कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ही नए समीकरण बनने और बिगड़ने का सिलसिला तेज होता दिखाई देने लगा है। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और अन्य स्थापित राजनीतिक दल अपनी-अपनी चुनावी रणनीति को मजबूत करने में जुटे हैं, तो दूसरी ओर कुछ नए चेहरे और छोटे राजनीतिक समूह भी अपना प्रभाव क्षेत्र तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में आने वाला विधानसभा चुनाव केवल बड़े दलों के बीच सीधा मुकाबला नहीं रह सकता, बल्कि कई सीटों पर बहुकोणीय संघर्ष की तस्वीर भी सामने आ सकती है।
इस बदलते राजनीतिक परिदृश्य में दो नाम विशेष रूप से चर्चा में हैं। पहला नाम पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल का है, जिन्होंने प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देने के बाद राजनीति में प्रवेश की घोषणा कर दी है। दूसरा नाम डॉ. रोहिणी घावरी का है, जो नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद पर आरोपों को लेकर पहले से चर्चा में रही हैं और अब उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाती दिखाई दे रही हैं।
आईएएस की कुर्सी छोड़कर राजनीति की राह पर दिव्या मित्तल
पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने 13 वर्ष की प्रशासनिक सेवा के बाद अगस्त 2026 में इस्तीफा देने की घोषणा की थी। उनका इस्तीफा 15 सितंबर 2026 से प्रभावी हुआ। इसके बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर लगातार अटकलें लगाई जा रही थीं। अब उन्होंने स्वयं स्पष्ट कर दिया है कि वह उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने जा रही हैं।
दिव्या मित्तल का राजनीतिक प्रवेश इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने किसी स्थापित राजनीतिक दल में शामिल होने के बजाय अलग राजनीतिक राह अपनाने का संकेत दिया है। हालिया सार्वजनिक संदेश में उन्होंने उत्तर प्रदेश से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने की बात कही और लोगों से सीधे संवाद का रास्ता अपनाया। इससे यह संकेत मजबूत हुआ है कि वह अपनी अलग राजनीतिक पहचान और संगठन खड़ा करने की दिशा में आगे बढ़ सकती हैं।
प्रशासनिक अधिकारी के रूप में मिर्जापुर और देवरिया सहित कई जिलों में उनकी कार्यशैली चर्चा में रही है। खासकर मिर्जापुर में जिलाधिकारी के रूप में उनके कार्यकाल के बाद स्थानीय स्तर पर उनकी लोकप्रियता की चर्चा होती रही। उनके इस्तीफे के बाद से ही मिर्जापुर से विधानसभा चुनाव लड़ने की अटकलें लगती रही हैं।
मिर्जापुर या बलिया पर नजर?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि दिव्या मित्तल पूर्वांचल की किसी ऐसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकती हैं, जहां उनकी प्रशासनिक पहचान और व्यक्तिगत संपर्क राजनीतिक पूंजी में बदल सके। मिर्जापुर का नाम सबसे अधिक चर्चा में रहा है। कुछ राजनीतिक सूत्र बलिया को भी संभावित विकल्प के रूप में देख रहे हैं।
हालांकि, अभी तक दिव्या मित्तल की ओर से किसी विधानसभा सीट को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। इसलिए मिर्जापुर या बलिया से चुनाव लड़ने की चर्चा को फिलहाल राजनीतिक अटकल के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। इतना जरूर स्पष्ट है कि उनका राजनीतिक प्रवेश अब केवल कयास नहीं रह गया है।
उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन खड़ा करने की होगी। प्रशासनिक पद पर रहते हुए किसी अधिकारी की पहचान और चुनावी राजनीति में मतदाताओं के बीच स्थायी संगठनात्मक आधार, दोनों अलग-अलग चीजें हैं। दिव्या मित्तल को अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता को बूथ स्तर के संगठन, कार्यकर्ताओं और स्पष्ट राजनीतिक एजेंडे में बदलना होगा।
