21 अक्टूबर 2026 7:06 पूर्वाह्न

सत्ता का नशा, खुशफहमी की खुमारी और गंदी नाली में लुढ़कता लोकतंत्र

लेखक विष्णु नागर की तस्वीर के साथ सत्ता का अहंकार, राजनीतिक खुशफहमी, नेताओं का दंभ और जनप्रतिरोध दर्शाती लैंडस्केप फीचर इमेज।

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लेखक: विष्णु नागर
राजनीतिक व्यंग्य | सत्ता का अहंकार | लोकतंत्र और जनप्रतिरोध

राजनीतिक व्यंग्य-समागम के अंतर्गत प्रस्तुत यह व्यंग्य सत्ता के नशे, राजनीतिक खुशफहमी, अहंकार और लोकतांत्रिक प्रतिरोध की पड़ताल करता है। विष्णु नागर की व्यंग्य-दृष्टि सत्ता के उस चरित्र पर प्रहार करती है, जो लंबे समय तक शासन में रहने के बाद अपने भ्रम को ही वास्तविकता और अपने प्रचार को ही जनमत समझने लगता है।

गंदी नाली में लुढ़कासन: जब सत्ता को अपना पतन भी दिखाई नहीं देता

ये खुशफहमी में हैं। खुशफहमी में जीने वालों को उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए। वे अपने आप लुढ़कते हुए किसी दिन जमीन पर आ जाएंगे। टांगें ऊपर हों और सिर नीचे, तब भी ऐसे लोग इसी भ्रम में रहते हैं कि वे पैरों के बल खड़े हैं या कुर्सी पर तनकर बैठे हैं। उनके अलावा सबको मालूम होता है कि वे लुढ़कावस्था में हैं, लेकिन उन्हें अपनी स्थिति का एहसास तक नहीं होता।

लुढ़कावस्था में ही वे भाषण दे रहे हैं, चीख-पुकार मचा रहे हैं, आदेश-निर्देश जारी कर रहे हैं, गालियां बक रहे हैं और अपनी वीरता के गीत गा रहे हैं। सरकार बदलने की बात उठते ही हाय-तौबा मचाते हैं। राजनीतिक विरोधियों को सिरफिरा कहकर अपनी घबराहट छिपाने की कोशिश करते हैं। नेहा बोरा और नेहा सिंह राठौर जैसी महिलाओं को निशाना बनाकर उनका चरित्र हनन करने की कोशिशों के बीच भी उनकी बेचैनी झलकती है।

दूसरी ओर, लोग उनके भीतर छिपे डर को समझकर उनकी इस हालत पर हंस रहे हैं। वे इस राजनीतिक तमाशे का आनंद ले रहे हैं, लेकिन सत्ता के नशे में चूर लोगों को इसका पता नहीं चलता। वे करवट तक बदलने की स्थिति में नहीं हैं। ताकत का अहंकार उन्हें इतना असहाय बना चुका है कि अपनी वास्तविक हालत पहचानने की क्षमता भी खोते जा रहे हैं।

सत्ता का नशा और बदबूदार नाली का आनंद

वे जिस जगह लुढ़के पड़े हैं, वह कोई साफ-सुथरी जमीन नहीं, बल्कि बदबूदार नाली है, जिसकी साल में एक बार आधी-अधूरी सफाई होती है। नशे में धुत व्यक्ति हो, कोई समूह हो या किसी राजनीतिक पार्टी का नेता, उसे लुढ़कने में सबसे ज्यादा आनंद उसी जगह आता है, जहां गंदगी हो। जगह जितनी बदबूदार होती है, उसे उतना ही अधिक आनंद मिलता है। व्यंग्य की भाषा में कहें तो वहां भी उसे एसी का मजा आता है।

जिनका अपना घर होता है, परिवार होता है, बीवी-बच्चे होते हैं, उन्हें अंधेरी रात में भी घरवाले नाली में तलाशते हैं। खींच-पकड़कर बाहर निकालते हैं, नहलाते-धुलाते हैं और बिस्तर पर लिटा देते हैं। लेकिन इनका तो कोई अपना रहा ही नहीं। जिसने भी अपना बनने की कोशिश की, उसके साथ इन्होंने दगा किया। ये हमेशा केवल अपने रहे हैं। जो कभी इनके अपने थे, उन्हें भी इन्होंने दुत्कार दिया।

