लेख — मोहन द्विवेदी
दिवाली भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है, जिसमें प्रकाश केवल घरों की देहरी पर नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना, सामाजिक संबंधों और जीवन-मूल्यों में भी उतरता है। मिट्टी के दीयों की सौंधी महक, आंगन में उकेरे जाने वाले मांडणे, घरों में तैयार होते पारंपरिक पकवान, परिवार के सदस्यों का मिल-जुलकर काम करना, बड़ों का आशीर्वाद और छोटों के प्रति स्नेह—ये सब मिलकर दिवाली को एक विशिष्ट सांस्कृतिक अनुभव बनाते रहे हैं। लेकिन समय के साथ इस पर्व का स्वरूप तेजी से बदला है। बिजली की रंग-बिरंगी झालरों, महंगे उपहारों, आकर्षक पैकिंग वाली मिठाइयों, ऑनलाइन खरीदारी और सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं की बाढ़ ने उत्सव को नया रूप दिया है।
आधुनिक सुविधाओं का स्वागत करना गलत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब साधन ही साध्य बन जाते हैं; जब घर सजाने की होड़ में मन की उदारता पीछे छूट जाती है; जब उपहार का मूल्य उसके भाव से नहीं, बल्कि उसकी कीमत से आंका जाने लगता है; और जब शुभकामनाओं के सैकड़ों संदेशों के बीच किसी अपने के पास बैठकर दो आत्मीय शब्द बोलने का समय नहीं बचता। ऐसे में सवाल केवल दिवाली के बदलते स्वरूप का नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना का है, जिसने इस पर्व को सदियों से भारतीय जनजीवन से जोड़े रखा है।
क्या आधुनिकता की चकाचौंध में हम दिवाली की आत्मा खोते जा रहे हैं? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें इतिहास, धर्म, लोकपरंपराओं, सामाजिक जीवन और वर्तमान उपभोक्तावादी संस्कृति को एक साथ समझना होगा। दिवाली की वास्तविक सार्थकता तभी सामने आएगी, जब हम यह जान सकें कि इस पर्व की ऐतिहासिक जड़ें क्या हैं, इसकी परंपराओं का सामाजिक अर्थ क्या रहा है और आज इन्हें बचाए रखने की जरूरत क्यों है।
दिवाली का इतिहास: एक परंपरा, अनेक सांस्कृतिक अर्थ
दिवाली का इतिहास किसी एक कथा, एक धार्मिक मान्यता अथवा एक क्षेत्र की परंपरा तक सीमित नहीं है। भारतीय उपमहाद्वीप में यह पर्व विभिन्न धार्मिक विश्वासों, लोककथाओं, कृषि-चक्रों, पारिवारिक रीति-रिवाजों और सामाजिक परंपराओं के साथ विकसित हुआ है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में इसके आयोजन का स्वरूप भिन्न हो सकता है, लेकिन प्रकाश, आशा, मंगलकामना और सामूहिक उल्लास की भावना व्यापक रूप से दिखाई देती है।
हिंदू परंपरा में दिवाली को भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास और रावण पर विजय के बाद अयोध्या लौटने की स्मृति से जोड़ा जाता है। लोकप्रिय मान्यता है कि अयोध्यावासियों ने अपने प्रिय राजा के स्वागत में दीप जलाए थे। यह कथा घर लौटने की खुशी, अन्याय पर न्याय की विजय और समाज के सामूहिक उल्लास का प्रतीक बन गई। हालांकि, इतिहास की दृष्टि से दिवाली की समस्त परंपराओं को केवल इसी घटना से जोड़ना उचित नहीं होगा, क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों में इसके दूसरे धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भ भी मिलते हैं।
