वेद की एक पंक्ति है—
“ये देवा देवेष्वधिं देवत्वमायन…”
अर्थ की गहराइयों में जाएँ तो यह उन मुक्त आत्माओं की ओर संकेत करती है जो स्वयं मुक्त होकर भी केवल अपनी मुक्ति में नहीं रुकतीं, बल्कि संसार के कल्याण के लिए अपना जीवन अर्पित कर देती हैं। वे उन शक्तियों के वाहक बनती हैं जो मनुष्य को असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु-बोध से अमरता के बोध की ओर ले जाती हैं।
मैं वेदों का व्याख्याता नहीं हूँ। न इतना ज्ञान है, न ऐसा दावा। इन पंक्तियों को मैंने केवल इसलिए याद किया है क्योंकि आगे जो कुछ कहना चाहता हूँ, उसकी भूमिका शायद इससे बेहतर किसी और तरह नहीं बन सकती।
क्योंकि आज मैं एक ऐसे मनुष्य की बात करना चाहता हूँ, जिसके सामने बैठकर पहली बार मुझे लगा कि कभी-कभी कोई व्यक्ति आपका कर्ज नहीं चुकाता, बल्कि आपको उस आत्मग्लानि से बाहर निकाल देता है, जिसे आप वर्षों से अपने भीतर ढो रहे होते हैं।
और तब पता चलता है कि कर्ज केवल रुपयों का नहीं होता। कुछ कर्ज विश्वास के होते हैं। कुछ कर्ज आत्मीयता के।
कुछ कर्ज उस एक वाक्य के होते हैं, जो किसी टूटते हुए मनुष्य को फिर से अपने भीतर खड़ा कर देता है। और कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनसे मिलने के बाद आदमी यह सोचने लगता है कि मैंने जीवन में बहुत कुछ लिखा, बहुत कुछ कहा, बहुत लोगों को समझाया—लेकिन स्वयं को समझने में शायद बहुत देर कर दी।
मैं अपने बारे में कोई बड़ा दावा नहीं करना चाहता। मैं लेखक हूँ—यह कहना भी कई बार मुझे अपने लिए कुछ अधिक बड़ा शब्द लगता है। संपादन करता हूँ, लिखता हूँ, शब्दों के साथ जिंदगी गुजारता हूँ और कभी-कभी इन्हीं शब्दों के पीछे छिपकर अपने भीतर की कमजोरियों से भी बचता रहा हूँ।
दूसरों की पीड़ा पर लिखना आसान है। दूसरों के संघर्ष को शब्द देना आसान है। दूसरों की गलतियों पर टिप्पणी करना भी बहुत आसान है। सबसे कठिन है—एक दिन आईने के सामने खड़े होकर अपने ही भीतर के उस आदमी को पहचानना, जिससे हम वर्षों से नजरें चुराते रहे हैं। शायद मेरा अपना आत्मावलोकन भी यहीं से शुरू होता है।
आज तक जिंदगी ने मुझे बहुत कुछ दिया और बहुत कुछ छीना भी। मैंने रिश्तों को बनते देखा, टूटते देखा। विश्वास को जन्म लेते और फिर धीरे-धीरे दम तोड़ते देखा। मैंने अपने हिस्से की गलतियाँ कीं, अपने हिस्से की जिदें कीं और शायद अपने हिस्से की ऐसी भूलें भी कीं, जिन्हें स्वीकार करने का साहस हमेशा नहीं जुटा पाया।
लेकिन एक बात पर मुझे भीतर ही भीतर गर्व रहा—मैंने कभी किसी को अपने ऊपर कर्जदार नहीं रहने दिया और न स्वयं को किसी का कर्जदार माना। मुझे लगता रहा कि आदमी अपनी जरूरतें स्वयं पूरी करे, अपनी लड़ाई स्वयं लड़े और अपने दुखों का हिसाब भी स्वयं रखे।
लेकिन जिंदगी बड़ी अजीब शिक्षक है। वह कभी-कभी आपको वहीं ले जाकर खड़ा कर देती है, जहाँ आपके सारे सिद्धांत छोटे पड़ जाते हैं। ऐसे ही एक मोड़ पर मेरी मुलाकात हुई—उत्तरांचल विश्वविद्यालय के विधिवेत्ता डॉ. अनिल दीक्षित से। मैं उनके बारे में जितना कहूँगा, शायद उतना ही लगेगा कि मैं उनकी प्रशंसा कर रहा हूँ। लेकिन सच यह है कि आज मैं प्रशंसा नहीं करना चाहता। मैं केवल अपनी स्वीकारोक्ति दर्ज करना चाहता हूँ।