यहां नाली केवल गंदगी का प्रतीक नहीं है। यह उस राजनीतिक मानसिकता का रूपक है, जिसमें सत्ता का अहंकार नैतिकता, जवाबदेही और मानवीय संबंधों को पीछे छोड़ देता है। जब राजनीतिक ताकत अपने आलोचकों को शत्रु और हर सवाल को षड्यंत्र समझने लगती है, तब सत्ता का नशा विवेक पर हावी होने लगता है।

झूठी शान, प्रचार का शोर और जनता की बदलती नजर

वे आज नाली में उल्टे पड़े हैं, मगर ख्वाब देख रहे हैं कि सीधे, तनकर खड़े हैं। उन्हें लगता है कि वे पूरी तरह होश में हैं, टेलीप्रॉम्प्टर से भाषण दे रहे हैं और देश की जनता उनकी हर बात गौर से सुन रही है। उनका डंका पूरी दुनिया में बज रहा है। लेकिन व्यंग्यकार का कटाक्ष यह है कि जिस अयोध्या में मंदिर निर्माण को लेकर बड़े-बड़े राजनीतिक दावे किए गए, वहां भी अब उनके राजनीतिक प्रभाव पर सवाल उठने लगे हैं।

लंबे समय तक सत्ता में बने रहने से पैदा हुई खुशफहमी का यही संकट है। जब शासन को लगातार अपनी उपलब्धियों का प्रचार सुनने की आदत पड़ जाती है, तब उसे जनता की नाराजगी और बदलते राजनीतिक संकेत सुनाई देना बंद हो जाता है। प्रचार की गूंज वास्तविक जनमत का विकल्प नहीं हो सकती। सत्ता के गलियारों में बजने वाली तालियां और जनता के मन में उठते सवाल दो अलग-अलग चीजें हैं।

बारह साल से अधिक समय तक किसी न किसी तरह सत्ता में बने रहने का अनुभव जब अहंकार में बदल जाता है, तब व्यक्ति को लगता है कि उसकी जमीन पहले से ज्यादा मजबूत हो गई है। वह भूल जाता है कि लोकतंत्र में सत्ता स्थायी संपत्ति नहीं है। जनता का समर्थन बदल सकता है, राजनीतिक समीकरण पलट सकते हैं और कल तक अजेय दिखाई देने वाली ताकत को भी जवाबदेही के कठघरे में खड़ा होना पड़ सकता है।

जब सत्ता का नशा ही विकास और विचारधारा बन जाए

नशे में व्यक्ति को अपनी हालत का अंदाजा नहीं रहता। मगर शराब का नशा सुबह उतर सकता है। सत्ता जब नशा बन जाए, तो उसके उतरने की कोई निश्चित सुबह नहीं होती। सत्ता छिन जाने के बाद भी उसका खुमार बना रह सकता है। आधी बेहोशी में पांच साल और उसके बाद के पांच साल गुजर सकते हैं, लेकिन व्यक्ति अपने भ्रम से बाहर आने को तैयार नहीं होता।

जिस राजनीतिक दल के नेताओं को लंबे समय तक लगातार शासन करने का अवसर मिलता है, उनके भीतर यह भ्रम गहरा सकता है कि सत्ता चलाने का हर दांव उन्हें आता है। वे मान लेते हैं कि विरोधियों को कभी इस तरीके से, कभी उस तरीके से पराजित कर देंगे। नई पीढ़ी के लड़के-लड़कियों के सत्ता परिवर्तन के सपनों को वे चुटकी में तोड़ देने की कल्पना करते हैं। बड़ी-बड़ी डींगें मारना उनके राजनीतिक स्वभाव का हिस्सा बन जाता है।

