जानलेवा बन रहा है इश्क ? कुछ चर्चित मामलों के बीच रिश्तों में बढ़ती हिंसा की भयावह तस्वीर
कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
पिछले कुछ महीनों में देशभर में सामने आए कुछ हाई-प्रोफाइल मामलों ने प्रेम, विवाह और रिश्तों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इंदौर के राजा रघुवंशी हत्याकांड से लेकर मेरठ के सौरभ राजपूत मामले और हाल ही में चर्चित केतन अग्रवाल प्रकरण तक, कई घटनाओं में महिलाओं पर हत्या या साजिश के आरोप लगे। इन मामलों ने सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया और देखते ही देखते महिलाओं को रिश्तों में अपराध की सबसे बड़ी दोषी के रूप में पेश किया जाने लगा।
हालांकि, अपराध के व्यापक आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर कहीं अधिक जटिल और चिंताजनक दिखाई देती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB), संयुक्त राष्ट्र (UN), विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) जैसे संस्थानों के आंकड़े बताते हैं कि रिश्तों में हिंसा और हत्या के अधिकांश मामलों में महिलाएं ही पीड़ित पक्ष के रूप में सामने आती हैं।
चर्चित मामलों ने बदला सामाजिक विमर्श
हाल के वर्षों में कुछ मामलों ने पूरे देश का ध्यान खींचा। सौरभ राजपूत हत्याकांड में पत्नी पर प्रेमी के साथ मिलकर हत्या का आरोप लगा। इंदौर के कारोबारी राजा रघुवंशी की हत्या के मामले में भी पत्नी और उसके सहयोगियों की भूमिका की जांच हुई। वहीं केतन अग्रवाल मामले में मंगेतर पर गंभीर आरोप लगाए गए।
इन घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर महिलाओं को लेकर नकारात्मक टिप्पणियों की बाढ़ आ गई। विवाह संस्था पर सवाल उठने लगे और कई लोग इन मामलों को आधार बनाकर महिलाओं को अविश्वसनीय या खतरनाक साबित करने की कोशिश करने लगे। लेकिन क्या कुछ चर्चित घटनाएं पूरे समाज की वास्तविक तस्वीर को दर्शाती हैं? आंकड़े इस धारणा को चुनौती देते हैं।
रिश्तों में हिंसा की सबसे बड़ी शिकार महिलाएं
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश में हर साल बड़ी संख्या में महिलाएं अपने पति या ससुराल पक्ष की प्रताड़ना का शिकार होती हैं। पति या ससुराल वालों द्वारा क्रूरता से जुड़े मामलों की संख्या लगातार चिंताजनक बनी हुई है। घरेलू हिंसा, मानसिक उत्पीड़न, आर्थिक नियंत्रण और शारीरिक प्रताड़ना जैसी घटनाएं लाखों महिलाओं के जीवन को प्रभावित करती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि दर्ज मामलों की संख्या वास्तविक घटनाओं से कहीं कम होती है, क्योंकि सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता और पारिवारिक प्रतिष्ठा के कारण बड़ी संख्या में महिलाएं शिकायत दर्ज ही नहीं करातीं।
दहेज हत्या आज भी कड़वी सच्चाई
तकनीकी और आर्थिक प्रगति के बावजूद दहेज प्रथा आज भी महिलाओं के लिए जानलेवा साबित हो रही है। हर वर्ष हजारों महिलाएं दहेज की मांग पूरी न होने के कारण हत्या, आत्महत्या या संदिग्ध मौत का शिकार बनती हैं।
आंकड़े बताते हैं कि औसतन प्रतिदिन कई महिलाओं की जान दहेज से जुड़े विवादों में चली जाती है। यह स्थिति दर्शाती है कि आधुनिकता के दावों के बावजूद महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर समाज में गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं।
यौन हिंसा में भी परिचित ही बनते हैं अपराधी
महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों की जांच करने पर भी एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आती है। अधिकांश मामलों में आरोपी कोई अजनबी नहीं, बल्कि परिचित व्यक्ति होता है।
पूर्व पति, लिव-इन पार्टनर, प्रेमी या शादी का झांसा देने वाले लोग बड़ी संख्या में यौन अपराधों में आरोपी पाए जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि महिलाओं के लिए सबसे बड़ा खतरा अक्सर बाहरी दुनिया से नहीं, बल्कि निजी संबंधों और भरोसे के दायरे से उत्पन्न होता है।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
संयुक्त राष्ट्र की महिलाओं के खिलाफ हिंसा संबंधी रिपोर्ट वैश्विक स्तर पर भी गंभीर तस्वीर प्रस्तुत करती है। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में महिलाओं की हत्या के मामलों में बड़ी संख्या ऐसे मामलों की होती है, जहां आरोपी उनका पति, पार्टनर या कोई करीबी रिश्तेदार होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो महिलाओं के लिए घर और निजी रिश्ते कई बार सबसे असुरक्षित स्थान बन जाते हैं।