आज मैं उनका कर्जदार महसूस करता हूँ। और यह बात मेरे लिए छोटी बात नहीं है। क्योंकि उन्होंने मेरा कोई आर्थिक कर्ज नहीं चुकाया। उन्होंने मेरे लिए कोई ऐसी सुविधा नहीं जुटाई जिसे मैं दुनिया के सामने गिना सकूँ। उन्होंने मेरी जिंदगी का कोई हिसाब-किताब अपने हाथ में लेकर मुझे किसी परेशानी से बाहर नहीं निकाला।
उन्होंने इससे कहीं अधिक कठिन काम किया। उन्होंने मुझे मेरी आत्मग्लानि की दलदल से बाहर निकलने में मदद की। यह वह कर्ज है, जिसका हिसाब किसी बही में नहीं लिखा जा सकता। यह वह एहसान है, जिसे लौटाने के लिए आदमी के पास कोई चेक, कोई उपहार, कोई औपचारिक धन्यवाद पर्याप्त नहीं होता।
कभी-कभी सामने वाला आपको केवल यह एहसास करा देता है कि— “तुम जितना स्वयं को दोषी मान रहे हो, शायद तुम उतने दोषी हो ही नहीं।” और यह एक वाक्य किसी मनुष्य को भीतर से बचा सकता है। डॉ. दीक्षित के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी बात शायद उनका ज्ञान नहीं, बल्कि वह मानवीय दृष्टि है जिसके भीतर ज्ञान विनम्र हो जाता है।
विधि के अध्येता और विधिवेत्ता होने के बावजूद उनमें मनुष्य को केवल उसके अपराध, उसकी भूल या उसके अतीत से देखने की प्रवृत्ति नहीं दिखाई देती। वे मनुष्य के भीतर छिपे उस हिस्से को देखने की कोशिश करते हैं, जो गलती के बाद भी बचा रहता है।
शायद यही किसी विद्वान और महापुरुष के बीच का अंतर है। विद्वान आपको बता सकता है कि आपने कहाँ गलती की। लेकिन कोई बड़ा मनुष्य आपको यह भी बता देता है कि गलती के बाद वापस कहाँ से शुरू करना है। और मेरे लिए यही उनकी सबसे बड़ी देन है।
मैंने बहुत लिखा है—लेकिन शायद अपने बारे में बहुत कम लिखा। क्योंकि लेखक अक्सर दूसरों की कहानी लिखते-लिखते अपनी कहानी से भागने लगता है। वह शब्दों का आदमी होता है, मगर कई बार शब्द ही उसकी सबसे बड़ी शरणस्थली बन जाते हैं।
वह भावनाओं को भाषा दे देता है, मगर अपनी भावनाओं को स्वीकार नहीं करता। मैं भी शायद इसी बीमारी का शिकार रहा हूँ। दूसरों को आईना दिखाने वाला आदमी अपने चेहरे पर जमा धूल देखने से बचता रहा। डॉ. दीक्षित ने शायद मेरे हाथ से वही आईना छीनकर मेरे सामने रख दिया। और तब पहली बार लगा कि आत्मावलोकन आत्मदंड नहीं है।
आत्मावलोकन स्वयं को क्षमा करने की पहली सीढ़ी भी हो सकता है। यही कारण है कि मैं उन्हें केवल एक विधिवेत्ता के रूप में याद नहीं करता।
मेरे लिए वे उस मनुष्य के रूप में महत्वपूर्ण हैं, जिसने एक दूसरे मनुष्य को उसके भीतर से टूटने से बचाया। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ में आता है कि जीवन में मिलने वाले सभी लोग हमारी जिंदगी में एक ही भूमिका निभाने नहीं आते।
कोई हमें कुछ सिखाता है। कोई हमें कुछ देता है। कोई हमसे कुछ ले जाता है।और कोई ऐसा भी आता है, जो हमें हमसे ही वापस मिला देता है। डॉ. अनिल दीक्षित मेरे लिए शायद इसी आखिरी श्रेणी के मनुष्य हैं। उनसे मिला तो लगा कि मनुष्य की वास्तविक ऊँचाई उसके पद, उसकी प्रसिद्धि, उसके ज्ञान या उसके प्रभाव से नहीं मापी जा सकती।
