20 अक्टूबर 2026 3:27 अपराह्न

₹73 हजार महीने कमाती है पत्नी, फिर भी मांगा पति से गुजारा भत्ता; हाईकोर्ट ने पलटा 15 हजार का आदेश, बच्चे के लिए ₹25 हजार तय

₹73 हजार मासिक कमाने वाली पत्नी के गुजारा भत्ता मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ का फैसला, रिपोर्टर अंजनी कुमार त्रिपाठी

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अंजनी कुमार त्रिपाठी की रिपोर्ट

भारत में वैवाहिक विवाद और तलाक के मामलों के साथ भरण-पोषण यानी गुजारा भत्ता का मुद्दा अक्सर अदालतों तक पहुंचता है। पति-पत्नी के बीच आर्थिक जिम्मेदारियों को लेकर होने वाले विवादों में अदालतें दोनों पक्षों की आय, आर्थिक स्थिति, जरूरतों और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर फैसला करती हैं। इसी तरह का एक महत्वपूर्ण मामला लखनऊ से सामने आया है, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने पत्नी के भरण-पोषण से जुड़े पारिवारिक न्यायालय के आदेश को बदल दिया है।

मामला इसलिए खास है क्योंकि पत्नी स्वयं एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और हर महीने करीब 73 हजार रुपये वेतन प्राप्त करती है। इसके बावजूद पारिवारिक न्यायालय ने पति को पत्नी के लिए हर महीने 15 हजार रुपये भरण-पोषण के रूप में देने का निर्देश दिया था। पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पत्नी की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उसके लिए दिए गए भरण-पोषण के आदेश को त्रुटिपूर्ण माना।

हालांकि, इस फैसले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि अदालत ने नाबालिग बच्चे के अधिकार को अलग और सर्वोच्च महत्व दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी बनी रहेगी और पति को बच्चे के खर्च के लिए हर महीने 25 हजार रुपये देने होंगे।

73 हजार रुपये कमाती है पत्नी, फिर भी मांगा था गुजारा भत्ता

जानकारी के अनुसार, संबंधित वैवाहिक विवाद में पति और पत्नी दोनों ही सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। पति की मासिक आय करीब 1.75 लाख रुपये बताई गई है, जबकि पत्नी को हर महीने लगभग 73 हजार रुपये वेतन मिलता है। पत्नी की अपनी नियमित आय होने के बावजूद उसने पति से भरण-पोषण की मांग की थी।

मामला पारिवारिक न्यायालय पहुंचा, जहां पति को पत्नी के लिए हर महीने 15 हजार रुपये देने का आदेश दिया गया। पति ने इस आदेश पर आपत्ति जताते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसकी दलील थी कि पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम है, नौकरी करती है और स्वयं अपना खर्च उठाने की स्थिति में है। ऐसे में उसे पति से अलग से भरण-पोषण दिए जाने का कोई आधार नहीं बनता।

पत्नी के पास 80 लाख रुपये से अधिक का फ्लैट भी

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पति की ओर से पत्नी की आर्थिक स्थिति से जुड़े तथ्यों को भी सामने रखा गया। बताया गया कि पत्नी की मासिक आय करीब 73 हजार रुपये है। इसके अलावा उसने बख्शी का तालाब इलाके में 80 लाख रुपये से अधिक कीमत का फ्लैट भी खरीदा है।

पति ने इन्हीं परिस्थितियों का हवाला देते हुए कहा कि पत्नी अपने जीवन-यापन के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन रखती है। इसलिए पारिवारिक न्यायालय द्वारा उसके लिए निर्धारित 15 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण का आदेश उचित नहीं है।

अदालत ने मामले में उपलब्ध परिस्थितियों और पत्नी की आय को ध्यान में रखते हुए पति की दलील को स्वीकार किया। कोर्ट ने माना कि नियमित रूप से 73 हजार रुपये मासिक वेतन प्राप्त करने वाली पत्नी अपने मूलभूत खर्चों को स्वयं वहन करने की स्थिति में है।

हाईकोर्ट ने पत्नी के लिए भरण-पोषण का आदेश पलटा

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पारिवारिक न्यायालय के उस आदेश को पलट दिया, जिसके तहत पति को पत्नी को हर महीने 15 हजार रुपये देने थे।

