दुर्गा प्रसाद शुक्ला और अनुराग गुप्ता की ग्राउंड रिपोर्ट
बाराबंकी के रामनगर और सिरौलीगौसपुर क्षेत्र में इन दिनों सरयू नदी का कहर केवल पानी बढ़ने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि नदी की तेज धारा अब आबादी की जमीन को लगातार निगलती जा रही है। नदी के किनारे बसे गांवों में दिन किसी तरह गुजर रहा है, लेकिन रात होते ही ग्रामीणों की बेचैनी बढ़ जाती है। उन्हें डर है कि जिस जमीन पर उनका घर खड़ा है, सुबह तक वही जमीन नदी की धारा में समा सकती है।
मंगलवार शाम एल्गिन ब्रिज पर सरयू नदी का जलस्तर 106.800 मीटर दर्ज किया गया। यह खतरे के निशान 106.070 मीटर से करीब 73 सेंटीमीटर ऊपर है। फिलहाल जलस्तर स्थिर बताया जा रहा है, लेकिन खतरे के निशान से ऊपर बह रही नदी और बैराजों से लगातार छोड़े जा रहे पानी ने ग्रामीणों की चिंता कम नहीं की है। मंगलवार दोपहर शारदा और गिरजा बैराज समेत अन्य स्रोतों से करीब 3.50 लाख क्यूसेक पानी सरयू नदी में छोड़े जाने की जानकारी सामने आई है।
पानी का दबाव थमा नहीं, कटान ने बढ़ाई चिंता
ग्राउंड पर हालात यह संकेत दे रहे हैं कि यहां बाढ़ के पानी से कहीं ज्यादा बड़ी चुनौती नदी का कटान बन गया है। हेतमापुर गांव में सरयू नदी की धार जमीन को लगातार काट रही है। नदी का बहाव जिस तरह किनारों को अपने साथ खींच रहा है, उससे ग्रामीणों के सामने केवल जलभराव की समस्या नहीं, बल्कि घर और जमीन दोनों खोने का खतरा खड़ा हो गया है।
सोमवार रात नदी की तेज धारा ने बाबा नारायण दास मंदिर के सामने स्थित करीब तीन दशक पुराने महंत गुरु नारायण और उदित नारायण के समाधि स्थलों को भी अपनी चपेट में ले लिया। इनके साथ करीब 10 मकान नदी में समा गए। पिछले तीन दिनों के दौरान नदी की धारा में समाने वाले मकानों की संख्या बढ़कर 32 हो गई है।
यह आंकड़ा अपने आप में सरयू नदी के कहर की गंभीरता को सामने रखता है। जिन घरों में कुछ दिन पहले तक परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी चल रही थी, वहां अब कटान के निशान और नदी की धारा दिखाई दे रही है।
मंदिर के बरामदे तक पहुंची सरयू की धार
हेतमापुर में बाबा नारायण दास मंदिर के आसपास की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। नदी की तेज धारा मंदिर के हिस्से को काटते हुए आगे बढ़ रही है और पानी मंदिर के बरामदे तक पहुंच चुका है। नदी के दबाव से मंदिर की दीवारों में दरारें आने की बात भी सामने आई है।
स्थानीय लोगों की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आसपास के ग्रामीणों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। नदी यदि इसी गति से कटान करती रही तो मंदिर के अस्तित्व पर भी संकट गहरा सकता है।
मंदिर को बचाने के लिए बाढ़ खंड की ओर से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। नदी के किनारे बोल्डर और पत्थर डाले जा रहे हैं। ईंटों से भरी बोरियों को भी तेज धारा वाले हिस्सों में डालकर कटान की गति रोकने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन मौके पर नदी की ताकत और बचाव कार्य के संसाधनों के बीच मुकाबला साफ दिखाई देता है।
