16 अक्टूबर 2026 6:35 अपराह्न

13 अंकों का सफर , 15वें पड़ाव से पहले पाठकों का दिल से धन्यवाद

जनगणदूत की ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ पर विशेष संपादकीय फीचर में मोहन द्विवेदी, केवल कृष्ण पनगोत्रा और संपादक अनिल अनूप की तस्वीरें

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‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ को यदि केवल पंद्रह लेखों की एक सामान्य श्रृंखला मान लिया जाए, तो शायद उसके साथ न्याय नहीं होगा। हमारे लिए यह केवल पंद्रह लेख नहीं हैं। यह पंद्रह दस्तक हैं। पंद्रह बार किसी दरवाजे पर खड़े होकर पूछा गया है—क्या अंदर कोई सुन रहा है? पंद्रह बार समाज से कहा गया है—थोड़ी देर रुकिए, इस विषय पर भी बात कर लीजिए। पंद्रह बार परिवार से आग्रह किया गया है—जिन बातों को कहने में संकोच होता है, उन्हें सुनने का साहस भी कीजिए।

और शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन पंद्रह दस्तकों के बहाने पत्रकारिता से भी एक सवाल पूछा गया है—आखिर पत्रकारिता का अर्थ क्या है? क्या मीडिया केवल घटनाओं की सूचना देने का माध्यम है? क्या पत्रकारिता का काम केवल यह बताना है कि आज क्या हुआ? या उसका एक बड़ा दायित्व यह भी है कि वह समाज को यह सोचने पर विवश करे कि जो हो रहा है, वह क्यों हो रहा है?

यहीं आकर ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ एक सामान्य लेख-श्रृंखला से आगे निकलती दिखाई देती है।

पाठकों ने केवल पढ़ा नहीं, स्वीकार भी किया

जनगणदूत परिवार के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ के अब तक 13 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। असली उपलब्धि यह है कि पाठकों ने इन लेखों को केवल पढ़ा नहीं, उन्हें स्वीकार किया।

किसी भी विचार-प्रधान लेखन के लिए पाठक का समय सबसे बड़ी पूंजी होता है। आज जब सूचना की गति बहुत तेज है, जब मोबाइल स्क्रीन पर हर क्षण नई खबर दस्तक दे रही है और जब कुछ सेकंड में पाठक एक खबर से दूसरी खबर पर पहुंच जाता है, ऐसे समय में किसी विचार को पढ़ने के लिए रुकना अपने आप में महत्वपूर्ण घटना है।

‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ के साथ यही हुआ। पाठकों ने रुककर पढ़ा, सोचा। कई विषयों पर सहमति व्यक्त की, कई बातों पर अपनी असहमति भी रखी और कई जगह शायद अपने आसपास के जीवन की तस्वीर देखी। यही किसी लेखन की वास्तविक सफलता है।

लेखक लिखता है, लेकिन रचना तभी जीवित होती है जब पाठक उसे अपने अनुभवों से जोड़ता है। ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ के साथ जनगणदूत परिवार ने यही अनुभव किया है। यह हमारे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं है।

ये चिट्ठियां कागज पर नहीं, मन तक पहुंचीं

‘चिट्ठी’ शब्द अपने आप में बहुत आत्मीय है। चिट्ठी में आदेश नहीं होता, संवाद होता है। उसमें शोर नहीं होता, एक ठहराव होता है। चिट्ठी पढ़ने वाला व्यक्ति केवल सूचना नहीं पढ़ता, वह लिखने वाले की भावना को भी महसूस करता है।

शायद यही कारण है कि ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ का स्वर पाठकों तक पहुंच सका। इन लेखों में उपदेश देने की बजाय सवाल हैं। किसी पर फैसला सुनाने की बजाय सोचने का आग्रह है। समाज को कठघरे में खड़ा करने की बजाय समाज के भीतर झांकने की कोशिश है।

यही इस लेखन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। आज सार्वजनिक संवाद में अक्सर दो ही रास्ते दिखाई देते हैं—या तो किसी बात का समर्थन कीजिए या विरोध। बीच की वह जगह, जहां कोई व्यक्ति बैठकर शांत मन से सोच सके, धीरे-धीरे छोटी होती जा रही है।