जैन परंपरा में दिवाली का विशेष संबंध भगवान महावीर के निर्वाण से है। सिख परंपरा में इसी अवधि में मनाया जाने वाला बंदी छोड़ दिवस गुरु हरगोबिंद साहिब की मुक्ति और उनके साथ अन्य बंदियों की रिहाई की स्मृति से जुड़ा है। बंगाल तथा पूर्वी भारत के कई हिस्सों में इस अवसर पर मां काली की पूजा का विशेष महत्व है। इन विविधताओं से स्पष्ट होता है कि दिवाली भारतीय सांस्कृतिक जीवन में अनेक अर्थों को समेटने वाला पर्व है।
इतिहासकारों के लिए किसी पर्व की प्राचीनता और उससे जुड़ी प्रत्येक लोकप्रिय कथा की ऐतिहासिक पुष्टि दो अलग विषय हैं। धार्मिक आख्यान समाज की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा होते हैं, जबकि उनके ऐतिहासिक विवरणों की पुष्टि के लिए स्वतंत्र साक्ष्यों की आवश्यकता होती है। इसलिए दिवाली की परंपरा को समझते समय धार्मिक आस्था का सम्मान और ऐतिहासिक तथ्यों के प्रति ईमानदारी, दोनों जरूरी हैं।
वर्ष 2025 में दीपावली को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किए जाने की घोषणा हुई। यह मान्यता केवल दीप जलाने की परंपरा का सम्मान नहीं है, बल्कि उन समुदायों, कारीगरों, कुम्हारों, मिठाई बनाने वालों और परिवारों के योगदान को भी रेखांकित करती है, जिनके सामूहिक प्रयास से यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहती है।
इस तथ्य का संदेश साफ है—किसी पर्व की असली संपन्नता केवल उसकी भव्यता में नहीं, बल्कि उस जीवंत सामाजिक संस्कृति में होती है, जो उसे अर्थ प्रदान करती है।
मिट्टी के दीये और मांडणे: लोकजीवन की सांस्कृतिक विरासत
एक समय था, जब दिवाली की तैयारी घर के भीतर और घर के आसपास के जीवन को एक साथ जोड़ देती थी। कुम्हार के चाक पर घूमती मिट्टी, उससे आकार लेते छोटे-छोटे दीये, उन्हें सुखाने और पकाने की प्रक्रिया तथा फिर बाजार में उनकी बिक्री—ये सभी दृश्य पर्व की अर्थव्यवस्था और लोकजीवन का हिस्सा थे।
मिट्टी का दीया केवल प्रकाश देने का साधन नहीं था। उसमें स्थानीय शिल्प, पारंपरिक कौशल और श्रम की गरिमा भी समाहित थी। तेल या घी, रूई की बत्ती और मिट्टी से बने पात्र के माध्यम से घर-घर में प्रकाश फैलता था। दीप जलाने की परंपरा ने प्रकाश को ज्ञान, शुभता और अंधकार पर विजय जैसे सांस्कृतिक अर्थों से जोड़ा।
आज बिजली की झालरों ने सजावट को अधिक सुविधाजनक और आकर्षक बना दिया है। उनका इस्तेमाल अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन यदि बिजली की रोशनी के साथ मिट्टी के दीये पूरी तरह गायब हो जाएं, तो हमें यह भी सोचना चाहिए कि कहीं हम उस स्थानीय कारीगरी से तो दूर नहीं हो रहे, जो हमारी परंपराओं को जमीन से जोड़ती है।
दीये खरीदना किसी बीते समय की नकल करना नहीं, बल्कि स्थानीय शिल्पकारों के श्रम को सम्मान देना भी है। कुछ दीये अपने घर में जलाने के साथ यदि हम जरूरतमंद परिवारों, पड़ोसियों और सार्वजनिक स्थानों पर भी प्रकाश पहुंचाने का प्रयास करें, तो पर्व का सामाजिक अर्थ और गहरा हो सकता है।
इसी तरह आंगन के मांडणे, रंगोली और अल्पना केवल सजावटी आकृतियां नहीं हैं। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में चावल के घोल, रंगीन मिट्टी, फूलों, प्राकृतिक रंगों और अन्य स्थानीय सामग्रियों से बनाए जाने वाले ये चित्र स्वागत, मंगलकामना और सृजनशीलता के प्रतीक हैं। इनके रूप अलग हो सकते हैं, लेकिन घर की देहरी को सुंदर बनाने और आगंतुकों का स्वागत करने की भावना में समानता दिखाई देती है।