उन्हें विश्वास रहता है कि मौजूदा आंधी और तूफान जल्दी थम जाएंगे, आसमान साफ हो जाएगा, धुंध छंट जाएगी और धूप फिर खिल उठेगी। तब वे चारों ओर हरियाली, फूल और खुशबू दिखाने लगेंगे। जनता को पीला भी हरा दिखाई देने लगेगा। बिना गंध वाले फूलों से महक आने लगेगी। सत्ता यदि कहेगी कि आकाश नीला है, तो उसके समर्थक इसे स्वीकार ही नहीं करेंगे, बल्कि इसे किसी असाधारण कृपा का परिणाम भी बता देंगे। यही राजनीतिक प्रचार और अंधसमर्थन के बीच का वह क्षेत्र है, जहां तर्क और वास्तविकता पीछे छूट जाते हैं।

विरोधियों को छोटा समझने की राजनीतिक भूल

सत्ता के नशे में डूबे लोगों को विरोधियों की हर मांग बेमतलब लगती है। धर्मेन्द्र प्रधान को हटाने की मांग हो या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग, उन्हें लगता है कि ये सब आलतू-फालतू बातें हैं। उन्हें भरोसा है कि विरोध करने वाले लड़ते-लड़ते थक जाएंगे, मार खाते-खाते हार मान लेंगे और आखिरकार माफी मांगने उनके दरवाजे पर आ जाएंगे।

उन्हें लगता है कि विदेशी फंडिंग का शोर मचाकर विरोधियों को बदनाम किया जा सकता है, आंदोलनकारियों को ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है और उन्हें सरकारी या निजी नौकरी के अवसरों से दूर रखा जा सकता है। राजनीतिक व्यंग्य यहां उस मानसिकता पर चोट करता है, जो असहमति को लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया के बजाय दंडित किए जाने वाले अपराध की तरह देखती है।

ऐसी सोच का अंतिम लक्ष्य यही दिखाई देता है कि विरोध करने वालों को इतना थका दिया जाए कि वे सवाल पूछना बंद कर दें। उनसे अपनी आवाज वापस लेने, माफी मांगने और सत्ता के सामने समर्पण करने की उम्मीद की जाए। फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाए और समय बीतते-बीतते भविष्य के बड़े-बड़े राजनीतिक वादे वर्तमान की जवाबदेही पर पर्दा डाल दें।

जब नौजवान डरना छोड़ दें, तब सत्ता की बेचैनी बढ़ती है

लेकिन जब वे थोड़ी देर के लिए होश में आते हैं, तो डर से कांपने लगते हैं। उन्हें दिखाई देता है कि ये लड़के-लड़कियां अब उनसे डरते नहीं। वे पुलिस और अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी से भी भयभीत नहीं होते। हजारों की संख्या में सुरक्षा बल तैनात करने के बावजूद विरोध करने वाले पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। मार खाते हैं, लेकिन रोते नहीं। उनका कहना है कि जितना मारना हो मार लो, मगर सरकार और चुनाव व्यवस्था से जुड़े सवालों का जवाब लेकर रहेंगे।

जब मेट्रो और इंटरनेट बंद करने जैसे कदमों पर सवाल उठते हैं, जब अदालतों में सरकारी फैसलों की समीक्षा होती है और जब मतदाता सूची की गड़बड़ियों को दुरुस्त करने के आदेश सामने आते हैं, तब सत्ता के लिए असुविधाजनक सवाल और तीखे हो जाते हैं। जंतर-मंतर जैसे प्रदर्शन स्थलों को लेकर लिए गए फैसलों पर भी जवाबदेही की मांग उठ सकती है। लोकतंत्र में किसी निर्णय पर सवाल पूछना व्यवस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे जवाबदेह बनाने का तरीका है।

सत्ता को जब यह महसूस होने लगता है कि पहले की तरह हर परिस्थिति उसके नियंत्रण में नहीं है, तब उसकी बेचैनी बढ़ती है। जो लोग कभी आदेश देते ही सब कुछ अपने पक्ष में हो जाने का भरोसा रखते थे, उन्हें अब अदालतों, आंदोलनों और जनता के सवालों का सामना करना पड़ता है। यही वह बिंदु है जहां सत्ता का आत्मविश्वास और सत्ता की खुशफहमी एक-दूसरे से अलग दिखाई देने लगते हैं।

