16 अक्टूबर 2026 7:33 अपराह्न

नाना पाटेकर : संघर्ष की आग में तपकर बने अभिनय के ‘नटसम्राट’, खामोशी से लेकर दहाड़ तक हर किरदार में छोड़ी अमिट छाप

नाना पाटेकर के दमदार अभिनय और फिल्मी सफर को दर्शाती फीचर इमेज, साथ में रिपोर्टर रोजी थॉमस

सुनने के लिए यहां क्लिक करें

The specified slider id does not exist.

रिपोर्ट- रोजी थॉमस

भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जिन्हें किसी एक खांचे में रखकर समझना संभव नहीं होता। वे कभी खलनायक बनकर डराते हैं, कभी पुलिस अधिकारी बनकर व्यवस्था की कठोरता दिखाते हैं, कभी टूटे हुए इंसान की पीड़ा बन जाते हैं और कभी अपनी हास्य शैली से दर्शकों को हंसा-हंसाकर लोटपोट कर देते हैं। नाना पाटेकर ऐसे ही अभिनेता थे, जिनकी आवाज, आंखों की बेचैनी, संवाद बोलने का अंदाज और किरदार में उतर जाने की क्षमता ने उन्हें भारतीय सिनेमा की अलग पहचान दी।

नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ गजानन पाटेकर था। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। आर्थिक कठिनाइयों से भरे बचपन ने उन्हें बहुत कम उम्र में जिंदगी की कठोर सच्चाइयों से परिचित करा दिया। यही संघर्ष बाद में उनके अभिनय की सबसे बड़ी ताकत बना। उन्होंने गरीबी को केवल बाहर से नहीं देखा था, बल्कि उसे जिया था। इसलिए जब वह पर्दे पर किसी संघर्षरत आम आदमी का किरदार निभाते थे तो वह अभिनय कम और जिंदगी का सच ज्यादा लगता था।

गरीबी ने सिखाया जिंदगी का पहला अभिनय

नाना पाटेकर की जिंदगी का शुरुआती दौर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। कम उम्र में ही उन्हें काम करना पड़ा। संघर्ष के उन दिनों ने उनके भीतर आत्मनिर्भरता पैदा की। उन्होंने पोस्टर पेंट करने जैसे काम भी किए और अपनी पढ़ाई तथा जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए मेहनत की। बाद में वह कला और अभिनय की दुनिया की ओर बढ़े।

एक ऐसे कलाकार की कहानी जिसने हर किरदार में जिया जीवन

उन्होंने मुंबई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से शिक्षा प्राप्त की। कला की इस पृष्ठभूमि ने उनके भीतर दृश्य और अभिव्यक्ति की समझ को और मजबूत किया। लेकिन उनकी मंजिल सिर्फ चित्र बनाना नहीं थी। उनके भीतर अभिनय का जुनून लगातार बढ़ता गया।

नाना पाटेकर ने रंगमंच को अपना पहला गंभीर मंच बनाया। थिएटर ने उन्हें अभिनय की वह बारीकी सिखाई जिसमें कैमरे की सुविधा नहीं होती। मंच पर कलाकार को अपनी आवाज, शरीर, चेहरे और संवाद के सहारे दर्शकों तक पहुंचना पड़ता है। शायद यही कारण है कि आगे चलकर नाना पाटेकर की संवाद अदायगी इतनी प्रभावशाली बनी।

‘गमन’ से शुरू हुआ फिल्मी सफर

नाना पाटेकर ने 1978 में ‘गमन’ से हिंदी फिल्मों में अपनी पहचान बनाने की दिशा में कदम रखा। शुरुआती दौर में उन्हें बड़े सितारे जैसी भूमिकाएं नहीं मिलीं, लेकिन उन्होंने छोटे और चुनौतीपूर्ण किरदारों को स्वीकार किया।

उनके लिए फिल्म में भूमिका की लंबाई से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका प्रभाव था। यही सोच उन्हें धीरे-धीरे उस मुकाम तक ले गई जहां वह किसी फिल्म के मुख्य अभिनेता हों या सहायक कलाकार, दर्शक उनके किरदार का इंतजार करने लगे।

1980 के दशक में उन्होंने कई फिल्मों में काम किया और धीरे-धीरे फिल्म उद्योग में एक ऐसे अभिनेता के रूप में पहचाने जाने लगे, जो किरदार को केवल निभाता नहीं, बल्कि उसे अपनी पूरी ऊर्जा से जीता है।

