ज़िंदगी, तुम अभी हार नहीं सकती –3 ; मैं भागी नहीं थी… मैं अपने बच्चों को बचाने निकली थी
एक अनाम जीवन की सत्यगाथा
✍️ अनिल अनूप
अब तक आपने पढ़ा…
पहले अंक “रोटी की तलाश में निकला था, रास्ते में शब्द मिले थे” में आपने जाना कि कैसे जीवन की कठोर परिस्थितियों ने मुझे बहुत कम उम्र में रोज़ी-रोटी की तलाश में धकेल दिया। कभी दिहाड़ी मजदूर, कभी फैक्ट्री में सुपरवाइजर, तो कभी ऐसे छोटे-बड़े काम, जिनकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन इन सबके बीच शब्द मेरा साथ नहीं छोड़ पाए। दिनभर श्रम करने के बाद रात को लिखना ही मेरे लिए सबसे बड़ा सुकून था। धीरे-धीरे पत्रकारिता मेरे जीवन का हिस्सा बनी और उसी सिलसिले में एक दिन मेरी नज़र एक ऐसे परिवार पर पड़ी, जिसने मेरी सोच की दिशा ही बदल दी।
दूसरे अंक “वह महिला, जिसने मुझे मेरे अंदर से ही मिलवाया” में उस महिला के जीवन का पहला अध्याय खुला। बिहार के एक साधारण ग्रामीण परिवार में जन्मी वह युवती पढ़ी-लिखी थी, समझदार थी और जीवन के सामान्य सपने लेकर विवाह करके ससुराल गई थी। लेकिन वहाँ उसका सामना एक ऐसी सच्चाई से हुआ, जिसके बारे में उसे पहले कभी बताया ही नहीं गया था। उसके पति मानसिक रूप से अस्वस्थ थे। गाँव वाले उन्हें एक ही शब्द में “पागल” कहकर पुकारते थे, लेकिन उसने उन्हें कभी इस दृष्टि से नहीं देखा। उसने पूरे दस वर्षों तक पत्नी होने का दायित्व निभाया, उनका इलाज कराया, उनकी सेवा की और इसी दौरान दो बच्चों की माँ भी बनी। जब उसे लगा कि अब उसके बच्चों का भविष्य अँधेरे में डूब सकता है, तब उसने अपने जीवन का सबसे कठिन निर्णय लिया। वह किसी से लड़कर नहीं निकली, किसी को दोष देकर नहीं निकली। वह केवल अपने बच्चों के लिए एक नई राह बनाने निकली थी।
दूसरे अंक की हमारी बातचीत समाप्त हो चुकी थी, लेकिन सच कहूँ तो उसके बाद भी वह बातचीत मेरे भीतर चलती रही। अब आगे पढ़िए…
पत्रकार होने के कारण मैं प्रतिदिन न जाने कितने लोगों से मिलता था। कोई अपनी समस्या सुनाता, कोई शिकायत करता, कोई अपने पक्ष में खबर छपवाने की कोशिश करता। चेहरे बदलते रहते थे, विषय बदलते रहते थे, लेकिन उस महिला का चेहरा मेरे मन से हट नहीं रहा था।
उसकी आँखों में मुझे पहली बार ऐसा धैर्य दिखाई दिया था, जो किताबों में नहीं मिलता। वह टूटी हुई थी, लेकिन बिखरी हुई नहीं थी। उसने बहुत कुछ खोया था, लेकिन उसके भीतर शिकायत का एक शब्द भी नहीं था।
अगले कुछ दिनों तक मेरा उसी इलाके में आना-जाना बना रहा। अब हमारी मुलाकातें संयोग नहीं रह गई थीं। मैं कभी पाँच मिनट रुक जाता, कभी आधा घंटा बीत जाता। धीरे-धीरे हमारे बीच औपचारिकता की दीवार टूटने लगी।
मैंने एक बात शुरू से महसूस की थी। वह अपने बारे में बहुत कम बोलती थी। अगर बात शुरू भी होती, तो कुछ ही क्षण बाद उसका विषय बदलकर बच्चों पर आ जाता। “आज बेटे ने पहली बार पूरी कविता सुनाई…” “बेटी अब बिना सहारे लिखने लगी है…” “दोनों को आम बहुत पसंद हैं…” “बेटा कह रहा था कि बड़ा होकर मास्टर बनेगा…” उसके चेहरे पर सबसे अधिक चमक तभी दिखाई देती थी, जब वह बच्चों की बात करती थी।
एक दिन मैंने उससे कहा— “एक बात पूछूँ?”
