21 अक्टूबर 2026 12:05 पूर्वाह्न

राशन कोटेदारों की कमाई का गणित : कहीं 90 रुपये तो कहीं 258 रुपये प्रति क्विंटल, आखिर क्यों अलग-अलग है कमीशन?

रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला के साथ राशन की दुकान, गेहूं-चावल और राशन कार्ड को दर्शाती फीचर इमेज, जिसमें देशभर के कोटेदारों के कमीशन और आय की जानकारी दी गई है।

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

लखनऊ। देश में करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) की महत्वपूर्ण भूमिका है। हर महीने लगभग 80 करोड़ लाभार्थियों तक गेहूं, चावल और अन्य आवश्यक खाद्यान्न पहुंचाने की जिम्मेदारी इसी व्यवस्था के माध्यम से पूरी की जाती है। इस पूरी प्रणाली की सबसे अहम कड़ी फेयर प्राइस शॉप (एफपीएस) यानी राशन की दुकानें हैं, जिन्हें आम बोलचाल में कोटे की दुकान कहा जाता है। इन दुकानों का संचालन करने वाले लोगों को कोटेदार कहा जाता है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार देशभर में 5.4 लाख से अधिक राशन की दुकानें संचालित हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के तहत पात्र परिवारों तक खाद्यान्न पहुंचाने की जिम्मेदारी इन्हीं दुकानों पर है। हालांकि हाल के वर्षों में कोटेदारों की आय, बढ़ते खर्च और कम कमीशन को लेकर असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। उत्तर प्रदेश में 28 जुलाई 2026 को बड़ी संख्या में कोटेदारों ने लखनऊ में प्रदर्शन कर अपनी मांगों को दोहराया और चेतावनी दी कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो अगस्त से राशन वितरण प्रभावित हो सकता है।

कमाई का मुख्य आधार है कमीशन, वेतन नहीं

बहुत से लोगों की धारणा होती है कि कोटेदार सरकारी कर्मचारी होते हैं और उन्हें नियमित वेतन मिलता है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। कोटेदारों को मासिक वेतन नहीं दिया जाता। उनकी आय का प्रमुख स्रोत राशन वितरण पर मिलने वाला कमीशन है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत केंद्र सरकार राज्यों को प्रति क्विंटल खाद्यान्न वितरण के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है। इसके अलावा राज्य सरकारें अपने बजट और नीतियों के अनुसार अतिरिक्त कमीशन, प्रोत्साहन राशि या मानदेय भी दे सकती हैं। इसी कारण पूरे देश में कोटेदारों की आय और सुविधाएं एक समान नहीं हैं।

उत्तर प्रदेश में क्यों बढ़ा असंतोष?

उत्तर प्रदेश के कोटेदार लंबे समय से कमीशन बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। वर्तमान में उन्हें प्रति क्विंटल खाद्यान्न वितरण पर केवल 90 रुपये का लाभांश मिलता है। उनका कहना है कि बढ़ती महंगाई, परिवहन व्यय, बिजली बिल, दुकान का रखरखाव, डिजिटल मशीनों का संचालन और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच यह राशि पर्याप्त नहीं है।

कोटेदारों की प्रमुख मांग है कि कमीशन को बढ़ाकर 200 रुपये प्रति क्विंटल किया जाए। इसके साथ ही लंबित भुगतानों का शीघ्र निस्तारण भी किया जाए। प्रदर्शन के दौरान उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने समय रहते सकारात्मक निर्णय नहीं लिया तो प्रदेश में राशन वितरण व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

हर राज्य में अलग-अलग है कमीशन की व्यवस्था

देश में कोटेदारों को मिलने वाला कमीशन एक समान नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि केंद्र सरकार केवल न्यूनतम वित्तीय सहायता निर्धारित करती है, जबकि अतिरिक्त भुगतान का निर्णय संबंधित राज्य सरकारें स्वयं करती हैं। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार विभिन्न राज्यों में स्थिति इस प्रकार है—

  • उत्तर प्रदेश में लगभग 90 रुपये प्रति क्विंटल।
  • बिहार में लगभग 258.40 रुपये प्रति क्विंटल।
  • महाराष्ट्र में करीब 170 रुपये प्रति क्विंटल।
  • राजस्थान में गेहूं वितरण पर लगभग 150.70 रुपये प्रति क्विंटल।
  • मध्य प्रदेश में लगभग 70 रुपये प्रति क्विंटल।
  • छत्तीसगढ़ में लगभग 120 रुपये प्रति क्विंटल।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि राज्यों के बीच कमीशन में काफी अंतर मौजूद है, जिससे कोटेदारों की आय भी प्रभावित होती है।

केंद्र सरकार की क्या है व्यवस्था?

