रिपोर्ट: सूरज सिंह राणा
चित्रकूट। गोवंश संरक्षण को लेकर सरकारी स्तर पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। गौशालाओं में रहने वाले गोवंश के लिए चारा, पानी, साफ-सफाई, शेड, मरम्मत और अन्य जरूरी सुविधाओं पर सरकारी धन खर्च किए जाने की बात कही जाती है। लेकिन जब योजनाओं और दावों से आगे बढ़कर जमीन पर व्यवस्था का जायजा लिया जाए, तो कई बार तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। चित्रकूट जनपद की ग्राम पंचायत कसहाई स्थित गौशाला की मौजूदा स्थिति भी ऐसे ही गंभीर सवाल खड़े करती नजर आ रही है।
कसहाई की गौशाला से सामने आई तस्वीरों और मौके पर दिखाई देने वाली अव्यवस्था ने व्यवस्था से जुड़े जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है। गौशाला परिसर में जहां-तहां गंदगी और अव्यवस्था दिखाई देने की बात सामने आ रही है। ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि यदि गौशालाओं के रखरखाव और व्यवस्थाओं के लिए लगातार सरकारी धन उपलब्ध कराया जा रहा है, तो फिर कसहाई की गौशाला में साफ-सफाई और रखरखाव की स्थिति संतोषजनक क्यों नहीं दिखाई दे रही?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गौशाला केवल किसी भवन या चारदीवारी का नाम नहीं है। यहां गोवंश की देखभाल, सुरक्षा, भोजन, पानी और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत जरूरतें पूरी करने की जिम्मेदारी जुड़ी होती है।
लाखों के सरकारी खर्च के दावे, लेकिन जमीन पर गंदगी क्यों?
सरकार और प्रशासन की ओर से समय-समय पर गौवंश संरक्षण को प्राथमिकता दिए जाने की बात कही जाती है। गौशालाओं को संचालित करने के लिए विभिन्न मदों में धनराशि उपलब्ध कराई जाती है। इसका उद्देश्य यही होता है कि गौवंश को सुरक्षित वातावरण मिले और उन्हें भूख, बीमारी तथा अस्वच्छता जैसी समस्याओं का सामना न करना पड़े।
लेकिन कसहाई की गौशाला की कथित बदहाली इस पूरी व्यवस्था की निगरानी पर प्रश्न खड़े कर रही है।
यदि गौशाला में नियमित सफाई की व्यवस्था है, तो परिसर में गंदगी जमा होने की स्थिति कैसे पैदा हुई? यदि मरम्मत और रखरखाव के लिए धनराशि खर्च की गई है, तो उसकी जमीनी स्थिति क्या है? क्या संबंधित जिम्मेदारों द्वारा नियमित निरीक्षण किया जाता है? और यदि निरीक्षण होता है, तो फिर कमियां दूर क्यों नहीं की गईं?
इन सवालों का जवाब संबंधित अभिलेखों और मौके की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकता है।
कागजों में व्यवस्था या धरातल पर इंतजाम?
गौशाला व्यवस्था में सबसे अहम मुद्दा केवल बजट जारी होना नहीं है, बल्कि उस बजट का उचित और निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप इस्तेमाल होना है।
अगर सरकारी रिकॉर्ड में सफाई, मरम्मत, रखरखाव या अन्य सुविधाओं पर खर्च दर्ज है, लेकिन मौके पर उसका अपेक्षित प्रभाव नजर नहीं आता, तो स्वाभाविक रूप से जांच की जरूरत महसूस होती है।
कसहाई गौशाला को लेकर भी यही सवाल सामने आ रहा है कि वहां उपलब्ध कराई गई सुविधाओं और खर्च का वास्तविक स्वरूप क्या है?