ग्रामीणों ने भी रात में बाढ़ खंड के कर्मचारियों के साथ मिलकर कटान रोकने में हाथ बंटाया। अंधेरे में नदी के किनारे खड़े होकर मिट्टी और जमीन को बचाने की कोशिश करने वाले लोगों के सामने हर पल खतरा बना रहा। इसके बावजूद सरयू की धार लगातार जमीन को काटती रही।
कई घरों पर मंडरा रहा नदी में समाने का खतरा
मंदिर के पूरब दिशा में नंद किशोर, कय्यूम, जहीर और मोबीन के मकान कटान के बेहद करीब पहुंच चुके हैं। पश्चिमी हिस्से में सलीम के मकान को भी नदी तेजी से अपनी ओर खींच रही है। ग्रामीणों के लिए सबसे भयावह स्थिति यह है कि नदी और घरों के बीच सुरक्षित दूरी लगातार कम होती जा रही है।
सरयू नदी का कहर केवल निजी मकानों तक नहीं पहुंचा है। नदी की धारा ने पशु अस्पताल के एक भवन को भी प्रभावित किया है। सीसी रोड का एक हिस्सा बह जाने से आवागमन पर भी असर पड़ा है। इससे यह स्पष्ट है कि कटान अब गांव की बुनियादी संरचना को भी नुकसान पहुंचाने लगा है।
निजाम, अहमद, रियाज, कलाम, जुम्मन, सुहेल और अलीशेर समेत कई अन्य ग्रामीणों के मकानों पर भी खतरा मंडरा रहा है। हालात ऐसे हैं कि कुछ परिवार अपने घरों को खुद तोड़कर ईंट, लकड़ी और दूसरी उपयोगी सामग्री सुरक्षित स्थानों पर ले जाने को मजबूर हैं।
किसी परिवार के लिए अपना घर खुद तोड़ना आसान फैसला नहीं होता। लेकिन जब सामने नदी हो और पीछे लगातार खिसकती जमीन, तब सामान बचा लेना ही ग्रामीणों के लिए मजबूरी बन जाता है।
रात होते ही बढ़ जाती है ग्रामीणों की बेचैनी
दिन के उजाले में नदी के किनारे की स्थिति दिखाई देती है, इसलिए ग्रामीण किसी तरह खतरे का अंदाजा लगा लेते हैं। लेकिन रात में यही खतरा कई गुना बढ़ जाता है। तेज बहाव की आवाज, किनारे के टूटने की आशंका और अचानक जमीन खिसकने का डर लोगों को सोने नहीं देता।
हेतमापुर और आसपास के गांवों में कई परिवार सुरक्षित स्थानों की तलाश में जुटे हैं। जिन लोगों के मकान अभी नदी से कुछ दूरी पर हैं, वे भी भविष्य को लेकर आशंकित हैं। उन्हें डर है कि जलस्तर बढ़ा या कटान की दिशा बदली तो अगली बारी उनके घर की हो सकती है।
ग्रामीणों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि बचाव कार्य नदी की लगातार बदलती धार के सामने कितनी देर तक टिक पाएगा। बाढ़ खंड की टीमें अपने स्तर पर काम कर रही हैं, लेकिन नदी की रफ्तार और कटान का क्षेत्र लगातार बदलने के कारण चुनौती कम होने के बजाय बढ़ती दिखाई दे रही है।
सिर्फ हेतमापुर नहीं, कई गांव बाढ़ की चपेट में
सरयू नदी का कहर हेतमापुर तक सीमित नहीं है। सिरौलीगौसपुर और रामसनेहीघाट तहसील क्षेत्र के कई गांवों में बाढ़ का पानी पहुंच चुका है। कई स्थानों पर पानी घरों के आसपास जमा है तो कुछ गांवों में स्कूल परिसरों तक पानी पहुंचने की जानकारी है।
इस स्थिति ने ग्रामीण जीवन को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने के साथ ही ग्रामीणों के सामने पशुओं के लिए चारे, पीने के पानी, आवागमन और सुरक्षित ठिकाने की समस्या भी खड़ी हो गई है।
कई परिवार ऊंचे और सुरक्षित स्थानों पर डेरा डालने को मजबूर हैं। जिन लोगों ने वर्षों की मेहनत से अपने घर और सामान जुटाया था, वे अब जरूरी सामान समेटकर अस्थायी सुरक्षित ठिकानों की ओर जाने को मजबूर हैं।
