चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट
गोंडा। जिले के छपिया थाना क्षेत्र के आज्ञामाफी गांव से अंधविश्वास से जुड़ा एक बेहद हैरान करने वाला मामला सामने आया है। पांच वर्षीय बच्चे की बीमारी के दौरान मौत के बाद परिवार ने उसका अंतिम संस्कार कर दिया था। इसी बीच खलीलाबाद से आए एक कथित तांत्रिक ने परिजनों को भरोसा दिलाया कि तंत्र-मंत्र और जड़ी-बूटी के जरिए बच्चे को दोबारा जीवित किया जा सकता है। तांत्रिक की बात पर परिजनों ने अंतिम संस्कार के बाद बच्चे के शव को दोबारा मिट्टी से बाहर निकाला।
परिजन मासूम के फिर से जीवित होने की उम्मीद में काफी देर तक इंतजार करते रहे। कथित तांत्रिक की ओर से दी गई जड़ी-बूटी की दवा बच्चे को पिलाने का प्रयास भी किया गया, लेकिन घंटों बीत जाने के बाद भी शरीर में किसी तरह की हलचल नहीं हुई। आखिरकार परिवार की वह उम्मीद भी टूट गई, जिसे अंधविश्वास के सहारे जगाया गया था।
इलाज के दौरान बिगड़ी थी पांच वर्षीय सत्यम की तबीयत
जानकारी के मुताबिक आज्ञामाफी गांव निवासी जय प्रकाश का पांच वर्षीय बेटा सत्यम 14 अगस्त को कुछ बच्चों के साथ खेल रहा था। खेलते समय अचानक उसकी तबीयत खराब हो गई। बच्चे की हालत बिगड़ने पर परिजन घबरा गए और उसे तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) छपिया लेकर पहुंचे।
अस्पताल में चिकित्सकों ने बच्चे का उपचार शुरू किया। परिजनों को उम्मीद थी कि इलाज के बाद सत्यम की हालत में सुधार आएगा, लेकिन उपचार के दौरान ही उसकी मौत हो गई। मासूम की मौत से परिवार में मातम छा गया। परिजनों के लिए यह बेहद दुखद और सदमे का समय था।
बताया जाता है कि उसी शाम मखौड़ा धाम में बच्चे का अंतिम संस्कार कर दिया गया। परिवार ने भारी मन से अपने पांच वर्षीय बेटे को अंतिम विदाई दी।
तांत्रिक ने जगाई दोबारा जिंदा होने की उम्मीद
बच्चे के अंतिम संस्कार के बाद परिवार के सामने एक कथित तांत्रिक पहुंचा। बताया जा रहा है कि वह खलीलाबाद से आया था। उसने परिजनों से दावा किया कि तंत्र-मंत्र, झाड़-फूंक और जड़ी-बूटी की मदद से मृत बच्चे को फिर से जीवित किया जा सकता है।
बेटे को खो चुके परिवार के लिए यह दावा भावनात्मक रूप से बेहद प्रभावशाली रहा। दुख और सदमे के बीच जब किसी ने बच्चे को वापस जीवित करने की उम्मीद दिखाई तो परिजनों ने उसकी बात पर भरोसा कर लिया। इसके बाद अंतिम संस्कार के बाद बच्चे के शव को दोबारा मिट्टी से बाहर निकाला गया।
कथित तांत्रिक की ओर से दी गई जड़ी-बूटी का इस्तेमाल करने की कोशिश की गई। परिजन बच्चे के शरीर में हलचल होने और उसके दोबारा सांस लेने की उम्मीद लगाए बैठे रहे। समय गुजरता रहा, लेकिन ऐसी कोई स्थिति सामने नहीं आई।
घंटों इंतजार के बाद टूट गई परिवार की उम्मीद
परिजनों ने काफी समय तक इंतजार किया। उन्हें उम्मीद थी कि तांत्रिक के बताए तरीके से बच्चे के शरीर में कोई प्रतिक्रिया होगी। लेकिन न तो शरीर में हलचल हुई और न ही जीवन का कोई संकेत मिला।
इस तरह बच्चे को दोबारा जीवित करने का दावा पूरी तरह विफल साबित हुआ। परिवार को एक बार फिर अपने मासूम बेटे की मौत की वास्तविकता का सामना करना पड़ा। घटना की जानकारी सामने आने के बाद गांव और आसपास के क्षेत्र में भी इसकी चर्चा शुरू हो गई।
लोगों के बीच सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर है कि आखिर दुख और भावनात्मक संकट की स्थिति में परिवार किस तरह एक ऐसे दावे पर भरोसा करने को मजबूर हो गया, जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