‘सलाम बॉम्बे!’ ने बढ़ाई अंतरराष्ट्रीय पहचान

मीरा नायर की चर्चित फिल्म ‘सलाम बॉम्बे!’ ने नाना पाटेकर के अभिनय को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिल्म को ऑस्कर के लिए नामांकन मिला था और भारतीय सिनेमा के यथार्थवादी पक्ष को दुनिया के सामने रखने वाली फिल्मों में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।

नाना पाटेकर का अभिनय हमेशा से उस सिनेमा के करीब रहा जिसमें जिंदगी को सजाकर नहीं, बल्कि उसके वास्तविक रूप में दिखाने की कोशिश की जाती है। यही कारण था कि वह समानांतर और मुख्यधारा—दोनों तरह के सिनेमा में अपनी जगह बना सके।

‘परिंदा’ ने बना दिया दमदार अभिनेता

1989 में आई ‘परिंदा’ नाना पाटेकर के करियर का बड़ा मोड़ साबित हुई। फिल्म में उन्होंने अपराध की दुनिया से जुड़े एक खतरनाक और जटिल किरदार को निभाया।

उनका अभिनय इतना प्रभावशाली रहा कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसी भूमिका के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। ‘परिंदा’ ने यह स्पष्ट कर दिया कि नाना पाटेकर किसी पारंपरिक फिल्मी छवि के मोहताज नहीं हैं। वह अपनी आवाज, आंखों और अभिनय की तीव्रता से अकेले दृश्य का तापमान बदल सकते हैं।

‘प्रहार’ में अभिनेता के साथ निर्देशक भी सामने आया

नाना पाटेकर के करियर में ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ का भी विशेष महत्व है। यह फिल्म उनके निर्देशन में बनी और इसमें उन्होंने सैन्य पृष्ठभूमि से जुड़े किरदार को निभाया।

इस फिल्म के लिए उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण भी लिया था। हथियार चलाने और सैनिक की शारीरिक भाषा को समझने के लिए उन्होंने मेहनत की। आगे चलकर शूटिंग के प्रति उनका लगाव भी इसी दौर से जुड़ा। ‘प्रहार’ ने साबित किया कि नाना केवल अभिनेता ही नहीं, बल्कि कहानी और निर्देशन की समझ रखने वाले फिल्मकार भी थे।

‘क्रांतिवीर’ में अभिनय का विस्फोट

1994 की ‘क्रांतिवीर’ नाना पाटेकर के अभिनय जीवन की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म में उन्होंने ऐसे व्यक्ति का किरदार निभाया जो व्यवस्था और सामाजिक अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है।

नाना की आवाज और संवाद बोलने का अंदाज इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में शामिल रहा। उनके किरदार में गुस्सा था, दर्द था, विद्रोह था और बदलाव की बेचैनी भी थी।

‘क्रांतिवीर’ के लिए नाना पाटेकर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इस सम्मान ने उन्हें भारतीय सिनेमा के शीर्ष अभिनेताओं की श्रेणी में स्थापित कर दिया।

खलनायक से हास्य तक—हर रंग में अलग अंदाज

नाना पाटेकर को केवल गंभीर और आक्रामक भूमिकाओं के लिए याद करना उनके अभिनय के साथ अन्याय होगा।

उन्होंने ‘अंगार’ जैसी फिल्मों में नकारात्मक भूमिका निभाई और खलनायक के रूप में भी प्रभाव छोड़ा। वहीं ‘अग्निसाक्षी’ में उनके अभिनय को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला। ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ में उन्होंने संवेदनशील पिता की भूमिका निभाई। फिर आया वह दौर जब दर्शकों ने नाना के भीतर छिपे हास्य अभिनेता को भी देखा।

‘वेलकम’ में उदय शेट्टी का किरदार आज भी लोकप्रिय है। यह भूमिका उनके गंभीर अभिनय से बिल्कुल अलग थी। लेकिन नाना ने इसे भी उसी आत्मविश्वास से निभाया। उनकी आवाज, संवाद बोलने की गति, चेहरे के भाव और गुस्से के बीच पैदा होने वाला हास्य दर्शकों को खूब पसंद आया। यही नाना पाटेकर की खासियत थी—वह खुद को किसी एक शैली में कैद नहीं करते थे।

‘अब तक छप्पन’ में फिर दिखी पुलिस अधिकारी की कठोरता

‘अब तक छप्पन’ में नाना पाटेकर ने पुलिस अधिकारी का किरदार निभाया। इस भूमिका में उन्होंने कानून, अपराध और व्यक्तिगत नैतिकता के बीच उलझे एक पुलिस अधिकारी को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