जब घर की महिलाएं, बच्चे और परिवार के दूसरे सदस्य मिलकर रंगोली या मांडणे बनाते थे, तब यह काम केवल सजावट तक सीमित नहीं रहता था। उसमें सीखने, सिखाने, बातचीत करने और परिवार के साथ समय बिताने के अवसर भी छिपे होते थे। आज बाजार से तैयार स्टिकर या मशीन से बनी सजावट खरीदना आसान है, मगर परिवार के साथ मिलकर कुछ बनाने का आनंद अलग होता है।
परंपरा को बचाने का अर्थ हर पुराने तरीके को अनिवार्य बना देना नहीं है। उसका अर्थ है उन मानवीय संबंधों और रचनात्मक गतिविधियों को जीवित रखना, जिनसे पर्व की आत्मीयता पैदा होती है।
घर में बनते पकवान और रिश्तों की मिठास
दिवाली के पुराने अनुभवों में रसोई की भूमिका विशेष रही है। घरों में लड्डू, गुजिया, शक्करपारे, नमकीन और क्षेत्रीय पकवान तैयार किए जाते थे। कई परिवारों में महिलाएं और पुरुष मिलकर तैयारी करते थे। पड़ोस में किसी के यहां कुछ विशेष बनता, तो उसे दूसरे घरों तक पहुंचाने की परंपरा भी अनेक स्थानों पर प्रचलित रही है।
इन पकवानों का महत्व केवल स्वाद में नहीं था। वे श्रम, साझेदारी और अपनत्व की अभिव्यक्ति थे। किसी पड़ोसी के लिए मिठाई अलग रख देना, दूर रहने वाले रिश्तेदार के आने पर उसकी पसंद का पकवान बनाना या बच्चों को अपने हाथों से तैयार चीजें खिलाना—ऐसे छोटे-छोटे काम पर्व को निजी अनुभव बनाते थे।
आज बाजार में तरह-तरह की मिठाइयां उपलब्ध हैं। आकर्षक डिब्बों में पैक उपहार आसानी से खरीदे जा सकते हैं और व्यस्त जीवन में यह सुविधा उपयोगी भी है। लेकिन मिठाई के डिब्बे की कीमत और उसे देने वाले व्यक्ति के भाव में अंतर समझना आवश्यक है।
महंगा उपहार अपने आप में गहरे प्रेम का प्रमाण नहीं होता। कई बार घर में बनी थोड़ी-सी मिठाई, किसी बुजुर्ग का आशीर्वाद, किसी पुराने मित्र से मिलने का समय या किसी नाराज रिश्तेदार से सुलह की पहल अधिक मूल्यवान साबित होती है।
समस्या बाजार से मिठाई खरीदने में नहीं, बल्कि रिश्तों को औपचारिकता में बदल देने में है। जब उपहार देना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन बन जाता है और उसकी तुलना दूसरे लोगों के उपहारों से होने लगती है, तब त्योहार अनजाने में प्रतिस्पर्धा का माध्यम बन सकता है।
दिवाली हमें यह सोचने का अवसर देती है कि हम अपने संबंधों को कितना समय देते हैं। क्या हमें सचमुच अपने प्रियजनों से मिलने का अवसर चाहिए, या केवल एक संदेश भेजकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं? क्या किसी बुजुर्ग के पास बैठना, किसी अकेले पड़ोसी का हाल पूछना और किसी जरूरतमंद परिवार की मदद करना हमारी प्राथमिकताओं में है?
रिश्तों की मिठास बाजार से नहीं खरीदी जा सकती। वह समय, संवेदना, विश्वास और व्यवहार से पैदा होती है।
आधुनिकता की चकाचौंध और उपभोक्तावादी संस्कृति
बाजार ने दिवाली को एक बड़े व्यावसायिक अवसर में बदल दिया है। कपड़े, आभूषण, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, वाहन, घरेलू सजावट, मिठाइयां और उपहार—लगभग हर क्षेत्र में पर्व के नाम पर विशेष बिक्री अभियान चलाए जाते हैं। खरीदारी का यह विस्तार रोजगार, व्यापार और उत्पादन को बढ़ावा दे सकता है। छोटे दुकानदारों, कारीगरों और सेवा क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए त्योहार की मांग आर्थिक अवसर भी पैदा करती है।
इसलिए आधुनिक बाजार को दिवाली का शत्रु मान लेना उचित नहीं होगा। असली सवाल यह है कि खरीदारी हमारी जरूरतों और सामर्थ्य के अनुसार हो रही है या सामाजिक दबाव और दिखावे के कारण।