ऐसे समय में विचार का एक ऐसा मंच जरूरी है जहां सवाल पूछे जा सकें और हर सवाल का तत्काल जवाब देना अनिवार्य न हो। ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ ने इस जगह को तलाशने की कोशिश की है। जनाब केवल कृष्ण पनगोत्रा ने इस यात्रा का निर्माण सफलतापूर्वक ही नहीं किया, बल्कि उसे शब्दों में जी कर दिखाया।

जनगणदूत परिवार अपने संपादक प्रवर अनिल अनूप जी का भी उतना ही आभार व्यक्त करता है कि उनके शब्द संयोजन, विषय को पाठकों की भावनाओं से जोड़कर चटपटी और सहज प्रस्तुति देने का ऐसा प्रयास रहा, जो पाठकों को हमेशा पचता रहा। यह भी अपने आप में कमाल है।

13 अंक पूरे हुए, यात्रा अभी बाकी है

आज हम ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ के 13वें अंक के साथ चल रहे हैं। यह पड़ाव महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे अंतिम पड़ाव समझना जल्दबाजी होगी। अभी एक और अंक आएगा और उसके बाद वह 15वां अंक, जिसे इस यात्रा का अंतिम अंक कहा गया है।

लेकिन यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है—आज का यह लेख ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ का कोई अंक नहीं है। यह जनगणदूत परिवार की ओर से उस पूरी यात्रा को देखने, समझने और अपने पाठकों के प्रति आभार व्यक्त करने का एक स्वतंत्र संपादकीय विचार है।

हम इस यात्रा के बीच में खड़े होकर पीछे भी देख रहे हैं और आगे आने वाले पड़ाव की ओर भी देख रहे हैं। पीछे देखने पर पंद्रह दस्तकें दिखाई देती हैं और आगे देखने पर अंतिम दस्तक की प्रतीक्षा दिखाई देती है।

लेकिन विचारों की यात्रा किसी अंतिम अंक के साथ समाप्त नहीं होती। लेख समाप्त हो सकता है, श्रृंखला समाप्त हो सकती है, किसी विषय पर अंतिम पंक्ति लिखी जा सकती है, मगर पाठक के मन में पैदा हुआ सवाल वहीं से अपनी दूसरी यात्रा शुरू करता है।

अंतिम अंक का अर्थ अंत नहीं

‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ के 15वें अंक को श्रृंखला का अंतिम अंक कहा जा रहा है। इसका अर्थ यह नहीं कि उन लेखों में उठे सवाल भी समाप्त हो जाएंगे। समाज में रिश्ते रहेंगे, परिवार रहेंगे, पीढ़ियों के बीच संवाद और दूरी दोनों रहेंगी। बदलती सामाजिक परिस्थितियां नए प्रश्न पैदा करती रहेंगी। पुरानी मान्यताओं और नई सोच के बीच संवाद चलता रहेगा।

इसलिए किसी भी विचार-श्रृंखला का अंतिम लेख वास्तव में अंतिम विचार नहीं होता। वह पाठक के भीतर एक नया विचार छोड़ जाता है।

कई बार पत्रकारिता की सबसे बड़ी सफलता किसी समस्या का समाधान देना नहीं, बल्कि उस समस्या को सही सवाल के रूप में समाज के सामने रख देना होती है। क्योंकि समाधान की पहली सीढ़ी सवाल ही है।

पत्रकारिता केवल खबर नहीं, समाज का आईना भी है

जनगणदूत परिवार के लिए पत्रकारिता केवल घटनाओं का संकलन नहीं है। हम मानते हैं कि खबर जरूरी है, तथ्य जरूरी हैं और घटनाओं की सही सूचना जरूरी है। लेकिन पत्रकारिता का दायित्व यहीं समाप्त नहीं हो जाता।

समाचार बताता है कि क्या हुआ। विचार पूछता है कि क्यों हुआ। विश्लेषण यह समझने की कोशिश करता है कि इसका प्रभाव क्या होगा। और संवेदनशील पत्रकारिता यह भी पूछती है कि इससे प्रभावित मनुष्य की स्थिति क्या है।

यही वह बिंदु है जहां पत्रकारिता समाज के साथ अपने बड़े दायित्व से जुड़ती है। ‘पनगोत्रा की चिट्ठी’ ने इसी विचार-परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। इसीलिए इसे केवल लेखों की संख्या में मापना उचित नहीं होगा।

