16 अक्टूबर 2026 7:33 अपराह्न

अंतिम विदाई के लिए तरसता रहा पिता का शव, ठेले पर मासूम बच्चों की गुहार ने जगाई इंसानियत

पिता के अंतिम संस्कार के लिए मदद और इंसानियत का प्रतीकात्मक दृश्य, रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

एक पिता की मौत के बाद उसके तीन मासूम बच्चे जिस पीड़ा से गुजरे, उसे सुनकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का कलेजा कांप उठेगा। जिस पिता ने जीवनभर मेहनत कर अपने बच्चों का पेट पाला, उसी की मौत के बाद उसके शव को अंतिम संस्कार तक नसीब नहीं हो पा रहा था। घर में मां का साया पहले ही उठ चुका था और अब पिता की मौत ने बच्चों को पूरी तरह बेसहारा कर दिया। हालात ऐसे बने कि बच्चों को पिता का शव ठेले पर रखकर अंतिम संस्कार की व्यवस्था के लिए लोगों से मदद मांगनी पड़ी।

यह हृदयविदारक घटना उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले में भारत-नेपाल सीमा के निकट नौतनवा नगर क्षेत्र से सामने आई है। यहां एक परिवार के सामने आई मजबूरी ने न केवल गरीबी और सामाजिक उपेक्षा की तस्वीर दिखाई, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि किसी असहाय परिवार को अंतिम संस्कार जैसी बुनियादी मानवीय जरूरत के लिए भी अगर दर-दर भटकना पड़े तो समाज की संवेदनशीलता कहां चली गई है।

मां के बाद पिता भी चले गए, तीन बच्चों पर टूटा दुखों का पहाड़

राजेंद्र नगर क्षेत्र निवासी लव कुमार पटवा लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे थे। शनिवार को उनकी मौत हो गई। परिवार पहले ही एक बड़े सदमे से गुजर चुका था। करीब छह महीने पहले उनकी पत्नी का भी निधन हो गया था। पति-पत्नी दोनों के दुनिया से चले जाने के बाद 14 वर्षीय राजवीर, 10 वर्षीय देवराज और उनकी छोटी बहन के सिर से माता-पिता दोनों का साया उठ गया।

पिता की मृत्यु के बाद बच्चों को उम्मीद थी कि परिवार, रिश्तेदार या आसपास रहने वाले लोग आगे आएंगे और अंतिम संस्कार में सहयोग करेंगे। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें अपेक्षित मदद नहीं मिली। पिता का शव करीब दो दिन तक घर में पड़ा रहा। बच्चों की स्थिति लगातार खराब होती जा रही थी और उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था कि आखिर पिता को अंतिम विदाई कैसे दी जाए।

जिन बच्चों की उम्र अभी जीवन की कठिनाइयों को समझने की भी नहीं हुई थी, उन्हें अचानक घर, परिवार और पिता की मृत्यु से जुड़े सारे फैसलों का सामना करना पड़ा।

जब अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं जुट सकी लकड़ी

परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि बच्चों के पास पिता के अंतिम संस्कार के लिए जरूरी लकड़ी और अन्य सामग्री खरीदने तक के पैसे नहीं थे। मजबूरी में उन्होंने शव को उसी ठेले पर रखा, जिसका इस्तेमाल उनके पिता अपने परिवार का जीवन चलाने के लिए करते थे।

यह दृश्य अपने आप में बेहद मार्मिक था। एक तरफ पिता का निर्जीव शरीर था और दूसरी तरफ उनके बच्चे थे, जिनके सामने अब अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने की चुनौती थी। बताया गया कि बच्चे पिता के शव को लेकर श्मशान घाट पहुंचे, लेकिन वहां भी अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक लकड़ी उपलब्ध नहीं हो सकी।

कब्रिस्तान तक पहुंचे बच्चे, वहां भी नहीं मिली जगह

मदद के लिए भटकते हुए बच्चे कब्रिस्तान तक भी पहुंचे। वहां उन्हें यह कहकर वापस कर दिया गया कि मृतक हिंदू समुदाय से संबंधित है और इसलिए उसका दफन किया जाना संभव नहीं है।

एक ओर श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार के लिए जरूरी सामग्री का इंतजाम नहीं हो पाया और दूसरी ओर कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार का विकल्प उपलब्ध नहीं हुआ। इस पूरे घटनाक्रम ने बच्चों की बेबसी को और गहरा कर दिया।

पिता के शव के साथ मदद की गुहार लगाते रहे मासूम

सबसे पीड़ादायक स्थिति तब बनी, जब बच्चों को अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए लोगों से आर्थिक मदद मांगनी पड़ी। जिस ठेले के सहारे उनके पिता ने कभी अपने परिवार की जरूरतें पूरी की थीं, वही ठेला अब उनकी अंतिम यात्रा का माध्यम बन गया था।

बच्चे पिता के शव को ठेले पर रखकर लोगों से मदद मांगते रहे। बताया गया कि कुछ लोगों ने उनकी स्थिति को गंभीरता से समझने के बजाय इसे भीख मांगने का कोई नया तरीका समझ लिया और आगे बढ़ गए।

