17 अक्टूबर 2026 9:59 अपराह्न

‘पिता और भाई नहीं हैं तो क्या हुआ, मैं हूं न’—बेसहारा दो बहनों की मदद को आगे आए एसडीएम

उन्नाव एसडीएम राजेश कुमार विश्वकर्मा के साथ परिवार और रिपोर्टर ठाकुर बख्श सिंह की तस्वीर, बड़ी बेटी को नौकरी और छोटी की पढ़ाई में मदद की पहल

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ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट

उन्नाव। सरकारी अफसर की पहचान अक्सर फाइलों, आदेशों और प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित समझी जाती है, लेकिन उन्नाव में सदर एसडीएम राजेश कुमार विश्वकर्मा ने संवेदनशीलता और मानवीय जिम्मेदारी की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसने प्रशासनिक भूमिका की एक अलग तस्वीर सामने रखी है। पिता और इकलौते भाई को खो चुकी दो बहनों और उनकी मां के सामने जब परिवार के भरण-पोषण और पढ़ाई का संकट खड़ा हुआ, तब एसडीएम ने उन्हें अकेला छोड़ने के बजाय मदद का भरोसा दिया।

परिवार से बातचीत के दौरान एसडीएम ने भावुक अंदाज में कहा, “पिता और भाई नहीं हैं तो क्या हुआ, मैं हूं न। मैं आपके परिवार की पूरी देखरेख करूंगा।” उनके इस भरोसे ने दुख से गुजर रहे परिवार को भावनात्मक संबल दिया। इतना ही नहीं, एसडीएम ने बड़ी बेटी को रोजगार दिलाने के प्रयास की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली, जबकि छोटी बेटी की पढ़ाई का खर्च उठाने का निर्णय किया है।

2011 में पिता की मौत, अब इकलौता भाई भी नहीं रहा

यह मामला उन्नाव जिले के सुपसी गांव का है। यहां रानी अपनी दो बेटियों पलक पाल और चमन पाल के साथ रहती हैं। परिवार के अनुसार, वर्ष 2011 में सड़क हादसे में रानी के पति की मौत हो गई थी। पति की असमय मृत्यु के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी रानी के कंधों पर आ गई।

आर्थिक परिस्थितियां कठिन थीं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। विद्यालय में रसोइया के रूप में काम करते हुए उन्होंने अपनी दोनों बेटियों की परवरिश की और उन्हें पढ़ाने का प्रयास जारी रखा। मां के संघर्ष में समय के साथ उनका बेटा शिवम पाल भी सहारा बनने लगा। परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में शिवम की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

लेकिन परिवार की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। शिवम 18 सितंबर 2024 को रोजगार के सिलसिले में सऊदी अरब गया था। परिवार के मुताबिक, 30 जुलाई 2026 को सऊदी अरब में हार्ट अटैक के कारण उसकी मौत हो गई। जवान बेटे की मौत ने परिवार को भीतर तक तोड़ दिया। एक ओर मां ने पति और बेटे दोनों को खो दिया, वहीं दोनों बहनों से परिवार का एकमात्र कमाने वाला सहारा भी छिन गया।

बेटे की मौत के बाद सामने आया रोजी-रोटी का संकट

शिवम की मौत के बाद परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल रोजमर्रा के खर्च और भविष्य का था। मां स्वयं सीमित आय के सहारे परिवार चला रही थीं। बड़ी बेटी पलक पढ़ाई पूरी कर चुकी है, लेकिन स्थायी रोजगार नहीं होने से परिवार को आर्थिक सहारा मिलना मुश्किल था। दूसरी ओर छोटी बेटी चमन पाल बीएससी की छात्रा है।

ऐसे हालात में परिवार को यह चिंता सताने लगी कि घर कैसे चलेगा और चमन की पढ़ाई किस तरह जारी रहेगी। इसी समस्या को लेकर परिवार तहसील दिवस में अपनी फरियाद लेकर पहुंचा। यहीं से परिवार की कहानी प्रशासन के उस अधिकारी तक पहुंची, जिसने उनकी समस्या को केवल एक आवेदन के रूप में नहीं देखा।

