नौवीं मुहर्रम पर अकीदत का माहौल, कर्बला के शहीदों की याद में हुईं मजलिसें और मातम
खुखुन्दू समेत दर्जनों गांवों में ताज़ियादारों ने तेज की तैयारियां, चौकियों की सफाई और इनामी प्रतियोगिताओं की तैयारी
इरफान अली लारी की रिपोर्ट
देवरिया जनपद के खुखुन्दू क्षेत्र सहित आसपास के ग्रामीण इलाकों में नौवीं मुहर्रम (तासूआ) का पर्व अत्यंत श्रद्धा, आस्था और धार्मिक भावना के साथ मनाया जा रहा है। इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम की नौवीं तारीख को विशेष महत्व प्राप्त है। यह दिन दसवीं मुहर्रम यानी यौम-ए-आशूरा की तैयारी का दिन माना जाता है, जब कर्बला के शहीदों विशेष रूप से हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की कुर्बानी को याद किया जाता है।
क्षेत्र के खुखुन्दू, भटहर, खिरसर, सिसवार, जैतपुरा, जुआफर, खजूरी, नरौली खेम, नरौली भीखम, तेनुआ, मरहवा और धनौती सहित अनेक गांवों में नौवीं मुहर्रम पर मजलिसों, मातमी कार्यक्रमों और धार्मिक आयोजनों का सिलसिला पूरे दिन जारी रहा। अकीदतमंदों ने काले लिबास पहनकर कर्बला के शहीदों को याद किया और उनकी कुर्बानी को मानवता तथा न्याय की रक्षा का प्रतीक बताया।
तासूआ का धार्मिक महत्व
इस्लामी परंपरा में मुहर्रम का महीना अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह हिजरी वर्ष का पहला महीना है और इसी से इस्लामी नववर्ष की शुरुआत होती है। मुहर्रम इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शामिल है, जिनका विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है।
नौवीं मुहर्रम, जिसे तासूआ कहा जाता है, दसवीं मुहर्रम यानी आशूरा के रोज़े की तैयारी का दिन माना जाता है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार नौवीं और दसवीं मुहर्रम का रोज़ा रखने की विशेष फज़ीलत है। हदीसों में उल्लेख मिलता है कि रमजान के बाद मुहर्रम के महीने में रखा जाने वाला रोज़ा सबसे श्रेष्ठ माना गया है। मान्यता है कि आशूरा के रोज़े से अल्लाह बंदों के पिछले वर्ष के गुनाहों को माफ कर सकता है।
कर्बला की शहादत की याद में मनाया जाता है मुहर्रम
मुहर्रम का महीना विशेष रूप से कर्बला की ऐतिहासिक घटना के कारण जाना जाता है। इस्लामी इतिहास के अनुसार पैगंबर हजरत मुहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन ने अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष किया था। उन्होंने तत्कालीन शासक यजीद की बैअत स्वीकार करने से इनकार कर दिया था क्योंकि वे उसके शासन को इस्लामी सिद्धांतों के विपरीत मानते थे।
इतिहासकारों के अनुसार यजीद ने स्वयं को खलीफा घोषित कर दिया था और अपने शासन को बलपूर्वक स्वीकार कराने का प्रयास कर रहा था। जब इमाम हुसैन ने उसके आदेश को मानने से इंकार किया तो उनके ऊपर दबाव बढ़ाया गया। इसके बाद वे अपने परिवार और साथियों के साथ मक्का से इराक की ओर रवाना हुए।
कर्बला में हुई मानवता की सबसे बड़ी कुर्बानियों में से एक
61 हिजरी में कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन और उनके साथियों को यजीद की विशाल सेना ने घेर लिया। कई दिनों तक पानी की आपूर्ति रोक दी गई। इसके बावजूद इमाम हुसैन ने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
नौवीं मुहर्रम की रात उन्होंने इबादत और दुआ में बिताने के लिए मोहलत मांगी। इसके बाद दसवीं मुहर्रम यानी आशूरा के दिन कर्बला के मैदान में युद्ध हुआ। इस संघर्ष में इमाम हुसैन के परिवार और उनके 72 साथी शहीद हो गए।
कर्बला की घटना को केवल एक युद्ध नहीं बल्कि सत्य, न्याय, मानवता और धार्मिक मूल्यों की रक्षा के लिए दी गई महान कुर्बानी के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि दुनिया भर के मुसलमान विशेष रूप से शिया समुदाय के लोग मुहर्रम के दिनों में कर्बला के शहीदों को याद करते हैं और उनकी शिक्षाओं से प्रेरणा लेते हैं।
चौकियों की सफाई और ताज़ियों की तैयारियां तेज
खुखुन्दू क्षेत्र में ताज़ियादारों ने अपने-अपने ताज़ियों और चौकियों की तैयारियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। विभिन्न गांवों में चौकियों की साफ-सफाई युद्ध स्तर पर की जा रही है। ताज़ियों को सजाने और धार्मिक कार्यक्रमों की व्यवस्था में स्थानीय लोग बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में मुहर्रम के अवसर पर पारंपरिक कार्यक्रमों के साथ-साथ सामाजिक सौहार्द का भी संदेश देखने को मिल रहा है। विभिन्न समुदायों के लोग भी व्यवस्थाओं में सहयोग कर रहे हैं।
आशूरा के अवसर पर होंगे विशेष आयोजन
स्थानीय आयोजकों के अनुसार दसवीं मुहर्रम के दिन कर्बला मैदान में कई धार्मिक और पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसके साथ ही इनामी प्रतियोगिताओं का आयोजन भी प्रस्तावित है, जिसमें क्षेत्र के युवाओं और बच्चों की सहभागिता रहेगी।
धार्मिक जानकारों का कहना है कि मुहर्रम केवल शोक का पर्व नहीं बल्कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने, सत्य के मार्ग पर चलने और मानवता की रक्षा के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देने वाला अवसर भी है। कर्बला की घटना आज भी दुनिया को यह संदेश देती है कि सत्य और न्याय की रक्षा के लिए किसी भी प्रकार का त्याग छोटा नहीं होता।
नौवीं मुहर्रम पर क्षेत्रभर में आयोजित मजलिसों, मातमी जुलूसों और धार्मिक सभाओं में कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। अकीदतमंदों ने अमन, भाईचारे और मानव कल्याण की दुआ करते हुए यौम-ए-आशूरा की तैयारियों को अंतिम रूप दिया।