वह मुस्कुराकर बोली— “जी सर जी, पूछिए।”
मैंने पूछा— “जब तुम्हें यह समझ में आ गया था कि तुम्हारे पति मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं, तब भी तुमने दस साल तक उनका साथ क्यों नहीं छोड़ा?”
उसने उत्तर देने में जल्दी नहीं की। कुछ क्षण तक वह चुप रही। फिर सामने दूर कहीं देखते हुए बोली— “क्योंकि बीमारी किसी की गलती नहीं होती, सर जी।”
मैं उसकी ओर देखता रह गया। उसने बहुत सहज स्वर में कहा— “शादी के समय मुझे कुछ पता नहीं था। मैं भी हर लड़की की तरह अपने घर से सपने लेकर निकली थी। मुझे लगा था कि मेरा भी छोटा-सा परिवार होगा। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। लेकिन कुछ ही समय बाद मुझे समझ में आने लगा कि मेरे पति सामान्य नहीं हैं।”
वह कुछ पल रुकी। फिर बोली— “गाँव के लोग उन्हें पागल कहते थे। मुझे यह शब्द कभी अच्छा नहीं लगा। वे बीमार थे… बस इतनी-सी बात थी।” उसके इस उत्तर ने मुझे भीतर तक छू लिया। आज इतने वर्षों बाद भी वह अपने पति के लिए सम्मान बचाकर रखे हुए थी। मैंने पूछा— “फिर?”
वह बोली— “फिर वही किया जो उस समय मुझे सही लगा।”
“क्या?”
“इलाज।”
उसने एक-एक बात जैसे अपने मन की गठरी खोलकर रख दी। “जहाँ किसी ने बताया कि अच्छे डॉक्टर हैं, वहाँ गई। सरकारी अस्पताल भी गई। निजी डॉक्टर के पास भी गई। गाँव के लोगों ने कहा कि अमुक बाबा के पास ले जाओ, वहाँ भी गई। किसी ने झाड़-फूँक कराई, किसी ने ताबीज पहनाया। सच कहूँ सर जी… उस समय मुझे यह नहीं पता था कि कौन सही है और कौन गलत। मुझे सिर्फ इतना पता था कि कोशिश छोड़ देना मेरे बस की बात नहीं थी।”
मैं सुनता रहा। वह कहती रही— “हर बार लगता था कि इस बार शायद सब ठीक हो जाएगा।” उसकी मुस्कान में उस समय की टूटी हुई उम्मीद साफ दिखाई दे रही थी।
कुछ देर बाद उसने कहा— “लोग मुझे समझाते थे—’तुम्हारी उम्र ही क्या है? पूरी जिंदगी पड़ी है। छोड़ दो इन्हें।'”
मैंने पूछा— “तुम्हारे मन में कभी यह विचार नहीं आया?” उसने बिना एक पल रुके उत्तर दिया— “नहीं सर जी।”
“क्यों?”
उसने मेरी ओर देखा। फिर बहुत शांत स्वर में बोली— “बीमारी उनकी थी… बेवफाई नहीं।” उसके इस एक वाक्य ने जैसे मेरे भीतर कोई दरवाज़ा खोल दिया। वह आगे बोली— “अगर किसी आदमी का हाथ टूट जाए, पैर टूट जाए, तो क्या पत्नी उसे छोड़ देती है? फिर दिमाग बीमार हो जाए, तो रिश्ता क्यों खत्म हो जाए?”