तहसील दिवस में एसडीएम ने सुनी परिवार की पीड़ा

तहसील दिवस के दौरान सदर एसडीएम राजेश कुमार विश्वकर्मा को परिवार की परिस्थितियों की जानकारी हुई। बातचीत के बाद उन्हें पता चला कि परिवार में अब मां और दो बेटियां ही हैं और नियमित आय का कोई मजबूत स्रोत नहीं बचा है।

एसडीएम ने परिवार की स्थिति को गंभीरता से लेते हुए उन्हें भरोसा दिलाया कि मुश्किल समय में प्रशासन उनके साथ खड़ा है। उन्होंने परिवार को आश्वस्त किया कि दोनों बेटियों के भविष्य को लेकर हरसंभव मदद की जाएगी।

इसी दौरान उन्होंने बड़ी बेटी पलक को रोजगार दिलाने के लिए स्थानीय स्तर पर प्रयास शुरू करने की बात कही। वहीं छोटी बेटी चमन की शिक्षा को किसी भी परिस्थिति में रुकने नहीं देने का संकल्प लिया।

बड़ी बेटी को रोजगार दिलाने के लिए उद्यमियों से संपर्क

एसडीएम राजेश कुमार विश्वकर्मा के मुताबिक, बड़ी बेटी ग्रेजुएट है और रोजगार के योग्य है। उन्नाव एक महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र होने के कारण यहां निजी क्षेत्र में रोजगार के कई अवसर मौजूद हैं। इसी संभावना को देखते हुए उन्होंने कुछ स्थानीय उद्यमियों और औद्योगिक इकाइयों से संपर्क किया है।

उनका प्रयास है कि पलक को उसकी योग्यता के अनुरूप ऐसा रोजगार मिल सके, जिससे वह अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने में योगदान दे सके। नौकरी मिलने से न केवल परिवार को नियमित आय का साधन उपलब्ध होगा, बल्कि पलक आत्मनिर्भर होकर अपनी मां और बहन का सहारा भी बन सकेगी।

एसडीएम का कहना है कि किसी परिवार को स्थायी सहारा देने का सबसे बेहतर तरीका उसे आत्मनिर्भर बनाने का रास्ता उपलब्ध कराना है। इसलिए बड़ी बेटी के रोजगार को लेकर वह व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास कर रहे हैं।

छोटी बेटी चमन की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठाएंगे एसडीएम

परिवार की छोटी बेटी चमन पाल बीएससी की पढ़ाई कर रही है। भाई की मौत के बाद आर्थिक संकट के कारण उसकी शिक्षा प्रभावित होने की आशंका थी। लेकिन एसडीएम ने साफ कर दिया कि आर्थिक परेशानियों के कारण उसकी पढ़ाई नहीं रुकेगी।

राजेश कुमार विश्वकर्मा ने चमन के शिक्षण संस्थान के प्रबंधन से भी बातचीत की है। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि चमन जब तक अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती है, उसकी शिक्षा में आर्थिक बाधा नहीं आने दी जाएगी और पढ़ाई से संबंधित आवश्यक खर्च की जिम्मेदारी वह स्वयं उठाएंगे।

एसडीएम की इस पहल से परिवार को सबसे बड़ी राहत यही मिली है कि चमन को पढ़ाई बीच में छोड़कर रोजगार की तलाश में जाने की मजबूरी नहीं होगी। परिवार के लिए यह मदद केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि भविष्य को लेकर एक मजबूत भरोसा भी है।

प्रशासनिक अधिकारी के साथ संवेदनशील इंसान की छवि

राजेश कुमार विश्वकर्मा का यह कदम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उन्होंने परिवार की समस्या को केवल सरकारी प्रक्रिया के तहत निपटाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने परिवार की वास्तविक जरूरत को समझा और तत्काल ऐसी पहल की, जिससे दोनों बेटियों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में रास्ता बन सके।