क्या नियमित सफाई के लिए जिम्मेदारी तय है? क्या सफाई का काम नियमित रूप से कराया जाता है? क्या मरम्मत कार्य वास्तव में हुआ है? क्या चारा और पानी की व्यवस्था मानकों के अनुरूप है? क्या संबंधित कार्यों के भुगतान से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध हैं? इन सभी बिंदुओं की निष्पक्ष जांच से ही तस्वीर साफ हो सकती है।
प्रधान और सचिव की भूमिका पर उठे सवाल
ग्राम पंचायत स्तर पर गौशाला से जुड़े कामों में स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में कसहाई गौशाला की स्थिति सामने आने के बाद ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना जांच का विषय है और उपलब्ध तस्वीरों या मौके की स्थिति मात्र के आधार पर किसी के विरुद्ध अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन जिम्मेदारी से जुड़े पदों पर बैठे लोगों से यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि गौशाला की नियमित निगरानी किस स्तर पर की जा रही है।
यदि परिसर में लंबे समय से गंदगी और अव्यवस्था बनी हुई थी, तो इसकी जानकारी जिम्मेदार अधिकारियों तक क्यों नहीं पहुंची? यदि जानकारी थी, तो सुधारात्मक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि सुधार कार्य के लिए धनराशि उपलब्ध कराई गई थी, तो उसके उपयोग की निगरानी किसने की? यही वे प्रश्न हैं जिनका जवाब सामने आना जरूरी है।
सरकारी धन का हिसाब सार्वजनिक होना जरूरी
गौशालाओं पर खर्च होने वाला सरकारी पैसा आखिरकार जनता के खजाने से आता है। इसलिए उसके उपयोग को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद जरूरी है।
कसहाई गौशाला के मामले में भी संबंधित विभाग को चाहिए कि वह उपलब्ध बजट, स्वीकृत धनराशि, खर्च की मद, भुगतान विवरण और कार्यों से जुड़े अभिलेखों की जांच करे। इसके साथ ही मौके पर भौतिक सत्यापन कराया जाना चाहिए।
कागज में दर्ज खर्च और जमीन पर दिखाई देने वाले काम का मिलान इस मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकता है।
यदि रिकॉर्ड में किसी कार्य का भुगतान दर्शाया गया है, तो मौके पर उस कार्य की स्थिति क्या है? यदि सफाई के नाम पर भुगतान हुआ है, तो सफाई की वास्तविक स्थिति कैसी है? यदि मरम्मत कराई गई है, तो उसका परिणाम कितना दिखाई देता है?
ऐसे सवाल किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाने के लिए नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी हैं।
निरीक्षण व्यवस्था भी सवालों के घेरे में
किसी भी गौशाला की व्यवस्था केवल ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं हो सकती। संबंधित विभागीय अधिकारियों की निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
गौशालाओं का समय-समय पर निरीक्षण होना चाहिए। निरीक्षण के दौरान केवल कागजी रिकॉर्ड देखना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। वास्तविक स्थिति जानने के लिए परिसर, गोवंश की स्थिति, साफ-सफाई, पानी, चारा, शेड और सुरक्षा व्यवस्था का भौतिक निरीक्षण आवश्यक है।
कसहाई गौशाला की तस्वीरें यदि वहां की वास्तविक स्थिति को दर्शाती हैं, तो यह प्रशासन के लिए एक संकेत है कि निरीक्षण व्यवस्था को और प्रभावी बनाने की जरूरत हो सकती है।
सवाल यह भी है कि क्या निरीक्षण रिपोर्ट में ऐसी कमियां दर्ज की गई थीं? यदि दर्ज थीं तो उन्हें दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए? और यदि कमियां दर्ज ही नहीं हुईं, तो निरीक्षण की गुणवत्ता पर सवाल उठना लाजिमी है।
गंदगी का सीधा असर गोवंश पर
गौशाला की साफ-सफाई का मुद्दा केवल सौंदर्य या परिसर की स्वच्छता से जुड़ा मामला नहीं है। इसका सीधा संबंध वहां रहने वाले गोवंश के स्वास्थ्य और जीवन से है।
गंदगी, जमा कचरा, खराब जल निकासी और अस्वच्छ वातावरण पशुओं के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं। ऐसे माहौल में संक्रमण और बीमारी का खतरा भी बढ़ सकता है।