सीएचसी अधीक्षक ने बताया—उपचार के दौरान हुई थी मौत
बच्चे की मौत को लेकर सीएचसी छपिया के अधीक्षक डॉ. अमित कुमार ने बताया कि बालक की मौत उपचार के दौरान हुई थी। चिकित्सकीय रूप से मृत्यु के बाद किसी व्यक्ति को तंत्र-मंत्र, झाड़-फूंक या सामान्य जड़ी-बूटी के माध्यम से दोबारा जीवित करने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
ऐसे मामलों में चिकित्सकीय सलाह और वैज्ञानिक जानकारी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। खासकर बच्चों की तबीयत अचानक बिगड़ने पर समय गंवाए बिना अस्पताल पहुंचना जरूरी है।
पुलिस को फिलहाल नहीं मिली मामले की सूचना
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर छपिया पुलिस का कहना है कि थाने में फिलहाल मामले की कोई सूचना नहीं दी गई है। छपिया थानाध्यक्ष प्रबोध कुमार ने बताया कि इस संबंध में थाने पर अभी कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई है।
पुलिस स्तर पर शिकायत या सूचना मिलने के बाद ही मामले में आगे की कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता की जरूरत
गोंडा के छपिया क्षेत्र में सामने आया यह मामला केवल एक परिवार की पीड़ा तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में आज भी मौजूद अंधविश्वास और झाड़-फूंक के नाम पर किए जाने वाले दावों की गंभीरता को सामने लाता है।
किसी प्रियजन की मौत के बाद परिवार भावनात्मक रूप से बेहद कमजोर स्थिति में होता है। ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति चमत्कार या तंत्र-मंत्र के जरिए मृत व्यक्ति को जीवित करने का दावा करता है तो दुखी परिजन आसानी से उसके प्रभाव में आ सकते हैं। यही वजह है कि ऐसी परिस्थितियों में समाज को अधिक जागरूक और संवेदनशील होने की जरूरत है।
बीमारी, दुर्घटना या अचानक तबीयत बिगड़ने की स्थिति में झाड़-फूंक और अप्रमाणित उपचार के बजाय प्रशिक्षित चिकित्सक और मान्यता प्राप्त स्वास्थ्य केंद्र की सहायता लेना सबसे सुरक्षित रास्ता है। विशेष रूप से बच्चों के मामले में उपचार में देरी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।
तंत्र-मंत्र के दावों से बचने की अपील
सत्यम की मौत और उसके बाद शव को दोबारा बाहर निकालने की घटना कई सवाल भी खड़े करती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अंधविश्वास किसी परिवार के दुख को और गहरा नहीं कर देता? बच्चे को खोने के सदमे के बीच परिवार को वास्तविकता स्वीकार करने के बजाय दोबारा उम्मीद में डालना मानसिक पीड़ा को बढ़ा सकता है।
वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति के विकास के बावजूद यदि समाज में मृत व्यक्ति को तंत्र-मंत्र से जीवित करने जैसे दावों पर भरोसा किया जाता है तो यह चिंता का विषय है। ऐसे मामलों में प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षकों, सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
गोंडा के आज्ञामाफी गांव की यह घटना लोगों को एक बार फिर यह संदेश देती है कि अंधविश्वास के बजाय वैज्ञानिक सोच और चिकित्सकीय सलाह पर भरोसा करना चाहिए। किसी भी बीमारी या आपात स्थिति में समय पर अस्पताल पहुंचना जीवन बचाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।