तेरह अंक हो चुके हैं, चौदहवां आने वाला है और पंद्रहवां इस यात्रा का अंतिम अंक होगा। लेकिन इन अंकों के बीच जो संवाद बना, वही इस पूरी श्रृंखला की असली उपलब्धि है।

पाठक ही किसी मीडिया संस्थान की असली ताकत हैं

किसी समाचार संस्थान के पास तकनीक हो सकती है। उसके पास वेबसाइट हो सकती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हो सकते हैं। उसके पास संसाधन हो सकते हैं। लेकिन यदि पाठक नहीं हैं, तो यह सब अधूरा है।

जनगणदूत परिवार अपने अनुक्रम को इसलिए धन्यवाद नहीं दे रहा है कि वे केवल हमारी सामग्री का अवलोकन करते हैं। हम उनके एसोसिएट्स बातचीत कर रहे हैं कि उन्होंने हमें अपना समय दिया।

आज के समय में पाठक का समय बहुत मूल्यवान है। उन्होंने हजारों ‘पनगोत्र की बोतल’ को बीच में से चुना। कुछ क्षण रुककर उसे पढ़ें। विषय को समझने की कोशिश की। कभी प्रतिक्रिया दी, कभी उसे आगे साझा किया और कभी मैसाचुसेट्स आर्किटेक्ट्स अपने अंदर कोई सवाल लेकर आगे बढ़ गया।

हम उस मौन पाठक को भी धन्यवाद देते हैं। क्योंकि पत्रकार की हमेशा प्रतिक्रिया सामने नहीं आती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पाठक के अंदर कोई प्रतिक्रिया पैदा नहीं हुई है।

जनगणदूत परिवार की ओर से लूट

आज इस अवसर पर जनगणदूत परिवार ने अपने सभी पाठकों के प्रति हृदय से सहयोगी व्यक्ति के रूप में ‘पनगोत्रा ​​की पत्रिका’ को पढ़ा, लेबल किया, स्वीकृत किया और इसे अपने समय का हिस्सा बनाया।

हम उन विरोधियों के भी प्रतिद्वंद्वी हैं। क्योंकि असंगत संवाद को औपचारिक नहीं बनाया जाता, अगर वह तर्क और सम्मान के साथ बातचीत की जाए। बल्कि कई बार असहमति ही विचार को और अधिक मजबूत बनाता है।

हम उन साक्षियों को भी धन्यवाद देते हुए कहते हैं कि ऐसे विषयों पर लिखना चाहिए। हम उन अचरजों के भी शौकीन हैं, हमें यह महसूस होता है कि विचार प्रधान लेख आज भी जगह है।

और सबसे बड़ा विरोध हम उस विशाल पाठक समूह को धन्यवाद देते हैं जिन्होंने यह साबित किया कि डिजिटल युग भी गंभीर है और पाठकों के लिए आत्मीय लेख मौजूद हैं।

लेखक के प्रति भी एक सार्वजनिक धन्यवाद

किसी भी लेख-श्रृंखला की सफलता के पीछे लेखक की दृष्टि, संवेदना और निराशा का महत्वपूर्ण योगदान होता है। ‘पनगोत्रा ​​की शब्दावली’ के माध्यम से केवल कृष्ण पंगोत्रा ​​ने जिन विषयों को उठाया, उन्हें जनगणदूत परिवार ने केवल प्रकाशित सामग्री के रूप में नहीं देखा। हमने उन्हें समाज से संवाद की कोशिश के रूप में देखा।

एक लेखक जब अपने आस-पास की दुनिया को देखता है तो उसे केवल कोई घटना नजर नहीं आती। वह अपने अंदर अर्थशास्त्र को तलाशता है। वह उन आवाजों को सुनने की कोशिश करती है जो बार-बार तेजी से किनारे पर दब जाती है। उन्होंने सामने कहा कि जिन पर परिवार में बात नहीं होती, समाज में चर्चा नहीं होती और कभी-कभी मीडिया में भी सामान नहीं बनता।

इस दृष्टि से ‘पनगोत्रा ​​की वर्णमाला’ ने जनगणदूत के विसजत दुनिया में अपनी अलग जगह बनाई है। जनगणदूत परिवार के लेखक केवल कृष्ण पंगोत्रा ​​के प्रति भी अपनी आत्मीय कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

पंद्रहवीं कक्षा से पहले एक स्टैंस्ट

अब जब हम 13वें एकांक तक पहुँचे हैं और एक और एकके बाद 15वें अंतिम अंक की ओर बढ़ रहे हैं, तो शायद कुछ जगह रुककर इस पूरी यात्रा को देखना चाहिए। कौनसा प्रश्न उठेगा? कितनी चुप्पियाँ को शब्द मिले? किस तरह से जोड़ी ने अपने जीवन से इन विषयों को जोड़ा?