विशेषज्ञ इसे “फेमिसाइड” की श्रेणी में रखते हैं, जहां महिला होने के कारण या लैंगिक असमानता से जुड़े कारणों के चलते महिलाओं को हिंसा का सामना करना पड़ता है।
रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर हत्या के अधिकांश शिकार पुरुष होते हैं, लेकिन पुरुषों की हत्या में अपराधी अक्सर बाहरी व्यक्ति होते हैं। इसके विपरीत महिलाओं की हत्या के मामलों में आरोपी अधिकतर उनके परिचित, रिश्तेदार या जीवनसाथी होते हैं।
हर दिन सैकड़ों महिलाएं बनती हैं शिकार
अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार दुनिया में प्रतिदिन बड़ी संख्या में महिलाओं की हत्या उनके पति, प्रेमी या रिश्तेदारों द्वारा की जाती है। यह स्थिति केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं है बल्कि विकसित और विकासशील दोनों प्रकार के देशों में देखी जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा का यह स्वरूप केवल अपराध नहीं बल्कि सामाजिक असमानता, पितृसत्तात्मक सोच और शक्ति संतुलन की समस्या से भी जुड़ा हुआ है।
घरेलू हिंसा की भयावह हकीकत
घरेलू हिंसा को अक्सर परिवार का निजी मामला मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि इसके प्रभाव बेहद गंभीर होते हैं।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अनुसार बड़ी संख्या में विवाहित महिलाओं ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपने जीवन में कभी न कभी शारीरिक, मानसिक या यौन हिंसा का सामना किया है।
घरेलू हिंसा केवल मारपीट तक सीमित नहीं होती। इसमें गाली-गलौज, मानसिक दबाव, आर्थिक नियंत्रण, सामाजिक अलगाव और यौन उत्पीड़न भी शामिल हैं। कई महिलाएं वर्षों तक ऐसे माहौल में रहने को मजबूर होती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू हिंसा के कारण महिलाओं में अवसाद, चिंता, आत्महत्या की प्रवृत्ति और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं विकसित हो सकती हैं।
भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की समस्या
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में करोड़ों महिलाएं अपने जीवनकाल में किसी न किसी रूप में पार्टनर हिंसा का सामना करती हैं।
दक्षिण एशिया के देशों में यह समस्या विशेष रूप से गंभीर मानी जाती है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कई देशों में बड़ी संख्या में महिलाएं घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना का सामना करती हैं।
हालांकि जागरूकता और कानूनी संरक्षण बढ़ने से शिकायत दर्ज कराने की प्रवृत्ति में सुधार हुआ है, लेकिन वास्तविक स्थिति अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है।
क्या पुरुष भी नहीं होते पीड़ित?
विशेषज्ञ इस बात से भी सहमत हैं कि रिश्तों में हिंसा का शिकार केवल महिलाएं ही नहीं होतीं। पुरुष भी मानसिक उत्पीड़न, आर्थिक शोषण, झूठे मुकदमों और कुछ मामलों में शारीरिक हिंसा के शिकार हो सकते हैं।
हाल के चर्चित मामलों ने यह दिखाया है कि महिलाओं द्वारा किए गए गंभीर अपराध भी समाज के सामने मौजूद हैं और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन अपराध विज्ञान के विशेषज्ञों का कहना है कि किसी एक वर्ग को पूरी तरह अपराधी या पीड़ित घोषित कर देना वास्तविकता से दूर होगा। अपराध का मूल्यांकन व्यक्तिगत घटनाओं और तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि लिंग के आधार पर।
सोशल मीडिया ट्रायल से बचने की जरूरत
आज सोशल मीडिया के दौर में किसी भी घटना पर तुरंत राय बना ली जाती है। कुछ चर्चित मामलों के आधार पर पूरे महिला वर्ग या पूरे पुरुष वर्ग को कटघरे में खड़ा कर देना खतरनाक प्रवृत्ति है।
कानून का मूल सिद्धांत है कि हर मामले की जांच उसके तथ्यों और सबूतों के आधार पर हो। किसी एक अपराधी के कारण पूरे समाज या किसी एक लिंग को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
राजा रघुवंशी, सौरभ राजपूत और केतन अग्रवाल जैसे चर्चित मामलों ने रिश्तों में बढ़ते अपराधों को लेकर चिंता जरूर बढ़ाई है। लेकिन व्यापक आंकड़े बताते हैं कि प्रेम, विवाह और पारिवारिक रिश्तों में हिंसा की सबसे बड़ी कीमत आज भी महिलाएं चुका रही हैं।
वास्तविक चुनौती किसी एक लिंग को खलनायक साबित करना नहीं, बल्कि उन सामाजिक और मानसिक कारणों को समझना है जो रिश्तों को हिंसा, अविश्वास और अपराध की ओर धकेल रहे हैं। जब तक समाज में समानता, सम्मान और संवेदनशीलता की संस्कृति विकसित नहीं होगी, तब तक प्रेम और रिश्तों की दुनिया में ऐसे दर्दनाक अध्याय सामने आते रहेंगे।