रोहिणी घावरी की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता
दूसरी ओर डॉ. रोहिणी घावरी भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होती दिखाई दे रही हैं। स्विट्जरलैंड से लौटने के बाद उनकी लखनऊ सहित उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियां चर्चा में रही हैं। हाल के दिनों में उनकी मुलाकात सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और मंत्री ओम प्रकाश राजभर से भी हुई, जिसके बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें और तेज हुईं।
रोहिणी घावरी इससे पहले नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद को लेकर लगाए गए आरोपों के कारण चर्चा में आ चुकी हैं। सितंबर 2026 में उन्होंने चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग को लेकर कानूनी रास्ता भी अपनाया। इस मामले में अदालत ने पुलिस से रिपोर्ट मांगी है।
उनकी सक्रियता को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। खास तौर पर वाल्मीकि और अन्य दलित समुदायों के बीच उनकी पहुंच बढ़ाने की कोशिशों की चर्चा है। हालांकि, उन्होंने अभी किसी निश्चित विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की औपचारिक घोषणा नहीं की है। इसलिए उनकी चुनावी भूमिका को लेकर अंतिम तस्वीर सामने आना अभी बाकी है।
चंद्रशेखर आजाद के लिए भी बढ़ सकती है चुनौती
रोहिणी घावरी की सक्रियता का सबसे सीधा राजनीतिक प्रभाव चंद्रशेखर आजाद की राजनीति पर पड़ सकता है। आजाद समाज पार्टी पहले ही 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी है और पार्टी ने बड़ी संख्या में संभावित उम्मीदवारों के साथ संपर्क और चयन प्रक्रिया शुरू कर रखी है।
यदि रोहिणी घावरी किसी राजनीतिक दल के साथ औपचारिक रूप से जुड़ती हैं या स्वतंत्र राजनीतिक मंच बनाती हैं, तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ सीटों पर दलित वोटों के समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। खासकर ऐसी सीटों पर जहां किसी उम्मीदवार की जीत कुछ हजार या उससे भी कम वोटों के अंतर पर निर्भर करती है, नए चेहरे का प्रवेश चुनावी गणित बदल सकता है।
हालांकि, किसी नए चेहरे की चर्चा को सीधे वोटों के बड़े हस्तांतरण से जोड़ना जल्दबाजी होगी। चुनाव में व्यक्तिगत लोकप्रियता के साथ संगठन, जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवार की स्वीकार्यता भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
एआईएमआईएम और छोटे दलों के साथ बन सकता है नया मोर्चा
उत्तर प्रदेश में एक और संभावित बदलाव छोटे और क्षेत्रीय दलों के बीच तालमेल को लेकर है। एआईएमआईएम, आजाद समाज पार्टी और अन्य छोटे राजनीतिक समूह यदि किसी साझा मंच या चुनावी समझौते की दिशा में बढ़ते हैं तो कई विधानसभा क्षेत्रों में मुकाबले का स्वरूप बदल सकता है।
आजाद समाज पार्टी खुद 2027 के लिए तैयारियों में जुटी है। पार्टी ने उम्मीदवारों की तलाश और संगठन विस्तार का काम शुरू कर दिया है। ऐसे में यदि अन्य दलों के साथ उसका तालमेल बनता है तो उसका प्रभाव कुछ सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों के बीच बढ़ सकता है।
दूसरी तरफ कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच भी सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत और दबाव की राजनीति जारी है। कांग्रेस अधिक सीटों की दावेदारी कर रही है, जबकि सपा की ओर से भी अपनी चुनावी ताकत के अनुरूप सीटों को लेकर संकेत दिए जा रहे हैं। अक्टूबर 2026 की शुरुआत में दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर मतभेदों की खबरें सामने आई हैं।
छोटे दलों को साथ रखने की कोशिश क्यों?