इन सवालों के जवाब शायद किसी भी दस्तावेज में नहीं मिलेंगे। और शायद मिलना भी नहीं चाहिए। क्योंकि विचार का प्रभाव सदैव कायम नहीं रह पाता।

किसी एक पाठक का अपने बच्चे से बात करने का तरीका बदल जाए, किसी परिवार में लंबे समय तक किसी विषय पर बातचीत न हो सके।

जनगणदूत का वादा—सवालों से दूरी नहीं

‘पनगोत्र की वर्णमाला’ की यह यात्रा जनगणदूत परिवार के लिए एक और सीख है। हमने देखा है कि पाठक केवल वर्णमाला नहीं चाहते। वह संवेदना भी चाहती है। वह सिर्फ ताजा घटना नहीं चाहती, वह अपनी पीछे की कहानी भी चाहती है।

वह जानना चाहता है कि किसी भी घटना का उसके परिवार, समाज और आने वाले स्थान पर क्या असर हो सकता है। इसलिए जनगणदूत परिवार भविष्य में भी तथ्य, संवेदना, प्रश्न और संवाद को पत्रकारिता के महत्वपूर्ण आधारों के रूप में देखने का प्रयास करेगा।

क्योंकि पत्रकारिता का काम केवल शोर उठाना नहीं है। कभी-कभी उनका सबसे बड़ा काम किनारे के बीच एक शांत सवाल पूछता है।

चाची से बस इतना कहा है…

‘पनगोत्र की वर्णमाला’ का ऊपरी अवलोकन जब आप सामने आएं, तो उसे केवल एक और लेख की तरह न पढ़ें। उसे अपने घर की किसी भी बातचीत की तरह पढ़ें। देखिये इसमें शामिल कौन-सी बात आपके आस-पास दिखाई देती है। कौन-सा सवाल आपको परेशान करता है। किस-किस बात से आप सहमत नहीं हैं।

और कौन-सी बात आपको यह विचारक के लिए मजबूर करती है कि इस विषय पर हमें अपने परिवार में, अपने समाज में और अपने बच्चों के साथ बात करनी चाहिए। क्योंकि यही इस संपूर्ण यात्रा का उद्देश्य है।

लेखक रह रहे हैं और पाठक पाठक रह रहे हैं—इतना ही संवाद नहीं। लेखक ने पूछा, पाठक ने उसे अपने जीवन से सम्मिलन देखा और फिर समाज में एक नई बातचीत शुरू हो गई—असल अर्थ में यही संगति वार्ता है।

सारे दरवाजे खुल रहे हैं, लेकिन दरवाजा खुल रहा है

‘पनगोत्र की नाव’ की यात्रा अपने निर्धारित अंतिम अंक की ओर बढ़ रही है। एक अंक अभी बाकी है। फिर 15वां और अंतिम अंक आया। लेकिन हम इसे पूर्णविराम की तरह नहीं देखना चाहते। इसे एक पर्यवेक्षण की तरह अधिक देखना होगा।

क्योंकि विश्व में पूर्णविराम के दर्शन बहुत कम होते हैं। प्रश्न आगे बढ़ रहे हैं, संदर्भ में बदलाव हैं और नई पीढि़यां पुराने जमाने के मसालों को नए तरीके से पूछती हैं।

इसलिए इन फ़िज़ूल चीज़ों के बाद भी दरवाज़ा खुला रहना चाहिए—संवाद का दरवाज़ा, सवाल का दरवाज़ा, असहमति का दरवाज़ा और एक-दूसरे को सुनने का दरवाज़ा सबसे ज़्यादा बर्दाश्त किया जाना चाहिए। ये शायद ‘पनगोत्र की वर्णमाला’ की सबसे बड़ी विरासत होगी।