जब किसी परिवार को दूसरों की सजावट देखकर अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करना पड़ता है, तब उत्सव तनाव का कारण बन जाता है। जब बच्चों के सामने महंगे उपहारों को प्रेम का पैमाना बनाया जाता है, तब उनके मन में भी यही धारणा विकसित हो सकती है कि किसी वस्तु का मूल्य उसके भाव से अधिक है।
इसी तरह सोशल मीडिया ने शुभकामनाएं भेजना सरल बना दिया है। दूर देशों में रहने वाले रिश्तेदारों से संपर्क बनाए रखना, तस्वीरें साझा करना और उत्सव की खुशियां बांटना आज पहले से कहीं आसान है। यह आधुनिक तकनीक का सकारात्मक पक्ष है।
लेकिन सैकड़ों संदेशों को एक साथ भेज देना और किसी निकट संबंधी की वास्तविक परेशानी से अनजान रहना भी इसी डिजिटल संस्कृति की विडंबना है। आभासी संपर्क उपयोगी है, पर वह हर बार व्यक्तिगत संवाद का विकल्प नहीं बन सकता।
दिवाली की सार्थकता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि घर में कितनी महंगी झालर लगी है, कितने उपहार खरीदे गए हैं या सोशल मीडिया पर कितनी तस्वीरें साझा हुई हैं। उसका वास्तविक अर्थ इस बात में है कि उत्सव ने हमारे जीवन में कितना आनंद, कितनी शांति और कितनी आत्मीयता जोड़ी।
आधुनिकता को अपनाते हुए भी हम अपनी परंपराओं को बचा सकते हैं। इसके लिए तकनीक छोड़ने, बाजार से दूरी बनाने या पुराने समय में लौट जाने की आवश्यकता नहीं है। जरूरत केवल इतनी है कि साधनों का उपयोग करते समय हम अपने मूल्यों को न भूलें।
दिवाली और सामाजिक समानता: रोशनी सबके घर पहुंचे
दिवाली का प्रकाश तभी व्यापक अर्थ ग्रहण करता है, जब वह समाज के सभी वर्गों तक पहुंचे। हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग होते हैं, जिनके लिए त्योहार का समय आर्थिक कठिनाइयों को और स्पष्ट कर देता है। किसी परिवार के पास नए कपड़े खरीदने के पैसे नहीं होते, किसी बुजुर्ग के पास मिलने आने वाला कोई नहीं होता, तो कोई श्रमिक त्योहार के दिन भी दूसरों के घरों और बाजारों को सजाने में लगा रहता है।
जिन हाथों से मिट्टी के दीये बनते हैं, जो लोग सफाई करते हैं, जो कारीगर सजावट तैयार करते हैं, जो दुकानदार रात तक काम करते हैं और जो श्रमिक उत्सव की व्यवस्थाओं में योगदान देते हैं, वे भी इस पर्व की सफलता का हिस्सा हैं। उनके श्रम को सम्मान देना दिवाली की सामाजिक चेतना का महत्वपूर्ण पक्ष है।
यदि हम स्थानीय कुम्हार से दीये खरीदें, छोटे दुकानदारों से सामान लें, जरूरतमंद परिवारों को उनकी आवश्यकता के अनुसार सहायता दें और सफाईकर्मियों तथा अन्य श्रमिकों के प्रति सम्मान व्यक्त करें, तो त्योहार की खुशियां अधिक व्यापक हो सकती हैं।
सहायता का अर्थ केवल धन देना भी नहीं है। किसी अकेले व्यक्ति को अपने साथ भोजन पर आमंत्रित करना, किसी बच्चे को किताबें देना, किसी बुजुर्ग की जरूरत पूरी करना या किसी परिवार की परेशानी सुनना भी महत्वपूर्ण है।
यह भी जरूरी है कि सहायता का प्रदर्शन न किया जाए। किसी जरूरतमंद व्यक्ति की तस्वीर खींचकर उसे सार्वजनिक करना, बिना अनुमति उसकी आर्थिक स्थिति उजागर करना या मदद के बदले प्रशंसा की अपेक्षा रखना संवेदनशीलता के विरुद्ध है। वास्तविक सेवा वह है, जिसमें दूसरे व्यक्ति की गरिमा सुरक्षित रहती है।
दिवाली के अवसर पर यदि हम अपने आसपास के लोगों के जीवन में थोड़ी-सी खुशी जोड़ सकें, तो प्रकाश का अर्थ घर की दीवारों से निकलकर समाज तक पहुंचने लगेगा।
पटाखों का शोर या जिम्मेदार उत्सव?
