मंदाकिनी का तांडव, रामनगरी बेहाल… कृष्ण! इस बार बांसुरी छोड़कर कुछ करो भी ; रामनगरी की गलियों में सैलाब, छतों पर जिंदगी…

चित्रकूट में बाढ़ से डूबे घाट, घर और बाजार के साथ रिपोर्टर सूरज सिंह राणा की फीचर तस्वीर

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सूरज सिंह राणा, ब्यूरो रिपोर्टर, चित्रकूट की प्रस्तुति
आलेख- जनगणदूत संपादकीय

आदरणीय संपादक महोदय,

चित्रकूट से यह चिट्ठी लिखते हुए आज मेरी कलम भी शायद मंदाकिनी के पानी में भीगी हुई है। सामने वही नदी है, जिसे हमने कभी मां कहा, कभी मोक्षदायिनी, कभी आस्था की जीवनरेखा और कभी राम की तपोभूमि की साक्षी।

लेकिन इस बार मां मंदाकिनी ने जैसे अपने ही आंगन में चीख सुनाई है।

रामघाट की सीढ़ियां पानी में हैं। गलियों में पानी है। घरों और दुकानों में पानी है। मंदिरों के भीतर पानी है। कहीं सामान बह रहा है, कहीं रोजी-रोटी। कहीं आदमी अपने घर की छत पर खड़ा है तो कहीं नाव ही जीवन की आखिरी उम्मीद बनी हुई है। और ऐसे समय में मन पूछता है—हे कृष्ण! तुम कहाँ हो?

यह सवाल किसी चमत्कार की मांग नहीं है। यह सवाल उस विवेक, उस नेतृत्व और उस दूरदृष्टि की तलाश है, जो संकट आने से पहले रास्ता बनाती है और संकट आने पर इंसान को अकेला नहीं छोड़ती।

चित्रकूट में बाढ़ नहीं, व्यवस्था की भी परीक्षा है

महोदय, पहले तथ्य देखिए। मंदाकिनी ने 29 अगस्त को 135.20 मीटर का उच्चतम जलस्तर छुआ। अब 4 सितंबर को जलस्तर घटकर करीब 128 मीटर तक आ गया है। प्रशासन के अनुसार जिले के 36 गांव प्रभावित हुए और 13,906 लोगों तक राहत पहुंचाई गई। 688 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।

ये आंकड़े राहत देते हैं कि प्रशासन ने संकट में हाथ पर हाथ रखकर इंतजार नहीं किया। लेकिन यही आंकड़े एक दूसरा सवाल भी खड़ा करते हैं—इतने बड़े पैमाने पर लोग प्रभावित होने की नौबत आखिर आई क्यों?

रामघाट के आसपास लगभग 400 दुकानों और 200 मकानों के डूबने की रिपोर्ट सामने आई। पांच दिनों तक मंदाकिनी खतरे के निशान से ऊपर रही और धर्मनगरी का बड़ा हिस्सा जलभराव की चपेट में रहा। और जब पानी घटा तो तबाही का असली चेहरा सामने आने लगा।

यही बाढ़ का चरित्र है। जब पानी आता है तो सब कुछ ढक देता है। जब पानी जाता है तो सवाल छोड़ जाता है।

यह केवल बादलों का अपराध नहीं

हर बाढ़ के बाद हम कहते हैं—बहुत बारिश हुई। सही बात है। इस बार पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार भारी बारिश हुई। लगातार बारिश के बाद मंदाकिनी खतरे के निशान से कई मीटर ऊपर चली गई। आसपास की नदियां और जलधाराएं भी उफान पर रहीं।

लेकिन संपादक महोदय, बारिश प्रकृति का निर्णय है, तबाही की मात्रा हमेशा प्रकृति का अकेला निर्णय नहीं होती।

नदी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में क्या हो रहा है? नदी के किनारे कितना निर्माण हुआ? जलनिकासी के रास्ते कितने बचे हैं? शहर का ड्रेनेज सिस्टम कितनी बारिश झेल सकता है? बाढ़ का पूर्वानुमान मिलने के बाद संवेदनशील आबादी को कितनी जल्दी सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा सकता है? ये सवाल असुविधाजनक हैं, मगर जरूरी हैं।

क्योंकि यदि नदी को हमने उसके रास्ते से बांधने, सिकोड़ने या किनारों पर बेतरतीब निर्माण करने की कोशिश की है, तो फिर बाढ़ आने पर केवल नदी को दोष देना वैसा ही होगा जैसे घर की खिड़की बंद करके धूप को दोष देना।

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मंदाकिनी ने रिकॉर्ड तोड़ा, लेकिन हमारी तैयारी?