उनका अभिनय यहां शोर नहीं करता। किरदार की चुप्पी, चेहरे की कठोरता और अचानक फूट पड़ने वाला गुस्सा मिलकर एक ऐसा व्यक्तित्व बनाते हैं जो दर्शक के मन में लंबे समय तक रहता है।

यही वह अभिनय शैली थी जिसने नाना पाटेकर को अपने दौर के दूसरे कलाकारों से अलग बनाया।

‘राजनीति’ में फिर बदला अंदाज

2010 में आई ‘राजनीति’ में नाना पाटेकर ने राजनीतिक दुनिया के एक प्रभावशाली चरित्र को निभाया। फिल्म में उनका किरदार वास्तविक राजनीतिक व्यक्तित्वों की छवियों से प्रेरित माना गया, लेकिन नाना ने उसे अपनी अभिनय शैली से अलग पहचान दी।

इस फिल्म ने एक बार फिर साबित किया कि नाना पाटेकर उम्र के साथ अपने किरदारों को बदलने की क्षमता रखते थे।

‘नटसम्राट’ ने रंगमंच वाले नाना को फिर सामने ला दिया

मराठी सिनेमा की चर्चित फिल्म ‘नटसम्राट’ नाना पाटेकर के अभिनय जीवन की उन भूमिकाओं में शामिल है जिन्हें लंबे समय तक याद किया जाएगा।

एक वृद्ध रंगमंच कलाकार की जिंदगी, उसके अहंकार, अकेलेपन, रिश्तों और टूटन को नाना ने जिस संवेदनशीलता से निभाया, उसने दर्शकों को भीतर तक प्रभावित किया।

यह भूमिका उनके अपने रंगमंचीय अनुभव से भी गहराई से जुड़ी दिखाई दी। नाना के लिए अभिनय केवल कैमरे का काम नहीं था। रंगमंच उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा और ‘नटसम्राट’ में उस रंगमंचीय आत्मा की झलक दिखाई दी।

तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से सम्मानित हुए नाना

नाना पाटेकर के अभिनय की सबसे बड़ी उपलब्धियों में उनके तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार शामिल हैं। उन्हें ‘परिंदा’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता, ‘क्रांतिवीर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और ‘अग्निसाक्षी’ के लिए फिर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय सम्मान मिला। इसके अलावा उन्हें कई फिल्मफेयर और अन्य पुरस्कार भी मिले। वर्ष 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

नाना की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी आवाज

नाना पाटेकर का नाम लेते ही उनकी आवाज कानों में गूंजने लगती है। लेकिन उनकी आवाज की ताकत केवल उसकी भारीपन में नहीं थी।

वह एक ही संवाद को कभी गुस्से में, कभी दर्द में, कभी व्यंग्य में और कभी हास्य के साथ बोल सकते थे। उनके संवादों में ठहराव और अचानक पैदा होने वाली तीव्रता दर्शकों पर सीधा असर डालती थी।

उन्होंने संवाद अदायगी को अभिनय का हथियार बनाया। यही वजह है कि उनकी कई फिल्मों के संवाद आज भी लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा हैं।

सिनेमा से बाहर भी आम लोगों से जुड़े रहे

नाना पाटेकर की पहचान केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने सामाजिक कामों में भी सक्रिय भूमिका निभाई। किसानों और ग्रामीण समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर उनकी चिंता सार्वजनिक रूप से सामने आती रही।

वह नाम फाउंडेशन से भी जुड़े रहे, जिसके माध्यम से किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों में मदद से जुड़े काम किए गए। इस पहल ने उन्हें सिनेमा से बाहर भी आम लोगों के बीच एक अलग पहचान दी।

उनके व्यक्तित्व में दिखावे की जगह सादगी का भाव अधिक दिखाई देता था। यही कारण है कि फिल्मी दुनिया की चमक-दमक के बीच भी नाना की छवि एक जमीन से जुड़े अभिनेता की रही।

निजी जीवन को हमेशा रखा निजी

नाना पाटेकर ने अपने निजी जीवन को सार्वजनिक चर्चा से काफी हद तक दूर रखने की कोशिश की। उन्होंने 1978 में नीलकांति पाटेकर से विवाह किया था। उनके बेटे मल्हार पाटेकर हैं। नाना और नीलकांति लंबे समय से अलग रहते थे, हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उनका तलाक नहीं हुआ था।

उनका निजी जीवन कई बार मीडिया की सुर्खियों में आया, लेकिन नाना ने सार्वजनिक रूप से अपनी निजी जिंदगी को लेकर बहुत ज्यादा खुलासा करने से परहेज किया।