इसलिए गौशाला में सफाई व्यवस्था को किसी अतिरिक्त सुविधा के रूप में नहीं, बल्कि गोवंश की बुनियादी जरूरत के रूप में देखा जाना चाहिए।
जब किसी गौशाला के नाम पर सरकारी बजट निर्धारित होता है, तो उसका मूल उद्देश्य यही होना चाहिए कि वहां रहने वाले पशुओं को सम्मानजनक और सुरक्षित वातावरण मिले।
ग्रामीणों की नजर में भी व्यवस्था पर सवाल
गौशाला किसी बंद सरकारी कार्यालय की तरह नहीं होती। इसके आसपास रहने वाले ग्रामीण प्रतिदिन उसकी स्थिति को देख सकते हैं। इसलिए स्थानीय लोगों के बीच उठने वाले सवालों को भी प्रशासन को गंभीरता से लेना चाहिए।
यदि ग्रामीण यह पूछ रहे हैं कि गौशाला की सफाई और रखरखाव के लिए उपलब्ध धनराशि का उपयोग किस तरह किया जा रहा है, तो संबंधित विभाग को तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए।
व्यवस्था में पारदर्शिता का सबसे बेहतर तरीका यही है कि शिकायतों की जांच हो, रिकॉर्ड सामने रखे जाएं और मौके का सत्यापन किया जाए।
सिर्फ कार्रवाई नहीं, स्थायी व्यवस्था की जरूरत
कसहाई गौशाला की स्थिति पर यदि प्रशासन संज्ञान लेता है तो केवल एक बार सफाई कराकर मामला खत्म कर देना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें नियमित निगरानी, सफाई, चारा-पानी और रखरखाव की जिम्मेदारी स्पष्ट हो।
साथ ही निरीक्षण की रिपोर्ट और कमियों के सुधार की प्रक्रिया भी प्रभावी होनी चाहिए।
यदि जांच में किसी प्रकार की वित्तीय या प्रशासनिक अनियमितता सामने आती है, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। वहीं यदि रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में कोई गंभीर अंतर नहीं मिलता, तो प्रशासन को तथ्य सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
अब प्रशासन की परीक्षा
कसहाई गौशाला की तस्वीरों ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या सरकारी योजनाओं का असर सिर्फ कागजों तक सीमित है या उसका लाभ वास्तव में गोवंश तक पहुंच रहा है?
सरकार गौवंश संरक्षण के लिए धन खर्च कर रही है, योजनाएं बनाई जा रही हैं और गौशालाओं को व्यवस्थित करने की बात कही जा रही है। ऐसे में किसी भी गौशाला की बदहाल तस्वीर पूरी व्यवस्था के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए।
कसहाई का मामला भी इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। प्रशासन यदि निष्पक्ष तरीके से अभिलेखों की जांच और मौके का भौतिक सत्यापन कराता है, तो न केवल वास्तविक स्थिति सामने आएगी बल्कि जिम्मेदारी भी तय की जा सकेगी।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि गौशाला की साफ-सफाई और रखरखाव के नाम पर खर्च होने वाला सरकारी धन आखिर जमीन पर कितना दिखाई दे रहा है?
यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ फैसला नहीं है, बल्कि व्यवस्था से जवाब मांगता है।
क्योंकि गौशाला में रहने वाले गोवंश अपनी समस्या खुद प्रशासन तक नहीं पहुंचा सकते। उनकी हालत ही उनकी आवाज है। अब यह प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह उस आवाज को सुने और यह सुनिश्चित करे कि गोवंश संरक्षण के नाम पर खर्च होने वाला हर रुपया वास्तव में गोवंश की सुरक्षा, सुविधा और बेहतर जीवन पर खर्च हो।
कसहाई गौशाला की बदहाल तस्वीरें यदि मौके की वास्तविक स्थिति को प्रतिबिंबित करती हैं, तो यह निश्चित रूप से जांच का विषय है। सरकारी धन के उपयोग, साफ-सफाई, मरम्मत, चारा-पानी और नियमित निरीक्षण से जुड़े रिकॉर्ड की जांच कर सच्चाई सामने लाई जानी चाहिए। किसी भी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता प्रमाणित होने पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
अब निगाह प्रशासन पर है—क्या वह कसहाई गौशाला की गंदगी और अव्यवस्था को गंभीरता से लेकर जांच कराएगा, या फिर सरकारी योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच का यह अंतर यूं ही बना रहेगा?
