डर के सामने खड़ी जनता और लोकतंत्र की असली ताकत

डर के सामने लोग तनकर खड़े हो चुके हैं। वे सवाल पर सवाल कर रहे हैं। डंडे खाते हैं, घसीटे जाते हैं, जेल में डाले जाते हैं, लेकिन डरने से इनकार करते हैं। उनका प्रतिरोध सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। लड़कियां और महिलाएं भी आगे आकर पुलिस, प्रशासन और राजनीतिक ताकतों से सवाल कर रही हैं। यही दृश्य उस व्यवस्था को बेचैन करता है, जो लंबे समय तक लोगों की चुप्पी को अपनी लोकप्रियता समझती रही हो।

सत्ता को कभी लगता था कि हर चीज पर उसका नियंत्रण है, हर सांस पर उसका अधिकार है और वह पचास साल तक राज करने आई है। मगर अचानक ऐसे लोग सामने आ गए हैं, जिन्हें न डराया जा सकता है, न आसानी से चुप कराया जा सकता है। उनके सवालों का जवाब देने के बजाय यदि उन्हें दबाने की कोशिश होती है, तो संघर्ष और तीखा हो सकता है। व्यंग्यकार इसी विरोधाभास को उजागर करता है कि सत्ता जितनी अधिक ताकत दिखाती है, उतनी ही बार उसे अपनी असुरक्षा का सामना करना पड़ सकता है।

जब जनता भय से मुक्त होकर सवाल पूछने लगती है, तब राजनीतिक समीकरण बदलने की संभावना पैदा होती है। लोकतंत्र की असली शक्ति केवल चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि नागरिकों के सवाल पूछने, असहमति जताने और सत्ता को जवाबदेह बनाने के अधिकार में है। सत्ता की ताकत का मूल्यांकन उसके विरोधियों को चुप कराने की क्षमता से नहीं, बल्कि आलोचना सहने और जवाब देने की तत्परता से होना चाहिए।

निष्कर्ष: नाली में लुढ़की सत्ता को जमीन का सच कब दिखेगा?

विष्णु नागर का यह राजनीतिक व्यंग्य सत्ता के नशे और खुशफहमी पर तीखा प्रहार है। गंदी नाली में लुढ़कने का रूपक उस राजनीतिक मानसिकता को सामने लाता है, जो अपने पतन को भी विजय समझती है। उसे लगता है कि प्रचार से वास्तविकता बदली जा सकती है, आलोचकों को डराकर सवाल खत्म किए जा सकते हैं और सत्ता पर लंबे समय तक कब्जा बनाए रखना ही लोकप्रियता का प्रमाण है।

लेकिन लोकतंत्र में जनता हमेशा मौन दर्शक नहीं रहती। नई पीढ़ी के सवाल, महिलाओं की भागीदारी, नागरिक आंदोलनों का प्रतिरोध और न्यायिक जवाबदेही सत्ता को उसकी सीमाओं का एहसास करा सकते हैं। सत्ता का नशा कितना भी गहरा हो, जनता के सवालों से बचना आसान नहीं। जो राजनीतिक नेतृत्व अपने आलोचकों की आवाज को सुनने के बजाय उन्हें कुचलने की कल्पना करता है, वह अंततः अपने ही भ्रम में कैद हो सकता है।

व्यंग्य का सबसे तीखा निष्कर्ष यही है कि लुढ़कने वाले को अपनी स्थिति का पता न हो, तब भी जमीन और आसपास की दुनिया सच छिपाकर नहीं रख सकती। लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं, जवाबदेही अनिवार्य है। और जब जनता डरना छोड़ देती है, तब सत्ता की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठा व्यक्ति भी अपने नीचे की जमीन खिसकती हुई महसूस कर सकता है।

लेखक परिचय: विष्णु नागर कई पुरस्कारों से सम्मानित साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं।

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