भगवान किसके साथ रहता है?
कहानीकार: श्रवण कुमार श्रीवास्तव
सुबह के पाँच बजते ही घर में घंटी की आवाज़ गूँज उठती। अगरबत्ती की सुगंध पूरे आँगन में फैल जाती। पीतल के दीपक की लौ धीरे-धीरे काँपती और पूजा के कमरे से मंत्रोच्चार सुनाई देता।
सुमित्रा रोज़ की तरह भगवान के सामने बैठी थी। माथे पर बड़ा-सा चंदन का तिलक, हाथ में माला और सामने गीता खुली हुई। उसके लिए दिन की शुरुआत पूजा के बिना अधूरी थी। वह मानती थी कि ईश्वर को प्रसन्न किए बिना जीवन में सुख नहीं मिल सकता।
उधर बैठक में बैठे राघव अपनी डायरी के पन्नों पर कुछ लिख रहे थे। वे देश के जाने-माने लेखक थे। वर्षों की साधना, संघर्ष और अनुभव ने उनके लेखन को ऐसी ऊँचाई दी थी कि लोग उन्हें सम्मान से सुनते थे। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी सरलता थी।
राघव कभी मंदिर जाने के विरोधी नहीं थे, लेकिन उनका विश्वास अलग था। वह अक्सर कहते, “अगर भगवान को कहीं खोजना है तो किसी भूखे को भोजन खिलाओ, किसी रोते हुए को सहारा दो, किसी अकेले का हाथ पकड़ लो। वह वहीं मिलेगा।”
सुमित्रा यह बात सुनते ही भड़क जाती। “तुम भगवान को मानते ही नहीं।” राघव मुस्कुरा देते। “मैं भगवान को सबसे ज्यादा मानता हूँ। बस उसे पत्थर में सीमित नहीं करता।” यही एक वाक्य उनके घर की सबसे बड़ी लड़ाई बन गया था।
राघव का जीवन किसी उपन्यास से कम नहीं था। बरसों पहले उन्होंने एक ऐसी स्त्री का हाथ थामा था जिसे समाज ने लगभग ठुकरा दिया था। उसका पहला पति मानसिक संतुलन खो चुका था। घर बिखर चुका था। रिश्तेदारों ने साथ छोड़ दिया था। गोद में एक छोटी बेटी और हाथ पकड़कर चलता एक मासूम बेटा।
वह दर-दर भटक रही थी। लोग सलाह देते थे। “ऐसी औरत से दूर रहो।” “दो-दो बच्चों का बोझ क्यों उठाओगे?” “अपनी जिंदगी बर्बाद मत करो।”
लेकिन राघव ने उन बच्चों में बोझ नहीं देखा। उन्होंने सिर्फ दो डरी हुई आँखें देखीं जिन्हें एक पिता की जरूरत थी। उन्होंने सुमित्रा से कहा था, “अगर तुम मेरे साथ चलना चाहती हो तो तुम्हारे बच्चे भी मेरे होंगे।”
उस दिन सुमित्रा बहुत रोई थी। उसे पहली बार लगा था कि दुनिया में अभी इंसानियत जिंदा है। राघव ने कभी दोनों बच्चों को सौतेला नहीं कहा। स्कूल के फॉर्म में अपना नाम लिखा। बीमार पड़े तो रात भर अस्पताल में बैठे रहे। कपड़े, किताबें, फीस… जो कुछ कमा सकते थे, सब उन बच्चों पर लगा दिया। उन्होंने अपने सपनों को छोटा कर लिया ताकि बच्चों के सपने बड़े हो सकें। धीरे-धीरे समय बदलता गया।
बेटी बड़ी हुई। उसकी शादी अच्छे घर में हुई। आज वह दो बच्चों की माँ है और अपने परिवार में खुश है। राघव जब भी उससे मिलते, वह उनके पैर छूकर कहती, “अगर आप मुझे अपना नाम न देते तो शायद मेरा जीवन कुछ और होता।” उस एक वाक्य से राघव की सारी थकान उतर जाती।
लेकिन बेटा… उसके भीतर एक अजीब बेचैनी थी। वह मेहनत से ज्यादा किस्मत पर भरोसा करता था। रातों-रात अमीर बनने वाले वीडियो देखता। हर दूसरे दिन कोई नया बिजनेस प्लान। कभी क्रिप्टो। कभी ऑनलाइन ट्रेडिंग। कभी फिल्म बनाने का सपना। कभी करोड़ों की कंपनी खोलने की बातें। लेकिन मेहनत? वह उसे सबसे कठिन काम लगता।