उसके पास कोई बड़ी डिग्री नहीं थी। लेकिन जीवन ने उसे जो समझ दी थी, वह किसी विश्वविद्यालय से कम नहीं थी। मैं उस दिन पहली बार महसूस कर रहा था कि शिक्षा केवल किताबों से नहीं मिलती। कुछ देर बाद उसने अपने दोनों बच्चों की ओर देखते हुए कहा— “धीरे-धीरे बेटा हुआ। फिर बेटी आई। मुझे लगा कि शायद बच्चों के आने से घर बदल जाएगा। कुछ समय के लिए लगा भी कि अब सब ठीक हो जाएगा। लेकिन बीमारी किसी भावना से नहीं बदलती।”
उसकी आवाज़ धीमी हो गई। “रात-रात भर जागना पड़ता था। कभी उन्हें संभालना पड़ता, कभी बच्चों को। कई बार ऐसा हुआ कि एक बच्चा बुखार में तप रहा होता और उधर वे घर से बाहर निकल जाते। तब समझ में नहीं आता था कि पहले किसे पकड़ूँ।”
उसने यह बात बिना किसी शिकायत के कही। मानो वह केवल अपने जीवन का एक पन्ना पढ़ रही हो। मैं पहली बार उसकी आँखों में छिपी हुई अनगिनत जागी हुई रातों को देख पा रहा था।
मैं कुछ देर तक मौन बैठा रहा। मुझे लग रहा था कि यदि मैंने इस समय कोई सामान्य-सा प्रश्न भी पूछा, तो शायद उसके जीवन के साथ अन्याय होगा।
उसने मेरी चुप्पी पढ़ ली। धीरे से बोली— “सर जी, लोग समझते हैं कि दुख बहुत बड़ा होता है। लेकिन सच कहूँ… दुख से बड़ा डर होता है।”
मैंने पूछा— “किस बात का डर?” उसने अपने दोनों बच्चों की ओर देखा।
फिर बहुत धीमे स्वर में बोली— “इस बात का कि कहीं मेरे बच्चों का बचपन भी इन्हीं परिस्थितियों में खत्म न हो जाए।” उसकी आवाज़ भर्रा गई थी, लेकिन उसने आँसू नहीं बहने दिए। कुछ क्षण बाद उसने कहा—
“एक दिन मेरी बेटी ने मुझसे पूछा—’माँ, पापा ऐसे क्यों हैं?'” वह चुप हो गई। मैंने महसूस किया कि वह उस दिन में लौट गई है। कुछ देर बाद उसने स्वयं ही आगे कहा— “सर जी… उस दिन मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। मैंने उसे गोद में उठा लिया, लेकिन उसके सवाल का जवाब नहीं दे सकी। रातभर सो नहीं पाई। पहली बार मुझे अपने दुख से ज्यादा अपने बच्चों का भविष्य दिखाई देने लगा।”
मैं पूरी तन्मयता से सुन रहा था। वह बोली— “मैंने सोचा… अगर यही सब देखते-देखते ये बड़े हुए तो क्या होगा? पढ़ाई कैसे होगी? इनका आत्मविश्वास कैसे बचेगा? इनके मन में पिता की कौन-सी तस्वीर बनेगी?”