अंत में—पाठकों को नमन

जनगणदूत परिवार की ओर से अपने सभी साथियों को दिल से धन्यवाद। आपने इस श्रृंखला को केवल स्थान नहीं दिया, बल्कि अपना विश्वास दिया। आपने इसे केवल पढ़ा नहीं, स्वीकार किया। आपने इन हथियारों को अपने समय और अपने विचारों में जगह दी।

हम आपके इस विश्वास को किसी संख्या, किसी आंकड़े या किसी उपलब्धि के रूप में नहीं देखना चाहते। हम इसे एक जिम्मेदारी के रूप में देखते हैं। आपने हमें पढ़ा है, इसलिए हमें और अधिक जिम्मेदारी से लिखना होगा। आपने मसालों को जगह दी है, इसलिए हमें मसालों से डरना नहीं होगा। आपके विचार को स्वीकार किया गया है, इसलिए हमारे विचार की गरिमा बनाए रखी जाएगी।

और आपने ‘पनगोत्र की वर्णमाला’ को जिस आत्मीयता से स्वीकार किया है, उसके लिए जनगणदूत परिवार आपका दिल से जुड़ा है।

तीसरी पारी तक साथ चलने के लिए धन्यवाद। चौदहवीं चौपाई पर फिर मिलेंगे। और उसके बाद पैंतीसवीं कक्षा के साथ इस विशेष यात्रा का अंतिम निरीक्षण आया। लेकिन आशा है कि तब तक हमारे बीच संवाद समाप्त नहीं होगा।

क्योंकि प्रश्न का अंतिम उत्तर हमेशा लिखा जा सकता है, लेकिन प्रश्न का अंतिम उत्तर हमेशा आवश्यक नहीं होता।

संभवतः गणित की असली ताकत भी यही है—वह हमें खबर सुनकर आगे नहीं बढ़ती, बल्कि कभी-कभी हमारे अंदर एक ऐसा सवाल छोड़ दिया जाता है, जो देर तक हमारा पीछा करता रहता है।

जनगणदूत परिवार की ओर से अपने विशाल पाठक समुदाय को सादर नमन और हृदय से धन्यवाद। लेखक श्री जनाब एकमात्र कृष्ण पानगोत्रा ​​साहब का विशेष आकर्षण हर सप्ताह हमारे लिए समय निकाल कर विचार का समंदर निहारने का दुर्लभ मौका दिया।

– मोहन द्विवेदी
कार्यकारी संपादक, जनगणदूत
एवं प्रधानाचार्य, जीएम अकादमी, सलेमपुर, देवरिया उत्तर प्रदेश

यह प्लांट अंतिम रूप में हो सकता है, विचार जारी रहेगा।
पनगोत्रा ​​साहब हमारे साथ बने रहेंगे, लेकिन वो रूप कौन-सा होगा, ये तो अगले रविवार को रहेगा।

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प्रश्न का उत्तर पढ़ें पर क्लिक करें

‘पनगोत्र की वर्णमाला’ को केवल लेख-श्रृंखला क्यों नहीं माना गया?

क्योंकि इसमें केवल इतिहास की जानकारी नहीं दी गई, बल्कि समाज, परिवार और नैतिकता से जुड़े प्रश्नों पर संवाद शुरू करने का प्रयास किया गया।

अब तक कितने अंक प्रकाशित हो चुके हैं?

‘पनगोत्र की वर्णमाला’ के 13 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। 15वें के बाद एक और अंक और अंतिम अंक निर्धारित है।

15वें अंक की यात्रा का अंत क्या होगा?

नहीं. 15वें अंक सीरीज का अंतिम रूप हो सकता है, लेकिन अविश्वास से उठे सवाल और विचार आगे भी संवाद का हिस्सा बने रहेंगे।

जनगणदूत परिवार का संदेश कैसे प्राप्त करें?

दिल के लिए विश्वास और समय के लिए धन्यवाद। यही विश्वास जनगणदूत को तथ्य, संवेदना और संवाद के साथ पत्रकारिता जारी रखने की जिम्मेदारी देता है।

पैंगोत्रा ​​साहब के साथ आगे क्या होगा?

पंगोत्रा ​​साहब जनगणदूत परिवार के साथ बने रहेंगे। आगे उनका रूप क्या होगा, यह अभी सरप्राइज़ है—अगले अगले रविवार को समाचार प्रकाशित होगा।

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