राघव समझाते। “बेटा, सफलता सीढ़ी चढ़कर मिलती है, लिफ्ट से नहीं।” वह हँस देता। “पुराने जमाने की बातें मत किया करो।”
राघव चुप हो जाते। समय ने एक और मोड़ लिया। राघव और सुमित्रा के घर एक और बेटा पैदा हुआ। राघव ने सोचा था कि अब परिवार और मजबूत होगा। लेकिन शायद किस्मत कुछ और लिख चुकी थी। धीरे-धीरे सुमित्रा का झुकाव अपने बड़े बेटे की ओर बढ़ता गया। उसे उसकी हर गलती सही लगती। उसकी हर असफलता के लिए दुनिया जिम्मेदार होती। राघव कुछ कहते तो वही पुराना आरोप सामने आ जाता। “तुम्हें मेरे बच्चों से प्यार नहीं है।” राघव हैरान रह जाते।
जिन बच्चों के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया, उन्हीं के बारे में ऐसा आरोप? पूजा अब भी रोज़ होती थी अगरबत्ती जलती थी। मंत्र गूँजते थे। लेकिन घर के भीतर सम्मान का दीपक बुझता जा रहा था। सुमित्रा छोटी-छोटी बात पर राघव को अपमानित कर देती। कभी बच्चों के सामने। कभी रिश्तेदारों के सामने। कभी पड़ोसियों के सामने। राघव हर बार चुप रह जाते। उनकी चुप्पी को लोग कमजोरी समझते रहे। लेकिन सच यह था कि वह घर बचाने की कोशिश कर रहे थे।
एक दिन सुमित्रा ने गुस्से में कहा, “तुम्हारे भगवान ने तुम्हें क्या दिया?” राघव ने शांत स्वर में उत्तर दिया,
“मुझे इंसान बने रहने की ताकत दी।” “तो मंदिर क्यों नहीं जाते?” “क्योंकि मेरा भगवान मेरे साथ चलता है। उसे छोड़कर मैं उसे ढूँढ़ने कहाँ जाऊँ?”
“गीता नहीं पढ़ते।” “अगर गीता पढ़कर भी मैं अपने घर वालों का सम्मान न कर सकूँ तो पढ़ने का क्या लाभ?” “पुराण नहीं जानते।” “अगर पुराण याद हों और व्यवहार में प्रेम न हो तो ज्ञान अधूरा है।”
उस दिन पहली बार सुमित्रा के पास कोई उत्तर नहीं था। लेकिन अहंकार ने उसे चुप नहीं रहने दिया। राघव ने महसूस किया कि अब उनका होना ही घर में विवाद का कारण बन चुका है। उन्होंने किसी से शिकायत नहीं की। एक सुबह अपनी पुरानी डायरी, कुछ किताबें, दो जोड़ी कपड़े और एक पेन उठाया। बस इतना ही उनका सामान था। जाते-जाते उन्होंने पूजा वाले कमरे की ओर देखा। दीपक जल रहा था। उन्होंने मन ही मन कहा, “हे प्रभु, अगर तुम सचमुच यहीं हो तो इस घर में प्रेम लौटा देना।” और बिना किसी को जगाए घर छोड़ दिया।
जब सुमित्रा पूजा से बाहर आई तो कमरा खाली था। अलमारी का एक हिस्सा खाली था। टेबल पर एक चिट्ठी रखी थी।
उसमें लिखा था— “मैं हारकर नहीं जा रहा हूँ। मैं तुम्हें जीताकर भी नहीं जा रहा हूँ। मैं सिर्फ उस जगह से जा रहा हूँ जहाँ मेरे होने से हर दिन किसी का क्रोध बढ़ता है। तुम भगवान की पूजा करती रहना। मैं उसी भगवान को लोगों की मुस्कान में खोजने निकल रहा हूँ।अगर कभी तुम्हें लगे कि भगवान सिर्फ मंदिर में नहीं, किसी चुप रहने वाले इंसान के धैर्य में भी रहता है, तब मुझे याद कर लेना।”
सुमित्रा ने पत्र पढ़ा। पहली बार उसकी आँखों से आँसू निकले। लेकिन उस समय भी उसका अहंकार उसके आँसुओं से बड़ा था। उसने पत्र अलमारी में रख दिया। दिन बीतते गए। राघव शहर-शहर घूमते रहे। लेखन करते रहे। उनकी किताबें पहले से ज्यादा पढ़ी जाने लगीं।
