूट की प्रक्रिया का अंतर स्पष्ट होना चाहिए

मामले का एक पहलू विज्ञापन के प्रकाशन और उसके स्थानीय स्तर पर प्रचार-प्रसार से जुड़ा है। उपलब्ध विज्ञप्ति में 25 फरवरी 2026 की तारीख और 10 मार्च 2026 तक प्रस्ताव जमा करने की समय-सीमा दिखाई देती है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि चित्रकूट जिले में गौशालाओं के आवंटन से संबंधित सूचना स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रूप से प्रकाशित या प्रसारित नहीं की गई।

इस आरोप की जांच में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि शासन के निर्देशों में विज्ञापन प्रकाशन का दायरा क्या निर्धारित था। क्या केवल राजधानी में प्रकाशित विज्ञप्ति ही पर्याप्त थी या संबंधित जिलों में भी सूचना प्रकाशित करना अनिवार्य था? क्या स्थानीय समाचार पत्रों, विकासखंड कार्यालयों, ग्राम पंचायतों और स्वयं सहायता समूहों तक सूचना पहुंचाने के निर्देश थे?

यदि शासन के आदेश में जिला स्तर पर प्रचार-प्रसार का स्पष्ट प्रावधान था और उसका पालन नहीं हुआ, तो यह गंभीर प्रशासनिक प्रश्न होगा। लेकिन यदि ऐसी बाध्यता नहीं थी, तब भी ग्रामीण समूहों तक सूचना पहुंचाने के व्यावहारिक प्रयासों की समीक्षा की जा सकती है। सार्वजनिक योजनाओं में प्रतिस्पर्धा और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए सूचना की पहुंच अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इसलिए प्रशासन को विज्ञापन की प्रति, प्रकाशन का प्रमाण, आवेदन प्राप्ति रजिस्टर और स्थानीय स्तर पर सूचना प्रसारित करने से जुड़े रिकॉर्ड सार्वजनिक करने चाहिए। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि पात्र महिला समूहों को आवेदन करने का वास्तविक अवसर मिला था या नहीं।

‘चलो गांव की ओर’ जागरूकता अभियान ने उठाई जांच की मांग

‘चलो गांव की ओर’ जागरूकता अभियान की ओर से मांग की गई है कि चित्रकूट जिले में गौशालाओं के आवंटन में स्वयं सहायता समूहों की कथित अनदेखी और चयन प्रक्रिया से संबंधित शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। अभियान का कहना है कि ग्रामीण महिलाओं को आजीविका और प्रबंधन के अवसर उपलब्ध कराने की सरकारी मंशा तभी पूरी होगी, जब पात्र समूहों को योजनाओं में वास्तविक भागीदारी मिलेगी।

अभियान की मांग है कि चयनित संस्थाओं की पात्रता, बैंक खातों, पंजीकरण प्रमाणपत्रों और गौशालाओं के वास्तविक हस्तांतरण की जांच कराई जाए। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया जाए कि चयन समिति ने किन मानकों के आधार पर संस्थाओं का चयन किया और स्वयं सहायता समूहों के आवेदनों पर क्या निर्णय लिया गया।

यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता, गलत जानकारी, पक्षपात या निर्धारित प्रक्रिया के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार व्यक्तियों और संस्थाओं के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके साथ ही, जहां आवश्यक हो, आवंटन प्रक्रिया की समीक्षा कर पारदर्शी तरीके से आगे की कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

जिला प्रशासन के सामने सात सीधे सवाल

चित्रकूट की गौशालाओं के आवंटन को लेकर उठे सवालों का समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच से संभव है। जिला प्रशासन को निम्नलिखित बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

  1. गौशाला संचालन के लिए कुल कितने आवेदन प्राप्त हुए और उनमें स्वयं सहायता समूहों के कितने आवेदन थे?

  2. चयन समिति ने किन पात्रता शर्तों और मूल्यांकन मानकों के आधार पर 12 एनजीओ के चयन का उल्लेख किया?

  3. क्या सभी चयनित संस्थाओं के पंजीकरण प्रमाणपत्र, बैंक स्टेटमेंट और संचालन क्षमता का सत्यापन पूरा हुआ?

  4. तीन संस्थाओं के बैंक खाते एक होने के आरोप में कितनी सच्चाई है और क्या इसकी जांच कराई गई?

  5. कितनी गौशालाओं का वास्तविक हस्तांतरण पूरा हुआ और कितनी गौशालाओं के दस्तावेज या औपचारिकताएं लंबित रहीं?

  6. क्या मई 2026 के भुगतान के संबंध में जारी निर्देशों के बाद आवश्यक अनुपालन किया गया?

  7. पात्र स्वयं सहायता समूहों को चयन प्रक्रिया में समान अवसर देने और भविष्य में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे?

इन सवालों का उत्तर सार्वजनिक होने से न केवल विवाद की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी, बल्कि भविष्य में इस तरह की शिकायतों को रोकने में भी मदद मिलेगी।

आरोपों का फैसला जांच से, लेकिन पारदर्शिता पर समझौता नहीं

चित्रकूट जिले की गौशालाओं के आवंटन से संबंधित उपलब्ध दस्तावेज एक प्रशासनिक प्रक्रिया, चयनित संस्थाओं से मांगी गई जानकारी और हस्तांतरण तथा भुगतान के संबंध में जारी निर्देशों की ओर संकेत करते हैं। दूसरी ओर, स्वयं सहायता समूहों की अनदेखी, चयन में पारदर्शिता की कमी और कुछ संस्थाओं के बैंक खातों को लेकर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है।

इसलिए पूरे मामले में न तो आरोपों को बिना जांच के अंतिम सत्य माना जा सकता है और न ही दस्तावेजों से सामने आए सवालों को नजरअंदाज किया जाना चाहिए। जिला प्रशासन को चाहिए कि वह चयन समिति की कार्यवाही, आवेदकों की सूची, पात्रता सत्यापन, बैंक संबंधी अभिलेखों की जांच की स्थिति और गौशालाओं के हस्तांतरण का विवरण उपलब्ध कराए। संबंधित संस्थाओं को भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए।

गौशालाओं का संचालन किसी संस्था को जिम्मेदारी सौंपने भर का विषय नहीं है। यह निराश्रित गोवंश के संरक्षण, सरकारी संसाधनों की जवाबदेही और ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण से जुड़ा मामला है। यदि महिला स्वयं सहायता समूहों को पात्र होने के बावजूद अवसर नहीं मिला, तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि संस्थाओं के चयन में किसी प्रकार की अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। और यदि प्रक्रिया नियमों के अनुरूप रही है, तो प्रशासन को दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

अब देखने वाली बात यह है कि जिला प्रशासन इन सवालों को गंभीरता से लेते हुए जांच कराता है या यह मामला पत्राचार और आरोपों के बीच ही उलझा रहता है। ग्रामीण महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना और गौशालाओं की व्यवस्था को पारदर्शी बनाना दोनों जरूरी हैं। इसका समाधान निष्पक्ष जांच, सार्वजनिक जवाबदेही और नियमों के समान अनुपालन में ही है।

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