रिपोर्टों के अनुसार इस बार मंदाकिनी ने लंबे अंतराल के बाद इतना विकराल रूप दिखाया कि पुराने बाढ़ रिकॉर्ड की यादें ताजा हो गईं। इस बाढ़ ने रामघाट से लेकर आसपास के इलाकों तक बुनियादी ढांचे की मजबूती पर भी सवाल खड़े किए हैं।

मध्य प्रदेश की ओर चित्रकूट क्षेत्र में बाढ़ के दौरान एक पुराने पुल के बह जाने की खबर ने इस संकट की गंभीरता और बढ़ा दी। 31 अगस्त को रामघाट-हनुमान धारा पुल के क्षतिग्रस्त होने की रिपोर्ट सामने आई। अब सवाल यह नहीं कि पुल क्यों बहा।

सवाल यह है कि क्या हमने पुल को उस नदी के हिसाब से बनाया था, जो वास्तव में वहां बहती है, या उस नदी के हिसाब से जिसे हमने कागज पर कल्पना कर लिया था?

बाढ़ अब केवल मौसम की खबर नहीं रही। यह बुनियादी ढांचे के ऑडिट की खबर है। यह शहरी नियोजन की खबर है। यह नदी प्रबंधन की खबर है। और सबसे बढ़कर यह भविष्य की तैयारी की खबर है।

भगवान भी पानी में थे और भक्त भी

चित्रकूट की इस बाढ़ की सबसे विचित्र तस्वीर रामघाट के बड़े मठ मंदिर से आई। मंदिर में पानी घुस गया। प्रशासनिक अधिकारी पुजारी को सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए समझाते रहे, लेकिन पुजारी का जवाब था कि वे भगवान को अकेला छोड़कर कैसे जाएं।

संपादक महोदय, यह दृश्य केवल भावुकता पैदा नहीं करता, बल्कि हमारे सामने एक बड़ा सवाल रखता है। क्या किसी नागरिक को अपनी आस्था की रक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डालनी पड़े? भगवान की रक्षा करने वाला भक्त सुरक्षित हो—क्या यह प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं? और क्या हमारी आपदा प्रबंधन व्यवस्था इतनी संवेदनशील नहीं हो सकती कि मंदिर भी सुरक्षित रहे और पुजारी भी? चित्रकूट में धर्म और प्रशासन आमने-सामने नहीं होने चाहिए। दोनों को साथ खड़ा होना चाहिए।

राहत पहुंची, लेकिन राहत की कहानी यहीं खत्म नहीं होती

सरकार और जिला प्रशासन ने राहत-बचाव में तेजी दिखाई। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें लगाई गईं। प्रभावित लोगों को भोजन और आवश्यक सामग्री पहुंचाई गई। प्रशासन के अनुसार 36 गांवों में 13,906 लोगों तक मदद पहुंची और 688 लोगों को सुरक्षित निकाला गया।

यह काम प्रशंसा योग्य है। लेकिन पत्रकारिता का धर्म केवल प्रशंसा करना नहीं है। हमारा काम यह पूछना भी है—अब आगे क्या? मकान टूटे हैं तो सर्वे कब पूरा होगा? दुकानदारों का नुकसान कैसे आंका जाएगा? फसल बर्बाद हुई है तो किसान को राहत कब मिलेगी? जिन परिवारों ने अपना सामान खोया, उनकी मदद केवल राहत सामग्री से होगी या पुनर्वास की ठोस योजना भी बनेगी? जिन सड़कों, पुलों और संपर्क मार्गों को नुकसान हुआ, उनकी स्थायी मरम्मत कब होगी? और सबसे महत्वपूर्ण—अगली बार मंदाकिनी फिर उफनी तो क्या हम फिर यही तस्वीर देखेंगे?