जस्टिस सौरभ लवानिया की सिंगल बेंच ने कहा कि पत्नी की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उसके लिए भरण-पोषण का आदेश उचित नहीं था। अदालत के सामने यह तथ्य महत्वपूर्ण था कि पत्नी स्वयं नौकरी करती है और उसे पर्याप्त मासिक वेतन प्राप्त होता है।

इस फैसले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि भरण-पोषण के मामलों में केवल पति की आय को आधार बनाकर निर्णय नहीं किया जा सकता। पत्नी की अपनी आय और उसकी वास्तविक आर्थिक क्षमता को भी अदालत के सामने देखा जाना जरूरी है।

बच्चे के अधिकार पर कोर्ट ने रखा विशेष जोर

हालांकि, अदालत ने पत्नी और बच्चे के अधिकारों को एक जैसा नहीं माना। पत्नी के लिए भरण-पोषण की मांग को स्वीकार नहीं किया गया, लेकिन नाबालिग बच्चे के लिए पिता की आर्थिक जिम्मेदारी को बरकरार रखा गया।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे का भरण-पोषण पिता की जिम्मेदारी है। इसी आधार पर पति को हर महीने 25 हजार रुपये बच्चे के खर्च के लिए देते रहने का निर्देश दिया गया।

यानी अदालत के फैसले का सीधा अर्थ यह नहीं है कि पत्नी की नौकरी होने मात्र से परिवार से जुड़ी सभी आर्थिक जिम्मेदारियां समाप्त हो जाती हैं। बच्चे के अधिकार को स्वतंत्र रूप से देखा गया और उसके पालन-पोषण के लिए आर्थिक सहायता जारी रखने का आदेश दिया गया।

तलाक के बाद गुजारा भत्ता क्यों बनता है बड़ा मुद्दा?

तलाक या वैवाहिक विवाद के बाद पति-पत्नी के बीच भरण-पोषण का सवाल अक्सर कानूनी विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है। ऐसे मामलों में अदालतें आम तौर पर दोनों पक्षों की आय, आर्थिक स्थिति, जीवन-स्तर, आश्रित बच्चों और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों पर विचार करती हैं।

इसलिए किसी भी मामले में यह कहना सही नहीं होगा कि हर कामकाजी पत्नी भरण-पोषण की हकदार होगी या हर कामकाजी पत्नी को भरण-पोषण नहीं मिलेगा। वास्तविक निर्णय संबंधित मामले के तथ्यों और लागू कानून के आधार पर होता है।

लखनऊ के इस मामले में पत्नी की नियमित आय और उसकी आर्थिक क्षमता को महत्वपूर्ण माना गया। दूसरी ओर, नाबालिग बच्चे की जरूरतों को अलग से देखते हुए पिता को उसके खर्च की जिम्मेदारी निभाने का आदेश दिया गया।

फैसले से क्या संदेश निकलता है?

हाईकोर्ट का यह फैसला वैवाहिक विवादों में आर्थिक आत्मनिर्भरता की भूमिका को रेखांकित करता है। यदि पत्नी स्वयं पर्याप्त आय अर्जित कर रही है और अपनी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है, तो अदालत उसके लिए पति से भरण-पोषण की मांग का आकलन अलग तरीके से कर सकती है।

साथ ही, बच्चे के मामले में स्थिति अलग हो सकती है। माता-पिता के बीच वैवाहिक संबंध समाप्त होने के बावजूद बच्चे की जरूरतें समाप्त नहीं होतीं। इसी कारण अदालत ने बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी को कायम रखा।

आगे ऐसे मामलों में भी हो सकता है असर

लखनऊ पीठ का यह निर्णय उन वैवाहिक विवादों के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है, जहां पत्नी स्वयं नौकरी करती है और पति से भरण-पोषण की मांग करती है। हालांकि, हर मामले में अदालत का निर्णय वहां मौजूद तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर ही होगा।

इस मामले में एक तरफ 73 हजार रुपये मासिक वेतन पाने वाली पत्नी के लिए 15 हजार रुपये के भरण-पोषण आदेश को हाईकोर्ट ने सही नहीं माना, वहीं दूसरी तरफ नाबालिग बच्चे के लिए 25 हजार रुपये मासिक भुगतान जारी रखने का निर्देश दिया गया।

इस तरह यह फैसला एक महत्वपूर्ण अंतर भी सामने लाता है—पत्नी का स्वयं कमाने में सक्षम होना और बच्चे के भरण-पोषण का अधिकार दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं। अदालत ने दोनों पहलुओं को अलग-अलग देखते हुए अपना निर्णय दिया।

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