दिवाली के आधुनिक स्वरूप पर चर्चा करते समय पटाखों और उनके पर्यावरणीय प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आतिशबाजी कई लोगों के लिए उत्सव का आकर्षण रही है, लेकिन अत्यधिक पटाखों से वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण बढ़ सकता है। इसका असर बच्चों, बुजुर्गों, सांस संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों और पशु-पक्षियों पर भी पड़ सकता है।
यहां भी संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है। उत्सव की खुशी का सम्मान करते हुए यह समझना होगा कि किसी की प्रसन्नता दूसरे के लिए परेशानी न बन जाए। पटाखों पर लागू स्थानीय नियमों और न्यायिक निर्देशों का पालन, सुरक्षित दूरी, बच्चों की निगरानी और संवेदनशील लोगों की जरूरतों का ध्यान रखना जरूरी है।
दिवाली की पहचान केवल धमाकों से नहीं है। दीप जलाना, परिवार के साथ समय बिताना, पूजा-अर्चना, पारंपरिक भोजन और सामाजिक मेल-मिलाप भी इसके महत्वपूर्ण अंग हैं। यदि हम इन गतिविधियों को केंद्र में रखें, तो उत्सव का आनंद बनाए रखते हुए उसके नकारात्मक प्रभाव कम किए जा सकते हैं।
इसी प्रकार बिजली की सजावट में ऊर्जा की अनावश्यक खपत से बचना, सुरक्षित विद्युत उपकरणों का उपयोग करना और कचरे का उचित निस्तारण करना भी जिम्मेदार उत्सव का हिस्सा है।
पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता कोई बाहरी विचार नहीं है, जिसे पर्व के विरुद्ध खड़ा किया जाए। स्वच्छ हवा, सुरक्षित वातावरण और दूसरों के प्रति जिम्मेदारी भी सामूहिक जीवन के आवश्यक मूल्य हैं।
दिवाली की असली रोशनी मनुष्य के भीतर है
दिवाली का धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ तभी पूरा होता है, जब बाहरी प्रकाश के साथ मनुष्य अपने भीतर भी झांकता है। हम घर की सफाई करते हैं, पुराने सामान को व्यवस्थित करते हैं और नई वस्तुएं खरीदते हैं। क्या इसी तरह हम अपने व्यवहार की भी समीक्षा करते हैं?
क्या हमने किसी के साथ अन्याय किया है? क्या कोई रिश्ता केवल अहंकार के कारण टूट गया है? क्या हम अपने परिवार को पर्याप्त समय दे रहे हैं? क्या हमारी सफलता के बावजूद हमारे आसपास के लोग उपेक्षित महसूस करते हैं? क्या हम दूसरों की खुशी में प्रसन्न हो पाते हैं?
ये प्रश्न किसी धार्मिक कर्मकांड का विकल्प नहीं, बल्कि उसके मानवीय अर्थ को समझने का माध्यम हैं।
प्रकाश का प्रतीकात्मक अर्थ अंधकार को दूर करना है। सामाजिक जीवन में अंधकार का रूप अज्ञान, घृणा, छल, असंवेदनशीलता और अन्याय के रूप में सामने आ सकता है। इसलिए दिवाली को केवल घर सजाने तक सीमित करने के बजाय हमें अपने आचरण में भी सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास करना चाहिए।
क्षमा मांगना, गलती स्वीकार करना, जरूरतमंद की सहायता करना, किसी के प्रति फैली गलतफहमी दूर करना और परिवार के सदस्यों के साथ संवाद बढ़ाना ऐसे छोटे कदम हैं, जो पर्व को वास्तविक अर्थ दे सकते हैं।
दिवाली की आत्मा को बचाने के लिए बड़े संकल्पों से अधिक छोटे, निरंतर प्रयासों की जरूरत है। वर्ष में एक दिन दीया जलाना सुंदर परंपरा है, लेकिन पूरे वर्ष किसी के जीवन में आशा बनाए रखना उससे भी बड़ा मानवीय दायित्व है।
नई पीढ़ी तक कैसे पहुंचे दिवाली की विरासत?