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बाढ़ का सबसे बड़ा चेहरा गरीब का होता है

बाढ़ सबके दरवाजे पर आती है, मगर सबको बराबर नहीं डुबोती। किसी के लिए बाढ़ का मतलब है गाड़ी को ऊंची जगह खड़ी करना। किसी के लिए दुकान बंद करना। किसी के लिए दो दिन होटल में रह लेना।

लेकिन गरीब के लिए बाढ़ का मतलब हो सकता है—घर गया, चूल्हा गया, अनाज गया, पशु गया, दुकान गई और कई बार पूरी जिंदगी की जमा पूंजी चली गई। इसलिए राहत नीति में सिर्फ यह मत गिनिए कि कितने राहत पैकेट बांटे गए।

यह भी गिनिए कि कितने परिवार अपनी पुरानी आर्थिक स्थिति में लौट पाए। कितने बच्चों की पढ़ाई फिर शुरू हुई। कितने छोटे दुकानदार दोबारा दुकान खोल पाए। कितने किसानों के खेत फिर खड़े हुए। यही असली पुनर्वास है।

पानी उतर रहा है, लेकिन खतरा पूरी तरह नहीं गया

आज जलस्तर घट रहा है। यह निश्चित रूप से राहत की खबर है। लेकिन जलस्तर घटने के साथ प्रशासन की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। वास्तव में अब दूसरा चरण शुरू होता है।

बीमारी रोकना, दूषित पानी से बचाव, बिजली व्यवस्था की जांच, क्षतिग्रस्त मकानों का सर्वे, सड़क और पुलों की सुरक्षा, पशुधन की स्थिति और प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता—ये सब काम उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

प्रशासन की ओर से आंशिक मकान क्षति के मामलों में सहायता राशि भेजने की प्रक्रिया शुरू किए जाने की जानकारी सामने आई है। लेकिन कागज पर स्वीकृति और जमीन पर सहायता के बीच की दूरी जितनी कम होगी, उतना ही प्रशासन सफल माना जाएगा।

कृष्ण कहाँ हैं?

अब वापस उस सवाल पर लौटता हूं जिससे यह चिट्ठी शुरू हुई थी। कृष्ण कहाँ हैं? शायद वे किसी आसमान से उतरने वाले देवता के रूप में नहीं आएंगे। वे उस नाविक में हैं, जो तेज बहाव में फंसे परिवार को किनारे लाता है। वे उस पुलिसकर्मी में हैं, जो रातभर सड़क पर खड़ा रहता है। वे उस डॉक्टर में हैं, जो बाढ़ के बीच मरीज तक पहुंचता है। वे उस अधिकारी में हैं, जो वातानुकूलित कमरे से निकलकर कीचड़ में उतरता है। वे उस ग्रामीण में हैं, जो पड़ोसी का हाथ पकड़कर कहता है—पहले तुम निकलो।

और वे उस पत्रकार में भी हैं, जो पानी उतरने के बाद सवाल पूछना बंद नहीं करता। कृष्ण शायद यही विवेक हैं। यही साहस हैं। यही जवाबदेही हैं।

चित्रकूट को सिर्फ तीर्थ नहीं, जीवित नदी-सभ्यता समझना होगा

महोदय, हमने चित्रकूट को पर्यटन स्थल बना दिया। हमने इसे तीर्थ बना दिया। हमने इसके घाटों पर रोशनी लगाई। हमने सड़कों को सजाया। हमने श्रद्धालुओं की संख्या गिनी।

लेकिन क्या हमने कभी मंदाकिनी की सांस गिनी? नदी को केवल घाट, आरती और पर्यटन की पृष्ठभूमि समझना खतरनाक है। नदी जीवित है। उसका अपना जलग्रहण क्षेत्र है। उसका अपना फैलाव है। उसका अपना प्राकृतिक रास्ता है।

और जब हम उस रास्ते को भूलते हैं तो नदी हमें याद दिलाती है कि नक्शे पर खींची गई रेखा और प्रकृति की रेखा एक चीज नहीं होती।