विवाद भी बने उनके सफर का हिस्सा

नाना पाटेकर का जीवन केवल पुरस्कारों और सफल फिल्मों की कहानी नहीं है। उनके करियर में विवाद भी आए। 2018 के #MeToo दौर में अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे, जिन्हें नाना पाटेकर ने खारिज किया था। इस विवाद ने फिल्म उद्योग में कार्यस्थल पर व्यवहार और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया।

किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति के जीवन को समझते समय उपलब्ध आरोपों और संबंधित व्यक्ति के पक्ष—दोनों को अलग-अलग तथ्य के रूप में देखना जरूरी है।

अभिनय के साथ देश और समाज से जुड़ाव

नाना पाटेकर की जिंदगी का एक और पहलू सेना और देश सेवा से उनका जुड़ाव रहा। ‘प्रहार’ के लिए सैन्य प्रशिक्षण लेने के बाद उनका सेना के प्रति जुड़ाव और गहरा हुआ। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने भारतीय सेना के साथ भी समय बिताया था।

उनका यह पक्ष उनके फिल्मी किरदारों से भी अलग नहीं था। पर्दे पर सैनिक, पुलिस अधिकारी या देश और समाज के लिए संघर्ष करने वाले व्यक्ति की भूमिका निभाते समय उनके भीतर की गंभीरता साफ दिखाई देती थी।

नाना पाटेकर क्यों थे अलग?

नाना पाटेकर को अलग बनाने वाली सबसे बड़ी चीज उनका बिना बनावट का अभिनय था। वह किरदार को सुंदर बनाने की कोशिश नहीं करते थे। वह किरदार को सच्चा बनाने की कोशिश करते थे।

उनके चेहरे पर कभी गुस्सा बहुत बड़ा दिखाई देता था तो कभी वही चेहरा असहाय पिता का दर्द बन जाता था। उनकी आंखों में एक साथ कठोरता और करुणा दिखाई दे सकती थी। वह जब बोलते थे तो संवाद याद रह जाता था। जब चुप रहते थे तो वह चुप्पी भी संवाद बन जाती थी।

नाना पाटेकर का जाना एक अभिनय-युग का अंत

8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में नाना पाटेकर का निधन हो गया। रिपोर्टों के अनुसार गोवा स्थित उनके घर पर उन्हें कार्डियक अरेस्ट आया और अस्पताल में उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन की खबर से भारतीय सिनेमा में शोक की लहर फैल गई।

उनका निधन ऐसे समय हुआ जब वह पांच दशक के करीब लंबे अभिनय सफर के बाद भी दर्शकों की स्मृति में पूरी तरह सक्रिय थे। उनके पीछे फिल्मों की लंबी सूची, पुरस्कारों का सम्मान और ऐसे किरदारों की विरासत है जिन्हें आने वाली पीढ़ियां भी देखती रहेंगी।

नाना पाटेकर का सफर हमें यह बताता है कि महान अभिनेता बनने के लिए फिल्मी परिवार में जन्म लेना जरूरी नहीं। चमकदार शुरुआत जरूरी नहीं। पारंपरिक नायक का चेहरा जरूरी नहीं।

जरूरी है तो संघर्ष से लड़ने की क्षमता, अभिनय के प्रति ईमानदारी और किरदार को भीतर तक महसूस करने की ताकत।

मुरुड-जंजीरा से शुरू हुआ विश्वनाथ पाटेकर का सफर जब नाना पाटेकर के नाम से भारतीय सिनेमा के इतिहास में दर्ज हुआ, तब तक वह अनेक चेहरों को जी चुके थे।

कभी वह ‘परिंदा’ का खतरनाक आदमी थे, कभी ‘क्रांतिवीर’ का विद्रोही, कभी ‘खामोशी’ का संवेदनशील पिता, कभी ‘अब तक छप्पन’ का कठोर पुलिस अधिकारी, कभी ‘नटसम्राट’ का टूटता हुआ कलाकार और कभी ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी।

यही नाना पाटेकर की असली विरासत है—एक अभिनेता, जिसने हर किरदार को अपना चेहरा दिया और फिर खुद उस किरदार में कहीं पीछे छूट गया।

उनका पर्दा गिर गया है, लेकिन उनके निभाए किरदार अभी खत्म नहीं हुए। वे हर बार फिर सामने आएंगे—किसी फिल्म के दृश्य में, किसी संवाद में, किसी आंख की बेचैनी में और उस आवाज में, जिसे भारतीय सिनेमा शायद ही कभी भूल पाए।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Read More

Cricket Live Score

Rashifal

और पढ़ें