परंपराएं केवल पुस्तकों और भाषणों से जीवित नहीं रहतीं। उन्हें परिवारों और समुदायों के दैनिक व्यवहार में स्थान देना पड़ता है। नई पीढ़ी को दिवाली का अर्थ समझाने के लिए केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि कौन-सा अनुष्ठान कब करना है। उसे यह भी समझाना होगा कि इन परंपराओं के पीछे कौन-से सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय मूल्य हैं।
बच्चों को मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगरों से परिचित कराया जा सकता है। परिवार के सदस्य मिलकर पारंपरिक पकवान बना सकते हैं। दादा-दादी और नाना-नानी से पुरानी दिवाली की स्मृतियां सुनने के लिए समय निकाला जा सकता है। बच्चे अपने हाथों से रंगोली बना सकते हैं और घर की सजावट में भाग ले सकते हैं।
इन गतिविधियों के माध्यम से उन्हें पता चलेगा कि त्योहार केवल तैयार वस्तुएं खरीदने का अवसर नहीं, बल्कि कुछ बनाने, साझा करने और साथ रहने का अनुभव भी है।
स्थानीय लोकगीतों, पारंपरिक कलाओं और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों को भी परिवार के उत्सव का हिस्सा बनाया जा सकता है। भारत की सांस्कृतिक विविधता उसकी शक्ति है। किसी एक क्षेत्र की परंपरा को सभी पर थोपने के बजाय अलग-अलग परंपराओं के प्रति सम्मान विकसित करना अधिक महत्वपूर्ण है।
दिवाली का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि अगली पीढ़ी इसे केवल बाजार में उपलब्ध वस्तुओं और मनोरंजन के साधनों के माध्यम से पहचानती है या इसके पीछे छिपे मानवीय मूल्यों से भी जुड़ती है।
परंपरा बचाने के लिए अतीत में लौटना जरूरी नहीं
दिवाली बदल रही है और समय के साथ उसका बदलना स्वाभाविक भी है। पहले तेल के दीये थे, आज बिजली की झालरें भी हैं। पहले संदेश पहुंचाने के साधन सीमित थे, आज डिजिटल माध्यमों ने दूरियों को कम किया है। पहले बहुत-से पकवान घरों में तैयार होते थे, आज बाजार ने अनेक सुविधाएं उपलब्ध करा दी हैं। इन परिवर्तनों को केवल पतन का संकेत मान लेना वास्तविकता का अधूरा चित्र होगा।
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सुविधाओं की वृद्धि अपने आप में जीवन की गुणवत्ता की गारंटी नहीं है। आधुनिक साधनों के बीच यदि संवाद कम हो जाए, उपहारों के बीच आत्मीयता खो जाए, सजावट के बीच संवेदना पीछे छूट जाए और उत्सव आर्थिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम बन जाए, तो हमें अपने उत्सव मनाने के तरीके पर विचार करना चाहिए।
दिवाली की आत्मा को बचाने का अर्थ बिजली की झालरों को हटाना, बाजार से मिठाई खरीदना बंद करना या हर परिवार को एक ही पारंपरिक तरीके से त्योहार मनाने के लिए बाध्य करना नहीं है। इसका अर्थ है आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक स्मृति, सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय संवेदना को भी आगे ले जाना।
हम मिट्टी के कुछ दीये जलाकर स्थानीय कारीगरों का साथ दे सकते हैं। घर में एक पकवान बनाकर बच्चों को अपनी परंपरा से जोड़ सकते हैं। महंगे उपहारों की जगह आत्मीय मुलाकात को महत्व दे सकते हैं। पटाखों के शोर को सीमित करके दूसरों की सुविधा का ध्यान रख सकते हैं। किसी जरूरतमंद के घर में खुशियों का उजाला पहुंचा सकते हैं और परिवार के साथ बैठकर बीते समय की स्मृतियां साझा कर सकते हैं।
यही वे छोटे प्रयास हैं, जो दिवाली को केवल रोशनी के प्रदर्शन से आगे ले जाते हैं।
आखिरकार, दिवाली की सार्थकता इस बात से तय नहीं होती कि रात कितनी चमकीली थी, बल्कि इससे तय होती है कि उस रात हमारे भीतर कितनी संवेदना जागी। घर के आंगन में बना मांडणा तभी अर्थपूर्ण है, जब हमारे व्यवहार में भी सौंदर्य हो। मिट्टी का दीया तभी प्रतीक बनता है, जब हम किसी दूसरे के जीवन में आशा का प्रकाश पहुंचाएं। मिठाई तभी रिश्तों की मिठास बनती है, जब उसमें दिखावे से अधिक अपनापन हो।
दिवाली अमावस्या की रात को रोशन करने भर का पर्व नहीं है। यह मनुष्य के भीतर आशा जगाने, संबंधों को संवारने, श्रम का सम्मान करने और समाज में खुशियां बांटने का अवसर है। आधुनिकता की चकाचौंध में यदि हम इन मूल्यों को बचाए रख सके, तो मिट्टी के दीयों की सौंधी महक कभी विलुप्त नहीं होगी। वह हमारे घरों में भले कम या अधिक दिखाई दे, लेकिन हमारी संस्कृति, संवेदना और जीवन-दृष्टि में हमेशा जीवित रहेगी।