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इसलिए अब चित्रकूट के लिए एक व्यापक बाढ़ प्रबंधन और नदी संरक्षण मास्टर प्लान की जरूरत है। ऐसा प्लान जिसमें नदी के प्राकृतिक क्षेत्र की पहचान हो, जलनिकासी व्यवस्था मजबूत हो, संवेदनशील बस्तियों का वैज्ञानिक मानचित्र बने, समय रहते चेतावनी मिले और राहत केंद्र स्थायी रूप से तैयार रहें। सिर्फ बाढ़ आने पर नाव उतारना पर्याप्त नहीं है। बाढ़ आने से पहले तैयारी करना ही असली आपदा प्रबंधन है।

संपादक महोदय, अब चुप रहने का समय नहीं

चित्रकूट की बाढ़ ने बहुत कुछ बहाया है। मगर उम्मीद है कि वह हमारी उदासीनता भी बहाकर ले जाएगी। अब हमें हर साल बाढ़ के बाद वही प्रेस नोट नहीं चाहिए—“प्रशासन पूरी तरह अलर्ट।” हमें यह जानना है कि अलर्ट रहने के बाद अगली बार नुकसान कम कैसे होगा।

हमें यह नहीं चाहिए कि हर बार नेता और अधिकारी बाढ़ के पानी में खड़े होकर तस्वीर खिंचवाएं। हमें चाहिए कि वे बाढ़ आने से पहले नदी, नालों, पुलों, तटों और जलनिकासी व्यवस्था की समीक्षा करें। हमें यह नहीं चाहिए कि पीड़ित परिवार राहत सामग्री की लाइन में खड़ा होकर अपनी बेबसी साबित करे।

हमें चाहिए कि सहायता उसके दरवाजे तक पहुंचे। और हमें यह भी नहीं चाहिए कि मंदाकिनी को हर बार “रौद्र” कहकर कहानी खत्म कर दी जाए। हमें यह समझना होगा कि नदी रौद्र नहीं हुई है। नदी ने केवल अपना रास्ता याद किया है। रौद्र शायद हम हैं—जो नदी के रास्ते भूल गए।

संपादक महोदय,

चित्रकूट में आज पानी घट रहा है। लेकिन मेरे भीतर सवाल बढ़ रहा है। क्या हम अगली बाढ़ का इंतजार करेंगे? क्या फिर रामघाट डूबेगा? क्या फिर दुकानदार अपनी दुकान की छत पर खड़ा होकर पानी घटने की प्रार्थना करेगा? क्या फिर कोई पुजारी अपने भगवान को छोड़ने से इनकार करेगा?

क्या फिर नावें हमारी तैयारी का प्रमाण बनेंगी? या इस बार हम सचमुच सीखेंगे? क्योंकि राम की नगरी को सिर्फ राम के नाम से नहीं बचाया जा सकता। मंदाकिनी को सिर्फ मां कह देने से उसकी रक्षा नहीं होगी। और कृष्ण को पुकारने भर से कृष्ण नहीं आएंगे। कृष्ण तभी आएंगे, जब हम अपनी जिम्मेदारी पहचानेंगे। इसलिए मेरी यह सार्वजनिक चिट्ठी किसी सरकार, किसी दल या किसी अधिकारी के खिलाफ नहीं है। यह उस सोच के खिलाफ है, जो हर आपदा को केवल “प्राकृतिक” कहकर अपनी जिम्मेदारी समाप्त कर देती है।

चित्रकूट को दया नहीं चाहिए। चित्रकूट को दूरदृष्टि चाहिए। चित्रकूट को घोषणाएं नहीं, स्थायी समाधान चाहिए। चित्रकूट को केवल राहत नहीं, सुरक्षित भविष्य चाहिए। और मंदाकिनी को केवल पूजा नहीं—अपना रास्ता, अपना सम्मान और अपना अस्तित्व चाहिए।

बाकी रही बात कृष्ण की… तो संपादक महोदय, उन्हें खोजिए मत। इस बार उन्हें हमारे फैसलों में, हमारी नीतियों में और हमारी जवाबदेही में दिखाई देना चाहिए।

सूरज सिंह राणा
ब्यूरो रिपोर्टर, चित्रकूट
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