जब दो भाइयों ने बढ़ाया मदद का हाथ

इसी बीच इस घटना की जानकारी नगर क्षेत्र के दो जनप्रतिनिधियों के प्रतिनिधियों तक पहुंची। बिस्मिल नगर वार्ड के सभासद प्रतिनिधि राशिद कुरैशी और राहुल नगर वार्ड के सभासद वारिस कुरैशी को जब बच्चों और उनके पिता की स्थिति का पता चला तो वे मौके पर पहुंचे।

दोनों भाइयों ने बच्चों से बातचीत की और उनकी स्थिति को समझा। इसके बाद उन्होंने अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक लकड़ी तथा दूसरी सामग्री की व्यवस्था कराई।

धर्म से ऊपर उठकर निभाई इंसानियत की जिम्मेदारी

राशिद कुरैशी और वारिस कुरैशी मुस्लिम समुदाय से आते हैं, जबकि मृतक लव कुमार पटवा हिंदू थे। इसके बावजूद दोनों भाइयों ने धार्मिक पहचान को मदद के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया।

वे शव को श्मशान घाट तक ले गए और हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार अंतिम संस्कार कराने में बच्चों की मदद की। देर रात तक चली प्रक्रिया के बाद लव कुमार पटवा को सम्मानजनक अंतिम विदाई दी जा सकी।

पिता की चिता जली तो बच्चों को मिला अंतिम सहारा

अंतिम संस्कार पूरा होने के बाद दोनों भाइयों ने बच्चों को उनके घर तक सुरक्षित पहुंचाया। पिता को अंतिम विदाई मिलने के बाद बच्चों के मन में दुख तो था ही, लेकिन यह संतोष भी था कि कम से कम उनके पिता का अंतिम संस्कार सम्मान के साथ हो गया।

14 वर्षीय राजवीर और 10 वर्षीय देवराज के लिए यह घटना शायद जीवनभर की ऐसी याद बन जाएगी, जिसे वे कभी भूल नहीं पाएंगे। कम उम्र में माता और पिता दोनों को खो देना अपने आप में असहनीय पीड़ा है। इसके ऊपर पिता के अंतिम संस्कार के लिए दर-दर भटकना उनकी परेशानी को और गहरा कर गया।

रिश्तों की बेरुखी और इंसानियत का सवाल

इस पूरे मामले ने समाज के सामने दो अलग-अलग तस्वीरें रख दी हैं। पहली तस्वीर उन बच्चों की है, जिनके सिर से माता-पिता दोनों का साया उठ गया और अंतिम संस्कार के लिए भी उन्हें मदद मांगनी पड़ी। दूसरी तस्वीर उन दो भाइयों की है, जिन्होंने धर्म की दीवार से ऊपर उठकर अनजान परिवार के बच्चों को सहारा दिया।

घटना को लेकर स्थानीय स्तर पर रिश्तेदारों और आसपास के लोगों की कथित बेरुखी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। साथ ही यह प्रश्न भी सामने आया है कि आर्थिक रूप से बेहद कमजोर परिवारों के लिए प्रशासन और स्थानीय निकायों की सहायता व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

एक घटना, कई बड़े सवाल

यह मामला केवल लव कुमार पटवा के परिवार की त्रासदी नहीं है। यह उन तमाम गरीब और बेसहारा परिवारों की स्थिति पर सोचने के लिए मजबूर करता है, जिनके पास बीमारी, मृत्यु या किसी अचानक आई विपत्ति से निपटने के लिए कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं होती।

अगर किसी परिवार का कमाने वाला सदस्य दुनिया छोड़ देता है और पीछे छोटे बच्चे रह जाते हैं, तो उस परिवार के सामने केवल अंतिम संस्कार का संकट नहीं होता। उसके बाद भोजन, शिक्षा, रहने और सुरक्षा जैसी कई चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं।

इसलिए जरूरी है कि ऐसी घटनाओं को केवल भावुक कहानी बनाकर भूल न दिया जाए। जरूरत इस बात की है कि स्थानीय स्तर पर बेसहारा परिवारों की पहचान हो, उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाए और आपात स्थिति में तत्काल सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था मजबूत हो।

नौतनवा की इस घटना ने एक तरफ तीन मासूमों की बेबसी दिखाई तो दूसरी तरफ दो भाइयों के रूप में इंसानियत की ऐसी मिसाल भी सामने रखी, जो समाज को यह याद दिलाती है कि दुख के समय इंसान की पहचान उसका धर्म नहीं, बल्कि उसका व्यवहार होता है।

जब अपने पीछे हट गए, तब किसी दूसरे ने हाथ थाम लिया। जब बच्चे पिता की अंतिम विदाई के लिए भटक रहे थे, तब किसी ने उनके आंसुओं को समझा। यह घटना समाज के सामने संवेदनशीलता, सहयोग और मानवीय जिम्मेदारी का एक बड़ा सवाल छोड़ जाती है।

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