उनका यह कहना कि “पिता और भाई नहीं हैं तो क्या हुआ, मैं हूं न” परिवार के लिए भावनात्मक सहारा बन गया। मौके पर मौजूद लोगों के लिए भी यह क्षण भावुक करने वाला था। एक प्रशासनिक अधिकारी का इस तरह व्यक्तिगत जिम्मेदारी लेने का निर्णय लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।

मानिकपुर से शुरू हुआ था ग्रामीण संवाद का प्रयास

राजेश कुमार विश्वकर्मा मूल रूप से कौशांबी जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने इंटर तक की शिक्षा कौशांबी के दुर्गादेवी इंटर कॉलेज से प्राप्त की। इसके बाद प्रयागराज विश्वविद्यालय से एलएलबी और एलएलएम की पढ़ाई पूरी की।

वह 2013 बैच के पीसीएस अधिकारी हैं। वर्ष 2015 में उनकी पहली पोस्टिंग चित्रकूट जिले की मानिकपुर तहसील में हुई थी। उस समय मानिकपुर क्षेत्र दस्यु प्रभावित इलाकों में गिना जाता था और दूरदराज के गांवों तक अधिकारियों की पहुंच आसान नहीं थी।

मानिकपुर में रहते हुए राजेश विश्वकर्मा ने ग्रामीणों से सीधे संवाद बढ़ाने की दिशा में ‘एक शाम एक ग्राम’ कार्यक्रम शुरू किया। इसके तहत अधिकारी गांवों में पहुंचते, ग्रामीणों की समस्याएं सुनते और स्थानीय स्तर पर उनके समाधान की कोशिश करते थे। इस पहल का उद्देश्य प्रशासन और ग्रामीण समाज के बीच दूरी कम करना तथा सरकारी अधिकारियों को गांवों की वास्तविक समस्याओं से सीधे जोड़ना था।

जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा में पहले भी करते रहे हैं मदद

राजेश कुमार विश्वकर्मा के बारे में बताया जाता है कि जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा में सहयोग करने की पहल वह पहले भी करते रहे हैं। जालौन में तैनाती के दौरान तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ. मन्नान अख्तर के प्रयासों से प्रेरित होकर उन्होंने कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय से जुड़ी बच्चियों की शिक्षा और जरूरतों में सहयोग करने में रुचि दिखाई।

इसके बाद बाराबंकी की हैदरगढ़ तहसील में तैनाती के दौरान उन्होंने प्रकाश इंटर कॉलेज के छह छात्रों की शिक्षा की जिम्मेदारी ली थी। इन बच्चों की फीस और पढ़ाई से संबंधित खर्च में वह सहयोग करते रहे।

बताया जाता है कि स्थानांतरण के बाद भी उन्होंने उन बच्चों की पढ़ाई में मदद का सिलसिला बंद नहीं किया। इससे स्पष्ट होता है कि जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा में सहयोग करना उनके लिए किसी एक स्थान या पद तक सीमित पहल नहीं रही है।

दो बहनों के लिए मदद से जगी नई उम्मीद

उन्नाव के सुपसी गांव की यह घटना बताती है कि किसी परिवार के जीवन में एक संवेदनशील हस्तक्षेप कितना बड़ा बदलाव ला सकता है। रानी ने पति और बेटे दोनों को खोने के बाद जिस संघर्ष का सामना किया, उसमें अब उनकी दोनों बेटियों का भविष्य भी एक बड़ी चिंता थी।

ऐसे समय में सदर एसडीएम राजेश कुमार विश्वकर्मा का आगे आना परिवार के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आया है। बड़ी बेटी को रोजगार दिलाने की कोशिश और छोटी बेटी की पढ़ाई का खर्च उठाने का निर्णय यदि अपने लक्ष्य तक पहुंचता है, तो इससे परिवार को आर्थिक स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ने में बड़ी मदद मिल सकती है।

यह पहल इस बात का भी उदाहरण है कि प्रशासनिक जिम्मेदारी केवल सरकारी आदेशों और योजनाओं के क्रियान्वयन तक सीमित नहीं है। संवेदनशीलता, मानवीय दृष्टिकोण और जरूरतमंद परिवारों के प्रति जिम्मेदारी की भावना प्रशासन और जनता के बीच विश्वास को मजबूत करती है।

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