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल चुनावी राज्य में छोटे दलों की भूमिका कई सीटों पर निर्णायक हो सकती है। यही वजह है कि बड़े दल चुनाव से पहले क्षेत्रीय और जातीय आधार वाले संगठनों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं।
सपा और कांग्रेस के संभावित गठबंधन के संदर्भ में भी छोटे दलों को साथ रखने की रणनीति महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अपना दल (कमेरावादी) जैसे दलों का अपना सामाजिक आधार है, जबकि अलग-अलग क्षेत्रों में अन्य छोटे संगठन भी स्थानीय प्रभाव रखते हैं।
चुनावी राजनीति में इन दलों की ताकत हमेशा सीटों की संख्या से नहीं मापी जाती। कई बार किसी छोटे दल का प्रत्याशी 5 से 10 हजार वोट लेकर भी किसी बड़े दल के उम्मीदवार के जीत-हार के समीकरण को बदल देता है। यही वजह है कि 2027 के चुनाव में जितने ज्यादा राजनीतिक मोर्चे खुलेंगे, स्थापित दलों के सामने उतनी ही अधिक चुनौती खड़ी हो सकती है।
2027 में 403 सीटों पर होगा विधानसभा चुनाव
उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। भारत निर्वाचन आयोग के आंकड़ों में भी उत्तर प्रदेश की विधानसभा सीटों की संख्या 403 दर्ज है।
2027 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, लेकिन अक्टूबर 2026 तक चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं हुआ है। इसलिए फरवरी या मार्च में मतदान होने की संभावनाओं को फिलहाल अनुमान के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। चुनाव की वास्तविक तारीखों का फैसला भारत निर्वाचन आयोग द्वारा कार्यक्रम जारी किए जाने के बाद ही होगा।
राज्यसभा चुनाव ने बढ़ाई यूपी की सियासी गर्मी
विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए चुनावी प्रक्रिया ने राजनीतिक गतिविधियों को और तेज कर दिया है। 6 अक्टूबर 2026 नामांकन की अंतिम तारीख रही। भाजपा ने सभी आठ उम्मीदवारों का नामांकन करा दिया है, जबकि समाजवादी पार्टी की ओर से प्रो. रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नथवानी पहले ही नामांकन दाखिल कर चुके हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह रहा कि समाजवादी पार्टी ने तीसरा उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा। इससे राज्यसभा की 10 सीटों के लिए मौजूदा समीकरण काफी हद तक साफ हो गया है। भाजपा के आठ और सपा के दो उम्मीदवारों के नामांकन के बाद फिलहाल निर्विरोध निर्वाचन की स्थिति बनती दिखाई दे रही है, बशर्ते नामांकन जांच और नाम वापसी की प्रक्रिया में कोई नया मोड़ न आए।
राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान 16 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित है। नामांकन पत्रों की जांच 7 अक्टूबर और नाम वापसी की अंतिम तारीख 9 अक्टूबर रखी गई है।
असली परीक्षा 2027 में होगी
राज्यसभा चुनाव भले ही तत्काल राजनीतिक सुर्खियों में हों, लेकिन उत्तर प्रदेश के सभी दलों की असली नजर 403 विधानसभा सीटों पर है। यही कारण है कि छोटे दलों की गतिविधियां, नए चेहरों की एंट्री और संभावित गठबंधनों को 2027 के बड़े चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
दिव्या मित्तल यदि अपनी अलग राजनीतिक जमीन तैयार करने में सफल होती हैं और रोहिणी घावरी अपनी सामाजिक सक्रियता को चुनावी राजनीति में बदलती हैं, तो कुछ क्षेत्रों में स्थापित दलों के सामने नए समीकरण जरूर खड़े हो सकते हैं। लेकिन इन दोनों चेहरों का वास्तविक चुनावी प्रभाव संगठन और उम्मीदवारों की घोषणा के बाद ही सामने आएगा।
फिलहाल इतना तय है कि 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष की सीधी लड़ाई तक सीमित रहने वाला नहीं है। नए चेहरे, छोटे दल, संभावित गठबंधन और अलग-अलग सामाजिक समूहों को साधने की कोशिशें इस चुनाव को बहुकोणीय बना सकती हैं। आने वाले महीनों में जैसे-जैसे राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों और गठबंधनों की तस्वीर साफ करेंगे, वैसे-वैसे उत्तर प्रदेश का चुनावी गणित भी नए सिरे से आकार लेगा।