बैराजों से छोड़ा गया पानी बढ़ा रहा चिंता
मंगलवार दोपहर शारदा और गिरजा बैराज समेत अन्य स्रोतों से करीब 3.50 लाख क्यूसेक पानी छोड़े जाने की सूचना ने ग्रामीणों की चिंता और बढ़ा दी। हालांकि मंगलवार शाम एल्गिन ब्रिज पर जलस्तर स्थिर बताया गया, लेकिन खतरे के निशान से ऊपर बह रही नदी के बीच ग्रामीण किसी भी बदलाव को लेकर सतर्क हैं।
नदी का जलस्तर स्थिर होना फिलहाल राहत की बात हो सकती है, लेकिन किनारों पर जारी कटान यह बताता है कि खतरा केवल पानी की ऊंचाई से तय नहीं हो रहा। कई जगह नदी की धारा जमीन को लगातार काट रही है। यही कारण है कि अपेक्षाकृत कम जलस्तर में भी किनारे बसे घर और सरकारी भवन जोखिम में आ रहे हैं।
प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती
मौजूदा हालात में प्रशासन और बाढ़ खंड के सामने एक साथ दो चुनौतियां हैं। पहली चुनौती बाढ़ के पानी से प्रभावित गांवों में लोगों को सुरक्षित रखना है और दूसरी चुनौती नदी के कटान को रोकना है।
कटान रोकने के लिए बोल्डर, पत्थर और बोरियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन जिस तेजी से नदी जमीन काट रही है, उससे बचाव कार्य की प्रभावशीलता लगातार चुनौती के घेरे में है। ग्रामीणों की अपेक्षा है कि संवेदनशील स्थानों पर राहत और बचाव संसाधनों को और मजबूत किया जाए तथा संभावित रूप से प्रभावित परिवारों को समय रहते सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जाए।
मौके की तस्वीर यह भी बताती है कि केवल तत्काल राहत से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा। नदी के लगातार बदलते स्वरूप और कटान प्रभावित क्षेत्रों का तकनीकी आकलन कर दीर्घकालिक सुरक्षा उपायों की जरूरत है।
ग्रामीणों को अब पानी से ज्यादा जमीन खोने का डर
सरयू नदी की बाढ़ के साथ आमतौर पर लोगों की चिंता पानी के घरों में घुसने तक सीमित रहती है, लेकिन इस बार कई ग्रामीणों के सामने उससे भी बड़ा संकट खड़ा है। पानी उतर जाने के बाद भी यदि नदी का कटान जारी रहा तो घर, खेत, रास्ते और सरकारी भवन सुरक्षित नहीं रहेंगे।
हेतमापुर में 32 मकानों का नदी में समा जाना इस खतरे की गंभीर तस्वीर पेश करता है। समाधि स्थलों का बह जाना और मंदिर तक नदी की पहुंच जाना इस बात का संकेत है कि नदी की धारा अब आबादी के बेहद करीब पहुंच चुकी है।
सरयू नदी का कहर ग्रामीणों के लिए सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि उनकी जमीन, घर, आजीविका और वर्षों की मेहनत पर मंडराता संकट बन चुका है। फिलहाल जलस्तर स्थिर है, लेकिन गांवों में डर स्थिर नहीं है। नदी की धार के हर उतार-चढ़ाव के साथ ग्रामीणों की निगाहें अपने घरों और किनारों पर टिकी हैं।
बाराबंकी के इन बाढ़ प्रभावित इलाकों में आने वाली रातें इसलिए भी अहम हैं कि नदी का जलस्तर भले स्थिर बताया जा रहा हो, लेकिन कटान अभी थमा नहीं है। जब तक नदी की धार शांत नहीं होती और संवेदनशील किनारों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिलती, तब तक ग्रामीणों के लिए हर रात एक नए खतरे की आशंका लेकर आएगी।