उसने गहरी साँस ली। “उसी रात मैंने निर्णय लिया कि अब मुझे माँ बनकर सोचना होगा। सिर्फ पत्नी बनकर नहीं।”
उसके इस वाक्य ने मेरे भीतर जैसे घंटी-सी बजा दी। पत्नी और माँ… दोनों भूमिकाएँ एक ही स्त्री निभाती है, लेकिन कभी-कभी जीवन उसे दोनों में से एक को प्राथमिकता देने के लिए विवश कर देता है। वह आगे बोली— “मैंने किसी से लड़ाई नहीं की। किसी पर आरोप नहीं लगाया। कोई मुकदमा नहीं किया। मैं सिर्फ अपने दोनों बच्चों का हाथ पकड़कर निकल आई।”
कुछ क्षण बाद उसने मेरी ओर देखकर कहा— “सर जी… लोग कहते हैं कि मैं अपने पति को छोड़कर भाग आई। लेकिन सच तो यह है कि मैं भागी नहीं थी… मैं अपने बच्चों को बचाने निकली थी।”
उस क्षण मैं पत्रकार नहीं रह गया था। मैं केवल एक श्रोता था। एक ऐसा श्रोता, जिसके सामने जीवन स्वयं अपनी गवाही दे रहा था। मैंने धीरे से पूछा— “क्या आज भी तुम्हें उनके लिए बुरा नहीं लगता?” उसने बिना किसी कटुता के उत्तर दिया— “लगता है सर जी। बहुत लगता है। आखिर वे मेरे बच्चों के पिता हैं। बीमारी किसी की इच्छा से नहीं आती।”
मैं उसकी ओर देखता रह गया। इतनी पीड़ा झेलने के बाद भी उसके भीतर सम्मान बचा हुआ था। आज के समय में, जब छोटे-छोटे कारणों से रिश्ते टूट जाते हैं, यह स्त्री अपने अतीत को अपमानित करने से इंकार कर रही थी।
मैंने सहज ही पूछा— “और तुम्हारे अपने बारे में?”
वह हल्का-सा मुस्कुराई। “मेरे बारे में सोचने की फुर्सत कहाँ थी, सर जी? सुबह काम, फिर बच्चों की पढ़ाई, खाना, कपड़े, बीमारी, फीस… यही जीवन था।” उसने हँसने की कोशिश की।
“कभी-कभी आईने में खुद को देखती थी तो लगता था… यह मैं हूँ भी या नहीं।”
उसकी वह मुस्कान बहुत देर तक मेरे मन में रही। उस दिन हमारी बातचीत समाप्त होने लगी। बच्चों ने मेरे हाथ से बिस्कुट का पैकेट लिया और खिलखिलाकर हँसने लगे। उनकी हँसी में भविष्य था। मैं उठकर जाने लगा। तभी उसने बहुत धीमे स्वर में कहा— “सर जी…”
मैं रुक गया। “जी?” वह कुछ क्षण चुप रही। फिर बोली— “आपसे बातें करके अच्छा लगता है।” मैं मुस्कुरा दिया।वह आगे बोली— “क्योंकि आप मेरी कहानी नहीं सुनते… मुझे सुनते हैं।”
उसके इस वाक्य ने मुझे भीतर तक छू लिया। पत्रकारिता करते हुए मैंने सैकड़ों लोगों के बयान लिखे थे। लेकिन पहली बार लगा कि किसी मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता यह नहीं होती कि कोई उसे सलाह दे। सबसे बड़ी आवश्यकता होती है— कोई बिना निर्णय सुनाए उसकी बात सुन ले। उस दिन जब मैं वहाँ से लौटा तो रास्ता वही था, सड़क वही थी, लोग वही थे।
लेकिन मैं पहले वाला आदमी नहीं था। उस रात मैंने अपनी डायरी खोली। काफी देर तक खाली पन्ने को देखता रहा।
फिर केवल एक वाक्य लिखा—
“आज पहली बार लगा कि पत्रकारिता केवल खबरें लिखने का काम नहीं है… कभी-कभी वह टूटते हुए मनुष्यों की आवाज़ सुनने का उत्तरदायित्व भी है।”
डायरी बंद करते समय मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि यह कहानी अब केवल उस महिला की नहीं रह जाएगी। समय धीरे-धीरे मुझे भी उसके जीवन की चौखट तक ले जाने वाला था। और शायद… वहीं से मेरे जीवन का सबसे कठिन निर्णय जन्म लेने वाला था।
क्रमशः…
अगले अंक में पढ़िए—
“सर जी… क्या हर आदमी के हिस्से में अपना कहने वाला कोई होता है?”
एक ऐसा प्रश्न, जिसने एक पत्रकार को पहली बार अपनी ही जिंदगी के आईने के सामने खड़ा कर दिया। वहीं से शुरू हुआ विश्वास का वह सफर, जिसने आगे चलकर चार जिंदगियों की दिशा बदल दी।








