सरकार के गले की फांस बनता जा रहा भोजपुर एनकाउंटर, सत्ता-विपक्ष एक सुर में
न्यायिक जांच के बाद भी नहीं थम रहा विवाद
भोजपुर एनकाउंटर मामला बिहार की राजनीति और कानून-व्यवस्था के लिए बड़ा मुद्दा बन गया है। भरत भूषण तिवारी की एनकाउंटर में मौत के बाद सरकार, पुलिस और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। मुख्यमंत्री द्वारा न्यायिक जांच की घोषणा के बावजूद पुलिस कार्रवाई, वायरल वीडियो और परिजनों के आरोपों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इस विस्तृत रिपोर्ट में भोजपुर एनकाउंटर, बिहार पुलिस की कार्रवाई, राजनीतिक प्रतिक्रियाएं, न्यायिक जांच और पूरे विवाद से जुड़े सभी महत्वपूर्ण पहलुओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
ममता सिंह की रिपोर्ट
पटना। बिहार के भोजपुर जिले में भरत भूषण तिवारी की पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत अब केवल एक आपराधिक घटना नहीं रह गई है, बल्कि यह राज्य की राजनीति, प्रशासन और पुलिस व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। कानून-व्यवस्था को लेकर अपनी सख्त छवि बनाने की कोशिश कर रही सरकार अब इस मामले में चारों ओर से घिरती दिखाई दे रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के कई वरिष्ठ नेताओं ने भी पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। यही वजह है कि यह मामला अब सरकार के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर बड़ी परीक्षा बन गया है।
एनकाउंटर से शुरू हुई बहस अब न्यायिक जांच तक पहुंची
भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में 17 जून को हुए भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर ने पूरे बिहार में नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के दावों के बाद इस कार्रवाई की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। बढ़ते राजनीतिक दबाव और जनाक्रोश को देखते हुए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मामले की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच कराने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि जांच किसी सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की निगरानी में कराई जाएगी ताकि सच्चाई सामने आ सके।
मुख्यमंत्री ने यह भी स्वीकार किया कि भरत भूषण तिवारी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि जांच में किसी पुलिस अधिकारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।
पीड़ित परिवार के घर नेताओं का लगातार पहुंचना बना राजनीतिक संदेश
घटना के बाद भरत तिवारी के गांव में नेताओं का तांता लगा हुआ है। सत्ता और विपक्ष दोनों के वरिष्ठ नेता पीड़ित परिवार से मिलकर संवेदना व्यक्त कर चुके हैं। इससे साफ संकेत मिल रहा है कि यह मामला आने वाले समय में बिहार की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है।
विपक्षी दल लगातार इसे फर्जी एनकाउंटर बताते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। वहीं सत्ता पक्ष के कई नेताओं ने भी पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाकर प्रशासन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
राजद ने बताया फर्जी एनकाउंटर
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस घटना को पूरी तरह फर्जी एनकाउंटर करार दिया है। उनका कहना है कि पुलिस ने कानून की प्रक्रिया का पालन करने के बजाय सीधे जान लेने का रास्ता चुना। उन्होंने मुख्यमंत्री से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग करते हुए आरोप लगाया कि बिहार में पहले भी कई संदिग्ध एनकाउंटर हुए हैं, जिनमें आज तक पीड़ित परिवारों को न्याय नहीं मिल सका।
राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष उदय नारायण चौधरी ने भी पूरे मामले की जांच विधानसभा के सभी दलों के प्रतिनिधियों वाली सर्वदलीय समिति से कराने की मांग उठाई है।
कांग्रेस ने पुलिस पर लगाए गंभीर आरोप
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने पीड़ित परिवार से मुलाकात के बाद आरोप लगाया कि पुलिस ने किसी पेशेवर सुपारी किलर गिरोह की तरह कार्रवाई की है। उनका कहना है कि भरत तिवारी सामाजिक सरोकारों से जुड़े व्यक्ति थे और कमजोर वर्गों की आवाज उठाने के कारण प्रशासन की नजर में खटक रहे थे।
कांग्रेस ने पीड़ित परिवार को एक करोड़ रुपये का मुआवजा देने तथा मामले की जांच विधानसभा की सर्वदलीय समिति से कराने की मांग की है।
उधर राज्यसभा सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह ने सरकार द्वारा घोषित न्यायिक जांच पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश की जगह उच्च न्यायालय के कार्यरत न्यायाधीश से जांच कराई जानी चाहिए, तभी लोगों का विश्वास कायम होगा। कांग्रेस ने इस पूरे प्रकरण को लेकर राज्यपाल से भी हस्तक्षेप की मांग करने का निर्णय लिया है।
वाम दलों ने भी सरकार को घेरा