वर्ष 2022 में केंद्र सरकार ने सामान्य राज्यों के लिए प्रति क्विंटल 90 रुपये का बेसिक मार्जिन निर्धारित किया था। वहीं पूर्वोत्तर, हिमालयी तथा द्वीपीय राज्यों के लिए यह राशि 180 रुपये प्रति क्विंटल तय की गई थी।

इसके अलावा ई-पीओएस मशीन के माध्यम से राशन वितरण के लिए भी अलग से वित्तीय सहायता का प्रावधान किया गया है। हालांकि यह राशि सीधे कोटेदारों को नहीं दी जाती, बल्कि पहले राज्य सरकारों को उपलब्ध कराई जाती है। राज्य सरकारें अपनी नीति के अनुसार इसका भुगतान कोटेदारों को करती हैं।

अतिरिक्त आय के लिए भी मिल रही हैं नई सुविधाएं

समय के साथ राशन दुकानों को केवल खाद्यान्न वितरण केंद्र तक सीमित नहीं रखा गया है। कई राज्यों ने इन्हें बहुउद्देश्यीय सेवा केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।

उत्तर प्रदेश में ई-पीओएस मशीन, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन वितरण प्रणाली जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। राजस्थान में अनेक राशन दुकानों को ई-मित्र सेवाओं से जोड़ा गया है, जिससे बिजली बिल जमा कराने, प्रमाण-पत्र संबंधी सेवाएं और अन्य सरकारी कार्यों के माध्यम से अतिरिक्त आय अर्जित की जा सकती है।

इसी प्रकार मध्य प्रदेश में कई राशन दुकानों को कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) से जोड़ा गया है। वहीं केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में अधिकांश राशन दुकानें सहकारी संस्थाओं के माध्यम से संचालित होती हैं, जहां कई कर्मचारियों को नियमित वेतन और अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध होती हैं।

एक कोटेदार की औसत मासिक आय कितनी होती है?

कोटेदार की कमाई किसी निश्चित वेतनमान पर आधारित नहीं होती। उसकी आय इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी दुकान से कितने राशन कार्ड जुड़े हैं और प्रत्येक महीने कितना खाद्यान्न वितरित किया जाता है।

आमतौर पर छोटे गांवों की राशन दुकानों से संचालकों को लगभग 8,000 से 15,000 रुपये प्रतिमाह की आय होती है। मध्यम स्तर की दुकानों में यह आय 15,000 से 30,000 रुपये तक पहुंच सकती है। जबकि बड़ी संख्या में लाभार्थियों वाली दुकानों में मासिक आय 40,000 से 50,000 रुपये तक भी पहुंच सकती है।

हालांकि कोटेदारों का कहना है कि इस आय में से दुकान का किराया, बिजली, परिवहन, कर्मचारियों का भुगतान, रखरखाव और अन्य प्रशासनिक खर्च निकालने के बाद वास्तविक बचत काफी सीमित रह जाती है।

सरकारी कर्मचारी का दर्जा भी प्रमुख मांगों में शामिल

कोटेदार संगठन कई वर्षों से अपनी विभिन्न मांगों को लेकर सरकारों के सामने आवाज उठाते रहे हैं। उनकी प्रमुख मांगों में 30 हजार से 50 हजार रुपये मासिक मानदेय, सरकारी कर्मचारी का दर्जा, पेंशन सुविधा, स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा, परिवहन व्यय का पूर्ण भुगतान तथा समय-समय पर कमीशन में बढ़ोतरी शामिल हैं।

उनका तर्क है कि मुफ्त राशन योजना के विस्तार के बाद लाभार्थियों की संख्या बढ़ी है। साथ ही आधार प्रमाणीकरण, ई-पीओएस मशीन संचालन, डिजिटल रिकॉर्ड, ऑनलाइन सत्यापन और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गई हैं, लेकिन आय में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हुई।

देशभर में एक समान कमीशन क्यों संभव नहीं?

सार्वजनिक वितरण प्रणाली केंद्र और राज्य सरकारों की साझा जिम्मेदारी है। केंद्र सरकार खाद्यान्न उपलब्ध कराती है और न्यूनतम वित्तीय सहायता निर्धारित करती है, जबकि राशन दुकानों का संचालन, अतिरिक्त कमीशन, मानदेय और अन्य सुविधाओं का निर्णय संबंधित राज्य सरकारें अपने वित्तीय संसाधनों और नीतिगत प्राथमिकताओं के आधार पर करती हैं।

यही कारण है कि एक राज्य में कोटेदारों को अपेक्षाकृत अधिक कमीशन मिलता है, जबकि दूसरे राज्य में यह काफी कम हो सकता है। जब तक सभी राज्यों के लिए एक समान राष्ट्रीय नीति नहीं बनाई जाती, तब तक कोटेदारों की आय और सुविधाओं में यह अंतर बना रहने की संभावना है।

बदलते समय में नई नीति की जरूरत

देश में खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की सफलता काफी हद तक राशन दुकानों और कोटेदारों पर निर्भर करती है। करोड़ों लोगों तक समय पर खाद्यान्न पहुंचाने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में बढ़ती महंगाई, परिचालन लागत और डिजिटल जिम्मेदारियों को देखते हुए विशेषज्ञ भी मानते हैं कि कोटेदारों की आय और कार्य परिस्थितियों की समय-समय पर समीक्षा आवश्यक है।

यदि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर संतुलित और व्यावहारिक नीति तैयार करती हैं, तो इससे न केवल कोटेदारों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी बल्कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली भी अधिक प्रभावी, पारदर्शी और टिकाऊ बन सकेगी।

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