लोग कहते, “इतना दर्द कोई कल्पना से नहीं लिख सकता।” उन्हें कौन बताता कि वह दर्द कल्पना नहीं था। वह जीवन था। उधर घर में पूजा पहले की तरह चलती रही। लेकिन अब घर में हँसी कम होती गई। बड़ा बेटा अब भी बिना मेहनत करोड़पति बनने के सपने देख रहा था।
योजनाएँ बनतीं। टूट जातीं। दोस्त बदलते। इरादे बदलते। लेकिन आदतें नहीं बदलतीं। छोटा बेटा चुपचाप पढ़ाई करता रहा। उसे पिता की कमी सबसे ज्यादा महसूस होती। लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की।
एक दिन सुमित्रा मंदिर से लौट रही थी। रास्ते में उसने एक वृद्ध को देखा। वह भूखा था। लोग निकल रहे थे। कोई नहीं रुका। उसे अचानक राघव की आवाज़ याद आई— “भूखे को भोजन खिलाओ, वहीं भगवान मिलेगा।” उसने पहली बार मंदिर का प्रसाद उस वृद्ध को दे दिया। वृद्ध मुस्कुराया। उस मुस्कान में उसे अजीब-सी शांति मिली। वह घर लौट आई। उस दिन उसने पूजा तो की, लेकिन पहली बार भगवान की मूर्ति से ज्यादा उस वृद्ध का चेहरा याद रहा।
कई महीने बाद उसकी बेटी आई। उसने माँ से पूछा, “पापा कहाँ हैं?” सुमित्रा ने नजरें झुका लीं।बेटी बोली,
“माँ, जिनके कारण आज मैं सम्मान से जी रही हूँ, क्या आपने कभी सोचा कि उन्हें सम्मान मिला भी या नहीं?” यह प्रश्न किसी तीर की तरह उसके भीतर उतर गया। रात को उसने वर्षों पुरानी वह चिट्ठी निकाली। हर शब्द अब पहले से अलग लग रहा था। उसे महसूस हुआ कि पूजा करना गलत नहीं था। गलत था पूजा के बाद भी किसी अपने का अपमान करना। भगवान को फूल चढ़ाना गलत नहीं था। गलत था उसी हाथ से किसी का आत्मसम्मान तोड़ देना।
कहते हैं, जीवन हमें देर से समझाता है। कभी-कभी इतनी देर से कि जिन्हें मनाना होता है, वे बहुत दूर जा चुके होते हैं। राघव आज भी लिख रहे हैं। उनकी कहानियों में मंदिर भी आता है, मस्जिद भी, गुरुद्वारा भी और चर्च भी। लेकिन हर कहानी के अंत में एक बात जरूर होती है— “ईश्वर किसी भवन में कैद नहीं होता। वह उस हृदय में बसता है जहाँ सम्मान, करुणा, त्याग और प्रेम जीवित रहते हैं।”
और शायद यही इस कहानी का सबसे बड़ा सत्य है। पूजा मन को निर्मल बना सकती है, लेकिन यदि वही मन अपनों के लिए कठोर हो जाए तो पूजा केवल एक कर्मकांड बनकर रह जाती है।
जिस लेखक ने किसी और के बच्चों को अपना नाम दिया, अपना जीवन दिया, अपना भविष्य दाँव पर लगा दिया, उसने बदले में धन नहीं माँगा, प्रसिद्धि नहीं माँगी, केवल सम्मान माँगा। और जब सम्मान ही घर से चला गया, तब उसने घर छोड़ दिया—क्रोध में नहीं, बल्कि शांति की तलाश में।
कहानी का अंत खुला है। शायद एक दिन सुमित्रा अपने भीतर बैठे अहंकार को हराकर राघव को खोजने निकले। शायद राघव लौट आएँ। और शायद वे कभी न लौटें। लेकिन यदि इस पूरी कहानी से कोई एक बात बची रहती है, तो वह यही है— भगवान मंदिरों में अवश्य हैं, ग्रंथों में भी हैं, लेकिन यदि वे हमारे व्यवहार, हमारे शब्दों और हमारे संबंधों में दिखाई नहीं देते, तो हमारी सारी पूजा अधूरी रह जाती है।