माकपा के राज्य नेतृत्व ने कहा कि बिहार में अपराध नियंत्रण के बजाय आम लोगों और आंदोलनकारियों पर पुलिस का दबाव बढ़ता जा रहा है। पार्टी का आरोप है कि कानून-व्यवस्था की विफलता को छिपाने के लिए ऐसी घटनाएं हो रही हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
इस बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री आर.के. सिंह, पूर्व विधायक राजन तिवारी तथा निर्दलीय सांसद पप्पू यादव सहित कई अन्य जनप्रतिनिधि भी पीड़ित परिवार से मिल चुके हैं।
सत्ता पक्ष के नेताओं ने भी उठाए सवाल
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार के सहयोगी दलों के नेताओं ने भी पुलिस कार्रवाई पर असहमति जताई है।
जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा कि केवल कुछ पुलिसकर्मियों को निलंबित कर देने से मामला समाप्त नहीं हो जाता। उन्होंने कहा कि एनकाउंटर से जुड़े वीडियो कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं और पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है।
भाजपा के वरिष्ठ नेता अश्विनी चौबे भी पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे। उन्होंने प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार को गुमराह करने का प्रयास बंद होना चाहिए। उन्होंने दोषी पुलिसकर्मियों की शीघ्र गिरफ्तारी और ग्रामीणों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने की मांग की।
विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने भी इस घटना को अत्यंत दुखद बताते हुए मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत रूप से मिलकर शीघ्र न्यायिक जांच सुनिश्चित कराने की बात कही।
एडीजी ने स्वीकार की पुलिस की लापरवाही
मामले में नया मोड़ तब आया जब बिहार पुलिस के एडीजी सुधांशु कुमार ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि प्रारंभिक स्तर पर पुलिस टीम स्थिति को संभालने में सफल नहीं रही। उनके अनुसार 16 जून को भरत तिवारी से बातचीत करने गई टीम ने परिस्थितियों का सही आकलन नहीं किया।
इस लापरवाही को देखते हुए विभाग ने संबंधित थाना प्रभारी, दो सब-इंस्पेक्टर, एक एएसआई और एक कांस्टेबल सहित कुल पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया।
हालांकि विपक्ष का कहना है कि केवल निलंबन पर्याप्त नहीं है। यदि पुलिस की गलती स्वीकार की जा चुकी है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ हत्या सहित गंभीर धाराओं में मुकदमा भी दर्ज होना चाहिए।
पुलिस की कहानी क्या कहती है?
पुलिस के अनुसार पूरा मामला 16 जून को सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो से शुरू हुआ। वीडियो में एक युवक हथियार लहराते हुए दिखाई दे रहा था। जांच के दौरान उसकी पहचान बिलौटी गांव निवासी भरत भूषण तिवारी के रूप में हुई।
पुलिस का दावा है कि जब टीम उसे पकड़ने पहुंची तो उसने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया और हथियार लहराते हुए पुलिस को चुनौती देने लगा। बाद में पुलिस बल बढ़ाया गया, लेकिन आरोपी कथित रूप से छत पर चढ़कर पुलिस पर फायरिंग करने लगा।
अगले दिन सुबह वह खेतों की ओर भागने लगा। पुलिस का कहना है कि उसने भागते समय भी लगातार गोलीबारी की, जिसके जवाब में आत्मरक्षा के तहत पुलिस ने फायरिंग की। गोली उसके पैर में लगी और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
परिजनों के आरोपों ने बढ़ाया विवाद
भरत भूषण तिवारी के परिवार का दावा पुलिस की कहानी से पूरी तरह अलग है। परिजनों का आरोप है कि घटना के अगले ही दिन उन्होंने संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कराने के लिए आवेदन दिया था, लेकिन आज तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई।
परिवार का यह भी आरोप है कि पुलिस भरत का मोबाइल फोन अपने साथ ले गई थी और उसमें मौजूद वीडियो तथा अन्य महत्वपूर्ण डाटा हटाने के बाद फोन वापस किया गया। परिजनों ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर कड़ी सजा देने की मांग की है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती भरोसा बहाल करना
भोजपुर एनकाउंटर अब केवल एक पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है। यह सरकार की जवाबदेही, पुलिस की कार्यप्रणाली और न्याय व्यवस्था पर जनता के भरोसे की परीक्षा बन चुका है। विपक्ष लगातार इसे चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है, जबकि सत्ता पक्ष के भीतर से उठ रही आवाजें सरकार की चिंता और बढ़ा रही हैं।
अब सबकी निगाहें प्रस्तावित न्यायिक जांच पर टिकी हैं। यदि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से पूरी होती है तो इससे लोगों का विश्वास बहाल हो सकता है। लेकिन यदि जांच लंबी खिंचती है या सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं मिलते, तो यह मामला आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति और सरकार दोनों के लिए बड़ी चुनौती बना रह सकता है।