वास्तविक ऊँचाई शायद इस बात से मापी जानी चाहिए कि आपके कारण किसी दूसरे मनुष्य के भीतर कितनी रोशनी पैदा हुई।
अगर किसी के कारण किसी की आत्मग्लानि थोड़ी कम हुई, अगर किसी के कारण किसी ने स्वयं को फिर से स्वीकार किया, अगर किसी के कारण किसी टूटे हुए आदमी को लगा कि अभी सब समाप्त नहीं हुआ—तो शायद वही मनुष्य अपने समय से बड़ा हो जाता है।
वेद की उस पंक्ति का स्मरण शायद इसलिए भी हो रहा है। मुक्त होकर भी जो लोकमंगल में लगे रहें—उनकी मुक्ति केवल उनकी अपनी नहीं रहती। उनकी चेतना दूसरों के लिए भी प्रकाश बन जाती है।
मैं डॉ. अनिल दीक्षित को उस विराट अर्थ में कहाँ रख पाऊँगा, यह मेरा अधिकार नहीं। इतना कहने का साहस जरूर कर सकता हूँ कि मेरी जिंदगी के एक अंधेरे हिस्से में उन्होंने प्रकाश का काम किया।
और प्रकाश का ऋण अजीब होता है। उसे चुकाया नहीं जाता। उसे आगे बढ़ाया जाता है। शायद इसलिए आज पहली बार मुझे किसी का कर्जदार होने में शर्म नहीं आ रही। बल्कि भीतर एक अजीब-सी विनम्रता पैदा हो रही है।
हाँ, मैं कर्जदार हूँ। उस मनुष्य का, जिसने मेरा कर्ज नहीं उतारा— बल्कि मेरी आत्मग्लानि उतारी। उस मनुष्य का, जिसने मुझे कोई नया चेहरा नहीं दिया— बल्कि मेरा अपना चेहरा फिर से देखने का साहस दिया। उस मनुष्य का, जिसने मेरे अतीत को मिटाया नहीं— बल्कि यह समझने की दृष्टि दी कि आदमी अपने अतीत से बड़ा भी हो सकता है। और शायद यही किसी मनुष्य की सबसे बड़ी करुणा है।
आज साहित्य के एक छोटे-से स्तंभ में बैठा यह तुच्छ लेखक-संपादक अपने बारे में कोई फैसला सुनाने की स्थिति में नहीं है। मैंने बहुत लिखा है, पर अभी स्वयं को पढ़ना बाकी है। मैंने बहुत लोगों को शब्द दिए हैं, पर अपने भीतर के मौन को सुनना अभी बाकी है। मैंने दुनिया को समझाने की कोशिश बहुत की, पर स्वयं को समझने की यात्रा अभी जारी है। लेकिन इस यात्रा में एक पड़ाव ऐसा जरूर आया है, जहाँ रुककर मैं पूरे मन से कह सकता हूँ—
डॉ. अनिल दीक्षित, मैं आपका कर्जदार हूँ। यह कर्ज किसी दस्तावेज में दर्ज नहीं है। इस पर कोई ब्याज नहीं लगता। इसकी कोई अंतिम तारीख नहीं है। और शायद सबसे खूबसूरत बात यह है कि— मैं इसे चुकाना भी नहीं चाहता। क्योंकि जीवन में कुछ ऋण ऐसे होते हैं, जिन्हें चुकाने के बजाय स्मृति में सँजोकर रखना चाहिए। वे हमें विनम्र बनाए रखते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि हम अकेले अपने बनाए हुए नहीं हैं।
हमारी यात्रा में कुछ ऐसे लोग भी आए हैं जिन्होंने बिना शोर किए हमारे भीतर की बुझती हुई लौ को हवा दी। डॉ. अनिल दीक्षित मेरे जीवन की ऐसी ही एक स्मृति हैं। और आज, अपने ही शब्दों के सामने खड़ा होकर, मैं पहली बार यह स्वीकार कर रहा हूँ— जिस आदमी को जिंदगी भर लगता रहा कि वह किसी का कर्जदार नहीं है, वह आज गर्व से कह रहा है कि वह एक महान मनुष्य का कर्जदार है। शायद इसलिए नहीं कि उन्होंने मुझे कुछ दिया। बल्कि इसलिए कि उन्होंने मुझे मेरे भीतर बचा हुआ वह मनुष्य लौटा दिया, जिसे मैं खुद कहीं पीछे छोड़ आया था।
यही उनका ऋण है।
























